ऐसा पहले कभी नहीं हुआ, जसा शुक्रवार को इस्लामाबाद में हुआ। भारत-पाक विदेश मंत्री स्तर की बातचीत एक दिन पहले हुई और उसमें बातचीत जारी रखने की ही बात की गई। पर अगले दिन जब भारतीय विदेश मंत्री कृष्णा पाकिस्तान में ही थे, तब विदेश मंत्री शाह महमूद कुरैशी ने जो कुछ किया-कहा, वह राजनयिक मर्यादा और शोभनीयता की धज्जियां उड़ाने वाला था। उन्होंने भारत की मंशा पर शक जताया, कृष्णा पर व्यक्तिगत आक्षेप किए और कश्मीर पर भड़ास निकाली। फिर भी भारत ने शांत और वार्ता के मुतल्लिक सकारात्मक प्रतिक्रिया जताई। कुरैशी वैसे पढ़े-लिखे और नफीस पाक नेता हैं, पर पाक की राजनेताओं की ही शायद यह मजबूरी है कि उन्हें सेना निर्देशित करती है।
पाकिस्तान ने फिर झटक दिया दोस्ती का हाथ। फिर दोहराया गया आगरा प्रकरण। मजमून वही था, बस मंच और किरदार अलग-अलग थे। तब आगरा था मंच, जो इस बार बदलकर हो गया इस्लामाबाद। पाकिस्तान के मुख्य पात्र थे तत्कालीन सैन्य शासक परवेज मुशर्रफ तो इस बार यही भूमिका निभाई वहां के विदेश मंत्री शाह महमूद कुरैशी ने। तब भी भारत-पाकिस्तान के बीच बातचीत की प्रक्रिया फिर शुरू करने की कवायद हुई थी, जो कारगिल युद्ध के बाद स्थगित हो गई थी। इस बार भी वही कोशिश। फिर शुरू हो दोनों देशों के बीच बातचीत, जो बंद हो गई थी 2008 के मुंबई हमले के बाद। कोशिश यही कि मुद्दे सुलङो। दोस्तों की तरह रहें पड़ोसी, न कि दुश्मनों की तरह। हालांकि यह सब इतना आसान नहीं है, वरना आजादी से अब तक साठ दशक से भी अधिक वक्त बीत जाने पर भी दोनों देशों के संबंधों में यह तल्खी न होती। लेकिन अच्छे परिणाम की उम्मीद में कोशिशें हमेशा होती रही हैं और आगे भी होती रहेंगी।
वर्ष 2001 में भी ऐसी ही कोशिश हुई थी। कारगिल में घुसपैठ के बाद पाकिस्तान से रुकी बातचीत को फिर से पटरी पर लाने के लिए तब वहां के सैनिक शासक परवेज मुशर्रफ को न्यौता गया था। वे आए भी थे। आगरा में तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के साथ बातचीत होनी थी। हुई भी, लेकिन मुशर्रफ बीच में ही आगरा शिखर सम्मेलन से पाकिस्तान से रवाना हो गए, नाराज होकर। इस बार भी कुछ-कुछ वैसा ही हुआ। पाकिस्तान ने हमारे विदेश मंत्री को न्यौता दिया। एमएम कृष्णा अपने पाकिस्तानी समकक्ष शाह महमूद कुरैशी से मिलने इस्लामाबाद पहुंचे। लेकिन बात जब परिणाम की आई तो वह कुछ-कुछ पहले जसा था, यानी ढाक के वही तीन पात। फिर वही तल्खी, फिर वही तेवर। कृष्णा ने उठाया आतंकवाद का मुद्दा तो कुरैशी ने अलापा कश्मीर का राग। बात सिर्फ इतनी होती तो शायद उसे बिगड़ी हुई न कहते। लेकिन तेवर में तल्खी इतनी थी कि वे हमारे गृह सचिव जीके पिल्लै की तुलना हाफिज सईद से कर बैठे। वही सईद, जिस पर मुंबई हमले के षड्यंत्र और उसे अंजाम देने वालों को मदद देने का आरोप है।
बात यहां तक भी नहीं रुकी। अब बारी विदेश मंत्री कृष्णा की थी। बिना किसी लाग-लपेट उन्होंने कह दिया कि कृष्णा बातचीत के लिए पूरी तरह अधिकृत नहीं थे। वे बार-बार फोन पर बात करते रहे और दिल्ली से आदेश लेते रहे। उनकी यह टिप्पणी कहीं से भी सामान्य शिष्टाचार के अनुकूल नहीं थी और न ही पिल्लै पर दिया गया बयान। पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी के पूर्व प्रमुख हामिद गुल ने भी कहा कि बोलते-बोलते बहुत बोल गए कुरैशी। फिर उनके तेवर भी नहीं बता रहे थे कि वे बातचीत को आगे बढ़ाने के मूड में हैं। ऐसा लगा मानो सबकुछ तय था। पाकिस्तान के नीति-निर्माताओं ने काफी सोच-समझकर इस बातचीत का तानाबाना बुना था और इसके लिए सामने किया था कुरैशी को। उन्हें यकीन था कि इतने अपमान के बाद भारत खुद ही बातचीत से इनकार कर देगा और पाकिस्तान अमेरिका सहित दुनिया को यह संदेश दे सकेगा कि वह तो बातचीत के लिए तैयार है, पर भारत नहीं। कुरैशी ने यही किया। वे खरे उतरे अपने नीति-निर्धारकों की उम्मीद पर या यूं कहें कि बखूबी निभाई उन्होंने अपनी जिम्मेदारी। कश्मीर पर कुरैशी के अड़ियल रुख से भी साफ लगता है कि वे आईएसआई के प्रभाव में थे। कुल मिलाकर, कुरैशी बातचीत को पटरी से उतारने में कामयाब रहे।
अपने तल्ख तेवर और विदेश मंत्री कृष्णा को ‘घर बुलाकर अपमानित करनेज् के रवैये के कारण भले ही कुरैशी यहां खलनायक बन गए हैं, लेकिन पाकिस्तान में वे हीरो बनकर उभरे हैं। एक ऐसे नेता के रूप में जो अपने हितों को लेकर बहुत सजग है और कश्मीर पर कोई भी समझौता करने को तैयार नहीं है। पाकिस्तान में कुरैशी की छवि एक मंङो हुए राजनेता के रूप में है। अपनी पार्टी पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी (पीपीपी) में भी वे धाक रखते हैं। भुट्टो परिवार के बेहद करीबी माने जाते हैं। इतने कि दिसंबर, 2007 में बम हमले में पार्टी की नेता बेनजीर भुट्टो की मौत के बाद वे पीपीपी की ओर से प्रधानमंत्री पद के स्वाभाविक व मजबूत दावेदार माने जा रहे थे। हालांकि यहां बाजी मार गए युसुफ रजा गिलानी।
54 वर्षीय कुरैशी पाकिस्तान में सामंती व खानदानी परिवार से ताल्लुक रखते हैं। उनके पिता मकदूम सज्जाद हुसैन कुरैशी मुल्तान के प्रभावशाली सामंती परिवार से आते थे। 1980 के दशक में जनरल जिया-उल-हक के शासन के दौरान वे पंजाब के गवर्नर थे। हालांकि सामंती परिवार में पैदाइश व परवरिश के बावजूद कुरैशी प्रगतिशील सोच के लिए जाने जाते हैं। 22 जून, 1956 को कुरैशी का जन्म मुरी में हुआ था, जो रावलपिंडी जिले के अंतर्गत सब-डिविजन है। पाकिस्तान में मुरी की गिनती आज प्रसिद्ध हिल स्टेशन के रूप में होती है, जहां बड़ी संख्या में पर्यटक आते हैं। यह कभी कश्मीर के महाराजा की ग्रीष्मकालीन राजधानी हुआ करती थी। शुरुआती शिक्षा के बाद आगे की पढ़ाई के लिए कुरैशी लाहौर चले गए और वहां के एचेन्सन कॉलेज में दाखिला लिया। इसके बाद उन्होंने कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय से 1983 में कानून की डिग्री ली। लेकिन एक वकील के रूप में प्रैक्टिस करने के बजाय उन्होंने राजनीति का रुख किया। पारिवारिक पृष्ठभूमि यहां काम आई। 1985 में पहली बार वे पीपीपी के उम्मीदवार के रूप में पंजाब प्रांत की एसेम्बली के लिए चुने गए। 1993 तक वे पंजाब एसेम्बली के सदस्य रहे। इस बीच उन्हें पार्टी से नेशनल एसेम्बली के लिए टिकट मिला और वे जीत भी गए। हालांकि 1997 में वे नेशनल एसेम्बली का चुनाव पाकिस्तान मुस्लिम लीग (नवाज) के उम्मीदवार से हार गए। लेकिन नेशनल एसेम्बली के चुनाव में यह उनकी एकमात्र हार है। इसके अलावा उन्होंने नेशनल एसेम्बली का कोई चुनाव नहीं हारा और वे लगातार सदन के सदस्य हैं।
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सोमवार, 19 जुलाई 2010
सोमवार, 12 जुलाई 2010
बल नहीं, संबल
वरिष्ठ पत्रकार व विश्लेषक देवदत्त से बातचीत पर आधारित
कश्मीर कुछ समय की शांति के बाद फिर उद्वेलित है। सुरक्षा बलों के खिलाफ जबर्दस्त आक्रोश है। स्थिति लगातार असामान्य होती जा रही है। जनता का राज्य और कें्र सरकार से मोहभंग है। आजादी के बाद से कश्मीर एक गुत्थी के रूप में ही रहा है। इसे सुलझाने की सारी कोशिशें मामले को उलझाती ही गई हैं। दरअसल इस पूरे मामले को नए नजरिये से देखने की जरूरत है। कश्मीर तभी शांत होगा, जब वहां लोगों को सही मायने में लोकतंत्र हासिल होगा। जरूरत वहां के लोगों से लड़ने की नहीं, उनका विश्वास जीतने की है।
कश्मीर समस्या आज की नहीं है। आजादी के समय से लेकर आज तक यह हिन्दुस्तान और पाकिस्तान के बीच संबंधों में एक महत्वपूर्ण कड़ी बनी हुई है। ऐसा नहीं है कि इसे सुलझाने के प्रयास नहीं हुए। लेकिन समस्या सुलझने के बजाय दिनों दिन उलझती गई। आज स्थिति और भी बदतर हो चुकी है। समस्या का समाधान तो दूर उसके तरीके भी उलझकर रह गए हैं और उसमें अधिक जटिलता आ गई है।
समस्या वहां के लोगों की है, जो अपनी पहचान को लेकर उद्वेलित हैं। आयरलैंड, फ्रांस सहित यूरोप के अन्य हिस्सों और अफ्रीका में भी जातीय पहचान को लेकर स्वर मुखर हो रहे हैं, जिससे कश्मीर के लोगों को नई ऊर्जा व प्रेरणा मिलती है। इसलिए इसे अनदेखा नहीं किया जा सकता। कश्मीर में आए दिन होने वाले प्रदर्शन, पत्थरबाजी समस्या के लक्षण मात्र हैं, पूरी समस्या नहीं। पुलिस या सेना की ओर से जवाबी कार्रवाई के जरिये इन लक्षणों को ही फौरी तौर पर शांत किया जा सकता है, समस्या का समाधान नहीं। लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि कश्मीर को हिन्दुस्तान से अलग कर दिया जाए। वास्तव में, कश्मीर को हिन्दुस्तान से अलग करके भी नहीं देखा जा सकता, क्योंकि यह सीधे तौर पर देश की एकता, अखंडता और धर्मनिरपेक्षता से जुड़ा है। कश्मीर के बगैर भारत की एकता की कल्पना भी नहीं की जा सकती। फिर इससे राज्य विरोधी ताकतों को भी बल मिलेगा।
उधर, पाकिस्तान की अपनी मजबूरी है। वह हिन्दुस्तान से समझौता नहीं कर सकता। वहां लोकतंत्र आया है, लेकिन महत्वपूर्ण राजनीतिक फैसलों पर वहां अब भी सेना और खुफिया एजेंसी आईएसआई का असर है। यह भी सच है कि कश्मीर में पथराव, प्रदर्शन या हिंसक हालात को हवा देने में पाकिस्तानी तत्वों का काफी योगदान होता है। लेकिन पाकिस्तान सरकार की कमजोरी के बावजूद इसके लिए सीधे तौर पर सेना या आईएसआई से बात नहीं की जा सकती, क्योंकि यहां प्रोटोकॉल आड़े आता है। फिर पाकिस्तान की सरकार राजनीतिक रूप से भी कमजोर है, क्योंकि पश्तून उनकी बात नहीं सुनते। इस तरह हिन्दुस्तान की निर्वाचित सरकार पाकिस्तान से जो भी बात करती है, वहां की सरकार उस पर सेना और आईएसआई से विचार-विमर्श करती है और उसके बाद ही कोई फैसला करती है। इससे समस्या सुलझने की बजाय और उलझती जाती है।
ऐसे में जरूरत है तो कश्मीर के लोगों को साथ लेकर चलने की, खासकर युवाओं को। लेकिन कश्मीर के अब तक के इतिहास पर नजर डालें तो मालूम होता है कि वहां की अवाम को आजादी के तकरीबन छह दशक बाद भी सही मायने में लोकतंत्र नहीं मिला और न ही नेतृत्व। आजादी से अब तक एक लंबे समय के लिए वहां राजनीतिक नेतृत्व अब्दुल्ला परिवार के हाथों में रहा। मुफ्ती मोहम्मद सईद के नेतृत्व में पीडीपी की सरकार आने के बाद कश्मीर में सही मायने में लोकतांत्रिक प्रक्रिया और वहां के लोगों को राजनीतिक नेतृत्व मिलने की उम्मीद जगी थी, लेकिन आगे चलकर यह उम्मीद भी मुफ्ती परिवार तक सिमटकर रह गई, जब पार्टी की बागडोर सईद की बेटी महबूबा मुफ्ती के हाथों में चली गई। फिर पुलिस की ओर से गोलीबारी या सेना का फ्लैगमार्च कश्मीरी अवाम के गुस्से को और भड़काता है। इसलिए यहां जरूरत है फ्रांस में 1968 के आंदोलन के समय सरकार द्वारा अपनाए गए तौर तरीके से सीख लेने की। जब युवाओं ने पूरे फ्रांस में सरकार का चक्का जाम कर दिया था, तब प्रसिद्ध चिंतक ज्यां पाल सात्र्र ने कहा था कि उनसे लड़ने की नहीं, बल्कि उनका विश्वास जीतने की जरूरत है। आज वही नीति कश्मीर के संदर्भ में भी अपनाने की जरूरत है।
दअसल, कश्मीर समस्या आज भारतीय विदेश नीति के सामने एक महत्वपूर्ण चुनौती बन गई है। 1980 के दशक तक समस्या अधिक जटिल नहीं थी। लेकिन आज समस्या को हल करने के तरीके भी जटिल हो गए हैं। वहां नई ताकतें आ गई हैं। पाकिस्तान तो था ही, अब तालिबान और अफगानिस्तान की उपस्थिति भी हो गई है। फिर अमेरिका की रुचि भी दक्षिण एशिया में बढ़ गई है और कश्मीर के जरिये वह अपने हित साधने की जुगत में है। हिन्दुस्तान की कमजोरी यह भी है कि यहां आज उस तरह का राष्ट्रीय नेतृत्व नहीं है, जसा 1950 के दशक तक था। वह ऐसा वक्त था जब राजनीतिक नेतृत्व अगर कोई फैसला करता था तो उस पर किसी तरह की बहस नहीं होती थी। राष्ट्रमंडल में शामिल होने का फैसला बतौर प्रधानमंत्री नेहरू ने किया था और बाद में संसद ने बिना किसी बहस के उसे पारित कर दिया। लेकिन आज वह स्थिति नहीं है और न ही उस तरह का राजनीतिक नेतृत्व। फिर यहां नौकरशाही भी हावी है, जो ऐसी समस्या का समाधान नहीं कर सकती। कुल मिलाकर स्थिति दिनोंदिन और पेचीदी होती जा रही है।
लेकिन ऐसा भी नहीं है कि समस्या के समाधान के सारे दरवाजे बंद हो गए हैं। सरकार की कोशिशें भले कामयाब होती नहीं दिख रही हों, लेकिन समस्या के समाधान को लेकर कई बुद्धिजीवी, राजनेता, अधिकारी, कार्यकर्ता आदि अनौपचारिक बातचीत कर रहे हैं, जिससे काफी उम्मीदें हैं। लंदन में उनकी कई बैठकें हो चुकी हैं और लगातार हो रही हैं। ये ऐसे लोग हैं, जो निष्पक्ष भाव रखते हैं और सामान्य तौर पर कश्मीरियों के मित्र के रूप में जाने जाते हैं। इसे ‘बैकरूम डिप्लोमेसीज् का नाम दिया जाता है। उधर, अमेरिका भी ऐसी की कोशिश में जुटा है। यानी अनौपचारिक रूप से वह भी समस्या के समाधान के लिए लगातार विचार-विमर्श कर रहा है। अब ऐसे में संशय इस बात को लेकर है कि कहीं सरकार कश्मीर समस्या के समाधान के लिए अमेरिकी फॉर्मूले को तरजीह न दे डाले, क्योंकि मौजूदा यूपीए सरकार का झुकाव भी अमेरिका की तरफ नजर आता है और विपक्ष भी एकजुट नहीं है। अमेरिकी फॉर्मूले में बुराई सिर्फ इतनी है कि चाहे वह जितना भी निष्पक्ष दिखे, उसमें अमेरिका अपने हितों का खयाल जरूर रखेगा। इसलिए समस्या को नए सिरे से समझने की जरूरत है। राजनीतिक दलों को भी चाहिए कि वे कश्मीर को एक मुद्दे की तरह इस्तेमाल न करें। देश की जनता को कश्मीर समस्या को नए परिप्रेक्ष्य में देखना होगा। पुराने मापदंडों के अनुसार न तो कश्मीर को देखना चाहिए और न ही सरकार को। कुल मिलाकर, फिलहाल समस्या के समाधान के बारे में नहीं, बल्कि उसके लिए माहौल तैयार करने की जरूरत है।
कश्मीर कुछ समय की शांति के बाद फिर उद्वेलित है। सुरक्षा बलों के खिलाफ जबर्दस्त आक्रोश है। स्थिति लगातार असामान्य होती जा रही है। जनता का राज्य और कें्र सरकार से मोहभंग है। आजादी के बाद से कश्मीर एक गुत्थी के रूप में ही रहा है। इसे सुलझाने की सारी कोशिशें मामले को उलझाती ही गई हैं। दरअसल इस पूरे मामले को नए नजरिये से देखने की जरूरत है। कश्मीर तभी शांत होगा, जब वहां लोगों को सही मायने में लोकतंत्र हासिल होगा। जरूरत वहां के लोगों से लड़ने की नहीं, उनका विश्वास जीतने की है।
कश्मीर समस्या आज की नहीं है। आजादी के समय से लेकर आज तक यह हिन्दुस्तान और पाकिस्तान के बीच संबंधों में एक महत्वपूर्ण कड़ी बनी हुई है। ऐसा नहीं है कि इसे सुलझाने के प्रयास नहीं हुए। लेकिन समस्या सुलझने के बजाय दिनों दिन उलझती गई। आज स्थिति और भी बदतर हो चुकी है। समस्या का समाधान तो दूर उसके तरीके भी उलझकर रह गए हैं और उसमें अधिक जटिलता आ गई है।
समस्या वहां के लोगों की है, जो अपनी पहचान को लेकर उद्वेलित हैं। आयरलैंड, फ्रांस सहित यूरोप के अन्य हिस्सों और अफ्रीका में भी जातीय पहचान को लेकर स्वर मुखर हो रहे हैं, जिससे कश्मीर के लोगों को नई ऊर्जा व प्रेरणा मिलती है। इसलिए इसे अनदेखा नहीं किया जा सकता। कश्मीर में आए दिन होने वाले प्रदर्शन, पत्थरबाजी समस्या के लक्षण मात्र हैं, पूरी समस्या नहीं। पुलिस या सेना की ओर से जवाबी कार्रवाई के जरिये इन लक्षणों को ही फौरी तौर पर शांत किया जा सकता है, समस्या का समाधान नहीं। लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि कश्मीर को हिन्दुस्तान से अलग कर दिया जाए। वास्तव में, कश्मीर को हिन्दुस्तान से अलग करके भी नहीं देखा जा सकता, क्योंकि यह सीधे तौर पर देश की एकता, अखंडता और धर्मनिरपेक्षता से जुड़ा है। कश्मीर के बगैर भारत की एकता की कल्पना भी नहीं की जा सकती। फिर इससे राज्य विरोधी ताकतों को भी बल मिलेगा।
उधर, पाकिस्तान की अपनी मजबूरी है। वह हिन्दुस्तान से समझौता नहीं कर सकता। वहां लोकतंत्र आया है, लेकिन महत्वपूर्ण राजनीतिक फैसलों पर वहां अब भी सेना और खुफिया एजेंसी आईएसआई का असर है। यह भी सच है कि कश्मीर में पथराव, प्रदर्शन या हिंसक हालात को हवा देने में पाकिस्तानी तत्वों का काफी योगदान होता है। लेकिन पाकिस्तान सरकार की कमजोरी के बावजूद इसके लिए सीधे तौर पर सेना या आईएसआई से बात नहीं की जा सकती, क्योंकि यहां प्रोटोकॉल आड़े आता है। फिर पाकिस्तान की सरकार राजनीतिक रूप से भी कमजोर है, क्योंकि पश्तून उनकी बात नहीं सुनते। इस तरह हिन्दुस्तान की निर्वाचित सरकार पाकिस्तान से जो भी बात करती है, वहां की सरकार उस पर सेना और आईएसआई से विचार-विमर्श करती है और उसके बाद ही कोई फैसला करती है। इससे समस्या सुलझने की बजाय और उलझती जाती है।
ऐसे में जरूरत है तो कश्मीर के लोगों को साथ लेकर चलने की, खासकर युवाओं को। लेकिन कश्मीर के अब तक के इतिहास पर नजर डालें तो मालूम होता है कि वहां की अवाम को आजादी के तकरीबन छह दशक बाद भी सही मायने में लोकतंत्र नहीं मिला और न ही नेतृत्व। आजादी से अब तक एक लंबे समय के लिए वहां राजनीतिक नेतृत्व अब्दुल्ला परिवार के हाथों में रहा। मुफ्ती मोहम्मद सईद के नेतृत्व में पीडीपी की सरकार आने के बाद कश्मीर में सही मायने में लोकतांत्रिक प्रक्रिया और वहां के लोगों को राजनीतिक नेतृत्व मिलने की उम्मीद जगी थी, लेकिन आगे चलकर यह उम्मीद भी मुफ्ती परिवार तक सिमटकर रह गई, जब पार्टी की बागडोर सईद की बेटी महबूबा मुफ्ती के हाथों में चली गई। फिर पुलिस की ओर से गोलीबारी या सेना का फ्लैगमार्च कश्मीरी अवाम के गुस्से को और भड़काता है। इसलिए यहां जरूरत है फ्रांस में 1968 के आंदोलन के समय सरकार द्वारा अपनाए गए तौर तरीके से सीख लेने की। जब युवाओं ने पूरे फ्रांस में सरकार का चक्का जाम कर दिया था, तब प्रसिद्ध चिंतक ज्यां पाल सात्र्र ने कहा था कि उनसे लड़ने की नहीं, बल्कि उनका विश्वास जीतने की जरूरत है। आज वही नीति कश्मीर के संदर्भ में भी अपनाने की जरूरत है।
दअसल, कश्मीर समस्या आज भारतीय विदेश नीति के सामने एक महत्वपूर्ण चुनौती बन गई है। 1980 के दशक तक समस्या अधिक जटिल नहीं थी। लेकिन आज समस्या को हल करने के तरीके भी जटिल हो गए हैं। वहां नई ताकतें आ गई हैं। पाकिस्तान तो था ही, अब तालिबान और अफगानिस्तान की उपस्थिति भी हो गई है। फिर अमेरिका की रुचि भी दक्षिण एशिया में बढ़ गई है और कश्मीर के जरिये वह अपने हित साधने की जुगत में है। हिन्दुस्तान की कमजोरी यह भी है कि यहां आज उस तरह का राष्ट्रीय नेतृत्व नहीं है, जसा 1950 के दशक तक था। वह ऐसा वक्त था जब राजनीतिक नेतृत्व अगर कोई फैसला करता था तो उस पर किसी तरह की बहस नहीं होती थी। राष्ट्रमंडल में शामिल होने का फैसला बतौर प्रधानमंत्री नेहरू ने किया था और बाद में संसद ने बिना किसी बहस के उसे पारित कर दिया। लेकिन आज वह स्थिति नहीं है और न ही उस तरह का राजनीतिक नेतृत्व। फिर यहां नौकरशाही भी हावी है, जो ऐसी समस्या का समाधान नहीं कर सकती। कुल मिलाकर स्थिति दिनोंदिन और पेचीदी होती जा रही है।
लेकिन ऐसा भी नहीं है कि समस्या के समाधान के सारे दरवाजे बंद हो गए हैं। सरकार की कोशिशें भले कामयाब होती नहीं दिख रही हों, लेकिन समस्या के समाधान को लेकर कई बुद्धिजीवी, राजनेता, अधिकारी, कार्यकर्ता आदि अनौपचारिक बातचीत कर रहे हैं, जिससे काफी उम्मीदें हैं। लंदन में उनकी कई बैठकें हो चुकी हैं और लगातार हो रही हैं। ये ऐसे लोग हैं, जो निष्पक्ष भाव रखते हैं और सामान्य तौर पर कश्मीरियों के मित्र के रूप में जाने जाते हैं। इसे ‘बैकरूम डिप्लोमेसीज् का नाम दिया जाता है। उधर, अमेरिका भी ऐसी की कोशिश में जुटा है। यानी अनौपचारिक रूप से वह भी समस्या के समाधान के लिए लगातार विचार-विमर्श कर रहा है। अब ऐसे में संशय इस बात को लेकर है कि कहीं सरकार कश्मीर समस्या के समाधान के लिए अमेरिकी फॉर्मूले को तरजीह न दे डाले, क्योंकि मौजूदा यूपीए सरकार का झुकाव भी अमेरिका की तरफ नजर आता है और विपक्ष भी एकजुट नहीं है। अमेरिकी फॉर्मूले में बुराई सिर्फ इतनी है कि चाहे वह जितना भी निष्पक्ष दिखे, उसमें अमेरिका अपने हितों का खयाल जरूर रखेगा। इसलिए समस्या को नए सिरे से समझने की जरूरत है। राजनीतिक दलों को भी चाहिए कि वे कश्मीर को एक मुद्दे की तरह इस्तेमाल न करें। देश की जनता को कश्मीर समस्या को नए परिप्रेक्ष्य में देखना होगा। पुराने मापदंडों के अनुसार न तो कश्मीर को देखना चाहिए और न ही सरकार को। कुल मिलाकर, फिलहाल समस्या के समाधान के बारे में नहीं, बल्कि उसके लिए माहौल तैयार करने की जरूरत है।
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