मंगलवार, 28 अप्रैल 2009
मुद्दों का अकाल और हार का डर
लोकसभा चुनाव के लिए प्रचार का दौर शुरू होते ही व्यक्तिगत टीका-टिप्पणियों और आक्षेपों की बाढ़ सी आ गई। यही सिलसिला 1999 के आम चुनाव में भी देखने को मिला था। तब निशाने पर थीं कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी, लेकिन इस बार सोनिया से अधिक निशाने पर हैं प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह।
भाजपा के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार लालकृष्ण आडवाणी ने उन्हें ‘अब तक का सबसे कमजोर प्रधानमंत्रीज् बताते हुए टेलीविजन पर खुली बहस की चुनौती दे डाली, तो पिछले पांच साल से लगातार अपने लिए ‘कमजोरज् शब्द सुनकर संयमित माने जाने वाले मनमोहन सिंह भी जसे फट पड़े। उन्होंने यह कहकर आडवाणी का प्रस्ताव नकार दिया कि ऐसा करके मैं उन्हें प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार का दर्जा नहीं देना चाहता। उन्होंने यह भी कहा, ‘मैं कर्मयोगी हूं, करने में यकीन रखता हूं, जबकि आडवाणी सिर्फ बयान बहादुर हैं।ज्
विवाद यहीं नहीं थमा। भाजपा के प्रमुख सहयोगी शिवसेना प्रमुख बाल ठाकरे ने उन्हें ‘गुलाम सिंहज् कहा। साफ है कि निशाने पर सोनिया और मनमोहन दोनों थे। लेकिन सोनिया भी कहां चुप रहने वाली थीं। चुनावी समर में अपने ‘सेनापतिज् का बचाव करते हुए आडवाणी को ‘संघ का गुलामज् बता डाला। इससे पहले भाजपा के फायरब्रांड नेता नरें्र मोदी ने ‘बुढ़िया पार्टीज् और ‘गुड़िया पार्टीज् कहकर कांग्रेस की खिल्ली उड़ाई, जिसका प्रियंका गांधी ने यह कहकर जवाब दिया कि ‘क्या मैं बूढ़ी दिखती हूं?ज् वहीं कांग्रेस के एक अन्य वरिष्ठ नेता कपिल सिब्बल ने तो भाजपा नेताओं को ‘दिमागी इलाजज् की जरूरत बता दी।
एक-दूसरे के खिलाफ व्यक्तिगत आक्षेपों की यह बानगी 1952 के आम चुनाव से लेकर 1990 के दशक के उत्तरार्ध तक नहीं देखने को मिली थी। ऐसा नहीं है कि पहले नेताओं में खींचतान नहीं थी, वैचारिक मतभेद नहीं थे। लेकिन उन्होंने कभी इसे सार्वजनिक नहीं किया। आज यदि नेता अपना संयम खोते जा रहे हैं, तो इसकी सबसे बड़ी वजह यह है कि राजनीति में मुद्दों का अकाल हो गया है। दलों की रीति-नीति स्पष्ट नहीं है। सभी के कार्यक्रम एवं घोषणा-पत्र लगभग एक जसे हो गए हैं। सभी जनता को सस्ता चावल, गेहूं, दाल, मुफ्त टीवी, कपड़े आदि से लुभाने की कोशिश कर रहे हैं। जबकि पहले के आम चुनाव सैद्धांतिक और वचारिक आधार पर लड़े जाते थे।
इसकी एक अन्य महत्वपूर्ण वजह नेताओं में ‘हार का डरज् भी है। आज कोई भी दल अपने वोट बैंक को लेकर बहुत आश्वस्त नहीं रह गया है। दरअसल, छोटे-छोटे दलों ने जनता के सामने कई विकल्प प्रस्तुत किए हैं, जबकि पहले ऐसा नहीं था। 1971 तक भारतीय राजनीति में कांग्रेस का ही प्रभुत्व रहा। 1977 में जनता पार्टी ने कांग्रेस का विकल्प जरूर प्रस्तुत किया, लेकिन 1980 और 1984 के चुनाव में एकबार फिर कांग्रेस ने अपना खोया जनाधार प्राप्त कर लिया। पर यह आगे जारी नहीं रह सका। 1989 से भारतीय राजनीति पर कांग्रेस का एकछत्र राज समाप्त हो गया। गठबंधन राजनीति के दौर में आज जनता के सामने कई विकल्प हैं। ऐसे में वोटर कहीं इधर-उधर न खिसक जाए, नेता हमेशा इसे लेकर आतंकित रहते हैं। लेकिन वे ‘किसी भी कीमत परज् जीतना भी चाहते हैं। जीतने की इस महत्वाकांक्षा से प्रेरित होकर ही वे व्यक्तिगत आक्षेपों के सहारे दूसरों को गलत बताकर खुद को अच्छा साबित करने की कोशिश करते हैं।
सहानुभूति की राजनीति
तमिलनाडु में इन दिनों सत्तारूढ़ और कें्र में सहभागी डीएमके की नींद उड़ी हुई है। कांग्रेस, जो कें्र में संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन सरकार का नेतृत्व कर रही है और राज्य में डीएमके को समर्थन दे रही है, भी मुश्किल में पड़ सकती है। दरअसल लिट्टे के खिलाफ श्रीलंका की सैन्य कार्रवाई ने विपक्षी दलों को एक ऐसा मुद्दा थमा दिया है, जिसका चुनाव में उन्हें लाभ मिलना तय माना जा रहा है। तमिलनाडु का श्रीलंकाई तमिलों से गहरा भावनात्मक संबंध है और यह चुनाव का समय है। इसलिए इस मुद्दे को सभी दल भुनाना चाहते हैं।
भारत सहित तमाम दूसरे देशों, अंतर्राष्ट्रीय संस्थाओं एवं एजेंसियों की अपील को दरकिनार कर श्रीलंका की सेना जिस तरह लगातार लिट्टे के सफाए के लिए आगे बढ़ रही है, उससे तमिल व्रिोहियों के अलावा एक हजार से ज्यादा मासूम व निर्दोष आम तमिल मारे जा चुके हैं, जबकि लाखों की संख्या में लोग दर-बदर हुए हैं। पलायन को मजबूर लोग बड़ी संख्या में तमिलनाडु का रुख कर रहे हैं। विपक्षी पार्टियां इसे एक बड़ा मुद्दा बनाकर सरकार को घेरने की कोशिश कर रही हैं। उनका आरोप है कि कें्र सरकार में भागीदार रहते हुए डीएमके उसे श्रीलंका पर युद्धविराम के लिए दबाव बनाने को तैयार करने में नाकाम रही। एआईएडीएमके प्रमुख जयललिता ने इस मुद्दे पर करुणानिधि को ‘कमजोरज् मुख्यमंत्री करार दिया है, जो कोई भी त्वरित व साहसिक निर्णय लेने में सक्षम नहीं हैं। वहीं एमडीएमके प्रमुख वाइको ने तो लिट्टे के खिलाफ सैन्य कार्रवाई नहीं रुकवा पाने की स्थ्िित में राष्ट्रीय एकता को खतरे तक की बात कह डाली।
इस मुद्दे पर लगातार विपक्ष के हमले ङोल रही डीएमके ने स्वयं को ‘तमिलों का सबसे बड़ा हितैषीज् बताने के लिए गुरुवार को राज्य में बंद का भी आह्वान किया, लेकिन विपक्ष ने इसे ‘नौटंकीज् करार दिया है। वास्तव में तमिलनाडु के राजनीतिक दल इस बात से भलीभांति परिचित हैं कि भले ही भारत सहित दुनियाभर के 30 देशों ने लिट्टे को आतंकवादी संगठन घोषित कर रखा हो, लेकिन आम तमिलों के बीच आज भी संगठन के सरगना वेल्लु प्रभाकरन को बड़ा दर्जा हासिल है। वे मानते हैं कि वह ‘उनके हितों की लड़ाईज् लड़ रहा है। वैसे जनता पार्टी के अध्यक्ष सुब्रमण्यम स्वामी जसे लोगों की भी कमी नहीं है, जो लिट्टे को आतंकवादी संगठन मानते हैं और उनके सफाए के समर्थक हैं।
प्रभाकरन को लेकर तमिलनाडु के मुख्यमंत्री और डीएमके प्रमुख एम करुणानिधि का ताजा बयान इसी संदर्भ में लिया जाना चाहिए। हालांकि इस पार्टी की सहानुभूति पहले से ही लिट्टे से रही है, लेकिन संप्रग ने पिछले साल मई में जब दो साल के लिए लिट्टे पर प्रतिबंध बढ़ाने का फैसला किया तो डीएमके भी उसमें शामिल थी। तब शायद गठबंधन राजनीति की मजबूरी ने उसे फैसले का विरोध नहीं करने दिया। लेकिन अब जब चुनाव सिर पर है, तो प्रभाकरन को ‘दोस्तज् और ‘आतंकवादी नहींज् बताना डीएमके प्रमुख एम करुणानिधि की राजनीतिक मजबूरी बन गई है।
तमिलनाडु की मौजूदा राजनीति पर गौर करें तो वहां दो गठबंधन चुनावी समर में ताल ठोंकते नजर आ रहे हैं। सत्तारूढ़ डीएमके-कांग्रेस गठबंधन में डीएमके की लिट्टे के प्रति सहानुभूति रही है, तो कांग्रेस उसकी कट्टर विरोधी है। डीएमके पर तमिलनाडु में सत्तारूढ़ रहते हुए कई बार व्रिोहियों को भारत में प्रवेश का सुरक्षित रास्ता देने के लिए भी उंगली उठी। उधर, प्रभाकरन को लेकर कांग्रेस की पीड़ा समझी जा सकती है। जांच एजेंसियों से पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी की हत्या में इस संगठन और प्रभाकरन का हाथ साबित हो चुका है। यही वजह है कि करुणानिधि ने जसे ही प्रभाकरन को ‘दोस्तज् बताया, कांग्रेस ने स्वयं को इससे अलग कर लिया और कहा कि लिट्टे को आतंकवादी संगठन मानने की उसकी नीति में कोई परिवर्तन नहीं आया है। प्रियंका गांधी ने भी साफ कर दिया कि लिट्टे प्रमुख को लेकर उनके मन में न तो कोई सहानुभूति है, न नफरत की भावना; लेकिन एक राष्ट्र के रूप में भारत कभी प्रभाकरन को माफ नहीं कर सकता, जिसने उसके पूर्व प्रधानमंत्री की हत्या की।
दूसरी तरफ एआईएडीएमके के नेतृत्व वाला गठबंधन है, जिसमें वाइको की पार्टी एमडीएमके और पीएमके भी शामिल है। एआईएडीएमके लिट्टे की धुर विरोधी है, जबकि वाइको लिट्टे के मुखर समर्थक हैं। लिट्टे के प्रति खुले समर्थन के कारण ही जयललिता ने मुख्यमंत्री रहते हुए वाइको को पोटा के तहत जेल भेज दिया था, जब वह कें्र में मंत्री थे। आज वही वाइको जयललिता के साथ हैं। पीएमके फिलहाल जयललिता के साथ है, लेकिन अब तक वह कें्र में सहभागी थी, इसलिए चुनाव में लोगों को रुख उसके खिलाफ भी जा सकता है। लोकसभा चुनाव के बाद जयललिता इस मुद्दे को लेकर डीएमके से समर्थन वापसी और राज्य में विधानसभा चुनाव के लिए भी कांग्रेस पर दबाव बना सकती है।
उधर, प्रभाकरन को लेकर करुणानिधि के हालिया बयान से वाम दलों में भी खलबली है। उनके इस बयान के बाद तीसरे मोर्चे में दरार की आशंका जताई जा रही है। वाम दलों को डर सता रहा है कि करुणानिधि के बयान से आहत कांग्रेस चुनाव बाद खुद को डीएमके से अलग कर सकती है और जयललिता, जो पहले से ही कांग्रेस के साथ गठबंधन की इच्छा जता चुकी हैं, कांग्रेस का दामन थाम सकती हैं।
शनिवार, 18 अप्रैल 2009
खम्मम-संसद रोड पर रोड़े ही रोड़े
पिछले चुनाव में रेणुका चौधरी ने उन्हें भारी मतों के अंतर से हराया था। इससे पहले 1999 में भी रेणुका चौधरी ही यहां से निर्वाचित हुई थीं। पिछले दो चुनाव परिणाम से उत्साहित रेणुका हैट्ट्रिक करना चाहती हैं। लेकिन इस बार उनकी राह आसान नहीं है। दूसरी बार यहां से किस्मत आजमा रहे नागेश्वर राव इस चुनाव में टीडीपी के अकेले उम्मीदवार नहीं हैं, बल्कि उन्हें वाम दलों और तेलंगाना राष्ट्र समिति का समर्थन भी हासिल है। टीडीपी, टीआएस और वाम दलों के संयुक्त उम्मीदवार के रूप में वह रेणुका को जबरदस्त चुनौती दे रहे हैं। हालांकि वाम दलों के कुछ जमीनी कार्यकर्ता इस बात से नाराज हैं कि टीडीपी-टीआरएस-वाम गठबंधन के प्रत्याशी के रूप में एक गैर-वामपंथी व्यक्ति को चुन लिया गया है। लेकिन वाम दलों के औपचारिक समर्थन से नागेश्वर राव का आत्मविश्वास तो बढ़ा ही है।
वहीं, रेणुका के सामने कई चुनौतियां हैं। विकास कार्यो को लेकर क्षेत्र की जनता उनसे खासी नाराज है, तो कांग्रेसियों का एक खेमा भी खम्मम संसदीय क्षेत्र के अंतर्गत आने वाले विधानसभा सीटों के लिए उम्मीदवारों के चयन से नाराज है। साथ ही सत्ता विरोधी भावना भी उनके खिलाफ जा सकती है। इसके अलावा अलग तेलंगाना राज्य की मांग भी इन दिनों आंध्र में जोरों पर हैं। टीआरएस इसे लेकर मुहिम चला रही है, जिसमें इस बार उसे टीडीपी और वाम दलों का भी साथ मिल गया है। जाहिर है तेलंगाना आंदोलन रेणुका सहित कांग्रेस के अन्य उम्मीदवारों के लिए परेशानी का सबब बन सकता है।
चीं-चीं पकड़े गए तो खीं-खीं
अपनों के बीच चीं-चीं के नाम से जाने जाने वाले गोविंदा ने 2004 में राजनीतिक पारी की शुरुआत की। कांग्रेस की सदस्यता ग्रहण की और उत्तर मुंबई से पार्टी के उम्मीदवार बने। जनता और पार्टी को उनसे बहुत सी अपेक्षाएं थी। लेकिन उन्होंने केवल पार्टी की उम्मीद पूरी की, जनता की उम्मीदों पर खरे नहीं उतरे। भाजपा उम्मीदवार व तत्कालीन कें्रीय मंत्री राम नईक को उन्होंने रिकॉर्ड मतों से हराया। माना जाता है कि गोविंदा की जीत और राम नईक की हार सुनिश्चित करने में उत्तर मुंबई संसदीय क्षेत्र के गुजराती मुस्लिम समुदाय ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इसलिए इसे भाजपा के प्रति उनके आक्रोश के रूप में भी देखा जा सकता है, जिसका लाभ गोविंदा को मिला।
लेकिन यह अभिनेता जनता से मिले प्रेम और उनके भरोसे को बरकरार नहीं रख पाया। फिल्मों में गरीब, मजबूर और बेबस लोगों के मसीहा के रूप में सामने आने वाले गोविंदा ने वास्तविक धरातल पर कभी अपने संसदीय क्षेत्र के लोगों की सुध नहीं ली। क्षेत्र के विकास तो दूर उन्होंने एकबार भी अपने संसदीय क्षेत्र के दौरे की जरूरत नहीं समझी। 2004 में चुनाव मैदान में उतरने से पहले उन्होंने ‘आवास, प्रवास, स्वास्थ्य और ज्ञानज् का नारा दिया था, लेकिन सांसद चुने जाने के बाद उन्होंने अपने ही नारे को भुला दिया।
जनता विकास और मदद को तरसती रही और अभिनेता सांसद न जाने कहां गायब रहे। यही वजह रही कि उनके क्षेत्र के लोगों ने अपने ही सांसद की गुमशुदगी रिपोर्ट दर्ज करा दी। दरअसल, जुलाई 2005 में जब मुंबई बारिश के पानी में डूब रहा था, उत्तर मुंबई के हजारों लोगों ने बड़ी आस लेकर गोविंदा को ढूढं़ने और उनसे मिलने की कोशिश की, लेकिन लोगों को उनका कहीं अता-पता नहीं चला। नाराज लोगों ने अपने सांसद के खिलाफ गुमशुदगी रिपोर्ट दर्ज करा दी।
और तो और, पांच साल के संसदीय कार्यकाल में संसद सत्र के दौरान उनकी उपस्थिति नाम मात्र की रही। इस दौरान न तो उन्होंने किसी चर्चा में भाग लिया और न ही कोई सवाल किया। सांसदों को अपने क्षेत्र के विकास के लिए जो राशि मिलती है, शुरुआती दिनों में गोविंदा ने उसका भी उपयोग नहीं किया। अखबारों, समाचार चैनलों पर यह खबर चली तब उन्हें इसकी सुध आई। लेकिन जल्द ही वह दोबारा इस बात को भूल गए। उत्तर मुंबई के दूर-दराज के क्षेत्रों के लोग अब भी पानी, बिजली और सड़क की समस्या से जूझ रहे हैं।
इसके अलावा उन्होंने अपने विवादास्पद बयान से कांग्रेस और महाराष्ट्र में उसकी सहयोगी पार्टी राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के लिए भी मुश्किल खड़ी की। उन्होंने मुंबई में ‘डांस बारज् पर प्रतिबंध लगाने के फैसले का विरोध किया, जबकि यह निर्णय महाराष्ट्र में सत्तारूढ़ उनकी पार्टी कांग्रेस और एनसीपी ने ही लिया था। इस तरह गोविंदा ने न केवल अपने क्षेत्र की जनता, बल्कि पार्टी को भी नाराज किया। ऐसे में उनका टिकट कटना तो तय ही था।
तमाम आलोचनाओं के बीच जनवरी 2008 में गोविंदा ने कहा था कि वह अब राजनीति नहीं करेंगे और पूरा समय अपने अभिनय करियर को देंगे, लेकिन 2009 के लोकसभा चुनाव की घोषणा के साथ ही वह राजनीति में दोबारा उतरने का अपना मोह नहीं छोड़ पाए। जो गोविंदा मुसीबत के समय अपने क्षेत्र के लोगों को ढूंढ़े नहीं मिल नहीं रहे थे, वह होली के समय अपने आवास पर लोगों के बीच रुपए बांटते पाए गए। उनके इस कदम ने साफ कर दिया था कि वह दोबारा चुनाव लड़ने के इच्छुक हैं। लेकिन पार्टी कोई रिस्क नहीं लेना चाहती थी। उसे भलीभांति अंदाजा था कि उत्तर मुंबई की जनता में गोविंदा के प्रति नाराजगी सिर चढ़कर बोल रही है। यही वजह रही कि इस सिने अभिनेता को दरकिनार कर पार्टी ने उत्तर मुंबई से शिवसेना से कांग्रेस का रुख करने वाले संजय निरुपम को टिकट दिया।
अब अर्जुन बे-बान
अर्जुन सिंह कांग्रेस के वरिष्ठ व वयोवृद्ध नेता हैं और कें्र में मानव संसाधन विकास मंत्री भी। उम्र का एक एक बड़ा हिस्सा उन्होंने कांग्रेस में गुजार दिया। स्वाभाविक रूप से उन्हें पार्टी से कुछ अपेक्षाएं रहीं। कभी अपेक्षाएं पूरी हुईं, तो कभी निराशा भी हाथ लगी और ऐसे में मन में व्रिोह भी जागा। व्रिोह की यही भावना थी कि 1990 के दशक में उन्होंने नारायण दत्त तिवारी के साथ ऑल इंडिया इंदिरा कांग्रेस (तिवारी) का गठन किया। लेकिन जसे सुबह का भूला शाम को घर लौट आता है, अर्जुन सिंह की भी घर वापसी हुई।
2004 में कांग्रेस नेतृत्व में जब संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन की सरकार बनी तो वह मानव संसाधन विकास मंत्री बने। उम्मीद थी कि अब उनकी अपेक्षाएं दरकिनार नहीं होंगी। लेकिन उन्हें फिर निराशा हाथ लगी और कई मौके पर तो आंसू छलक पड़े। 15वीं लोकसभा चुनाव की घोषणा हुई तो बेटी वीणा सिंह ने मध्य प्रदेश के सीधी और बेटे अजय सिंह, जो राज्य में विधायक हैं, ने सतना संसदीय सीट से कें्रीय राजनीति में उतरने की इच्छा जताई। पिता के नाते उन्होंने बच्चों की मंशा को पूरा समर्थन दिया और पार्टी आलाकमान तक यह बात भी पहुंचा दी। लेकिन पार्टी ने सतना से सुधीर सिंह तोमर और सीधी से इं्रजीत पटेल को उम्मीदवार बनाया। बर्जुन के बेटे-बेटी को नहीं। यह अलग बात है कि तोमर और पटेली अर्जुन ¨सह खेमे के ही सदस्य हैं। वैसे कहा यह जा रहा था कि खुद अर्जुन ¨सह का जोर वीणा को टिकट के लिए था।
वंचित वीणा ने निस्संदेह पिता को आहत किया। शायद यही वजह रही कि बलिया में एक चुनावी सभा में इसका जिक्र आने पर उनकी आंखें नम हो गईं। बाद में पत्रकारों ने इसका कारण पूछा तो उन्होंने केवल इतना कहा, ‘इस उम्र में ऐसा होता हैज्। उधर, कांग्रेस आलाकमान के इनकार के बाद वीणा सिंह ने सीधी से बतौर निर्दलीय उम्मीदवार नामांकन दाखिल कर दिया। हालांकि एक पिता यहां धर्मसंकट में पड़ गया कि वह बेटी के लिए प्रचार करे या एक निष्ठावान कार्यकर्ता की तरह पार्टी के उम्मीदवार के पक्ष में। बिना किसी देरी के उन्होंने पार्टी उम्मीदवार के पक्ष में प्रचार का औपचारिक एलान कर इस बारे में तमाम अटकलों पर विराम लगा दिया। लेकिन अर्जुन सिंह ऐसे आसान राजनीतिज्ञ भी नहीं हैं। इतनी लंबी पारी वह अपनी चतुराई व सूझबूझ के कारण ही खेल पाए। कुछ लोग तो यह भी मानते हैं कि अपने शीर्ष दिनों में उनके अति-चातुर्य ने उन्हें एक खास तरह से राजनीतिक हलकों में संदिग्ध बना दिया। उनकी हर बात, हर कदम को लोग संदेह से देखते हैं। यही संदेह वीणा की उम्मीदवारी में काम कर रहा है। जानकार कह रहे हैं कि वीणा के लिए अर्जुन ने चालाकी से बिसात बिछाई है। इसका राज तो तब खुलेगा, जब नाम वापसी होगी। यह देखना दिलचस्प होगा कि किसका पर्चा रद्द होता है और कौन नाम वापस लेता है।
सरकार में रहते हुए अर्जुन सिंह ने कई महत्वपूर्ण निर्णय लिए, तो कई बार अपने विवादास्पद बयानों से पार्टी के लिए मुश्किल भी खड़ी की। तमाम विरोध के बावजूद उन्होंने उच्च शिक्षण संस्थानों और कें्रीय विश्वविद्यालयों में अन्य पिछड़ा वर्ग के लिए आरक्षण का ऐतिहासिक फैसला किया। आरक्षण विरोधी छात्र फैसले के खिलाफ सड़कों पर उतर आए। उनपर मंडल राजनीति का दूसरा अध्याय शुरू करने का आरोप लगा। कहा गया कि वह सिर्फ वोट बैंक की राजनीति से प्रेरित होकर यह कदम उठा रहे हैं। फिर भी, उन्होंने अपना कदम पीछे नहीं हटाया। वहीं, पीलीभीत से भाजपा के उम्मीदवार वरुण गांधी के बारे में अपने हालिया बयान से उन्होंने पार्टी के लिए परेशानी भी पैदा कर दी। वरुण पर राष्ट्रीय सुरक्षा कानून लगाने के फैसले को उन्होंने ‘दुर्भाग्यपूर्णज् करार दिया। भाजपा ने उनके बयान को हाथों-हाथ लिया, तो कांग्रेस को सफाई देनी पड़ी कि यह उनके निजी विचार हैं। फिर मंत्रिमंडल के अपने सहयोगी लालू प्रसाद यादव के वरुण गांधी पर बयान की निंदा करते हुए भी उन्हें देर नहीं लगी।
अर्जुन सिंह गांधी परिवार के पुराने हिमायती रहे हैं। सोनिया को राजनीति में लाने और कांग्रेस सौंपने की मुहिम में वह शामिल रहे। इस कारण कांग्रेस से अलग हुए और सोनिया के आने पर वापस आ गए। लेकिन अपने कुछ बयनों के कारण वह गांधी परिवार की नजरों से उतर गए। जामिया मिलिया इस्लामिया विश्वविद्यालय के एक कार्यक्रम में तो सोनिया गांधी ने उनकी दुआ-सलाम तक कबूल नहीं की। इधर चुनाव के कारण उनकी आधिकारिक बायोग्राफी का विमोचन स्थगित हो गया। लेकिन जब भी वह आएगी, उसे लेकर हंगामा मचेगा। अर्जुन सिंह की पत्नी सरोज सिंह के हवाले से उसमें कहा गया है, ‘मैडम का क्या बिगड़ जाता, अगर उन्हें राष्ट्रपति बना देतीं।ज् चुनाव बाद अर्जुन सिंह पर नजर रखनी होगी। कांग्रेस सरकार बनने पर शायद ही वह मंत्री बनें। वैसे कभी उनकी हसरत भी प्रधानमंत्री बनने की थी। प्रणव मुखर्जी की तरह वह भी बेहद प्रतिभाशाली हैं। बल्कि कई मामलों में उनसे कहीं आगे भी। वह तो लगातार चुनावी हारों और शारीरिक अस्वस्थता के कारण मात खा गए हैं। अब उनमें वह बात नहीं कि वह पांसा पलट दें। पर हां, पार्टी और नेतृत्व को बगले तो झंकवा ही सकते हैं।
उल्लंघन के अन्य महत जन
आए दिन आयोग के पास आचार संहिता के उल्लंघन के मामले पहुंचते हैं। आयोग दलों को सख्त निर्देश देता है। इस दिशा में ठोस कार्रवाई भी करता है, फिर भी यह सिलसिला है कि रुकने का नाम नहीं ले रहा। हाल में असम के मुख्यमंत्री तरुण गोगोई और आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री वाईएस राजशेखर रेड्डी पर सरकारी मशीनरी के दुरुपयोग और अपने प्रभाव के इस्तेमाल का आरोप लगा। कई अन्य नेताओं पर भी ऐसे आरोप लग चुके हैं, जो आदर्श आचार संहिता के उल्लंघन का मामला बनता है। लेकिन पार्टियां हैं कि सबक सीखने को तैयार नहीं।
असम की मुख्य विपक्षी पार्टी असम गण परिषद ने चुनाव आयोग को दी शिकायत में आरोप लगाया है कि गोगोई ने अपने प्रभाव का इस्तेमाल कर चाय बगान के मालिकों से कांग्रेस के पक्ष में राजनीतिक चंदा इकट्ठा किया। साथ ही यह भी कहा गया कि अपनी हाल की कोलकाता यात्रा के दौरान उन्होंने सरकारी सेवाओं का लाभ लिया। हालांकि आयोग के पूछे जाने पर गोगोई ने साफ किया कि उनकी यात्रा पूरी तरह निजी थी, चुनाव से इसका कोई लेना-देना नहीं था। लेकिन आयोग ने स्पष्ट कर दिया कि एकबार चुनाव प्रक्रिया शुरू हो जाने के बाद निजी यात्रा के दौरान भी सरकारी मशीनरी का इस्तेमाल नहीं किया जा सकता। आयोग ने सख्त लहजे में उन्हें भविष्य में इसका ध्यान रखने और ऐसी गलती नहीं दोहराने का निर्देश दिया।
उधर, आंध्र प्रदेश में तेलंगाना राष्ट्रसमिति के नेता चं्रशेखर राव ने मुख्यमंत्री वाईएस राजशेखर रेड्डी चुनाव प्रचार के दौरान सरकारी भवन के इस्तेमाल का आरोप लगाया। साथ ही मुख्य निर्वाचन अधिकारी ने मुख्यमंत्री वाईएस रेड्डी के दामाद अनिल कुमार को करीमनगर के एक गेस्ट हाउस में 10.40 लाख से अधिक रुपए के साथ तीन पादरियों से मिलने के आरोप में जवाब-तलब किया है। आंध्र की मुख्य विपक्षी पार्टी टीडीपी और भाजपा का आरोप है कि मुख्यमंत्री का दामाद होने के नाते अपने प्रभाव का इस्तेमाल कर अनिल कुमार एक समुदाय विशेष के लोगों का वोट हासिल करने की जुगत में हैं। हालांकि अनिल कुमार और पादरियों का कहना है कि इस राशि का चुनाव से कोई लेना-देना है, बल्कि यह धार्मिक कार्यो के लिए है।
वहीं, हरियाणा की मुख्य विपक्षी पार्टी इंडियन नेशनल लोकदल ने चुनाव आयोग में मुख्यमंत्री भूपें्र सिंह हुड्डा के दो मीडिया सलाहकार और चार मीडिया समन्वयक के खिलाफ शिकायत दी, जिसमें उन पर सरकारी वाहनों एवं सुविधाओं के इस्तेमाल का आरोप लगाया गया। आयोग तक शिकायत पहुंचने के बाद हरियाणा सरकार के जनसंपर्क विभाग को मुख्यमंत्री के दो मीडिया सलाहकार और दो मीडिया समन्वयक को सरकारी वाहनों या सुविधाओं का इस्तेमाल नहीं करने का सख्त निर्देश दिया।
इस बीच झारखंड भाजपा ने प्रदेश के राज्यपाल सैयद सिब्ते रजी पर आचार संहिता लागू हो जाने के बाद नई योजनाएं शुरू करने का आरोप लगाया। उनका कहना है कि चुनाव घोषित हो जाने के बाद राज्यपाल ने राज्यकर्मियों के भत्ते में वृद्धि की घोषणा की है, जो आदर्श आचार संहिता का उल्लंघन है। वहीं, महाराष्ट्र भाजपा ने भी राज्य की कांग्रेस-एनसीपी गठबंधन सरकार पर जनता के धन के दुरुपयोग का आरोप लगाया। राज्य के मुख्य निर्वाचन अधिकारी को दी शिकायत में प्रदेश भाजपा ने कहा है कि पार्टी के प्रचार के लिए सरकार रेडियो, टेलीविजन और विज्ञापन पर आम जनता का पैसा पानी की तरह बहा रही है।
इससे पहले आयोग सरकारी भवन के इस्तेमाल को लेकर भाजपा नेता मेनका गांधी को भी नोटिस जारी कर चुका है। साथ ही समाजवादी पार्टी के नेता मुलायम सिंह को भी ‘होली मिलनज् के नाम पर लोगों के बीच वोट बांटने के लिए नोटिस जारी किया गया। हाल ही में भाजपा नेता जसवंत सिंह और पार्टी के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष कैलाश मेघवाल पर भी ग्रामीणों के बीच रुपए बांटने का आरोप लगा। चुनाव आयोग ऐसी शिकायतों को लेकर सख्त तो दिखता है, लेकिन तमाम सख्ती के बावजूद ऐसी शिकायतें लगातार आयोग तक पहुंच रही हैं। साफ है कि विभिन्न राजनीतिक दल इसे लेकर गंभीर नहीं हैं। अब देखना है कि आखिर कब रुकता है यह सिलसिला।
शनिवार, 28 मार्च 2009
जेटली से खलबली
जेटली की नाराजगी से पार्टी में बेचैनी साफ दिख रही है। खासतौर पर आडवाणी की चिंता समझी जा सकती है। हालांकि वह इसे छोटी-मोटी बात कहकर टाल रहे हैं, लेकिन प्रधानमंत्री पद पर उनकी दावेदारी के लिए ताजा विवाद किसी अपशकुन से कम नहीं है। वैसे भी जेटली की गिनती पार्टी के जिताऊ रणनीतिकारों में जो होती है। पेशे से वकील जेटली ने भले ही अब तक कोई लोकसभा चुनाव नहीं जीता हो, लेकिन कई राज्यों में बतौर प्रभारी चुनाव के लिए ऐसी रणनीति बनाई कि पार्टी को जबरदस्त सफलता मिली। कर्नाटक दक्षिणी राज्यों में पहला प्रदेश है, जहां भाजपा ने 2004 के लोकसभा व विधानसभा चुनाव और 2008 के विधानसभा चुनाव में प्रभावशाली उपस्थिति दर्ज की। इसका श्रेय भी जेटली को ही जाता है, क्योंकि तब वही राज्य के प्रभारी थे। जम्मू-कश्मीर, जहां भाजपा की उपस्थिति नहीं के बराबर थी, में भी 2008 के विधानसभा चुनाव में पार्टी ने बेहतर प्रदर्शन किया और वहां भी जेटली ही राज्य प्रभारी थे। इसके अलावा गुजरात, पंजाब, बिहार के विधानसभा और दिल्ली नगर निगम चुनाव में पार्टी की सफलता भी जेटली की झोली में ही जाती है।
जेटली पार्टी का वह चेहरा हैं, जो अपने बेबाक अंदाज और साफ-सुथरी छवि के लिए भी जाना जाता है। टीवी चैनलों पर वह पार्टी के सबसे उम्दा वकील हैं, जिनका लोहा विपक्षी भी मानते हैं। उनका तर्क है कि व्यवासायी सुधांशु मित्तल को उत्तर पूर्वी राज्यों का सह प्रभारी बनाए जाने से पार्टी में धनबल और भ्रष्टाचार को बढ़ावा मिलेगा। लेकिन मित्तल को राजनाथ का समर्थन प्राप्त है और पार्टी अध्यक्ष ने साफ कर दिया है कि वह किसी के दबाव में उनकी नियुक्ति रद्द नहीं करेंगे। गौरतलब है कि मित्तल स्व. प्रमोद महाजन के खासमखास हुआ करते थे। पार्टी के वरिष्ठ नेता और आरएसएस भी इस बात से भलीभांति वाकिफ है कि जेटली-राजनाथ विवाद यदि यूं ही जारी रहा, तो यह चुनाव में पार्टी के लिए परेशानी का सबब बन सकती है। यही वजह है कि सभी राजनाथ-जेटली विवाद सुलझाने की कवायद में जुटे हैं। जेटली को मनाने के लिए तरह-तरह के फॉर्मूले पेश किए जा रहे हैं, लेकिन जेटली हैं कि टस से मस नहीं हो रहे।
वरुण ने खोला गटर-गेट
एक भड़काऊ भाषण और सबकी आंखों का तारा। भारतीय जनता पार्टी में वरुण गांधी का आज यही स्थान है। इस भड़काऊ और सांप्रदायिक भाषण से पहले वरुण गांधी जाने तो जाते थे, पर राजनीति में उनकी जगह नाकुछ ही थी। लेकिन आज उन्हें हर कोई जानता है। इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के माध्यम से देशभर में लोगों ने उनके ‘जहरीलेज् भाषण को सुना। उन्हें सुनने और जानने के लिए लोगों ने इंटरनेट पर हजारों बार क्लिक किया। ब्लॉग के माध्यम से वरुण के भाषण पर अंतर्राष्ट्रीय चर्चा होने लगी।
एक संप्रदाय विशेष के खिलाफ हमलावर तेवर अपनाने के बाद वरुण ने अंतर्राष्ट्रीय छवि तो हासिल की ही, भाजपा में हिंदू स्वाभिमान के नए प्रतीक के रूप में उभरे, जिसके लिए वह जानी जाती है। चुनाव आयोग द्वारा उन्हें सांप्रदायिक सद्भाव बिगाड़ने का दोषी करार दिए जाने और लोकसभा उम्मीदवार नहीं बनाने की सलाह देने के बावजूद भाजपा न केवल दृढ़ता से उनके साथ खड़ी है, बल्कि हर तरह से उनका बचाव कर रही है। पार्टी के वरिष्ठ नेता से लेकर अध्यक्ष तक आयोग को टका सा जवाब दे चुके हैं कि उसे यह सुझाव देने का हक नहीं है।
लेकिन कुछ साल पहले तक यही स्थिति नहीं थी। 2006 में मध्य प्रदेश का मुख्यमंत्री बनने के बाद जब शिवराज सिंह चौहान ने विदिशा संसदीय सीट छोड़ी, तो यहां से वरुण को उम्मीदवार बनाने की चर्चा जोरों पर थी, पर पार्टी ने इनकार कर दिया। लेकिन आज वही वरुण पार्टी में स्टार बनकर उभरे हैं। अचानक उनका कद नरें्र मोदी सरीखे भाजपा के उग्र हिंदूवाद के समर्थकों के समकक्ष जा खड़ा हुआ है। उत्तर प्रदेश सहित देश के अन्य हिस्सों से पार्टी उम्मीदवारों के पक्ष में प्रचार के लिए उन्हें बुलाया जा रहा है।
‘लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्सज्, जहां से वरुण ने पढ़ाई पूरी की, ने उनसे नाता तोड़ लिया। तो क्या हुआ? भाजपा और भगवा ताकतों से तो उनके संबंधों की एक नई शुरुआत हुई है। सभी ने उन्हें हाथों-हाथ लिया। बताया जाता है कि वरुण जिस मोबाइल फोन का इस्तेमाल करते हैं, उसमें 10 हजार से ज्यादा एसएमएस स्टोर करने की क्षमता है। जब वह पिलीभीत के लिए चले थे, तो उसमें आठ एसएमएस ही सेव थे। लेकिन जब वह दिल्ली लौटे तो इनबॉक्स फुल हो चुका था। उनके लिए बधाइयों का तांता लगा था। बधाई देने वालों में संघ प्रमुख, कांची के शंकराचार्य, श्री-श्री रविशंकर, मोरारी बापू और अंबानी बंधु सहित कई उद्योगपति शामिल थे। उनके समर्थन और उत्साहवर्धन के लिए 800 जिलों से फैक्स आए। करीब 37 हजार लोगों ने उन्हें देखने-सुनने के लिए यूट्यूब पर क्लिक किया। ऐसे में भाजपा भला, कब तक वरुण के बयानों से यह कहकर किनारा करती कि ये उनके अपने विचार हैं।
वास्तव में गठबंधन राजनीति की मजबूरी में जबकि पार्टी को अपने मूल मुद्दों से पीछे हटना पड़ा और प्रधानमंत्री पद की दावेदारी के लिए लाल कृष्ण आडवाणी को धर्मनिरपेक्षता का लबादा ओढ़ना पड़ा, पार्टी को भी एक ऐसे नेता की तलाश थी, जो उग्र हिंदूवाद की उनकी विचारधारा को खुलेआम सबके सामने रख सके। साथ ही कांग्रेस द्वारा युवाओं को लुभाने की कमान जब राहुल को सौंपी गई, तो कहीं न कहीं भाजपा को भी एक ऐसे ही नेता की जरूरत थी, जो वरुण के रूप में पूरी हो गई।
आस-भरोस भागवत
माना जा रहा है कि मोहन राव भागवत संघ के साथ भाजपा के संबंधों को नए सिरे से परिभाषित करेंगे। संघ के सरकार्यवाह के रूप में मोहन राव भागवत की नियुक्ति भाजपा के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार लाल कृष्ण आडवाणी के लिए भी बेहद महत्वपूर्ण है। हालांकि शुरू में वह पार्टी के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार के रूप में आडवाणी के समर्थक नहीं थे, लेकिन बाद में कोई अन्य विकल्प नहीं मिलने के बाद उन्होंने अपनी असहमति वापस ले ली।
मोहन राव भागवत की गिनती संघ के कट्टर हिंदूवादी नेताओं के रूप में होती है। ऐसे में उनकी नियुक्ति का सीधा अर्थ यह भी है कि कट्टर हिंदूवादी भगवा ताकतों का प्रभाव व उनकी सक्रियता बढ़ेगी। भाजपा पर ऐसी ताकतों की पकड़ मजबूत होगी। ये ताकतें हिंदू वोट भाजपा की झोली में लाने का भरपूर प्रयास करेंगी, जिससे प्रधानमंत्री पद तक पहुंचने में अंतत: आडवाणी को मदद मिलेगी। भागवत की कट्टर हिंदूवादी छवि और भाजपा में संघ की दखअंदाजी का यह भी अर्थ है कि अब पार्टी में नरें्र मोदी, आडवाणी सरीखे कट्टर नेताओं का बोलबाला बढ़ेगा। साथ ही पार्टी पर अयोध्या में राम मंदिर के निर्माण, धारा 370 खत्म करने और समान नागरिक संहिता के मुद्दे पर लौटने का दबाव बढ़ेगा।
पेशे से पशुचिकित्सक भागवत महाराष्ट्र के चं्रपुर जिले से आते हैं। शुरुआती वर्षो में ही वह संघ के प्रचारक बन गए। 59 वर्षीय भागवत गुरूजी गोलवलकर के बाद संघ के अब तक के सबसे कम उम्र के सरकार्यवाह हैं। अब भी वह आधुनिकता से कोसों दूर हैं और वैचारिक श्रेष्ठता को महत्व देते हैं। सूचना क्रांति के इस दौर में भी वह संगठन को आगे बढ़ाने के लिए परंपरागत दृष्टिकोण के समर्थन करते हैं और कर्यकर्ताओं को यकीन दिलाते हैं कि अगले दो दशक में भारत विश्वगुरू होगा।
जया जाए ना
कुछ साल पहले तक कहा जाता था कि कें्र में सत्ता का रास्ता उत्तर भारत के दो प्रमुख राज्यों उत्तर प्रदेश और बिहार से होकर गुजरता है। कमोबेश आज भी यह बात लागू होती है। लेकिन क्षेत्रीय दलों के बढ़ते वर्चस्व ने दक्षिणी राज्यों को भी इतना ही महत्वपूर्ण बना दिया है। 2009 के लोकसभा चुनाव में दक्षिणी राज्य तमिलनाडु की कुछ ऐसी ही भूमिका रहने वाली है। न केवल चुनाव पूर्व गठबंधन, बल्कि मतदान के बाद सरकार गठन के निर्माण में यह राज्य किंगमेकर की भूमिका में सामने आ सकता है।
तमिलनाडु 39 लोकसभा सीट वाला राज्य है। राज्य की राजनीति में इस समय सक्रिय क्षेत्रीय दल हैं- जयललिता के नेतृत्व वाला एआईएडीएमके, मुख्यमंत्री करुणानिधि के नेतृत्व वाला ्रमुक, वाइको के नेतृत्व वाला एमडीएमके और रामदौस के नेतृत्व वाला पीएमके। इनमें ्रमुक का कांग्रेस जसे राष्ट्रीय दल के साथ गठबंधन है, जबकि एआईएडीएमके आठ दलों (सीपीआई, सीपीएम, फॉरवार्ड ब्लॉक, आरपीआई, टीडीपी, टीआरएस, जेडीएस, एआईएडीएमके) के तीसरे मोर्चे की एक महत्वपूर्ण भागीदार है, जो कांग्रेस और भाजपा दोनों से समान दूरी बनाए रखने की बात करती है। उसे एमडीएमके का साथ भी मिल सकता है, जबकि कांग्रेस-डीएमके गठबंधन में पीएमके साझीदार हो सकता है।
पिछले चुनाव में सरकार बनाने की कुंजी ्रमुक को मिली थी। एआईएडीएमके के खाते में कोई लोकसभा सीट नहीं आई थी। लेकिन इस बार उसकी स्थिति अपेक्षाकृत अधिक सुदृढ़ मानी जा रही है। समझा जा रहा है कि उसे सत्ता विरोधी भावना का फायदा मिल सकता है। साथ ही जयललिता का करिश्माई व्यक्तित्व भी इसमें कारगर साबित हो सकता है। दूसरी तरफ ्रमुक को सत्ता विरोधी भावना ङोलनी पड़ सकती है। राज्य में वह स्वयं सत्तासीन है, जबकि कें्र की संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन सरकार में एक महत्वपूर्ण भागीदार है। इसके अलावा इस बार के आम चुनाव में ्रमुक को करुणानिधि के करिश्माई व्यक्तित्व का लाभ भी नहीं मिलेगा। बीमारी एवं अधिक उम्र की वजह से इस बार चुनाव में करुणानिधि के बजाय उनके बेटे एमके स्तालिन कांग्रेस-्रमुक गठबंधन का नेतृत्व करेंगे और निस्संदेह, उन पर जयललिता का व्यक्तित्व भारी पड़ेगा। यही वजह है कि भाजपा भी लगातार तीसरे मोर्चे के ऐसे दलों पर नजर बनाए है, जहां से चुनाव बाद के गठबंधन में उसे मदद मिल सकती है। ऐसी किसी भी स्थिति में भाजपा एआईएडीएमके को अपने साथ लाना चाहेगी।
हालांकि, स्वयं जयललिता कांग्रेस से गठबंधन की इच्छुक हैं। उन्होंने कांगेस को इसके लिए संकेत भी किया। कहा, राज्य में डूबने और हारने से बचना है, तो ्रमुक का साथ छोड़ दें। बातों-बातों में इंदिरा गांधी और राजीव गांधी से अपने बेहतर संबंधों की याद भी दिलाई। लेकिन कांग्रेस ्रमुक का साथ छोड़ने के लिए तैयार नहीं हुई। उधर, कांग्रेस के प्रति जयललिता के रुझान को देखते हुए वाम दलों में बेचैनी महसूस की जा रही है।
चुनाव के दौरान राज्य में जो मुद्दे छाए रहेंगे, उनमें लिट्टे के खिलाफ श्रीलंका की सैन्य कार्रवाई में प्रभावित होने वाले तमिल नागरिकों का मुद्दा सबसे महत्वपूर्ण है। कांग्रेस को छोड़कर सभी दल इसे लेकर अभियान चलाएंगे। एआईएडीएमके को इसका अपेक्षाकृत अधिक फायदा मिल सकता है, क्योंकि वह कें्र में भागीदार नहीं है। साथ ही म्रास उच्च न्यायालय में पुलिसिया कार्रवाई, बिजली की कमी, बेरोजगारी, बढ़ती महंगाई और गिरती कानून-व्यवस्था के मुद्दे पर भी वह सरकार को घेर सकती है। इसमें वाम दल भी उसके बराबर के सहयोगी होंगे। कुल मिलाकर, वाम दलों के साथ एआईएडीएमके इस बार चुनाव में डीएमके पर भारी पड़ सकती है। फिर भी, जनता के मन की थाह लेना तो मुश्किल है। इसलिए चुनाव में ऊंट किस करवट बैठेगा, इसके लिए इंतजार करना होगा 13 मई का, जब तमिलनाडु की जनता अपने मताधिकार का प्रयोग करेगी।
सौ साल बाद हिंद स्वराज
प्रसिद्ध गांधीवादी चिन्तक देवदत्त से साक्षात्कार के आधार पर
महात्मा गांधी की पुस्तक ‘हिंद स्वराजज् के बारे में कुछ भी कहने से पहले यह बताना जरूरी है कि यह आधुनिक समाज की विकृतियों से पार पाने का विकल्प प्रस्तुत करती है। इसमें कोई नुस्खा नहीं है, बल्कि दृष्टिकोण है, जिसके सहारे आधुनिक सभ्यता की समस्या का निदान ढूंढ़ा जा सकता है। अफ्रीका, इंगलैंड और भारत में कुछ साल बिताए वक्त से उन्हें जो अनुभव हुआ, उसे ही उन्होंने ‘हिंद स्वराजज् के रूप में पन्नों पर उकेरा।
यह पुस्तक उन्होंने 1909 में लंदन से केपटाउन जाते वक्त जहाज में 21 दिन में गुजराती भाषा में लिखी थी। इसके लिए उन्होंने जहाज में इस्तेमाल हो चुके पन्नों के पिछले हिस्से का उपयोग किया था। इससे जाहिर होता है कि उनके मन में अपनी बात कहने और उन समस्याओं से समाज को अवगत कराने की कितनी उत्कंठा थी, जिसे उन्होंने महसूस किया था। वास्तव में यह किताब एक साधारण व्यक्ति के अनुभव की दास्तां हैं, क्योंकि तब पुस्तक का लिखने वाला महात्मा नहीं सिर्फ मोहनदास करमचंद गांधी था।
आज हम पुस्तक की सौवीं वर्षगांठ मना रहे हैं। लेकिन मुङो खेद के साथ कहना पड़ रहा है कि सौ साल बाद भी हमें पुस्तक के बारे में वास्तविक समझ नहीं है। इसे लेकर बस गांधीगिरी की जा रही है। तथाकथित गांधीवादी या गैर-सरकारी संगठन महज कुछ औपचारिकता पूरी कर रहे हैं। पुस्तक के मूल तत्व पर कहीं बहस नहीं हो रही। नोबल विजेता वीएस नायपॉल की टिप्पणी इसके बारे में बिल्कुल सटीक मालूम पड़ती है, ‘हिंदुस्तान के लोगों ने न हिंद स्वराज पढ़ा है और न पढ़ते हैं।ज्
जहां तक पुस्तक की प्रासंगिकता का सवाल है तो 21वीं सदी में भी इससे इनकार नहीं किया जा सकता। खासतौर पर, आज की बुनियादी समस्याओं से उबरने में इसका दृष्टिकोण कारगर साबित हो सकता है। स्वयं गांधी ने खासतौर पर भारतीय परिप्रेक्ष्य में इसकी प्रासंगिकता की बात कही थी। उनका साफ मानना था, ‘हिंदुस्तान को कभी आधुनिक सभ्यता रास नहीं आएगी, इसलिए हमें देहाती सभ्यता की ओर जाना चाहिए।ज् यहां यह उल्लेखनीय है कि नैतिक आधार वाली सभ्यता को वह देहाती और भौतिक आधार वाली सभ्यता को आधुनिक मानते थे।
चूंकि गांधी स्वयं इस पुस्तक को भारत के संदर्भ में प्रासंगिक मानते थे, इसलिए उन्होंने इस पर बहस को आगे बढ़ाने की कोशिश की। इसे उन्होंने गुजराती में लिखा था, लेकिन अधिक से अधिक लोगों तक इसे पहुंचाने के लिए उन्होंने स्वयं ही इसका अंग्रेजी अनुवाद किया। लेकिन हमारे देश के राजनेताओं ने इसे कभी स्वीकार नहीं किया। उन्होंने इसे 1945 में ही ठुकरा दिया था। तब पुस्तक पर बहस आगे बढ़ाने की गरज से गांधी ने जवाहर लाल नेहरू को यह कहते हुए पत्र लिखा था, ‘हिंदुस्तान को बदलने के लिए और आजाद भारत के नवनिर्माण के लिए हिंद स्वराज प्रासंगिक है। लेकिन मैं इसमें एक परिवर्तन करना चाहूंगा। यह कि किताब में मैंने प्रजातंत्र को वेश्या कहा है, जबकि अब मैं इसे बांझ करना चाहता हूं।ज् तब जवाहर ने इसे ‘अयथार्थवादीज् कहकर टाल दिया था। बहस को और आगे ले जाने के लिए गांधी ने नेहरू को दूसरा पत्र लिखा, जिसका उन्होंने कोई जवाब नहीं दिया। साफ है कि हमारा राजनीतिक नेतृत्व कभी इस बहस को आगे बढ़ाने के पक्ष में नहीं रहा।
आजाद भारत में संविधान निर्माण के दौरान इस पर बहस हुई। संविधान सभा में तीन दिन तक इस पर बहस हुई, जिसमें गांधी के पंचायती राज-व्यवस्था पर बहुसम्मति बनी। लेकिन तब भी डॉ. भीम राव अंबेडकर और बीएन राय ने इसे यह कहकर टाल दिया कि बात सही है, लेकिन संविधान का निर्माण लगभग हो चुका है। इसलिए इसे राज्य के नीति-निर्देशक तत्वों में शामिल कर दिया जाएगा। इस तरह संविधान सभा ने भी पंचायती राज-व्यवस्था को लेकर जिम्मेदारी आने वाली सरकारों पर छोड़कर अपना पल्ला झाड़ लिया और पुस्तक के तत्वों पर बहस यहीं खत्म हो गई।
लेकिन भारतीय राजनेताओं ने भले ही इस पर बहस को आगे बढ़ाने में रुचि नहीं ली, विदेशी विद्वानों और चिंतकों ने इसे हमेशा सराहा। रूसी चिंतक और उपन्यासकार लियो टॉलस्टॉय ने ‘¨हद स्वराजज् को ऐतिहासिक करार देते हुए ‘न केवल भारत, बल्कि पूरी मानवता के लिए महत्वपूर्णज् बताया था। पश्चिम के विद्वान आज भी ‘हिंद स्वराजज् को अपने सिद्धांतों में फिट करने की कोशिश कर रहे हैं। पिछले माह दिल्ली में ‘हिंद स्वराज की प्रासंगिकताज् पर हुए एक सेमिनार में 37 देशों के 226 प्रतिनिधियों ने भाग लिया था। दो दिन तक चले इस सेमिनार में 67 पेपर प्रस्तुत किए गए थे, लेकिन आश्चर्य की बात है कि सभी पेपर विदेशी विद्वानों के थे, किसी भारतीय की इस पर कोई प्रस्तुति नहीं थी। इससे भी ज्यादा खेदजनक यह है कि सेमिनार में भारतीय प्रतिनिधियों की ओर से कोई सारगर्भित प्रश्न नहीं उठाए गए। हां, आईआईटी और मैनेजमेंट के कुछ छात्रों ने अपेक्षाकृत अधिक प्रासंगिक प्रश्न उठाए, जिससे कुछ युवाओं में इसके प्रति रुझान के संकेत मिलते हैं, जो सकारात्मक है। कुल मिलाकर, हमें हमारी ही कृति के बारे में आज विदेशी विद्वानों और चिंतकों से पता चल रहा है, ठीक वैसे ही जसे ग्रीक सभ्यता अरब के माध्यम से वापस यूरोप गई थी।
‘हिंद स्वराजज् की सौवीं वर्षगांठ के मौके पर पूरे साल निश्चय ही जगह-जगह कई कार्यक्रम आयोजित किए जाएंगे। लेकिन मुङो बहुत खेद के साथ कहना पड़ रहा है कि यह भी महज औपचारिकता बनकर रह जाएगी। इसके साथ आज कुछ वैसा ही हो रहा है, जसा गुरुनानक देव के शव पर पड़े चादर के साथ हुआ था। तब उनसे स्वयं को जोड़ने के लिए लोग उनके मृत शरीर पर पड़े चादर के कई टुकड़े कर उसे अपने साथ ले गए थे। आज वही ‘हिंद स्वराजज् के साथ हो रहा है। विभिन्न वर्ग, खासकर राजनेता अपनी वैधता के लिए इसका इस्तेमाल कर रहे हैं।
मुस्कान को तरसतीं लाखों पिंकियां
‘स्माइल पिंकीज् कहानी है एक ऐसी लड़की की, जो पैदा होती है कटे होंठ के साथ। इसलिए आसपास के लोग और साथी-संगी उसे ‘होंठ कटवाज् के नाम से बुलाते हैं। कोई भी उसे अपने में शामिल नहीं करता। न मोहल्ले के बच्चे और न ही स्कूल के। सामाजिक तिरस्कार ङोलती इस बच्ची की जिंदगी के सपने रंग भरने से पहले ही बिखर जाते हैं। वह स्कूल जाना बंद कर देती है, घर से बाहर निकलना बंद कर देती है। मां-बाप के पास इतने पैसे नहीं कि अपनी बिटिया का इलाज करा सकें, उसका ऑपरेशन करा सकें, ताकि वह भी सामान्य जिंदगी जी सके। ऐसे में वे भी दुआ करने लगते हैं, ‘ऐसी जिंदगी से तो बेहतर है कि बेटी मर जाए।ज्
लेकिन इसी बीच ‘स्माइल ट्रेनज् नामक न्यूयार्क की चैरिटी संस्था आगे आती है और डॉक्टर सुबोध की मदद से उसका ऑपरेशन होता है, बिल्कुल मुफ्त। उस पर वृत्तचित्र बनता है और वह ऑस्कर तक का सफर तय करती है। आज हर किसी की जुबां पर ‘स्माइल पिंकीज् का नाम है। ऑस्कर में पहले नामांकन और बाद में सर्वश्रेष्ठ वृत्तचित्र का खिताब जीतने के बाद दुनियाभर के लोगों ने टेलीविजन और अखबारों में छपे फोटो के माध्यम से पिंकी की मुस्कुराहट देखी, उसकी खुशी देखी।
लेकिन यह भी एक बड़ा सच है कि यदि इस वृत्तचित्र ने ऑस्कर तक का सफर नहीं तय किया होता, तो आज शायद ही किसी को ‘स्माइल पिंकीज् का पता होता और उन्हें पिंकी की मुस्कुराहट देखने को मिलती। इस सच को भी नहीं झुठलाया जा सकता कि ऑस्कर जीतने के साथ ही पिंकी जसे कटे होंठ वाले बच्चों और बड़ों के लिए मुश्किलें खत्म हो गईं। हां, इतना जरूर है कि इससे ऐसे लोगों के लिए आशा की एक नई किरण जगी है। लेकिन ऐसे लोगों के प्रति सामाजिक नजरिये में परिवर्तन आज भी एक चुनौती है। वैसे भी कहा जाता है कि हमारे यहां के लोगों की याददाश्त बहुत कमजोर है। वे बहुत जल्दी चीजों को भूल जाते हैं। शायद ही कुछ दिनों बाद लोगों को इस वृत्तचित्र के संदेश याद रहे कि ऐसे लोगों को भी सम्मान से जीने का हक है।
पिंकी का ऑपरेशन करने वाले डॉक्टर सुबोध भी इस बात से भलीभांति परिचित हैं। शायद यही वजह है कि लास एंजिल्स में ऑस्कर समारोह से लौटने के बाद उन्होंने इस फिल्म को तमाम बड़े शहरों में दिखाने की योजना बनाई है, ताकि समाज को ऐसे लोगों के प्रति संवेदनशील बनाया जा सके। निश्चय ही यह एक अच्छी कोशिश होगी, क्योंकि पिंकी जसे बच्चों की मुस्कुराहट लौटाने के लिए जितनी जरूरत सर्जरी की है, उससे कहीं अधिक आवश्यकता ऐसे बच्चों को प्रेम और स्नेह की है।
अब जरा आंकड़ों पर नजर दौड़ाएं तो ‘स्माइल ट्रेनज् के सौजन्य से अब तक 50 हजार बच्चों के होंठ की सर्जरी की जा चुकी है। लेकिन आज भी हमारे देश में करीब 10 लाख कटे होंठ वाले बच्चे हैं, जो ऑपरेशन का इंतजार कर रहे हैं। हर घंटे करीब तीन बच्चे कटे होंठ के साथ पैदा होते हैं और प्रत्येक साल इनकी संख्या करीब 35 हजार होती है। हर सात सौ में से एक बच्चा इस विकृति का शिकार है, पर सबकी किस्मत पिंकी जसी नहीं होती।
इसकी सर्जरी में तकरीबन 10 हजार रुपए खर्च होते हैं, लेकिन जसे-तैसे सिर्फ दो वक्त की रोटी का जुगाड़ कर पाने वाले लोगों के पास न तो इतने पैसे होते हैं और न ही इतनी जानकारी कि सर्जरी करा अपने बच्चों को एक बेहतर भविष्य दे सकें। ऐसे में बच्चे सामाजिक दंश ङोलते हुए ही बड़े होते हैं। न तो उचित शिक्षा मिल पाती है और न ही अच्छी नौकरी। सामाजिक तिरस्कार ङोलने को मजबूर इन बच्चों की मानसिक हालत का अंदाजा आसानी से लगाया जा सकता है। बहरहाल, उम्मीद की जा सकती है कि ‘स्माइल पिंकीज् से ऐसे बच्चों की मुस्कुराहट लौटाने में कामयाबी जरूर मिलेगी।
जन्म-मरण सोनागाछी
आज हर तरफ ऑस्कर में आठ खिताब अपनी झोली में करने वाले ‘स्लमडाग मिलेनियरज् की धूम है। सभी खुश हैं, गदगद हैं। कलाकार से लेकर फिल्म निर्माण से जुड़े सभी सदस्य और वे भी, जो किसी न किसी तरह इससे जुड़ाव महसूस करते हैं। इस फिल्म से एशिया की सबसे बड़ी झुग्गीबस्ती मुंबई के धारावी के लोगों को बेहतर जिंदगी के लिए उम्मीद की एक किरण नजर आने लगी है। लेकिन कितने बच्चों की जिंदगी ‘स्लमडॉग मिलेनियरज् के मुख्य किरदार जमाल की तरह अंधेरे से निकलकर उजाले में आ पाएगी, कहना मुश्किल है।
ऑस्कर की खिताबी घोषणा के बाद एक अंग्रेजी अखबार ने चार साल पहले के एक वृत्तचित्र में काम करने वाले बच्चों की जो कहानी छापी, वह हमारे सामाजिक यथार्थ को सामने लाती है, जो निश्चय ही तकलीफदेह है। चार साल पहले देह व्यापार की सबसे बड़ी मंडी कोलकाता के सोनागाछी के बच्चों पर बने वृत्तचित्र ‘बॉर्न इनटू ब्रॉथेल्सज् ने भी ऑस्कर तक का सफर तय किया था। 2005 में उसे सर्वश्रेष्ठ वृत्तचित्र का खिताब मिला था। अमेरिकी निर्देशक जेना ब्रिस्की और रॉस कॉफमैन ने देहव्यापार में संलग्न महिलाओं के बच्चों के हाथों में कैमरे देकर उन्हें एक बेहतर जिंदगी के गुर सिखाए थे। वृत्तचित्र सोनागाछी में देहव्यापार को मजबूर ऐसी मांओं के बच्चों पर कें्िरत है, जो फोटोग्राफी सीखकर अपने जीवन में उजाला करते हैं।
तब उन बच्चों की बेहतर जिंदगी को लेकर तमाम दावे किए गए थे। आशा जगी कि वे उस जिंदगी से उबरने में कामयाब रहेंगे, जिससे पार पाने की तमाम कोशिशों के बाद भी उनकी मांएं कामयाब नहीं हो सकीं। उम्मीद की गई कि वेश्यालय की आंच अब उन बच्चों के दामन नहीं झुलसाएगी। वे भी समाज में दूसरे लोगों की तरह एक बेहतर व सम्मान की जिंदगी बिता पाएंगे। लेकिन चार साल बाद जब उन किरदारों को तलाशा गया, तो मालूम हुआ कि ऑस्कर की चमक-दमक तक पहुंचने के बाद भी दुर्भाग्य ने उनका पीछा नहीं छोड़ा।
वृत्तचित्र में फोटोग्राफी से अपने जीवन में उजाला भरने वाले सोनागाछी के उन बच्चों में से कुछ को जिंदगी फिर उसी मोड़ पर ले आई, जहां से वे चले थे। इसके आठ किरदारों में से एक वेश्यावृत्ति की राह चुनने को मजबूर हो गई। ऑस्कर की घोषणा के कुछ महीने बाद ही उसने अपनी मां का परंपरागत धंधा अपना लिया। जब फिल्म बनी थी, तब वह नाबालिग थी, लेकिन आज बालिग है और उसकी गिनती सोनागाछी की पांच हजार पूर्ण कालिक वेश्याओं में होती है। फिल्म से उसे और उसकी मां को जो आशा जगी थी कि अब वह देहव्यापार की इस मंडी से बाहर निकल पाएगी और सम्मानपूर्वक जिंदगी बिताएगी, धरी की धरी रह गई। यह फिल्म सोनागाछी वेश्यालय की वह दीवार नहीं तोड़ पाई, जिसकी चारदीवारी में उसकी मां उलझकर रह गई थी। वह कभी गरीबी और उस वातावरण से नहीं उबर पाई, जिसके सपने उसने फिल्म निर्माण के बाद देखे थे।
वृत्तचित्र में भूमिका निभाने वाली एक अन्य लड़की पिछले दो साल से गायब है। किसी को उसके बारे में जानकारी नहीं है। फिल्म रिलीज होने के बाद उसने कुछ दिन तक कोलकता की उस चैरिटी संस्था के लिए काम किया था, जिसने वृत्तचित्र के निर्माण में मदद दी थी। लेकिन कुछ समय बाद ही उसने चैरिटी संस्था को अलविदा कर दिया और शादी कर ली। लेकिन आज दो साल हो गए हैं, किसी को उसके बारे में कुछ नहीं पता।
फिल्म के आठ किरदारों में से केवल चार को शिक्षा का मौका मिला, शेष कहीं अंधेरों में ही गुम हो गए। चार में से दो को विभिन्न संस्थाओं की मदद से अमेरिका में पढ़ाई का मौका मिला, जबकि दो अन्य कोलकाता में ही पढ़ रहे हैं। एक अन्य लड़की की कुछ दिनों पहले कोलकाता में ही शादी हो गई, जबकि आठवां किरदार आज भी बेरोजगार है और सोनागाछी में ही जिंदगी के ऊबड़-खाबड़ रास्तों पर कुछ तलाशाने की कोशिश में जुटा है।
शुक्रवार, 6 फ़रवरी 2009
दुई को दूर कर दिल से
तीस जनवरी 1948 वास्तव में आजादी की प्रेरणा और स्वराज के सिद्धांत को गुमराह करने की साजिश थी। महात्मा गांधी को गोली मारने वालों ने सोचा था कि इससे गांधी के विचार मर जाएंगे, उनका दर्शन मर जाएगा। लेकिन छह दशक से अधिक समय बीत जाने के बाद भी उनके विचार हमारे बीच मौजूद हैं। उनके विचारों और दर्शन को आधुनिकता और बाजारवाद की आंधी भी खत्म नहीं कर पाई।
दरअसल उस एक घटना में गांधी की मौत हुई ही नहीं थी, मौत हुई थी तो बस एक नश्वर शरीर की, क्योंकि गांधी किसी व्यक्ति का नाम नहीं, बल्कि वह तो एक दर्शन है, विचार है। बहुत से लोगों का यह भी कहना है कि मौजूदा दौर में गांधी विचार की प्रासंगिकता नहीं रह गई है, क्योंकि हालात अब पूरी तरह से बदल चुके हैं। लेकिन यह सच नहीं है। समाज जिन चुनौतियों से गुजर रहा है, उनसे पार पाने में ये विचार काफी हद तक कारगर साबित हो सकते हैं।
गांधी को गोली मारनेवाले नाथूराम गोडसे से लेकर हम सब आज तक दोहरी जिंदगी जी रहे हैं। गोडसे ने जब गांधी की प्रार्थना सभा में प्रवेश किया था तो उसके चेहरे और हावभाव को देखकर कोई भी उसके इरादों का अंदाजा नहीं लगा सकता था। उसने झुककर गांधी को प्रणाम किया और फिर गोली मार दी। उसके चेहरे और कृत्य में जो भेद था, वह आज भी देखने को मिलता है। हम जो हैं वह दिखना नहीं चाहते। यह आज विकास के दौर का अहम हिस्सा बन गया है। निश्चय ही, इस तरह की जिंदगी किसी भी स्वस्थ समाज के हित में नहीं है और इनसे पार पाने में गांधी विचार एवं दर्शन कारगर सिद्ध हो सकते हैं।
गांधी हमेशा भारत के नवनिर्माण में अंतिम व्यक्ति को कसौटी मानते थे, जिसकी आज भी जरूरत है। खादी ग्रामोद्योग, कुटीर उद्योगों के माध्यम से उन्होंने आम लोगों में आत्मविश्वास जगाने की कोशिश की। उनका यह भी मानना था कि समाज की कमजोरियों को दूर किए बगैर स्वराज नहीं आ सकता और अगर आ भी जाए तो टिक नहीं सकता। इसलिए जिंदगीभर उन्होंने सामाजिक कुरीतियों को दूर करने का प्रयास किया।
गांधी ने निरंतर सत्य के साथ प्रयोग किया। लेकिन कभी उन्होंने यह नहीं कहा कि उन्होंने जिस सत्य को ढूंढ़ निकाला है, वही अंतिम है। वह हमेशा आम लोगों को भी सत्य के प्रयोग के लिए प्रेरित करते रहे। लेकिन यह कहना कभी नहीं भूले कि इसकी कीमत चुकाने के लिए भी तैयार रहें। उन्होंने स्वयं सत्य के साथ प्रयोग किया और इसकी कीमत अपनी जान देकर चुकाई।
आजाद भारत में गांधी पर तरह-तरह के आरोप लगते रहे। पाकिस्तान विभाजन के लिए जिम्मेदार ठहराने के साथ-साथ यह भी कहा गया कि उन्होंने एक संप्रदाय विशेष के प्रति तुष्टिकरण की नीति अपनाई। लेकिन उन पर आरोप लगाने वाले वही लोग हैं, जिन्होंने कभी सोचा था कि 30 जनवरी 1948 के बाद गांधी का अस्तित्व नहीं रहेगा। वे यह बर्दाश्त नहीं कर पा रहे हैं कि आखिर कैसे गोली लगने के बाद भी गांधी जिंदा हैं और इसलिए उन पर तरह-तरह के आरोप लगाकर आम लोगों के मन में उनके विचारों के प्रति कटुता पैदा करने की कोशिश कर रहे हैं।
मुङो तो लगता है कि आज हमारा देश ही नहीं, दुनिया गांधी की तरफ फिर से देख रही है। मेरा विश्वास है कि वह गांधी के पास लौटेगी भी। हिंसा के इस दौर से पार पाने के लिए अहिंसा का मार्ग ही अपनाना होगा।
जहां तक बॉलीवुड की बात है तो गांधी दर्शन को वहां (फिल्मों में) नहीं ढूंढ़ा जा सकता। यह एक मनोरंजन उद्योग है और इसमें गांधी के विचारों को उसी तरह पेश किया गया है। समाज में समय-समय पर कई महापुरुष हुए और लोगों ने उन्हें अलग-अलग नजरिये से देखा। गांधी को भी देखने और दिखाने के सिलसिले में बॉलीवुड की ऐसी ही कोशिश रही। कुल मिलाकर गांधी के विचारों में आस्था रखने वाले की हैसियत से इन्हें बहुत संतोषजनक नहीं कहा जा सकता।
बुधवार, 4 फ़रवरी 2009
आम आदमी के गांधी
महात्मा गांधी की शहादत को इकसठ साल हो गए। तीस जनवरी 1948 की शाम प्रार्थना सभा में आते हुए उन्हें गोली मारी गई थी। उस सभा में वरिष्ठ पत्रकार और गांधीवादी विचारक देवदत्त भी मौजूद थे। वे मानते हैं कि इस घटना ने समाज को नेतृत्वविहीन कर दिया, जिससे आज तक उबरा नहीं जा सका है। गांधी के विचार और सत्य के प्रति उनके आग्रह आज भी पूरी तरह प्रासंगिक हैं।
महात्मा गांधी आम लोगों के नेता थे। समाज के नेता थे। आम लोगों से मिलने-जुलने, उनकी समस्याएं जानने के लिए वह प्रार्थना सभा का आयोजन करते थे। उस दिन भी (30 जनवरी) उन्होंने वही किया था। वह आजादी के बाद की पहली प्रार्थना सभा थी। जसे ही वह पहुंचे, किसी ने उन्हें गोली मार दी, जिसकी पहचान बाद में नाथूराम गोडसे के रूप में की गई।दरअसल वह गोली महात्मा गांधी को नहीं लगी थी और न ही उससे उनकी मौत हुई थी। गोली आम आदमी की उस मानसिकता को लगी थी, जो गांधी को अपना नेता मानते थे; जो यह मानते थे कि अगर गांधी बोल रहे हैं, तो उसमें कोई तो बात होगी। महात्मा गांधी कैसे आम लोगों के नेता थे, इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि जिस दिन गांधी को गोली मारी गई थी, पूरा शहर सुनसान हो गया था। दुकानें स्वत:स्फूर्त बंद हो गई थीं। लोगों के घरों में चूल्हे नहीं जले। साफ है कि सभी ने यही महसूस किया कि उनका कोई अपना उनके बीच से चला गया। आम लोगों तक उनकी पहुंच कितनी अधिक थी, इसे इसी बात से समझा जा सकता है कि 30 जनवरी 1948 को, जबकि देश में न तो टीवी चैनल थे और न ही रेडियो दूर-दूर तक फैला था, फिर भी यह खबर जंगल में आग की तरह फैल गई कि गांधी हमारे बीच नहीं रहे।
इस एक घटना ने समाज को नेतृत्वविहीन कर दिया। उसके बाद जो नेतृत्व शून्यता पैदा हुई, समाज उससे आज तक उबर नहीं पाया। गांधी की प्रार्थना सभाओं में सभी को बोलने की, अपनी बात रखने की पूरी आजादी थी। किसी को समय की पाबंदी के कारण बोलने से रोका नहीं जाता था। कई बार लोग अपनी समस्याएं बताते-बताते पूरा भाषण दे डालते थे, लेकिन गांधी कभी उससे ऊबे नहीं। ऐसे ही लोगों में दो सरदार जी थे, जो शरणार्थी थे। अपनी बात कहते-कहते वे अक्सर प्रार्थना सभा का पूरा वक्त ले लेते थे। लेकिन गांधी ने कभी उन्हें अपनी पूरी बात कहने से नहीं रोका। ऐसा कई अन्य लोगों के साथ भी होता था। इसके बाद गांधी केवल इतना ही कहते थे कि आज की सभा खत्म, अब अगली सभा में मिलेंगे। कहने का अर्थ है कि उनकी सभाओं में सच्चे मायने में लोकतंत्र था। सबको कहने की आजादी थी।
वास्तव में उनकी सभाएं जनसुनवाई का माध्यम थीं, जो 30 जनवरी 1948 के बाद खत्म हो गया। उसके बाद किसी ने भी उस मानसिकता का ध्रुवीकरण नहीं किया, जिसकी रचना गांधी ने की थी और जिसका इस्तेमाल संरचनात्मक कार्यो में किया जा सकता था। गांधी ने कभी अपनी सभाओं में राजनीतिक भाषा का इस्तेमाल नहीं किया। लेकिन आज उनके विचारों का राजनीतिकरण हो गया है। उनका अंतिम संस्कार भी राजकीय तरीके से किया गया और आम आदमी, जिनके वह नेता थे, दूर से ही उन्हें देखते रहे। कुला मिलाकर, आजादी के बाद विभिन्न राजनीतिक दलों और सरकारों ने उनके विचार और दर्शन को अपनाने के बजाए उन्हें भुनाने की कोशिश की।
गांधी समाज के हर आदमी तक विकास कार्यो को पहुंचाना चाहते थे। वे समाज के विकास में ही देश का विकास देखते थे। लेकिन आजादी के बाद के राजनीतिक दलों और सरकारों ने जो नीतियां अपनाईं, उससे देश ने तो तरक्की की, लेकिन समाज आज भी कहीं बहुत पीछे है। दूर दराज के गांवों का आम आदमी आज भी देश के विकास से खुद को जोड़ नहीं पा रहा है। यहां भी गांधी दर्शन को अपनाने की जरूरत है।
जहां तक मौजूदा वक्त में गांधी के विचारों की प्रासंगिकता का सवाल है तो इसे झुठलाया नहीं जा सकता। लेकिन यह भी सच है कि किसी भी समस्या से निपटने के लिए गांधी के विचारों को दर्द निवारक दवा के तौर पर इस्तेमाल नहीं किया जा सकता। आतंकवाद, जो इस वक्त विश्व की एक बड़ी समस्या है, के संदर्भ में भी गांधी के विचार पूरी तरह प्रासंगिक हैं। आज आतंकवाद के खिलाफ दुनिया के सबसे ताकतवर देश ने मुहिम चला रखी है, लेकिन फिर भी इसके खत्म होने के आसार नहीं दिख रहे। दरअसल किसी भी समस्या को खत्म करने के लिए इसकी प्रकृति को समझना जरूरी है। अतंकवाद एक मौलिक समस्या है और इसे युद्ध या लड़ाइयों से खत्म नहीं किया जा सकता, बल्कि आतंकवादियों की मानसिकता समझनी होगी, इसकी वजह समझनी होगी कि आखिर क्यों उन्होंने यह रास्ता अपनाया?
मौजूदा दौर में आर्थिक संकट विश्व की एक बड़ी समस्या है। यहां भी गांधी के विचार प्रासंगिक हैं। गांधी ने कहा था कि अर्थशास्त्र में नैतिकता होनी चाहिए। लेकिन दुनिया के सबसे ताकतवर देश ने अर्थशास्त्र में इस नैतिकता को तिलांजलि दे दी और जिसका नतीजा यह हुआ कि अमेरिका से शुरू हुआ आर्थिक संकट पूरे विश्व को जलाने लगा। वर्तमान संकट नतिकता की कमी से पैदा हुआ है और इसे दूर करने के लिए अर्थव्यवस्था में नैतिकता लाने की जरूरत है, जिसके लिए गांधीवादी तरीके अपनाए जा सकते हैं।
गांधी के बारे में कुल मिलाकर इतना ही कहा जा सकता है कि उन्होंने व्यवस्था को बदलने की कोशिश की, वस्तुस्थिति को बदलने की कोशिश की, सत्य के साथ नए-नए प्रयोग किए, सत्य के लिए आग्रह किया और इन रास्तों पर चलने वालों की दो ही नियति होती है- गोली खाना या एकाकीपन। गांधी को गोली मिली।
