मंगलवार, 23 फ़रवरी 2010

अपना दोस्त राम बरन


राम बरन यादव अभी भारत की यात्रा पर आए हुए थे। उनकी भारत यात्रा राजनयिक तो थी ही साथ ही उन्होंने हरिद्वार में चल रहे कुम्भ मेले में भी एक भक्त की हैसियत से भाग लिया। वे चाहते हैं कि भारत और नेपाल के संबंध मधुर बने रहें। वे हरेक क्षेत्र में भारत के साथ मिलकर काम करना चाहते हैं। राष्ट्रपति पद तक पहुंचने के क्रम में उन्हें काफी संघर्ष करना पड़ा है। यह राम बरन यादव की स्पष्टवादिता का ही प्रमाण है कि राष्ट्रपति पद पर रहते हुए भी वे देश की वर्तमान राजनीतिक व्यवस्था से असंतुष्ट हैं और उसको आमूल-चूल बदलने की बात करते हैं।

राम बरन यादव, नेपाल के राष्ट्रपति। एक ऐसे नेता जो लोकतंत्र की स्थापना के लिए न केवल राजतंत्र से लड़ते रहे, बल्कि माओवादियों से भी लड़े और आज भी उनका विरोध ङोल रहे हैं। नेपाल में करीब ढाई सौ साल पुराने राजतंत्र की विदाई और गणतंत्र की स्थापना के बाद वहां पहली बार जनता का कोई प्रतिनिधि राष्ट्रपति बना और यह मौका मिला राम बरन यादव को। निश्चय ही, इस उपलब्धि में लोकतंत्र की स्थापना के लिए उनकी अंतहीन लड़ाई का महत्वपूर्ण योगदान रहा। आखिर, लंबे समय से नेपाल में जड़ें जमाए राजतंत्र की विदाई आसान तो न थी।एक लंबी लड़ाई के बाद वर्ष 2008 में नेपाल में 240 पुराने राजतंत्र का अंत हुआ और वहां संघीय लोकतांत्रिक गणराज्य की स्थापना हुई। उसी साल अप्रैल में वहां संविधानसभा के चुनाव हुए, जिसमें कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ नेपाल (माओवादी) माओवादियों को सबसे अधिक सीटें मिलीं। लेकिन जुलाई में हुए राष्ट्रपति चुनाव में उनका उम्मीदवार हार गया। नेपाली कांग्रेस के उम्मीदवार राम बरन यादव ने सीपीएनएम उम्मीदवार राम राजा प्रसाद सिंह को हराकर जीत हासिल की। इससे पहले उन्होंने अपने गृह जिले धनुषा के ही पांच नंबर कांस्टीच्वेंसी से संविधानसभा का चुनाव जीता था। राष्ट्रपति पद पर जीत के तुरंत बाद उन्होंने कहा था कि यह लोकतंत्र की जीत है और वे आगे भी इसे मजबूत करने के लिए काम करते रहेंगे।चार फरवरी, 1948 को नेपाल के मधेशी क्षेत्र में धनुषा जिले में एक मध्यमवर्गीय किसान परिवार में पैदा हुए राम बरन यादव के लिए राष्ट्रपति पद तक का सफर आसान नहीं रहा और न ही यह कामयाबी उन्हें विरासत में मिली। उन्होंने जो कुछ भी पाया अपनी मेहनत व जुझारूपन से पाया। पिता मध्यमवर्गीय परिवार के किसान थे। परिवार आर्थिक रूप से बहुत संपन्न नहीं था। लेकिन किसान पिता को यह पसंद नहीं था कि बेटा भी खेत-खलिहान में उलझकर रह जाए। इसलिए उन्होंने बेटे को स्कूल भेजा। उनकी शुरुआती शिक्षा-दीक्षा उनके गृह जिले में ही हुई। लेकिन उच्च शिक्षा के लिए वे काठमांडू रवाना हो गए।बाद में उन्होंने भारत का रुख किया और पश्चिम बंगाल के कलकत्ता मेडिकल कॉलेज से एमबीबीएस की पढ़ाई की। इस दौरान वे विभिन्न लोकतांत्रिक संगठनों से जुड़े रहे। वहां छात्र राजनीति में उनकी महत्वपूर्ण भागीदारी रही। एमबीबीएस की डिग्री लेने के बाद उन्होंने चंडीगढ़ के मेडिकल एजुकेशन और शोध संस्थान से एमडी किया। पढ़ाई पूरी करने के बाद वे नेपाल लौट गए। वहां उन्होंने करीब चार साल तक प्रैक्टिस भी की। उन्होंने जनकपुर में एक मेडिकल क्लिनिक भी खोला। एक डॉक्टर के रूप में भी वे कामयाब रहे।लेकिन डॉक्टरी का पेशा शायद उनके लिए नहीं बना था। पहले से ही राजनीति में रुचि रखने वाले डॉ. यादव 1980 के दशक में नेपाल के पूर्व प्रधानमंत्री बीपी कोइराला के आखिरी दिनों में उनके निजी चिकित्सक बने, जो उनके राजनीतिक जीवन का टर्निग प्वाइंट साबित हुआ। बीपी कोइराला की सामाजिक-लोकतांत्रिक विचारधारा ने उन्हें सक्रिय राजनीति में आने के लिए प्रेरित किया। वे नेपाली कांग्रेस से जुड़ गए और पार्टी में विभिन्न पदों पर उन्होंने महत्वपूर्ण जिम्मेदारी निभाई। 1991-1994 के बीच वे गिरिजा प्रसाद कोइराला की सरकार में स्वास्थ्य मंत्री भी बने। वैसे नेपाल में लोकतंत्र की लड़ाई से वे तभी जुड़ गए थे, जब दिसंबर, 1960 में तत्कालीन राजा महें्र ने लोकतांत्रिक ढंग से चुनी हुई प्रधानमंत्री बीपी कोइराला की सरकार गिरा दी और सभी शक्तियां अपने अधीन कर ली। पड़ोसी देश भारत के लिए उनके दिल में स्नेह है और इसलिए वे दोनों देशों के संबंध मधुर बनाना चाहते हैं। पिछले सप्ताह भारत की यात्रा के दौरान उन्होंने इसके स्पष्ट संकेत दिए। राष्ट्रपति चुने जाने के बाद भी उन्होंने साफ कहा था कि वे शिक्षा, स्वास्थ्य और पर्यावरण के क्षेत्र में भारत के साथ मिलकर काम करना चाहते हैं। शायद यही वजह रही कि वर्ष 2008 में राष्ट्रपति का पदभार ग्रहण करने के बाद अपनी पहली औपचारिक विदेश यात्रा के रूप में उन्होंने भारत को चुना। भारत से उनके लगाव की वजह न केवल उनका ऐसे क्षेत्र से होना है, जहां की संस्कृति और रीति-रिवाज काफी हद तक यहां से मिलते-जुलते हैं, बल्कि उनकी शिक्षा-दीक्षा भी हो सकती है, जो उन्होंने भारत में ही पाई।नेपाल में राम बरन यादव की छवि एक ऐसे जुझारू नेता की है, जो जनता के लोकतांत्रिक हितों व अधिकारों के लिए प्रतिबद्ध हैं और देश की एकता व अखंडता के लिए हर झंझावात ङोलने को तैयार हैं। शायद यही वजह है कि नेपाल के मधेश क्षेत्र में मधेशी प्रांत की मांग का वे खुलकर विरोध करते हैं, जबकि वे स्वयं उसी क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करते हैं। उनका सपना नेपाल को आर्थिक रूप से संपन्न और शांतिपूर्ण बनाना है, जो फिलहाल विकास की बाट जोह रहा है। साथ ही वे नेपाल के तराई क्षेत्र में सक्रिय कुछ हथियारबंद समूहों को मुख्यधारा में लाना चाहते हैं। उनका साफ मानना है कि देश में जो मौजूदा राजनीतिक संस्कृति है, उसके कारण विकास अवरुद्ध हो गया है। इसमें आमूल-चूल बदलाव की जरूरत है। एकजुटता और प्राकृतिक संसाधनों के इस्तेमाल से ही नेपाल तरक्की कर सकता है।वे स्पष्टवादिता के लिए भी जाने जाते हैं और इस क्रम में अपनी उम्र भी नहीं छिपाते। राष्ट्रपति चुनाव से पहले इस बारे में पूछे जाने पर बड़ी साफगोई से ठहाके के साथ उन्होंने कहा, ‘यूं तो मैं 64 साल पहले पैदा हुआ था, लेकिन जन्म प्रमाण-पत्रों के अनुसार मेरी उम्र चूंकि 61 साल ही है, इसलिए राष्ट्रपति चुनाव के लिए दाखिल नामांकन-पत्र में भी यही उम्र लिखी गई है।‘

मंगलवार, 16 फ़रवरी 2010

बेगुन का गुनग्राहक


कौन नहीं जानता कि जयराम रमेश नव पूंजीवाद और उदारीकरण के घनघोर समर्थक हैं। लेकिन बीटी बैगन के मामले में उन्होंने पर्यावरण मंत्री के नाते जो फैसला लिया, वह उनकी अपनी आर्थिक विचारधारा के उलट था। उनकी नजर इस बहस के सामाजिक पहलू को नहीं काट पाई और उन्होंने फिलहाल उस पर रोक लगा दी। उनके इस फैसले पर अब वे बीटी बैगन विरोधी भी वाह-वाह कर रहे हैं, जिनके लिए तैश खाकर जयराम रमेश ने कहा था कि उन लोगों को अपने दिमाग का इलाज कराना चाहिए। वैसे भी रमेश तैश में आकर ऐसे बयान देते रहते हैं जो आगे बड़े विवाद बनते हैं।

पर्यावरण से प्यार है उन्हें। आज से नहीं, नौ साल की उम्र से, जब ब्रिटिश लेखक एडवर्ड प्रिचार्ड गी की पुस्तक ‘द वाइल्ड लाइफ ऑफ इंडियाज् हाथ आई। पर्यावरण से इस विशेष लगाव की वजह से ही शायद यूपीए सरकार के दूसरे कार्यकाल में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और यूपीए अध्यक्ष सोनिया गांधी ने वन एवं पर्यावरण मंत्रालय की जिम्मेदारी के लिए उन्हें चुना। ये हैं जयराम रमेश। वे राष्ट्रीय सलाहकार परिषद के सदस्य भी हैं। इससे पहले की यूपीए सरकार में वे वाणिज्य व उद्योग मंत्रालय में राज्य मंत्री रह चुके हैं।
यूपीए सरकार के दूसरे कार्यकाल में पर्यावरण व मंत्री के रूप में जयराम रमेश अक्सर विवादों में रहे। कभी जलवायु परिवर्तन पर उनके बयान ने विपक्ष को नाराज किया तो कभी भोपाल में यूनियन कार्बाइड कंपनी के परिसर स्थल का दौरा करने के बाद दिए गए उनके बयान ने आम लोगों को नाराज कर दिया। इन दिनों वह बीटी बैंगन को लेकर चर्चा में हैं। हालांकि लोगों के भारी विरोध के बाद इसे भारतीय कृषि जगत में उतारने पर रोक लगा दी गई है, लेकिन इसे लेकर उनका आग्रह किसी से छिपा नहीं है। इसका विरोध करने वालों को उन्होंने ‘मानसिक इलाजज् की सलाह तक दे डाली।
रमेश कांग्रेस के उन खास नेताओं में हैं, जिनकी गिनती गांधी-नेहरू परिवार के करीबी नेताओं में होती है। यही वजह रही कि पिछले साल लोकसभा चुनाव अभियान की जिम्मेदारी पार्टी अध्यक्ष सोनिया गांधी ने उन्हें सौंपी। रमेश ने भी उन्हें निराश नहीं किया। पार्टी के एक अनुशासित कार्यकर्ता की तरह उन्होंने तुरंत वाणिज्य व उद्योग राज्य मंत्री के पद से इस्तीफा दिया और जुट गए चुनाव की रणनीति तैयार करने में। चुनाव अभियान को लेकर बनाई गई उनकी रणनीति कामयाब रही और यूपीए पिछली बार की तुलना में अधिक सीटें लेकर एकबार फिर सत्तासीन हुई, जिसमें उन्हें पर्यावरण व वन मंत्रालय का स्वतंत्र कार्यभार सौंपा गया।
लेकिन यूपीए सरकार के अन्य मंत्रियों से अलग उनके कमरे में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह या सोनिया गांधी की तस्वीर नहीं, बल्कि दक्षिण भारत के देवी-देवताओं को दर्शाती तंजौर पेंटिंग और बौद्ध धर्म के कुछ चिह्न् हैं। इसके अलावा कोई तस्वीर है तो वह महात्मा गांधी और जवाहर लाल नेहरू की है, वह भी गंभीर बहस की म्रुा में। हालांकि उनकी आदर्श इंदिरा गांधी हैं। रमेश के मुताबिक, हर क्षेत्र में उन्होंने बेहतर काम किया। पर्यावरण भी इसका अपवाद नहीं है। अगर बतौर प्रधानमंत्री उन्होंने वन संरक्षण की दिशा में जरूरी कदम नहीं उठाए होते, तो आज यह पूरी तरह खत्म हो चुका होता।
कर्नाटक के चिकमगलूर में नौ अप्रैल, 1954 को जन्मे रमेश तकनीक व आधुनिकीकरण के हिमायती हैं। इसकी वजह शायद उनकी शिक्षा-दीक्षा और पारिवारिक पृष्ठभूमि रही है। उनके पिता प्रो. सीके रमेश आईआईटी, बॉम्बे के सिविल इंजीनियरिंग डिपार्टमेंट के विभागाध्यक्ष थे। तीसरी से पांचवीं की स्कूली शिक्षा उन्होंने रांची के सेंट जेवियर स्कूल से पूरी की। 1970 में उन्होंने आईआईटी, बॉम्बे में दाखिला लिया और वहां से मैकेनिकल इंजीनियरिंग में बीटेक किया। 1975-77 में उन्होंने अमेरिका के कार्नेगी यूनिवर्सिटी से प्रबंधन और लोक नीति में मास्टर डिग्री ली।
पढ़ाई खत्म करने के बाद वे विश्व बैंक से जुड़े। दिसंबर, 1979 में वे भारत लौटे और यहां योजना आयोग सहित कें्र सरकार के उद्योग व आर्थिक विभाग से संबंधित विभिन्न संस्थाओं में महत्वपूर्ण जिम्मेदारी निभाई। वे 1991 में पीवी नरसिम्हा राव सरकार में वित्त मंत्री मनमोहन सिंह के सलाहकार भी रहे। वे राजीव गांधी के भी करीबी रहे। 1989 में जब कांग्रेस चुनाव हार हार गई थी, तो कांग्रेस के पुनर्जीवन के लिए उन्होंने राजीव गांधी के सलाहकार की भूमिका निभाई थी। आज उसी भूमिका में वे सोनिया गांधी के साथ हैं।
रमेश आंध्र प्रदेश से राज्य सभा के सदस्य हैं। उनकी मातृभाषा तेलुगू है। कर्नाटक संगीत और भरतनाट्यम में उन्हें खासी दिलचस्पी है। वे चीन के साथ भारत के अच्छे संबंधों के पैरोकार रहे हैं। उनका कहना है कि दोनों देशों के बीच व्यापार, कला, संस्कृति सहित अन्य क्षेत्रों में भी सहयोग की भरपूर गुंजाइश है और इससे दोनों पक्ष लाभान्वित होंगे। उन्होंने भारत-चीन संबंधों पर आधारित ‘मेकिंग सेंस ऑफ चीनींडिया : रिफ्लेक्शन ऑन चाइना एंड इंडियाज् नामक पुस्तक भी लिखी। जयवायु परिवर्तन पर कोपेनहेगन सम्मेलन के दौरान भी उन्होंने ब्राजील, दक्षिण अफ्रीका और चीन के साथ मिलकर प्रभावशाली तरीके से विकासशील देशों का पक्ष रखने की मुहिम चलाई। उन्होंने बिजनेस स्टैंडर्ड, बिजनेस टुडे, द टेलीग्राफ, टाइम्स ऑफ इंडिया और इंडिया टुडे के लिए कॉलम भी लिखा है। साथ ही टेलीविजन पर भी बिजनेस और अर्थ से जुड़े कई कार्यक्रम प्रस्तुत किए।
लेकिन कई बार उनके बयानों ने विवाद पैदा किया, जिस पर खासा हंगामा हुआ। देश के पहले जीन परिवर्धित बीटी बैंगन को व्यावसायिक मंजूरी से पहले उन्होंने लोगों से इस बारे में परामर्श लेना जरूरी समझा। इसके लिए उन्होंने हैदराबाद में लोगों को आमंत्रित कर अनूठी पहल की। वहां देश के सात शहरों से करीब आठ हजार लोग पहुंचे। इस दौरान लोगों ने विरोध प्रदर्शन भी किए, जिसके जवाब में रमेश ने यहां तक कह डाला कि बीटी बैंगन का विरोध करने वालों को ‘मानसिक इलाजज् की जरूरत है। इसी तरह, यूपीए सरकार के पहले कार्यकाल में प्रधानमंत्री के ब्राजील दौरे से ठीक पहले उन्होंने यह कहकर विदेश मंत्रालय के लिए मुश्किल खड़ी कर दी कि आखिर ऐसे देश से व्यापार समझौते की क्या उपयोगिता है, जो हमसे काफी दूर है। भोपाल में यूनियन कार्बाइड कंपनी से हुए गैस रिसाव ने स्थानीय लोगों को जो घाव दिए, वे आज भी नहीं भरे हैं। इसे लेकर आज भी लोगों में रोष है। लेकिन रमेश ने कंपनी परिसर में पहुंचकर और वहां से हाथ में मिट्टी उठाकर यह कहते हुए लोगों को नाराज कर दिया कि देखिये, यह मेरे हाथ में है, फिर भी मैं जिंदा हूं। जलवायु परिवर्तन पर कोपेनहेगन सम्मेलन के दौरान कार्बन उत्सर्जन कम करने को लेकर दिए गए उनके बयान ने भी खासा हंगामा बरपाया।

सोमवार, 8 फ़रवरी 2010

अमर नहीं था प्रेम


अमर सिंह कब खबरों में नहीं रहते। लेकिन इधर खूब थे और वह भी उलट कारणों से। पहले उनका खबरों में होना समाजवादी पार्टी के लिए होता था। इस बार सपा से उनकी बेआबरू विदाई इसका कारण बनी। मुलायम-अमर की जोड़ी टूट गई। दोस्त-दोस्त न रहा। प्यार, प्यार न रहा!

अमर सिंह, भारतीय राजनीति के कॉरपोरेट नुमाइंदे। एक ऐसे कारोबारी नेता, जिसने धुर समाजवादी पार्टी को दिया पूंजीवादी चेहरा। पैसा हाथ बदलते हैं, यह कहावत जानी-मानी। लेकिन वह हाथ ही बदल देता है मनुष्य को भी। गरीब-गुरबों की राजनीति करने वाली पार्टी अचानक हो गई पांच सितारा। कॉरपोरेट और फिल्मी सितारों से लकदक। खांटी समाजवादी हाशिये पर। जनता भी पार्टी से होती गई दूर। तब कहीं ‘नेताजीज् को एहसास हुआ कि पूंजीवाद ने उनके समाजवाद का निकाल दिया दीवाला। यह समझने में लग गए पूरे चौदह साल। फिर भी सबकुछ लुटा के आखिर होश में आ ही गए। अमर सिंह पार्टी से बाहर हो गए, इस आरोप के साथ कि वे समाजवाद की नींव हिलाने की एक साजिश के रूप में पार्टी में शामिल हुए थे। इस तरह, समाजवाद और पूंजीवाद का प्रेम अमर नहीं हो पाया।
करीब चौदह साल पहले 1996 में अमर सिंह समाजवादी पार्टी में शामिल हुए थे। तब सपा का अपना जनाधार था। पार्टी प्रमुख मुलायम सिंह यादव दो बार राज्य के मुख्यमंत्री बन चुके थे। कें्र में जब संयुक्त मोर्चा की सरकार बनी तो वे रक्षा मंत्री बने। ऐसा इसलिए हो सका, क्योंकि गरीब, पिछड़े और अल्पसंख्यक; जिसकी वे राजनीति करते थे, उनके साथ थे। लेकिन अमर सिंह के आने के बाद पार्टी की रीति-नीति बदलने लगी। पूंजीपतियों और उद्योगपतियों की भूमिका बढ़ी। अमर सिंह पार्टी और उनके बीच संपर्क सूत्र का काम करने लगे। रिलायंस अनिल धीरूभाई अंबानी समूह के प्रमुख अनिल अंबानी जसे उद्योगपति और अमिताभ बच्चन, जया बच्चन, जया प्रदा, राजबब्बर, संजय दत्त, मनोज तिवारी जसी फिल्मी हस्तियां पार्टी से जुड़ीं। पार्टी को बड़ी मात्रा में वित्तीय अनुदान मिलने लगा, जिसकी उसे सख्त जरूरत थी।
पैसे की ताकत के अलावा उनके पास वक्तृत्व कला भी थी। शेरो-शायरी से लेकर अंग्रेजी भाषा पर भी उनकी अच्छी पकड़ है, जो सपा के दूसरे नेताओं में नहीं थी। जो गिने-चुने नेता अंग्रेदां थे भी, वे नेताजी के विश्वासपात्र नहीं बन पाए। उनके इन्हीं गुणों और पैसे की धमक ने उन्हें नेताजी के करीब ला दिया। इतने करीब कि नेताजी बहुत से फैसलों के लिए उन पर निर्भर हो गए। जयललिता से बात करनी हो या चं्रबाबू नायडू से, सपा के प्रतिनिधि अमर सिंह ही होते थे। वे सपा प्रमुख की एक बड़ी जरूरत बन गए। नेटवर्क में माहिर अमर सिंह को नेटवर्क नेता के रूप में भी जाना जाता है।
अमर सिंह पार्टी के लिए राजपूत वोट बैंक की दृष्टि से भी फायदेमंद थे। सपा जो केवल पिछड़ों और अल्पसंख्यकों की राजनीति के लिए जानी जाती थी, को राजपूतों का वोट मिलने की उम्मीद भी बंध गई। उनके आने के बाद पार्टी से कई राजपूत नेता जुड़े भी। लेकिन आजम खां जसे पुराने व जनाधार वाले नेता पार्टी से अलग भी हुए।
अमर सिंह के बोलबाले के दौर में पार्टी उस कांग्रेस के करीब जाने लगी, जिसका विरोध ही उसकी राजनीति का आधार था। कल्याण सिंह जसे नेता भी पार्टी में आए, जिसकी वजह से सपा के परंपरागत मुसलमान वोटर नाराज हो गए। एक अरसे से अमर नीति से परेशान सपा के जमीनी कार्यकर्ताओं में विरोध के स्वर मुखर होने लगे। इस बीच अपनी भूमिका कमजोर होती देख अमर सिंह ने पार्टी सुप्रीमो पर दबाव बनाने के लिए इस्तीफे की राजनीति अपनाई। पार्टी के सभी पदों से उन्होंने इस्तीफा दे दिया। पार्टी में रहते हुए ही उन्होंेने स्वयं को राजपूतों का सच्चा प्रतिनिधि बताते हुए लोकमंच का गठन किया। निश्चय ही उनका यह कदम पार्टी के खिलाफ बगावत का बिगुल था।
अमर सिंह का विवादों से हमेशा चोली-दामन का साथ रहा है। ‘वोट के बदले नोटज् कांड ऐसा ही एक मामला है। वर्ष 2008 में अमेरिका के साथ परमाणु समझौते को लेकर जब वामपंथी दलों ने कें्र की संप्रग सरकार से समर्थन वापस ले लिया था, तब अमर सिंह ही सरकार के लिए तारणहार बनकर आए थे। कांग्रेस को समर्थन के लिए उन्होंने सपा प्रमुख को मनाया। कहा तो यहां तक गया कि लोकसभा में नोटों से भरा जो बैग लहराया गया था, वह अमर सिंह ने ही भाजपा सांसदों को संप्रग के पक्ष में मतदान के लिए दिया था। अब सपा के नेता भी दबी जुबान से यह कहने लगे हैं, हालांकि तब उन्होंने इससे इनकार किया था। सपा के इस रवैये ने उसके परंपरागत वोट बैंक मुसलमानों को नाराज कर दिया, क्योंकि वे इस समझौते का विरोध कर रहे थे।
दिल्ली के जामिया नगर में हुए मुठभेड़ की जांच की मांग कर उन्होंने एक नए विवाद को जन्म दिया, जबकि इससे पहले उन्होंने मुठभेड़ में शहीद हुए दिल्ली पुलिस के जवान मोहन चंद शर्मा के परिवार को दस लाख रुपए की सहायता राशि देकर अपनी संवेदना जताई थी। 26/11 के बाद यह बयान देकर उन्होंने पार्टी के लिए मुश्किल खड़ी कर दी कि यदि हमलावर पाकिस्तान के नागरिक नहीं हुए तो सपा कें्र की यूपीए सरकार से समर्थन वापस ले लेगी। ऐसे गंभीर हालात में अमर सिंह के इस बयान ने पार्टी को हंसी का पात्र बना दिया। हाल ही में अमर सिंह की रुचि ‘ब्लॉगिंगज् में भी हो गई है। ‘बड़े भाईज् अमिताभ बच्चन से प्रेरणा लेकर उन्होंने अपना ब्लॉग भी शुरू किया।
अमर सिंह का जन्म सत्ताइस जनवरी, 1956 को उत्तर प्रदेश के आजमगढ़ जिले में हुआ। उनकी शुरुआती शिक्षा जिले के हिंदी माध्यम स्कूलों से ही हुई। लेकिन आगे की पढ़ाई के लिए उन्होंने पश्चिम बंगाल का रुख किया। वहां कोलकाता के सेंट जेवियर कॉलेज से उन्होंने उच्च शिक्षा प्राप्त की। अपने राजनीतिक करियर की शुरुआत उन्होंने कांग्रेस से की। सपा में शामिल होने से पहले वे कोलकाता में कांग्रेस के हार्डकोर नेता थे। 1980 के दशक में कांग्रेस के तत्कालीन नेता माधव राव सिंधिया ने उन्हें ऑल इंडिया कांग्रेस कमेटी के लिए भी नामांकित किया था, क्योंकि कोलकता में भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड के अध्यक्ष के लिए हुए चुनाव में उन्होंने जगमोहन डालमिया को हराने में सिंधिया की मदद की थी। बाद में वे हिंदुस्तान टाइम्स, सहारा इंडिया सहित कई अन्य कंपनियों के निदेशक भी बने। अब सपा से बाहर होने के बाद कहा जा रहा है कि वे घर वापसी यानी कांग्रेस में जाने की सोच रहे हैं। सपा नेताओं का भी आरोप है कि पिछले एक साल में कांग्रेस से उनकी नजदीकियां बढ़ी हैं।

मंगलवार, 2 फ़रवरी 2010

गांधी और मैं


राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की पुण्यतिथि (30 जनवरी) अभी-अभी बीती है। हर साल उनकी पुणयतिथि और जन्म तिथि (2 अक्टूबर) पर कुछ कार्यक्रम आयोजित उन्हें श्रद्धांजलि देकर हम अपने कर्तव्यों की इतिश्री समझ लेते हैं। कार्यक्रमों में उनके दर्शन की बात की जाती है, उनके बताए रास्तों पर चलने की बात की जाती है, लेकिन वास्तव में उन्हें आत्मसात कोई नहीं करता। उनके दर्शन, उनकी नीतियों पर अमल में कई मुश्किलों व अड़चनों का हवाला देकर उन्हें टाल दिया जाता है। कुछ युवा तो इन दिनों गांधी दर्शन को पुराना व अप्रसांगिक करार देते हुए इसकी आलोचना को फैशन समझने लगे हैं। लेकिन जहां तक मैंने गांधी को पढ़ा और समझा है, उनकी नीतियां व दर्शन मुङो हर तरह से प्रासंगिक लगे।

मेरे लिए गांधी का अर्थ है एक मजबूत इरादों वाला इंसान, जो अपने शुरुआती जीवन में निहायत ही संकोची स्वभाव के थे। तब उनमें कुछ भी ऐसा नहीं था, जो उन्हें असाधारण बना दे। अपने बचपन में वह भी दूसरे बच्चों की तरह ही थे, जो बुरी संगत में पड़ने पर सिगरेट के कश लेता है और घर में वैष्णव धर्म का अनुपालन होने के बावजूद छिपकर मांस भी खाता है। आम युवाओं की तरह उन्हें भी ‘पत्नी सुखज् प्रिय लगता है और वह भी इतना कि पिता की बीमारी में भी पत्नी से मिलने की इच्छा कम नहीं होती।
लेकिन एक चीज थी, जो गांधी को सबसे अलग करती है और जिसकी बदौलत वे आज हम सबके बीच आम नहीं, खास हैं; साधारण नहीं, असाधारण हैं। वह थी, सही और गलत को पहचानने की उनकी क्षमता। दिल की आवाज सुनने की क्षमता और उसके बताए रास्ते पर तमाम मुश्किलों के बाद भी चलने का दृढ़ निश्चय। मुङो लगता है कि यह क्षमता हम सबमें होती है, लेकिन हम उसका इस्तेमाल नहीं करते, या यूं कहें कि कर नहीं पाते और अक्सर सही-गलत के भंवर में फंसे रहते हैं।
सिगरेट का कश लगाने के बाद उन्हें यह एहसास होता है कि यह अनुचित है और बगैर किसी सलाह-मशविरे या दबाव के वह इसे छोड़ देते हैं। उन्हें यह भी एहसास होता है कि घरवालों को बिना बताए मांस खाकर उन्होंने ‘पापज् किया है। ‘पापज् का यह एहसास इतना तीव्र होता है कि आत्महत्या तक के खयाल आते हैं मन में। लेकिन इसे त्यागकर वे इस ‘पापज् का प्रायश्चित भी करते हैं और पूरी दुनिया को इस तर्क के साथ शाकाहार के लिए प्रेरित करते हैं कि जिस प्रकार मनुष्य को जीने का हक है, उसी तरह जानवरों को भी जीवन का अधिकार है और मानव को उसकी हत्या का कोई हक नहीं है। साथ ही, वे यह भी कहते हैं कि मनुष्य के शरीर की बनावट कुछ इस तरह है कि वह केवल कंद-मूल खाकर भी स्वस्थ रह सकता है, जसा कि प्राचीन मानव करता था। फिर भोजन के लिए जीव हत्या क्यों?
‘पत्नी सुखज् के प्रति हमेशा आकर्षित रहने वाले गांधी बाद में इसे तृष्णा बताते हुए ब्रह्मचर्य का व्रत लेते हैं और उसका अनुपालन भी करते हैं। गांधी जब पढ़ाई के लिए ब्रिटेन जाते हैं, तो आम युवाओं की तरह वे भी स्वयं को वहां अविवाहित दिखाना चाहते हैं। युवतियों का साथ उन्हें भी अच्छा लगता है। लेकिन जल्द ही उन्हें एहसास होता है कि यह ‘झूठज् है और पत्नी के साथ ‘अन्यायज् भी। सत्य का यह पुजारी उस झूठ को अधिक दिनों तक ढो नहीं पाता।
तो कहां हैं गांधी हम सबसे अलग? क्या वे हम सबके बीच के, हम सबके जसे ही नहीं हैं? हैं, बिल्कुल हैं। लेकिन उनमें सत्य को लेकर जो आग्रह था, वह हम सबमें कहां? गांधी जो थे, वही दिखते थे और दिखना चाहते भी थे। लेकिन आज हम हैं कुछ और, जबकि दिखना चाहते हैं कुछ और। कुल मिलाकर, आज हमारे खाने के दांत हाथी की तरह ही अलग और दिखाने के अलग हैं। हम सबने झूठ व फरेब का आवरण ओढ़ रखा है, जिसे उतार फेंकने की जरूरत है।
मेरे लिए गांधी का अर्थ एक ऐसे दृढ़ निश्चयी इंसान से भी है, जो पत्नी और बच्चों के बुरी तरह बीमार पड़ने पर भी उन्हें मांस व मदिरा देने के डॉक्टरी सलाल को दरकिनार करते हुए उनके स्वास्थ्य लाभ के लिए देसी तरीके अपनाता है और इसमें जीतता भी है। हालांकि मैं यह नहीं कहती और न ही गांधी जी ने कहा था कि हम सबको भी बीमारी से पार पाने का वही तरीका बिना सोचे-समङो अपनाना चाहिए। पर, इतना तो जरूर है कि उस इंसान ने विपरीत परिस्थितियों में भी हिम्मत नहीं हारी और अपने निश्चय पर अडिग रहने की सीख दी।
मेरे लिए गांधी का अर्थ ऐसे संवेदनशील इंसान से भी है, जिसने देश-दुनिया का भ्रमण करने के बाद जब यह देखा कि एक बड़ी आबादी के पास पहनने के लिए कपड़े तक नहीं हैं, तो उन्होंने स्वयं भी सिर्फ धोती से तन ढंकने का निर्णय लिया। उनके इस निर्णय ने कई लोगों को आश्चर्य में डाला। ब्रिटिश अधिकारियों ने उन पर फब्तियां भी कसी। उन्हें ‘अधनंगा फकीरज् कहा। लेकिन अपने इस निर्णय से यह अधनंगा फकीर लाखों-करोड़ों दिलों का सम्राट बन बैठा।
मेरे लिए गांधी का अर्थ एक ऐसे इंसन से है, जो उस वक्त मुङो सहारा देता है, जब निराशा हर तरफ से मुङो घेर लेती है, वह चाहे व्यक्तिगत स्तर पर हो या व्यावसायिक स्तर पर। गांधी का यह जंतर कि जब भी दु:खी होओ, अपने से अधिक दु:खी लोगों के बारे में सोचो, मुङो बहुत सुकून देता है। खुद को कष्ट पहुंचाने वाले को माफ कर देने का उनका प्रयोग भी अद्भुत है। कई बार मैंने महसूस किया कि खुद को आहत करने वाले को कष्ट देने के लिए हम जो भी कोशिश करते हैं, उससे कहीं न कहीं हम स्वयं भी आहत होते हैं। मैंने कई बार यह भी समझा कि बदले की आग में जलना किसी सजा से कम नहीं होता। सामने वाले को तो सजा तब मिलती है, जब हम कुछ ऐसा कर बैठते हैं, जिससे उसे तकलीफ हो; लेकिन बदले की यह आग इतनी देर में हमें बहुत तकलीफ दे जाती है।
इसी तरह, उनके ‘आत्मसंयमज् के सिद्धांत को हम कैसे नकार दें? खासकर, उपभोक्तावाद और बाजारवाद के इस युग में जबकि हम सबको इसकी बेहद जरूरत है, व्यक्तिगत संबंधों में भी और बाजार-उपभोक्ता के संबंधों में भी। अगर इसका अनुपालन किया गया होता तो आर्थिक संकट एकबार फिर सिर नहीं उठाता। इसी तरह, एक बेहतर इंसान बनने के लिए तो इसकी और भी जरूरत है।
गांधी मुङो हर वक्त संयम न खोने की प्रेरणा देते हैं। किसी के लिए मन में दुर्विचार लाकर अपने और उसके प्रति मानसिक हिंसा नहीं करने की सीख देते हैं और हर बुरे वक्त में मेरा संबल व सहारा बनते हैं। हालांकि उनकी कई बातें विरोधाभासी हैं और सबका अनुपालन या अनुसरण नहीं किया जा सकता, क्योंकि आज परिस्थितियां और हालात काफी हद तक बदल गए हैं, लेकिन आज भी मुङो देश-दुनिया की अधिकांश समस्याओं का समाधान गांधी दर्शन में नजर आता है, यहां तक कि नक्सलवाद और आतंकवाद का भी, क्योंकि हिंसा की जवाबी कार्रवाई और फिर उसकी प्रतिक्रिया में की गई हिंसा का कोई अंत नहीं हो सकता।

सोमवार, 1 फ़रवरी 2010

बवाल में चटवाल

संत सिंह चटवाल को पद्मश्री मिलने पर काफी बवाल है। बिल और हिलेरी क्लिंटन के साथ अक्सर दिखने वाले चटवाल को लोग उनकी अमीरी औरे बेटे की शाही शादी के लिए भी जानते हैं। यह भी सच्चाई है कि उन्होंने अपना साम्राज्य अपनी मेहनत से खड़ा किया। एक बेहद छोटी शुरुआत से शानदार समृद्धि की उनकी यात्रा सफलता की एक बड़ी कहानी है। पर विवाद और घोटाले भी उनसे जुड़े हुए हैं।

संत सिंह चटवाल, भारतीय मूल के अमेरिकी व्यवसायी। बॉम्बे पैलेस रेस्तरां की श्रंखला और हैम्पशायर होटल व रिजार्ट के मालिक। इस बार गणतंत्र दिवस पर उन्हें श्रेष्ठ नागरिक सम्मान में से एक पद्मश्री पुरस्कार से नवाजा गया। अमेरिका सहित दुनिया के अन्य देशों में ‘इंडियन करी के बादशाहज् नाम से मशहूर चटवाल ने विदेशों में भारतीय व्यंजन की खूब धाक जमाई। उनके होटलों व रेस्तरां में लोग भारतीय व्यंजन का खूब स्वाद ले रहे हैं। भारत के कई शहरों में भी उनके होटल व रेस्तरां हैं, जहां लोगों को स्वादिष्ट भोजन परोसा जाता है। कुल मिलाकर, करोड़ों-अरबों का व्यवसाय। लेकिन उनके पद्मश्री ने कई के मुंह का जायका बिगाड़ दिया है।
लेकिन चटवाल की शख्सियत का एक अन्य पहलू भी है और वह बेहद विवादास्पद है। कई ऐसे मामले हैं, जिन्होंने चटवाल को विवादों में घेरा। क्लिंटन दंपति से उनके रिश्ते की बात हो या बेटे की सबसे खर्चीली शादी का मामला या फिर बैंकों से ण लेकर धांधली के आरोप, सबने उनकी विवादित छवि ही पेश की। लेकिन इन सबका उनके व्यवसाय पर कोई फर्क नहीं पड़ा। वह दिन-दूना रात-चौगुना बढ़ता ही रहा। चटवाल की विवादास्पद छवि की वजह से ही उन्हें पद्म पुरस्कार दिए जाने पर विवाद पैदा हुआ। भाजपा ने राष्ट्रपति व प्रधानमंत्री को पत्र लिखकर उनसे पुरस्कार वापस लेने की मांग की तो कांग्रेस के कुछ नेताओं ने भी पूरी प्रक्रिया से दूरी बनाए रखी।
चटवाल का जन्म 1946 में रावलपिंडी में हुआ था, जो आज पाकिस्तान का हिस्सा है। पाकिस्तान के पंजाब प्रांत के फरीदकोट में उनके पिता की एक छोटी सी चाय की दुकान थी। विभाजन के बाद उनका परिवार भारत आ गया। जाहिर तौर पर एक सफल व्यवसायी के रूप में चटवाल को यह कामयाबी विरासत में नहीं मिली। यह सब उन्होंने अपनी मेहनत से हासिल किया। हां, पिता एक छोटे से व्यवसायी थे और इसका लाभ उन्हें इतना जरूर मिला कि विरासत में उन्हें व्यवसाय की बारीकियों को जानने-समझने व सीखने का मौका मिला। अपनी इस जानकारी का इस्तेमाल उन्होंने विदेशों में अपना व्यवसाय बढ़ाने के लिए किया।
बचपन से ही चटवाल को ऊंची व गगनचुंबी इमारतें लुभाती थीं। वे ऊंची उड़ान भरने का सपना देखते थे। उनका सपना तब साकार हुआ, जब वे भारतीय नौसेना में पायलट बने। लेकिन यह उनके लिए काफी नहीं था। वे और ऊंची उड़ान भरना चाहते थे। उनका सपना कुछ अलग करने का था। अपने सपनों को उड़ान देने के लिए चटवाल ने 1970 के दशक में विदेश का रुख किया था। सबसे पहले वे पूर्वी अफ्रीका के देश इथियोपिया गए। वहां उन्होंने मेहमान नवाजी के क्षेत्र में अपना नया करियर शुरू किया। उन्होंने ‘उमर खय्यामज् नाम से रेस्तरां खोला और लोगों को भारतीय व्यंजन परोसना शुरू किया, जो उन्हें खूब रास आया। लेकिन उनका व्यवसाय यहां अधिक दिनों तक टिक नहीं पाया। 1974 में इथियोपिया के सम्राट हेल सेलसी का तख्ता पलट हो गया और चटवाल को वह देश छोड़ना पड़ा। अब तक उन्होंने जो भी बचत की थी, उसे लेकर वे कनाडा रवाना हो गए और वहां मांट्रायल में रेस्तरां खोला। वहां भारतीय व्यंजन परोसने के बजाए उन्होंने लोगों को ऐसा व्यंजन परोसना शुरू किया, जो भारतीय व फ्रांसीसी खानपान का मिलाजुला रूप था।
लेकिन चटवाल इससे भी बड़ा कुछ करना चाहते थे। इसलिए उन्होंने अमेरिका का रुख किया। 1979 में वे न्यूयॉर्क गए और वहां पहला बॉम्बे पैलेस रेस्तरां खोला। धीरे-धीरे उन्होनें अमेरिका के कई शहरों में इसकी शाखाएं खोली। आज अमेरिका के बेवर्ली हिल, शिकागो, डेनेवर, मियामी, ह्यूस्टन, सैन फ्रांसिस्को व वाशिंगटन डीसी के अलावा टोरंटो, वैनकोवर, बैंकाक, बुडापेस्ट, कुआलालंपुर, हांगकांग, लंदन, मांट्रायल और नई दिल्ली में भी इसकी कई शाखाएं हैं।
अमेरिका में होटल व्यवसाय स्थापित करने के दौरान चटवाल की नजदीकियां क्लिंटन परिवार से बढ़ीं। क्लिंटन परिवार से उनकी नजदीकियों ने कई विवादों को जन्म दिया। कहा गया कि राष्ट्रपति रहते हुए बिल क्लिंटन ने उन्हें कर भुगतान सहित कई मामलों में राहत पहुंचाई, जिसके बदले चटवाल ने क्लिंटन परिवार को खूब वित्तीय मदद दी। साल 2007 में चुनाव अभियान के दौरान राष्ट्रपति पद के लिए डेमोक्रेटिक पार्टी की उम्मीदवार व पूर्व राष्ट्रपति बिल क्लिंटन की पत्नी हिलेरी क्लिंटन के लिए उन्होंने 50 लाख अमेरिकी डॉलर का फंड इकट्ठा किया।
वे विलियम जे. क्लिंटन फाउंडेशन के ट्रस्टी भी हैं, जो स्वास्थ्य सुरक्षा, आर्थिक सशक्तिकरण के लिए काम करती है। जाहिर तौर पर फाउंडेशन के लिए उन्होंने खूब वित्तीय संसाधन जुटाए। क्लिंटन परिवार से उनकी नजदीकियों का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि वे उनके घर अक्सर डिनर व लंच के लिए आते हैं। बिल व हिलेरी क्लिंटन की कई यात्राओं में चटवाल उनके साथ भारत आए। जब हिलेरी अमेरिका की विदेश मंत्री बनीं, तो यहां तक कहा गया कि चटवाल उप विदेश मंत्री बन सकते हैं। इसके अलावा, जॉन कैरी, चार्ल्स शूमर, नैन्सी पेलोसी, जोसेफ क्राउली से भी उनके अच्छे संबंध हैं। आरोप है कि व्यक्तिगत हितों के लिए उन्होंने अपने राजनीतिक संपर्को का खूब इस्तेमाल किया।
उनसे जुड़ा यह एकमात्र विवाद नहीं है। उन पर लिंकन सेविंग्स, फर्स्ट न्यूयॉर्क बैंक फॉर बिजनेस, बैंक ऑफ बड़ौदा, बैंक ऑफ इंडिया और स्टेट बैंक ऑफ इंडिया सहित कई अमेरिकी व भारतीय बैंकों से ण लेकर गलत आधार पर स्वयं को दिवालिया घोषित करने का आरोप है। भारतीय बैंकों से धांधली के मामले में सीबीआई ने उन्हें गिरफ्तार भी किया, लेकिन वे बच निकलने में कामयाब रहे। अमेरिका के कई समाचार-पत्रों ने इन मुद्दों को प्रमुखता से छापा। चुनाव अभियान के दौरान ये खबरें हिलेरी क्लिंटन के लिए शर्मिदगी का कारण बनीं, तो भारत में यह कहते हुए बुद्धिजीवियों और राजनीतिक दलों के नेताओं ने उनकी आलोचना की कि इससे विदेशों में भारतीयों की गलत छवि पेश हो रही है। 1980 के दशक में अमेरिका के प्रतिभूति एवं विनिमय आयोग ने बॉम्बे पैलेस श्रंखला के संदर्भ में गलत दस्तावेज पेश करने के लिए उन पर आजीवन किसी सार्वजनिक कंपनी का निदेशक या अधिकारी बनने का प्रतिबंध लगा दिया।
बेटे विक्रम चटवाल की शादी के आयोजन को लेकर भी वे सुर्खियों में रहे। फरवरी, 2006 में विक्रम की शादी भारतीय मॉडल प्रिया सचदेव से हुई। विवाह समारोह का आयोजन दिल्ली में हुआ था, जिसमें लक्ष्मी मित्तल, अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति बिल क्लिंटन सहित कई बड़ी हस्तियां शामिल थीं। शादी समारोह की कवरेज के लिए विभिन्न देशों से 30 भाषाओं के सौ पत्रकार बुलाए गए थे। इसे ‘सदी की शादीज् का नाम देते हुए ‘भारत का अबतक का सबसे महंगा विवाह समारोहज् कहा गया।
इन विवादों से अलग चटवाल ने अमेरिका में अनिवासी भारतीयों के हितों की बात भी उठाई। सभी आरोपों से अलग उनका यह भी दावा रहा है कि अमेरिका में अपने राजनीतिक संपर्को का इस्तेमाल उन्होंने व्यक्तिगत हितों के लिए नहीं, बल्कि भारतीय समुदाय और अमेरिकियों के बीच नजदीकियां व सामंजस्य स्थापित करने में किया। शायद यही वजह रही कि उन्हें पंजाब सरकार ने अप्रैल, 1999 में उन्हें ‘ऑर्डर ऑफ खालसाज् सम्मान से नवाजा। यह सम्मान पाने वाले वे भारतीय मूल के एकमात्र अमेरिकी हैं।

सोमवार, 18 जनवरी 2010

लोकतंत्र की सयानी बेटी

शेख हसीना बड़ी जीवट वाली महिला हैं। बेहद जुझारू। अपने यशस्वी पिता शेख मुजीबुर्रहमान से राजनीति विरासत में पाई। लेकिन उन्हें काफी संघर्ष के बाद सत्ता मिली। उनका संघर्ष बांग्लादेश में लोकतंत्र की स्थापना को लेकर भी था। इसलिए भी उन्हें लोकतंत्र की बेटी कहा जाता है। हाल ही में उन्हें इंदिरा गांधी शांति सम्मान दिया गया।

बांग्लादेश में लोकतंत्र की स्थापना के लिए अगर किसी नेता का नाम लिया जाएगा, तो वह शेख हसीना होंगी। शायद यही वजह है कि उन्हें न केवल बांग्लादेश में, बल्कि पूरी दुनिया में ‘लोकतंत्र की बेटीज् कहा जाता है। शेख हसीना, बांग्लादेश की मौजूदा प्रधानमंत्री और वहां के प्रमुख राजनीतिक दल अवामी लीग की अध्यक्ष हैं, जो पिछले करीब तीन दशक से पार्टी का नेतृत्व कर रही हैं।
लोकतंत्र की स्थापना के लिए बांग्लादेश में उन्होंने जो लंबी लड़ाई लड़ी, उसने उनकी छवि जुझारू नेता के रूप में स्थापित की। बीबीसी ने उन्हें ‘आयरन लेडीज् कहा, जो लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए सालों निर्वासन में रहीं। लोगों के लोकतांत्रिक अधिकारों के लिए हमेशा लड़ती रहीं, लेकिन समझौता नहीं किया। वे गरीबों के हक के लिए भी उतनी ही संवेदनशील हैं और भ्रष्टाचार को भी समाप्त करना चाहती हैं। उन्हें दो बार सत्ता मिली। पहली बार 1996 से 2001 तक और दूसरी बार 2008 में, जिसके बाद वे अब तक सत्तासीन हैं। अपने शासनकाल के दौरान उन्होंने जो भी योजनाएं लागू कीं, उनकी राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय मीडिया में खूब चर्चा हुई। हालांकि कुछ विवादों ने भी उनका पीछा नहीं छोड़ा। जनता ने कभी सिर-आंखों पर बिठाया तो कभी पटखनी भी दी। उन पर भ्रष्टाचार, रिश्वतखोरी के आरोप भी लगे। लेकिन लोकतांत्रिक ताकतों को मजबूत करने की उनकी मुहिम ने ऐसे आरोपों को काफी हद तक दबा दिया।
राजनीति में उन्होंने अपने पिता शेख मुजीबुर्रहमान के नाम को खूब भुनाया और बार-बार दोहराया कि बांग्लादेश की नींव रखने वाले शेख मुजीबुर्रहमान ने वहां जिस भयमुक्त और लोकतांत्रिक समाज की कल्पना की थी, उसकी स्थापना के लिए वे हर संभव कोशिश करेंगी, भले इसकी कीमत उन्हें भी पिता की तरह जान देकर क्यों न चुकानी पड़े। जाहिर तौर पर हसीना की इस बेबाकी और प्रतिबद्धता ने लोगों का ध्यान अपनी ओर खींचा और वह एक ताकतवर नेता के रूप में उभरने लगीं।
स्वतंत्र व निष्पक्ष चुनाव के लिए उन्होंने बांग्लादेश में केयर टेकर गवर्नमेंट का सुझाव दिया, जो राजनीतिक विश्लेषकों को खूब भाया। उन्होंने इसे आने वाले दिनों में तीसरी दुनिया के अन्य देशों में भी चुनाव प्रक्रिया के लिए एक बेहतर व अनुकरणीय कदम बताया। भारत के साथ संबंधों को लेकर भी शेख हसीना का रवैया वहां के अन्य राजनीतिक दलों से अलग रहा है। वे और उनकी पार्टी ने हमेशा भारत के साथ मधुर संबंधों को तवज्जो दी। यही वजह है कि जब-जब बांग्लादेश में अवामी लीग की सरकार बनी, भारत में उम्मीद की गई कि अब वहां भारत विरोधी ताकतों पर अंकुश लग सकेगा। पड़ोसी पाकिस्तान के अलावा बांग्लादेश ही है, जहां भारत विरोधी ताकतें सबसे अधिक सक्रिय हैं।
अट्ठाइस सितंबर, 1947 को गोपालगंज जिले के छोटे से गांव तुंगीपारा में जन्मी हसीना ने राजनीतिक जीवन की शुरुआत छात्र नेता के रूप में की। पांच भाई-बहनों में हसीना सबसे बड़ी थीं। गरीबों व जरूरतंदों के लिए स्नेह की भावना उन्हें मां बेगम फजीलतुन्नेसा से विरासत में मिली। साल 1968 में परमाणु वैज्ञानिक डॉक्टर एमए वाजेद से उनका विवाह हुआ। इस बीच उन्होंने अपनी पढ़ाई जारी रखी। 1973 में ढाका विश्वविद्यालय से उन्होंने स्नातक किया। राजनीतिक सूझबूझ व सक्रियता उन्हें विरासत में मिली थी। कॉलेजों व विश्वविद्यालयों में छात्र राजनीति में वे खूब सक्रिय रहीं। बांग्लादेश मुक्ति संग्राम के समय उन्हें गिरफ्तार भी किया गया। 1971 में बांग्लादेश के गठन के बाद राजनीति में उनकी भागीदारी काफी कम रही। समझा जा रहा था कि उनके भाई शेख कमल ही पिता की राजनीतिक विरासत को आगे बढ़ाएंगे। लेकिन नियति को कुछ और ही मंजूर था। पं्रह अगस्त, 1975 को एक सैन्य व्रिोह में शेख मुजीबुर्रहमान सहित हसीना के तीनों भाइयों और मां की हत्या कर दी गई। तब हसीना और उनकी बहन पश्चिमी जर्मनी में छुट्टियां मना रही थीं। बांग्लादेश की तत्कालीन सरकार ने देश में उनके प्रवेश पर प्रतिबंध लगा दिया। पहले ब्रिटेन में और फिर भारत में उन्होंने निर्वासित जीवन बिताया। इस बीच वे अवामी लीग की मजबूती के लिए काम करती रहीं। सत्रह मई, 1981 को उन्हें बांग्लादेश लौटने की अनुमति मिली। तब देश में सैन्य शासन ही था।
लंबे समय के सैन्य शासन के बाद वर्ष 1991 में वहां पहली लोकतांत्रिक चुनाव हुए। लेकिन हसीना की पार्टी दूसरे नंबर पर रही। बांग्लादेश नेशनललिस्ट पार्टी पहले नंबर पर रही और उसकी नेता खालिदा जिया देश की पहली महिला प्रधानमंत्री बनीं। हसीना ने बीएनपी पर चुनाव में धांधली का आरोप लगाया। उन्होंने अगला चुनाव केयर टेकर गवर्नमेंट की देखरेख में करवाने और इसके लिए संविधान में प्रावधान करने की मांग रखी। काफी विरोध के बाद बीएनपी सरकार ने संविधान में केयर टेकर गवर्नमेंट का प्रावधान किया। उसी साल जून में न्यायाधीश हबीबुर्रहमान केयर टेकर गवर्नमेंट के मुखिया बने। उनके नेतृत्व में चुनाव हुए। 299 सदस्यीय संसद में अवामी लीग को 146 सीट मिली। कुछ अन्य दलों के सहयोग से उसकी सरकार बन गई और हसीना प्रधानमंत्री बनीं।
अपने इस कार्यकाल के दौरान हसीना ने कई महत्वपूर्ण काम किए। उनकी सरकार की सबसे महत्वपूर्ण उपलब्धि भारत के साथ फरक्का बांध समझौता रही। इसके बाद उन्होंने देश के दक्षिण-पूर्वी हिस्से में जनजातीय व्रिोहियों के साथ शांति समझौता किया, जिससे व्रिोही गतिविधियों में कुछ हद तक कमी आई। गरीबों को छत मुहैया कराने के लिए उन्होंने ‘आश्रयणज् योजना शुरू की।
इस बीच उनकी सरकार पर भ्रष्टाचार और राजनीति के अपराधीकरण को बढ़ावा देने के आरोप भी लगे। विपक्ष ने इन मुद्दों को खूब भुनाया। शायद यही वजह रही कि वर्ष 2001 में जब चुनाव हुए तो अवामी लीग केवल 62 सीटों पर सिमट गई, जबकि बीएनपी के नेतृत्व में चार दलों के गठबंधन को दो-तिहाई बहुमत मिला। वर्ष 2007 में बांग्लादेश में परिस्थतियां बदलीं, वहां आपातकाल लगा दिया गया और चुनाव स्थगित कर दिए गए। तब हसीना अमेरिका में थीं। अंतरिम सरकार ने उनके देश लौटने पर प्रतिबंध लगा दिया। लेकिन सरकारी विरोध के बावजूद सात मई, 2007 को वह बांग्लादेश आईं। हजारों समर्थकों ने हवाई अड्डे पर उनका स्वागत किया। पुलिस ने उन्हें घर में ही नजरबंद कर दिया। इस बीच नवंबर, 2008 में वहां चुनाव हुए, जिसमें अवामी लीग को 230 सीटें मिली और हसीना एकबार फिर प्रधानमंत्री बनीं।
शेख हसीना ने छह साल भारत में भी गुजारे। वित्त मंत्री प्रणव मुखर्जी और उनके परिवार में काफी घनिष्ठता है। प्रणव दा की पत्नी उनकी बेहद करीबी मित्र हैं। खास मौकों पर वे अब भी फोन करने से नहीं चूकतीं, जबकि प्रणव मुखर्जी उनसे कहते हैं कि अब आप प्रधानमंत्री हैं और प्रोटोकॉल भी कोई चीज होती है। जवाब में उनका कहना होता है कि उससे ज्यादा महत्वपूर्ण प्रणव दा आप हैं।

जुमा जुमा पांच

जकब जुमा अजब शख्सियत के मालिक हैं। वे दक्षिण अफ्रीका के राष्ट्रपति हैं। उनके जीवन की अनेक रंगते हैं। वे जुझारू हैं, पर बेहद विवादास्पद। वे संजीदा राजनेता हैं, पर बेहद रोमांटिक। वे लोकप्रिय हैं, पर बदनामी पीछा नहीं छोड़ती। वे साम्यवादी-समाजवादी समझ रखते हैं, पर निजी जिंदगी में सामंतवाद छाया हुआ है। अभी उन्होंने पांचवीं शादी रचाई है।


सार्वजनिक जीवन में बेहद जुझारू तो निजी जीवन में बेहद रोमांटिक। कई मामलों में बेहद विवादास्पद भी। ये हैं दक्षिण अफ्रीका के राष्ट्रपति जकब जुमा। कभी उप-राष्ट्रपति रह चुके जुमा पर सत्ता में रहते हुए भ्रष्टाचार, जबरन वसूली सहित बलात्कार जसे संगीन आरोप भी लगे। अदालतों में सुनवाई हुई। मीडिया में मामला उछला। लेकिन जनता और कार्यकर्ताओं के बीच लोकप्रियता कम न हुई।
हाल ही में उन्होंने पांचवीं शादी रचाकर सनसनी मचा दी। उन्हें इसमें कोई बुराई नजर नहीं आती। वे बड़ी साफगोई से कहते हैं कि अन्य राजनेता भी घर के बाहर दूसरी औरतों से लुके-छिपे संबंध रखते हैं। मैंने यह खुलेआम किया और ब्याह रचाया, तो इस पर ऐतजराज क्यों? और फिर, एक के सिवा किसी को छोड़ा भी तो नहीं। सब साथ में हैं। यहां बता दें कि उनकी पहली पत्नी का देहांत हो चुका है, जबकि एक से तलाक हो चुका है। शेष तीन पत्नियां अब भी उनके साथ हैं। तीनों की अलग-अलग क्षेत्रों में रुचि है और इसमें उन्हें महारत भी हासिल है।
सड़सठ वर्षीय जुमा की हर शादी के बाद उनकी पत्नियों में तनाव की स्वाभाविक खबर उड़ी। हर बार यह सवाल पैदा हुआ कि अब देश की प्रथम महिला का दर्जा किसे हासिल होगा? कौन राष्ट्रपति की आधिकारिक यात्राओं में उनके साथ होंगी। इस बार भी यह सवाल बरकरार था। लेकिन राष्ट्रपति भवन ने साफ कर दिया कि जुमा की नई शादी को लेकर उनकी पत्नियों में कोई मतभेद नहीं है। सभी उसी तरह मिलजुलकर रहेंगी, जसे कभी राजे-रजवाड़े के दिनों में महाराजों की कई पत्नियां साथ रहा करती थीं। इन पांच औपचारिक शादियों के अलावा भी जुमा के कई महिलाओं से अंतरंग संबंध रहे हैं। अब भी हैं। जुमा की एक अन्य मंगेतर हैं, जिनसे आने वाले दिनों में वे शादी रचा सकते हैं।
बारह अप्रैल, 1942 को दक्षिण अफ्रीका के कवाजुलू नटल प्रांत में जन्मे जुमा के शुरुआती जीवन की बात की जाए तो वह बेहद अभाव में गुजरा। पिता पुलिस में थे। लेकिन बचपन में ही बेटे के सिर से पिता का साया उठ गया। द्वितीय विश्वयुद्ध के आखिर में उनकी मौत हो गई। मां ने डरबन के घरों में छोटा-मोटा काम कर बेटे का पालन-पोषण किया। मां को सहयोग देने के लिए केवल पं्रह वर्ष की उम्र से जुमा ने भी काम शुरू कर दिया, जिसके बाद पढ़ाई-लिखाई बहुत पीछे छूट गई। जुमा ने केवल तीसरी तक पढ़ाई की। उसमें भी वे अच्छा नहीं कर पाए। पांचवीं ग्रेड में जसे-तैसे उन्होंने परीक्षा पास की। इस तरह जुमा का बचपन डरबन और जुलूलैंड के बीच आते-जाते बीता।
इस बीच वे कई ट्रेड यूनियनों के संपर्क में आए, जिसका उन पर गहरा प्रभाव पड़ा। इनके आदर्शो और सोच ने ही उन्हें राजनीति में आने के लिए प्रेरित किया। केवल सत्रह साल की उम्र में 1959 में वे अफ्रीकन नेशनल कांग्रेस (एएनसी) से जुड़ गए। हालांकि अगले ही साल इस पर प्रतिबंध लग गया, जिसके बाद 1963 में जुमा दक्षिण अफ्रीकन कम्युनिस्ट पार्टी से जुड़ गए। लेकिन कम्युनिस्ट पार्टी के कार्यकर्ता के रूप में भी वे अधिक दिनों तक काम नहीं कर सके। सरकार को उखाड़ फेंकने की कोशिश के आरोप में 45 लोगों को गिरफ्तार किया गया, जिसमें जुमा भी शामिल थे। नेल्सन मंडेला सहित एएनसी के अन्य लोकप्रिय नेताओं के साथ उन्होंने दस साल जेल में गुजारे।
जेल से निकलने के बाद उन्होंने एक बार फिर एएनसी को खड़ा करने की कोशिश की। उन्होंने दक्षिण अफ्रीका छोड़ दिया और स्वाजिलैंड व मोजाम्बिक में निर्वासित जीवन बिताया। वहां वे एएनसी की मजबूती के लिए काम करते रहे। फरवरी 1990 में जब पार्टी पर से प्रतिबंध खत्म हुआ तो स्वदेश लौटने वालों में जुमा पहले नेता थे। तब तक जुमा सर्वप्रिय नेता बन चुके थे। 1999 से 2005 के बीच वे दक्षिण अफ्रीका के उप राष्ट्रपति भी रहे। इस बीच भ्रष्टाचार, जबरन वसूली सहित बलात्कार के संगीन आरोप भी उन पर लगे, जिसके बाद तत्कालीन राष्ट्रपति थाबो म्बेकी ने उन्हें अपने पद से हटा दिया। लेकिन इससे न तो उनकी लोकप्रियता में कमी आई और न ही समर्थकों ने उनका साथ छोड़ा। दिसंबर 2007 में म्बेकी को हराकर वे पार्टी के अध्यक्ष बने। सितंबर 2008 में एनएनसी ने म्बेकी को वापस बुला लिया और साफ कर दिया कि अगले साल होने वाले आम चुनाव के बाद पार्टी जीती तो राष्ट्रपति जुमा ही होंगे। मई 2009 के आम चुनाव में उनकी पार्टी भारी बहुमत से जीतकर आई और वे राष्ट्रपति बन गए। जुमा की आर्थिक नीतियां काफी हद तक समाजवाद के करीब प्रतीत होती हैं। एक ओर उन्होंने निवेशकों को उनके हितों की सुरक्षा का आश्वासन दिया तो दूसरी ओर वंचितों के बीच संपत्तियों के पुनर्वितरण पर भी जोर दिया।
एक लोकप्रिय व जुझारू नेता से अलग जुमा की छवि काफी विवादास्पद भी रही है। उन्होंने कई बार ऐसे बयान दिए और ऐसा काम किया, जिससे वे सुर्खियों में रहे। उन्होंने यह कहते हुए धार्मिक समूमहों को नाराज कर दिया कि जीसस ने एएनसी को दक्षिण अफ्रीका में शासन करने के लिए कहा है और वह तब तक शासन करती रहेगी, जब तक जीसस लौट नहीं आते। वहीं, दक्षिण अफ्रीका में रहने वाले गोरों की यह कहते हुए नाराजगी मोल ले ली कि यहां रहने वाले सभी गोरे समूहों में केवल अफ्रीकन ही सही मायने में दक्षिण अफ्रीकी हैं। मीडिया से भी उनका छत्तीस का आंकड़ा रहा। उन पर लगे भ्रष्टाचार व बलात्कार के आरोप को मीडिया ने प्रमुखता से उछाला, जिसने जुमा को नाराज कर दिया। लेकिन जुमा अंतत: सभी मामलों से बरी हो गए और उन्होंने कई मीडिया संगठनों पर करोड़ों में मानहानि का मुकदमा ठोक दिया। समान लिंगी विवाह को ईश्वर और देश दोनों के लिए शर्मनाक बताते हुए उन्होंने यहां तक कह दिया कि यदि उनके सामने कोई लेस्बियन या होमो आ जाए तो वे उन्हें धक्का देकर भगा देंगे। हालांकि इस बयान के व्यापक विरोध के बाद उन्होंने माफी भी मांगी और देश के विकास में ऐसे लोगों के योगदान को भी स्वीकार किया। उधर, पश्चिमी सहारा की स्वतंत्रता का समर्थन करने पर उन्हें मोरक्को के राजदूत की आलोचना भी ङोलनी पड़ी।

एक गुरूजी, सब चेला

शिबू सोरेन की क्या-क्या फजीहत नहीं हुई, पर उनकी राजनीति लुहार की एक चोट की तरह सब पर भारी पड़ी। झारखंड चुनाव में उनके जनाधार वाले नेता की छवि फिर सामने आई। वहीं, उनकी हुनर व फायदेमंद राजनीति को भी उजागर किया। यूपीए से एनडीए के संग जाते उन्हें देर नहीं लगी और वे तीसरी बार मुख्यमंत्री बन गए।


शिबू सोरेन, झारखंड के नए मुख्यमंत्री। समर्थकों के बीच गुरूजी के नाम से मशहूर सोरेन राजनीति के चतुर खिलाड़ी हैं। राज्य गठन के नौ वर्षो में वहां सात बार सरकार बनी, जिसमें सोरेन ने अपनी राजनीतिक सूझ-बूझ व दांव-पेंच का इस्तेमाल करते हुए तीसरी बार मुख्यमंत्री बनने का गौरव हासिल किया। हालांकि पिछली दो बार का उनका कार्यकाल काफी छोटा रहा। पहला 2005 में सिर्फ नौ दिन का, जब विधानसभा में बहुमत साबित नहीं कर पाने के कारण उनकी सरकार गिर गई और दूसरा अगस्त 2008 से जनवरी 2009 के बीच करीब चार माह का, जब तमार विधानसभा सीट से उपचुनाव हार जाने के बाद उन्हें इस्तीफा देना पड़ा।
हजारीबाग जिले के नेरमा गांव में ग्यारह जनवरी 1944 को जन्मे सोरेन की छवि जूझारू व विवादास्पद नेता की रही है। जमींदारों और ‘बाहरियोंज् के खिलाफ आंदोलन छेड़कर आदिवासियों के बीच वे हीरो बन बैठे, तो 1991 में कें्र की नरसिम्हा राव सरकार को बचाने के लिए वोटोंे की खरीद-फरोख्त मामले में उनकी मिलीभगत ने उन्हें एक अवसरवादी नेता के रूप में पेश किया। चिरुडीह नरसंहार और अपने निजी सचिव शशिनाथ झा की हत्या के मामले में अदालती फैसले ने उनके आपराधिक चेहरे को भी उजागर किया।
सोरेन ने अपने राजनीतिक करियर की शुरुआत 1970 के दशक के शुरुआती दिनों में एक जूझारू आदिवासी नेता के रूप में की, जिसने साहूकारों द्वारा भोले-भाले व मासूम आदिवासियों के शोषण के खिलाफ आंदोलन छेड़ा। आंदोलन की आग उनके भीतर तब जगी, जब साहूकारों के लोगों ने कथित रूप से उनके पिता की हत्या कर दी। इस घटना ने उन्हें साहूकारों के खिलाफ खड़ा कर दिया। पिता की कथित हत्या के बाद सोरेन ने पढ़ाई छोड़ दी। तब उनकी उम्र केवल 18 साल थी। उन्होंने संथाल नवयुवक संघ का गठन किया और साहूकारों के खिलाफ आंदोलन छेड़ दिया। वे लोग उनसे खौफ खाने लगे, जो जरूरतमंद आदिवासियों को ऊंची दरों पर ण दिया करते थे और जबरन उसकी वसूली भी करते थे। इस बीच गैर-आदिवासियों को उन्होंने ‘बाहरियोंज् के रूप में परिभाषित किया और उनके खिलाफ भी आंदोलन छेड़ा।
जगह-जगह ‘बाहरियोंज् को निशाना बनाया गया। 23 जनवरी, 1975 को जामतारा जिले के चिरुडीह गांव में कुछ हथियारबंद आदिवासियों ने एक बस्ती पर हमला कर दिया, जिसमें 11 लोग मारे गए। आदिवासियों ने जहरीले तीर-कमान से हमला किया, जो बाद में झारखंड मुक्ति मोर्चा का चुनाव चिह्न् बना। इस मामले में 68 लोगों के खिलाफ हत्या का मुकदमा दर्ज किया गया, जिसमें सोरेन का नाम भी शामिल था। कहा गया कि वे भी हलावरों की भीड़ का हिस्सा थे। लेकिन जामताड़ा की अदालत ने उन्हें बरी कर दिया। बस फिर क्या था? आदिवासियों के बीच वे भगवान बन बैठे।
साहूकारों के खिलाफ लंबी लड़ाई के बाद उन्होंने राजनीति की ओर रुख किया। 1977 में वे पहली बार लोकसभा चुनाव लड़े, लेकिन हार गए। हालांकि 1980 में उन्होंने लोकसभा चुनाव जीत लिया। इसके बाद 1989, 1991 और 1996 में वे लगातार लोकसभा चुनाव जीतते रहे। जीत का यह सिलसिला 1998 और 1999 के आम चुनाव में जारी नहीं रह सका। साल 2002 में भाजपा के सहयोग से वे राज्यसभा के लिए चुने गए। बाद में उसी साल दुमका लोकसभा सीट से उन्होंने उपचुनाव जीता। 2004 के आम चुनाव में भी वे जीते और मनमोहन सिंह के नेतृत्व में बनी कें्र की संयुक्त प्रगतिशील सरकार में कोयला मंत्री बने। लेकिन चिरुडीह नरसंहार मामले में वारंट जारी होने के बाद 24 जुलाई 2004 को उन्हें अपने पद से इस्तीफा देना पड़ा। करीब एक माह की न्यायिक हिरासत के बाद वे जमानत पाने में कामयाब रहे, जिसके बाद उसी साल 27 नवंबर को उन्हें फिर कें्रीय मंत्रिमंडल में शामिल कर लिया गया। लेकिन फरवरी-मार्च 2005 में झारखंड विधानसभा चुनाव के बाद उन्होंने प्रदेश का रुख किया और मुख्यमंत्री बने। हालांकि विधानसभा में बहुमत साबित नहीं कर पाने के कारण उनकी सरकार गिर गई। वर्ष 2006 में उन्हें फिर कें्रीय मंत्रिमंडल में शामिल कर लिया गया।
इस बीच 5 दिसंबर 2006 को दिल्ली की एक अदालत ने अपने निजी सचिव की हत्या के 12 साल पुराने मामले में उन्हें दोषी करार देते हुए आजीवन कारावास की सजा सुनाई। ऐसा पहली बार हुआ, जब किसी मंत्री के खिलाफ ऐसी सजा सुनाई गई। सीबीआई पर भी कें्र के प्रभाव से मामले को कमजोर करने का आरोप लगा। अदालत ने साफ कहा कि अभियोजन पक्ष जानबूझकर कमजोर सबूत पेश कर रहा है। अदालत के इस फैसले के बाद उन्हें फिर कें्रीय मंत्रिमंडल से बाहर कर दिया गया। लेकिन 2007 में दिल्ली उच्च न्यायालय ने निचली अदालत के फैसले को बदल दिया। सोरेन मामले से बरी हो गए। बदली परिस्थितियों में 27 अगस्त 2008 को वे दूसरी बार झारखंड के मुख्यमंत्री बने। इस बार बहुमत उनके साथ था। लेकिन अपने पद पर बने रहने के लिए छह माह के भीतर उन्हें विधानसभा की सदस्यता लेनी थी, जिसमें वे नाकाम रहे।
इस बार चुनाव में उनकी पार्टी फिर जीती। नतीजे का अंकगणित उनके साथ था। उनके बिना किसी की सरकार नहीं बन सकती थी। यूपीए के घटक रहे गुरूजी को सरकार बनाने के लिए एनडीए का सहयोग लेने में कोई हर्ज नहीं दिखा। इसने साबित किया कि न सिर्फ जनता में उनकी पैठ है, बल्कि वे राजनीति के ऐसे चतुर सुजान हैं, जो जानते हैं कि कब किस करवट होना फायदेमंद होगा।

भागवत प्रसाद गडकारी

नितिन गडकरी ठेठ संघ की पसंद वाले अध्यक्ष हैं। वे उन चार-पांच से बाहर के हैं, संघ प्रमुख भागवत जिनकी पतंग पहले ही काट चुके थे। युवा और कर्मठ होना उनकी सबसे बड़ी संपदा बताई जा रही है, लेकिन दिल्ली की राजनीति आसान नहीं है। बड़े-बड़े दिग्गजों के बीच उनका कितना जोर चलेगा, यह समय बताएगा। लेकिन एक बात तय है उन्हें संघ का मुंह जोहते रहना पड़ेगा।

हाल ही में हुए सांगठनिक फेरबदल में भाजपा को एक नया व युवा चेहरा दिया गया। नितिन गडकरी (52) के रूप में पार्टी को नया अध्यक्ष मिला, जो भाजपा के अब तक के सबसे युवा अध्यक्ष हैं। गडकरी ‘वेंटिलेटरज् पर चल रही भाजपा को स्वस्थ व जिताऊ बनाने में कहां तक कामयाब होंगे, यह तो आनेवाला समय बताएगा, पर इतना तो तय है कि भाजपा में आमूल-चूल परिवर्तन की राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की चाह पूरी हो गई है और अब पार्टी में संघ का दखल बढ़ेगा।
गडकरी संघ प्रमुख मोहन भागवत के करीबी और उनकी पसंद माने जाते हैं। इस साल सितंबर से ही पार्टी अध्यक्ष के रूप में उनके नाम की चर्चा थी। लोकसभा चुनाव में हार के बाद संघ प्रमुख भागवत कई बार पार्टी संगठन में रद्दो-बदल की आवश्यकता जता चुके थे। हालांकि उन्होंने यह भी कहा कि ये भाजपा का अंदरूनी मामला है और संघ इसमें किसी तरह का हस्तक्षेप नहीं करने जा रहा। लेकिन भाजपा में संघ का दखल व प्रभाव सर्वविदित है। इसलिए अटकलें लगाई जा रही थीं कि पार्टी अध्यक्ष के रूप में जो भी कार्यभार संभालेगा, वह संघ का करीबी होगा। यह भी कहा गया कि वह दिल्ली से बाहर का नेता होगा। गडकरी की नियुक्ति से ये अटकलें सही साबित हुई हैं। उनकी साफ-सुथरी छवि ने भी अध्यक्ष पद के लिए उन्हें एक योग्य उम्मीदवार बनाया।
गडकरी महाराष्ट्र के नागपुर जिले से संबंध रखते हैं, जो संघ प्रमुख भागवत का कार्यक्षेत्र रहा है। उनका जन्म सत्ताइस मई, 1957 को नागपुर के देशास्थ ब्राह्मण परिवार में हुआ था। राजनीतिक पारी की शुरुआत उन्होंने भाजपा के युवा मोर्चा और इसकी छात्र इकाई अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के साथ की। इस बीच उनकी पढ़ाई भी जारी रही। उन्होंने महाराष्ट्र से ही एमकॉम, एलएलबी और डीबीएम की पढ़ाई की।
पार्टी का राष्ट्रीय अध्यक्ष बनने से पहले 2004-2009 के बीच उन्होंने महाराष्ट्र भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष के रूप में अपनी सेवा दी। हालांकि उनके नेतृत्व में भाजपा हाल का विधानसभा चुनाव हार गई, लेकिन इससे उनके राजनीतिक भविष्य पर किसी तरह का संकट नहीं छाया, जसा कि राजस्थान में वसुंधरा राजे सिंधिया और उत्तरांचल में बीसी खंडूरी के साथ हुआ, बल्कि अध्यक्ष बनाकर एक तरह से उन्हें इनाम दिया गया। संभवत: यहां ‘हारने वाला ही जीतने वाला होता हैज् का फॉर्मूला अपनाया गया।
इससे पहले 1995 से 1999 के बीच वह महराष्ट्र की भाजपा-शिवसेना सरकार में मंत्री भी रहे। लोक कल्याण मंत्री के रूप में उन्होंने कई महत्वपूर्ण काम किए। इस दौरान उनकी कार्यप्रणाली से प्रतीत होता है कि वे आधुनिक तकनीक के हिमायती हैं। उन्होंने विभाग में आमूल-चूल बदलाव किए और बहुराष्ट्रीय कंपनियों की तर्ज पर विभागीय कर्मचारियों के लिए नियम लागू किए। निर्माण कार्यो में गुणवत्ता लाने के लिए उन्होंने अंतराष्ट्रीय स्तर की तकनीक अपनाने पर जोर दिया और इसके लिए एक समिति का भी गठन किया। उन्होंने पूरी तरह सरकार द्वारा नियंत्रित महाराष्ट्र स्टेट रोड डेवेलपमेंट कापरेरेशन (एमएसआरडीसी) का गठन किया, जिसने मुंबई में कई फ्लाईओवर बनाए। अपने कार्यकाल के दौरान उन्होंने खासतौर पर ग्रामीण क्षेत्रों को सड़क मार्ग से जोड़ने को प्रमुखता दी, ताकि विकास की गाड़ी दूर-दराज के गांवों में भी पहुंच सके।
इस क्षेत्र में उनके विशेष कार्यो को देखते हुए बाद में कें्र की भाजपा सरकार ने उन्हें राष्ट्रीय ग्रामीण सड़क विकास समिति का अध्यक्ष नियुक्त किया। विस्तृत अध्ययन व कई बैठकों के बाद गडकरी ने कें्र को इस बारे में अपनी रिपोर्ट सौंपी, जिसके बाद ग्रामीण क्षेत्रों में सड़क संपर्क के लिए प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना शुरू की गई। सड़क निर्माण के क्षेत्र में उनके महत्वपूर्ण योगदान को देखते हुए उन्हें हाइवे वाले गडकरी भी कहा जाता है। वह विदर्भ आंदोलन के भी हिमायती रहे हैं।
गडकरी की पहचान केवल राजनेता के रूप में नहीं रही है, बल्कि उद्योगपति और कृषिविज्ञ के रूप में भी रही है। वह कई कंपनियों के संस्थापक व अध्यक्ष रहे हैं। वहीं, कृषि के क्षेत्र में आधुनिक तकनीक अपनाने पर उन्होंने जोर दिया, तो सौर ऊर्जा, जल प्रबंधन के क्षेत्र में भी कई परियोजनाएं लागू की। हाल में उन्होंने कई देशों के साथ फलों का निर्यात शुरू किया है।
हालांकि गडकरी के साथ ये उपलब्धियां हैं, लेकिन अध्यक्ष के रूप में उनके सामने कहीं अधिक चुनौतियां हैं। महाराष्ट्र सरकार के मंत्री और प्रदेश भाजपा अध्यक्ष के रूप में अब तक उनका कार्यक्षेत्र मुख्यत: मुंबई और नागपुर तक ही सिमटा रहा। लेकिन अब उनकी जिम्मेदारी देशव्यापी हो गई है। पार्टी को एकबार फिर से खड़ा करना, खासकर उत्तर भारत के कई प्रमुख राज्यों में, आसान नहीं होगा। इसके अलावा, वे भाजपा का कोई राष्ट्रीय चेहरा नहीं हैं और न ही राष्ट्रीय स्तर के नेता हैं। फिर, पार्टी के कई वरिष्ठ नेताओं को दरकिनार कर उन्हें यह जिम्मेदारी सौंपी गई है। ऐसे में उन्हें इन नेताओं का असंतोष व असहयोग ङोलना पड़ सकता है। अब तक उन्होंने कोई विधानसभा या लोकसभा चुनाव नहीं जीता है, यह बात भी उनके खिलाफ जा सकती है। इसलिए कदम-कदम पर उन्हें संघ के सहयोग व समर्थन की आवश्यकता होगी।

शनिवार, 5 दिसंबर 2009

बेहतर दुनिया तीन कदम

(देवें्र शर्मा से बातचीत पर आधारित)

जलवायु परिवर्तन के शोर में हम एक गहरे विरोधाभास को नजरअंदाज कर रहे हैं। एक ओर कोपेनहेगन है तो दूसरी तरफ जेनेवा, जहां विश्व व्यापार संगठन व्यापार बढ़ाने का आह्वान कर रहा है। व्यापार बढ़ेगा तो पर्यावरण बिगड़ेगा ही। दरअसल तीन बातें जरूरी हैं- अमेरिकी मॉडल का त्याग, व्यापार में कटौती और लोगों को जागरूक बनाना। हमारे कई संकटों का यही हल है।

आज हर तरफ जलवायु परिवर्तन की चर्चा है। इससे होने वाले नुकसान को लेकर दुनिया आशंकित है। खास तौर पर सम्रु के किनारे रहने वाले क्षेत्रों में इसका सबसे अधिक नुकसान हो सकता है। आनेवाले सालों में ये क्षेत्र पूरी तरह से डूब सकते हैं। मालदीव सहित भारत के लक्ष्यद्वीप और पश्चिम बंगाल में सुंदरवन को सबसे अधिक नुकसान हो सकता है। जलवायु परिवर्तन के खतरे से पूरी तरह आगाह मालदीव ने हाल ही में सम्रु के अंदर कैबिनेट की बैठक बुलाकर दुनिया को एक संदेश देने की कोशिश की। लेकिन इसे लेकर कहीं कोई कारगर कोशिश होती नहीं दिखती।
भारत में अक्सर यह कहकर पल्ला झाड़ लिया जाता है कि जलवायु परिवर्तन के लिए जिम्मेदार कार्बन गैसों के उत्सर्जन के लिए हम उतने जिम्मेदार नहीं हैं, जितने अमेरिका, चीन या अन्य विकसित देश। इसके लिए कार्बन गैसों के उत्सर्जन में प्रति व्यक्ति योगदान का हवाला दिया जाता है। लेकिन यह गलत है, क्योंकि गैस उत्सर्जन के लिए प्रति व्यक्ति की जिम्मेदारी का प्रतिशत जब निकाला जाता है, तो उसमें देश की पूरी जनसंख्या को शामिल किया जाता है, जबकि ग्रामीण क्षेत्र की आबादी का इसमें कोई योगदान नहीं होता। कार्बन उत्सर्जन के लिए शहरों व महानगरों के लोग और वहां मौजूद औद्योगिक इकाइयां जिम्मेदार हैं। साफ तौर पर जलवायु परिवर्तन के लिए हम भी उतने ही जिम्मेदार हैं, जितने अमेरिका, चीन या अन्य विकसित देश। इसलिए आज अगर जलवायु परिवर्तन पर वैश्विक चर्चा हो रही है, तो सबसे पहले हमें अपना घर सुधारना होगा।
दरअसल, अमेरिका की राह पर चलते हुए हमने विकास का एक ऐसा मॉडल चुना है, जो पर्यावरण प्रदूषण की मात्रा भी साथ-साथ बढ़ाता है। कार, फ्रिज, टेलीविजन, एयरकंडीशन सहित अन्य बाजारी सुविधाएं को विकास का पैमाना माना जाने लगा है। लेकिन कोई इससे पर्यावरण को होने वाले नुकसान की चर्चा नहीं करता। कार से जो प्रदूषण फैलता है, वह अगले सौ साल तक पर्यावरण में मौजूद रहता है और इस वक्त देश में तकरीबन 170 लाख कार हैं। आखिर हम अपनी आनेवाली पीढ़ी को कितना सुरक्षित पर्यावरण देंगे?
जलवायु परिवर्तन के खतरों को लेकर विकसित देश हायतौबा तो खूब मचा रहे हैं, लेकिन इसे कम करने को लेकर ईमानदार व गंभीर कोशिश कहीं नहीं दिखती। दरअसल सारा खेल 200 मिलियन डॉलर का है। वास्तव में, कार्बन गैसों का उत्सर्जन रोकने और पर्यावरण को सुरक्षित बनाने के नाम पर वे विकासशील देशों को ऐसी तकनीक बेचना और वहां निवेश करना चाहते हैं, जिससे उनकी अर्थव्यवस्था को फायदा हो सके। भारत, चीन, ब्राजील, दक्षिण अफ्रीका भी इसी दौड़ में शामिल है और इसलिए इन देशों में जलवायु परिवर्तन का शोर अधिक सुनाई देता है।
यदि वास्तव में दुनिया इसके प्रति गंभीर होती तो इसे लेकर विरोधाभास नहीं दिखता। यह विरोधाभास नहीं तो और क्या है कि एक ओर जेनेवा में विश्व व्यापार संगठन जसी संस्था व्यापार बढ़ाने पर जोर दे रही है, तो कोपेनहेगन में जलवायु परिवर्तन और इसके खतरों पर चर्चा होने जा रही है। लेकिन कोई इस बारे में बात नहीं करता कि यदि व्यापार बढ़ेगा तो क्या प्रदूषण नहीं बढ़ेगा? आखिर व्यापार जहाजों और विमान से ही किया जाएगा, जिसके चलने व उड़ान भरने में बड़ी मात्रा में ऊर्जा खपत होती है और कार्बन गैसों का उत्सर्जन होता है।
जलवायु परिवर्तन का प्रमुख कारण अमेरिका की आरामपसंद जीवन शैली है, जिसमें अधिकतर चीजों का मशीनीकरण हो गया है। आज अगर वैश्विक स्तर पर जलवायु परिवर्तन और इसके खतरों की चर्चा हो रही है, तो हमें अमेरिकी जीवनशैली को टेबल पर रखने की जरूरत है। हालांकि अमेरिका पहले ही इसमें किसी तरह के फेरबदल से इनकार कर चुका है, लेकिन जब तक इसे परिवर्तनीय नहीं बनाया जाता, खतरे को कम नहीं किया जा सकता।
यदि जलवायु परिवर्तन के खतरे को कम करना है, तो इसके लिए तीन चीजों पर खास ध्यान देना होगा। सबसे पहले तो विकास के अमेरिकी मॉडल का अनुसरण बंद करना होगा। दूसरे, व्यापार में कटौती करनी होगी और तीसरे, लोगों में जागरुकता लानी होगी। इसके लिए हम स्वीडेन को आदर्श मान सकते हैं, जहां सभी उत्पाद सामग्रियों पर कार्बन फुट प्रिंट होता है। इससे लोगों को पता चलता है कि विभिन्न स्थानों से आयाजित सामानों में कार्बन उत्सर्जन कितना हुआ है। यदि भारत में भी यही चीज शुरू की जाए तो लोगों में जागरुकता जरूर आएगी और धीरे-धीरे लोग उन चीजों को खरीदना बंद कर देंगे, जिसके आयात में कार्बन गैसों का उत्सर्जन अधिक हुआ हो। जलवायु परिवर्तन को कम करने की दिशा में यह एक कारगर कदम हो सकता है।

गिलट नहीं गिलानी

कम चर्चित और बेहद संकोची राजनेता से शुरू हुआ सैयद युसुफ रजा गिलानी का राजनीतिक जीवन। पाकिस्तान के प्रधानमंत्री वे बने या बनाए गए, अपने इन्हीं गुणों के कारण। लेकिन कुछ ही समय में गिलानी अपने तेजतर्रार नए अवतार में उभरने लगे। अब वे पूर्णावतार ले चुके हैं। जरदारी पिछड़ रहे हैं। खुद गिलानी उन्हें सिर्फ राष्ट्राध्यक्ष और स्वयं को शासन का प्रमुख कर्ताधर्ता बता रहे हैं।

सैयद युसुफ रजा गिलानी, पाकिस्तान के प्रधानमंत्री, जो अपने समर्थकों के बीच ‘हमेशा सही काम करने वाले नेताज् के रूप में जाने जाते हैं, भले ही व्यक्तिगत रूप से इसके लिए उन्हें कोई भी कीमत चुकानी पड़े। उनकी पहचान एक मृदुभाषी राजनीतिज्ञ के रूप में भी रही है। पाकिस्तान में करीब एक दशक के सैनिक शासन के बाद 2008 में जब उन्होंने लोकतांत्रिक ढंग से चुनी हुई सरकार का नेतृत्व संभाला तो गिलानी कोई हाईप्रोफाइल राजनीतिज्ञ नहीं थे।
सच कहा जाए तो बेनजीर की हत्या के बाद पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी (पीपीपी) ने उन्हें प्रधानमंत्री पद के लिए चुना भी इसलिए था। इसके लिए पार्टी के तत्कालीन सबसे चर्चित नेता अमीन फहीम की दावेदारी को दरकिनार कर दिया गया। समझा जा रहा था कि इस कम चर्चित नेता के जरिये बेनजीर के पति व राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी के लिए पाकिस्तान के शासन में हस्तक्षेप आसान रहेगा और कुछ ही महीनों में गिलानी के हाथ से सत्ता अपने हाथ में लेना उनके लिए आसान होगा। हालांकि बेनजीर के प्रति कुछ उनकी वफादारी भी थी, जिसके लिए उन्हें यह इनाम मिला।
लेकिन गिलानी जब एकबार पाकिस्तान की सत्ता पर काबिज हुए तो उनकी कम चर्चित व संकोची राजनेता की छवि जाती रही। वे धीरे-धीरे सत्ता के प्रमुख कें्र के रूप में उभरने लगे और अब जरदारी को किनारे करते हुए उन्होंने दो टूक कह दिया है कि असली सरकार वे ही चला रहे हैं। जरदारी राष्ट्राध्यक्ष हैं, न कि शासनाध्यक्ष। उन्होंने इन दावों को भी खरिज कर दिया कि पाकिस्तान का शासन नेतृत्वविहीन है और इसके कई कें्र हैं। साफ है, जरदारी की अगर ऐसी कोई चाह थी कि गिलानी के जरिये वे अपनी मर्जी चला सकेंगे, तो गिलानी उसे पूरा करने के मूड में नहीं हैं।
पाकिस्तान में, जहां संवैधानिक रूप से सत्ता संसद में निहित है, सत्ता परिवर्तन के बाद शासन के कई कें्र नजर आने लगे। यह सब शुरू हुआ 1999 के सैनिक तख्ता पलट से, जब पाकिस्तान के सेना अध्यक्ष जनरल परवेज मुशर्रफ ने लोकतांत्रिक ढंग से चुनी हुई पाकिस्तान मुस्लिम लीग (पीएमएल) की नवाज शरीफ सरकार को सत्ता से बेदखल करते हुए सत्ता हथिया ली थी। बाद में इसे लोकतांत्रिक रूप देने के लिए उन्होंने सैन्य शासक का चोंगा उतार फेंका और राष्ट्रपति बन बैठे। लेकिन सत्ता की कुंजी अपने हाथ में ही रखी। उन्होंने संविधान में कई संशोधन किए और वे सारी शक्तियां, जो संसद व प्रधानमंत्री के पास थीं, अपने हाथों में ले ली।
सत्ताइस दिसंबर 2007 को पीपीपी अध्यक्ष बेनजीर भुट्टो की हत्या के बाद हुए आम चुनाव और उसके बाद बने नए निजाम में गिलानी प्रधानमंत्री व जरदारी राष्ट्रपति बने। उम्मीद की गई कि पाकिस्तान में एक बार फिर संसदीय शासन प्रणाली से कामकाज होगा। प्रधानमंत्री शासन का कें्र होगा और प्रमुख शक्तियां उसके हाथों में ही होंगी। लेकिन जरदारी ने मुशर्रफ द्वारा संशोधन के बाद राष्ट्रपति में निहित की गई शक्तियों को लौटाने की उदारता नहीं दिखाई। यहीं से शुरू हुआ राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री की सत्ता में टकराव। गिलानी के शासन में जरदारी की टोकाटाकी व हस्तक्षेप बढ़ता रहा। लेकिन अंतत: गिलानी ने जरदारी के हर हुक्म की तामील करना मुनासिब नहीं समझा। इसका कारण शायद उन्हें विरासत में मिली राजनीतिक सूझबूझ रही।
अपनी सूझबूझ से ही उन्होंने धीरे-धीरे सत्ता अपने हाथ में ले ली। वे सबसे अधिक चर्चित हुए पाकिस्तान के मुख्य न्यायाधीश इफ्तिखार मोहम्मद चौधरी की पुनर्बहाली करवाकर, जिन्हें जनरल मुशर्रफ ने बर्खास्त कर दिया था। जरदारी उनकी बहाली के लिए आसानी से तैयार नहीं थे, क्योंकि उन्हें अपने खिलाफ भ्रष्टाचार के कई मामले खुल जाने का अंदेशा था। लेकिन गिलानी ने जरदारी को आश्वस्त किया और न्यायाधीश बहाल हुए। हाल के दिनों में जरदारी ने परमाणु आयुध के नियंत्रण का अधिकार भी प्रधानमंत्री गिलानी को सौंप दिया। गिलानी अन्य शक्तियां भी राष्ट्रपति से प्रधानमंत्री को स्थानांतरित करने में लगे हैं।
गिलानी का जन्म नौ जून 1952 को कराची में हुआ था, हालांकि उनका परिवार पंजाब प्रांत से ताल्लुक रखता है। गिलानी परिवार पंजाब के मुल्तान का एक प्रभावी राजनीतिक व आध्यात्मिक परिवार है। गिलानी के पिता मखदूम आलमदार हुसैन गिलानी पाकिस्तान के निर्माण के बने प्रस्ताव के प्रमुख हस्ताक्षरी थे। गिलानी की शुरुआती शिक्षा-दीक्षा मुल्तान में ही ला सल्ले हाई स्कूल में हुई। उच्च शिक्षा उन्होंने लाहौर के फोरमैन क्रिश्चयन कॉलेज से पाई। पंजाब विश्वविद्यालय से उन्होंने पत्रकारिता की पढ़ाई की।
गिलानी ने अपने राजनीतिक जीवन की शुरुआत 1978 में पिता की मौत के बाद जनरल जिया-उल-हक के सैनिक शासन के दौरान की थी। वह पीएमएल की कें्रीय कार्य समिति में शामिल हुए। प्रधानमंत्री मुहम्मद खान जुनेजो की सरकार में वह मंत्री भी बने। लेकिन जल्द ही पीएमएल से उनका मोहभंग हो गया और 1988 में वह पीपीपी में शामिल हो गए। पीपीपी में शामिल होने की अर्जी लेकर जब वे बेनजीर भुट्टो से मिलने गए थे, तब पाकिस्तान में जनरल जिया-उल-हक का ही शासन था और पीपीपी अनिश्चतता के दौर से गुजर रहा था। बेनजीर ने कहा भी था कि वे उन्हें कुछ भी दे पाने की स्थिति में नहीं हैं, फिर क्यों वे पीपीपी का दामन थामना चाहते हैं? तब गिलानी ने कहा था, ‘दुनिया में तीन तरह के लोग हैं, एक वे जो सम्मान चाहते हैं, दूसरे वे जो बुद्धि चाहते हैं और तीसरे वे जो दौलत चाहते हैं। मैं पहले तरह का इंसान हूं और इसलिए पीपीपी में शामिल होना चाहताा हूं।ज् इसके बाद शक व शुबहे की कोई गुंजाइश ही नहीं रह गई। गिलानी की यह वफादारी बेनजीर की आखिरी सांस तक उनके साथ बनी रही।
यही वजह रही कि 2001 में उन्होंने परवेज मुशर्रफ के साथ समझौते से इनकार कर दिया, जिसके तहत उन्हें पीपीपी के जनाधार वाले नेताओं को साइडलाइन करना था। उन्हें इसकी कीमत जेल जाकर चुकानी पड़ी। मुशर्रफ शासन ने उन पर सरकार में रहते हुए गैर-कानूनी नियुक्तियां करने का आरोप लगाकर उन्हें जेल में डाल दिया। 7 अक्टूबर 2006 को वह जेल से रिहा हुए। जेल में उन्होंने एक किताब लिखी, ‘चाह-ए-युसुफ की सदा।ज् पुस्तक में उन्होंने पीएमएल छोड़ने और पीपीपी में शामिल होने के कारणों का जिक्र किया है। इससे पहले जनरल जिया की मौत के बाद 1988-90 की बेनजीर की सरकार में वे मंत्री बने। बेनजीर के दूसरे कार्यकाल में 1993-97 के बीच उन्होंने पाकिस्तान की नेशनल एसेम्बली के स्पीकर के रूप में अपनी सेवा दी।

मंगलवार, 1 दिसंबर 2009

बहुत शोर था . . . लिब्रहान . . .!

न्यायमूर्ति एमएस लिब्रहान ने तीन महीने के लिए बने आयोग की रिपोर्ट सत्रह साल बाद सौंपी और पिछले हफ्ते वह संसद में रखी गई। बाबरी मस्जिद ध्वंस को लेकर बने इस जांच आयोग पर सबकी नजरें थीं। पर साल-दर-साल माहौल-मूल्य-मुद्दे बदलते गए और अब जब यह नुमायां हो गई है, तो हम पाते हैं कि अब वह मुद्दा ही बेदम हो चुका है कि जिसके कारण बाबरी ध्वंस की शर्मनाक घटना घटी। फिर भी लोगों को दिलचस्पी तो थी ही। लेकिन वह भी रिपोर्ट के निष्कर्ष से शांत हो गई, क्योंकि इसमें आमतौर पर वही है, जिसका अंदाजा था। वही संघ परिवार और भाजपा इसमें षड्यंत्रकारी बताए गए हैं, जिन्हें देश का आमजन भी इस धत्कर्म का दोषी माने हुए था। अटल बिहारी वाजपेयी को दोषियों में रखना और तब के प्रधानमंत्री पीवी नरसिम्हा राव को बख्श देना जरूर इसमें ऐसी बातें रहीं, जिन पर काफी कोहराम मचा।

देश के सर्वाधिक विवादास्पद, संवेनशील और दो समुदायों की धार्मिक भावनाओं से जुड़े बहुप्रतीक्षित बाबरी विध्वंस मामले पर रिपोर्ट आ गई है। रिपोर्ट में यूं तो कोई नई बात नहीं है। जसा कि उम्मीद थी, भगवा बिग्रेट को इसमें जमकर लताड़ लगाई गई है। लेकिन पूरे प्रकरण में भाजपा के उदारवादी माने जाने वाले वरिष्ठ नेता व पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के नाम ने राजनीतिक हलके में तूफान मचा दिया। रिपोर्ट सीधे तौर पर वाजपेयी को दोषी नहीं बताती। लेकिन यह कह कर एक बड़ा आरोप तय करती है कि बाबरी विध्वंस कोई अचानक हुई घटना नहीं, बल्कि एक सोची-समझी रणनीति थी और भाजपा के वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी सहित अटल बिहारी वाजपेयी भी इससे पूरी तरह वाकिफ थे। इन नेताओं ने जानबूझकर पूरे प्रकरण से दूरी बनाए रखी। वास्तव में इन्होंने जनता के विश्वास व लोकतंत्र को धोखा दिया है और इसलिए वे उनके अपराधी हैं।
बाबरी विध्वंस पर यह रिपोर्ट न्यायमूर्ति एमएस लिब्रहान के नेतृत्व में गठित लिब्रहान आयोग ने दी है। छह दिसंबर, 1992 को कारसेवकों द्वारा बाबरी विध्वंस को अंजाम देने के करीब दस दिन बाद ही यानी 16 दिसंबर 1992 को तत्कालीन प्रधानमंत्री पीवी नरसिम्हा राव ने इस आयोग का गठन किया था और म्रास उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति एमएस लिब्रहान को मामले की जांच का जिम्मा सौंपा था। तब मामले की जांच के लिए उन्हें तीन माह का समय दिया गया था। लेकिन जांच पूरी होते-होते 17 साल लग गए, जिसके लिए कुल 48 बार आयोग का कार्यकाल बढ़ाया गया। इन 17 सालों में न्यायमूर्ति लिब्रहान ने कई लोगों के बयान लिए, ऑडियो-वीडियो टेप की जांच की और उसके बाद अपनी रिपोर्ट दी। एक सदस्यीय इस आयोग की जांच पर करीब आठ करोड़ रुपए का खर्च आया है।
तकरीबन एक हजार पन्ने की रिपोर्ट में न्यायमूर्ति लिब्रहान ने भाजपा के कई वरिष्ठ नेताओं सहित 68 लोगों को नामजद किया है। राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ को बाबरी विध्वंस का मुख्य साजिशकर्ता करार देते हुए उन्होंने उत्तर प्रदेश की तत्कालीन कल्याण सिंह सरकार को इस साजिश को अमल में लाने का दोषी करार दिया है। साथ ही कें्र की तत्कालीन पीवी नरसिम्हाराव सरकार को भी यह कहते हुए आड़े हाथों लिया है कि उसने बाबरी विध्वंस को रोकने के लिए कोई गंभीर कदम नहीं उठाए। हालांकि यह कहकर उनका बचाव किया कि राज्य सरकार की ओर से कें्र से किसी तरह की मदद नहीं मांगी गई।
अपनी रिपोर्ट में न्यायमूर्ति लिब्रहान ने भाजपा के वरिष्ठ नेताओं, लाल कृष्ण आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी व अटल बिहारी वाजपेयी को पर्दे के पीछे से भूमिका निभाने वाला करार दिया है। रिपोर्ट में साफ कहा गया है कि ये नेता बाबरी विध्वंस की आरएसएस की साजिश से पूरी तरह वाकिफ थे और उन्होंने जानबूझकर राम जन्मभूमि अभियान से दूरी बनाए रखी। अपनी रिपोर्ट में न्यायमूर्ति लिब्रहान नेताओं पर भी खूब बरसे। उन्होंने किसी दल विशेष का नाम लिए बगैर सभी नेताओं को यह कहते हुए आड़े हाथों लिया कि अपने क्ष्रु राजनीतिक स्वार्थ के लिए वे एक महान राष्ट्र व दुनिया की पुरानी सभ्यताओं में से एक को असहिष्णुता और बर्बरता की ओर ढकेल रहे हैं।
बाबरी विध्वंस पर लिब्रहान आयोग की बहुप्रतीक्षित रिपोर्ट कई तरह से विवादों में घिरी है। सबसे पहले तो भाजपा और सहयोगी दलों ने रिपोर्ट लीक होने को लेकर हंगामा किया। रिपोर्ट लीक होने का आरोप सरकार पर लगा, अंगुली न्यायमूर्ति लिब्रहान पर भी उठी। लेकिन इन आरोपों को लेकर न्यायमूर्ति लिब्रहान का रवैया ‘नो कमेंटज् का रहा। उन्होंने कुछ भी कहने से इनकार कर दिया। हालांकि रिपोर्ट लीक होने के मामले में वह मीडिया पर भड़के जरूर।
रिपोर्ट का एक अन्य विवादास्पद पहलू इसका अत्यधिक समय लेना है। सरकार ने इसके लिए तीन माह की समय सीमा निर्धारित की थी, जबकि रिपोर्ट सौंपते-सौंपते न्यायमूर्ति लिब्रहान को 17 साल लग गए। इसके लिए उन्होंने प्रमुख गवाहों के असहयोगात्मक रवैये और आयोग के कामकाज के शुरुआती दिनों में ही कर्मचारियों के लगातार स्थानांतरण को जिम्मेदार ठहराया। रिपोर्ट में देरी की एक प्रमुख वजह न्यायमूर्ति लिब्रहान ने आयोग के सलाहकार अनुपम गुप्ता के असहयोगात्म रवैये को भी बताया है। तकरीबन एक हजार पन्ने की रिपोर्ट में न्यायमूर्ति लिब्रहान ने 18 पन्नों में इस बात का जिक्र किया है कि आखिर क्यों जांच पूरी करने में उन्हें 17 साल लग गए।
अनुपम गुप्ता के असहयोगात्म रवैये का जिक्र करते हुए न्यायमूर्ति लिब्रहान ने कहा है कि निहित कारणों से गुप्ता ने आयोग के सलाहकार के रूप में अपनी भूमिका नहीं निभाई, जिसके चलते उन्हें बार-बार परेशानी हुई और अंतत: उन्हें इसके लिए दूसरे अधिवक्ता की मदद लेनी पड़ी। वहीं, अनुपम गुप्ता ने न्यायमूर्ति लिब्रहान पर भाजपा नेता लालकृष्ण आडवाणी को बचाने का आरोप लगाते हुए 2007 में ही आयोग के सलाहकार का पद छोड़ दिया था।
इसके अलावा बिना सुनवाई के रिपोर्ट में वाजयपेयी का नाम आने से भी न्यायमूर्ति लिब्रहान की किरकिरी हो रही है। प्रेक्षक जांच आयोग अधिनियम, 1952 की धारा 8बी का हवाला देते हुए रिपोर्ट में वाजपेयी को नामजद करने पर सवाल उठा रहे हैं, जिसमें किसी भी व्यक्ति पर आरोप तय करने से पहले उसका पक्ष जानने का प्रावधान है। साथ ही वे प्राकृतिक न्याय के सिद्धांत का भी हवाला दे रहे हैं, जिसके अनुसार किसी भी व्यक्ति के खिलाफ कोई प्रतिकूल टिप्पणी करने से पहले उसे सुनवाई का अधिकार होना चाहिए। इसे मानहानि से जोड़कर भी देखा जा रहा है।

डेडली हेडली

मुंबई पर आतंकवादी हमले यानी 26/11 को एक साल होने में अब कुछ दिन बाकी हैं। पाक पूरे मामले को दबाकर बैठा है, जबकि सारे जवाब उसी के पास हैं और उसी को देना है। इस बीच जो खुलासे हो रहे हैं और जो नए नाम सामने आ रहे हैं, उनकी शक की सुई भी पाक की ओर है। डेविड कोलमैन हेडली उर्फ दाऊद गिलानी ऐसा ही एक नाम है। पाक मूल के इस अमेरिकी नागरिक की गिरफ्तारी के बाद जो तथ्य सामने आए हैं, उनसे जांच एजेंसियों को शक है कि 26/11 की वारदात में उसका भी हाथ था। आश्चर्य की बात यह कि 2006 से 2009 तक वह नौ बार भारत आया। कई शहरों में गया और वीसा एजेंसी के जरिये अपने आतंकवादी संगठन लश्कर-ए-तैयबा के लिए भर्ती करता रहा। फिर भी, उसके दहशतगर्दी इरादों को कोई भांप नहीं पाया।

डेविड कोलमैन हेडली उर्फ दाऊद गिलानी। पाकिस्तानी मूल का अमेरिकी नागरिक। अमेरिका में शिकागो के ओज्हेयर अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डे से गिरफ्तार यह शख्स एक और आतंकवादी वारदात को अंजाम देने की फिराक में था। उसके निशाने पर था अमेरिका और भारत। इसके अलावा भी कई अन्य देशों में वह आतंक फैलाने का मंसूबा पाले था और यह सब वह कर रहा था पाकिस्तान स्थित आतंकवादी संगठन लश्कर-ए-तैयबा के इशारे पर।
गिरफ्तारी के वक्त वह पाकिस्तान जाने के लिए फिलाडेल्फिया की उड़ान पर था, जहां वह अपने आकाओं के साथ मिलकर नए खौफनाक हमले की रूपरेखा तय करने वाला था। समझा जाता है कि वह भारत में 26/11 जसा ही एक और हमला अंजाम देने का षड्यंत्र रच रहा था। उसे गिरफ्तार करने वाली अमेरिका की फेडरल ब्यूरो ऑफ इंवेस्टिगेशन (एफबीआई) के अधिकारियों ने उससे पूछताछ के आधार पर जो खुलासा किया है, उसके अनुसार हेडली के निशाने पर थे देश के दो महत्वपूर्ण व लोकप्रिय बोर्डिग स्कूल- देहरादून स्थित दून स्कूल और मसूरी स्थित वूडस्टॉक स्कूल। साथ ही नई दिल्ली में नेशनल डिफेंस कॉलेज भी उसके निशाने पर था।
हेडली 2006 में बिजनेस वीसा पर भारत आया और 2006 से 2009 के बीच कुल नौ बार उसने भारत का दौरा किया। इस दौरान वह देश के कई शहरों में गया। अहमदाबाद, पुणे, लखनऊ, आगरा और दिल्ली का उसने दौरा किया। जुलाई 2008 तक वह मुंबई में रहा और करीब दो साल तक उसने वहां वीसा एजेंसी चलाई। अपनी इस वीसा एजेंसी के जरिये उसने कई लोगों को भारत से बाहर खाड़ी देशों में भेजा। लेकिन वह उन्हें किसी व्यवसाय के सिलसिले में खाड़ी देश नहीं भेज रहा था, बल्कि लश्कर-ए-तैयबा के कैडर के रूप में उनकी भर्ती कर रहा था।
अपने मुंबई प्रवास के दौरान वह होटल ट्रिडेंट में रुका। कुछ दिन छत्रपति शिवाजी टर्मिनस (सीएसटी) के पास एक गेस्ट हाऊस में रहा और ताज होटल में भी उसने कमरा लिया था। इस आधार पर मुंबई हमले में भी उसका हाथ होने की आशंका जाहिर की जा रही है। एफबीआई के अधिकारी भी इस बात से इनकार नहीं करते। गृह मंत्री पी चिदंबरम ने भी हमले में उसका हाथ होने की आशंका जाहिर करते हुए इसकी जांच की बात कही है। गौरतलब है कि मुंबई हमले के दौरान होटल ट्रिडेंट, सीएसटी और होटल ताज, ये तीनों आतंकवादियों के हमले के शिकार हुए थे। जांच एजेंसियां इस बात की भी जानकारी जुटा रही हैं कि क्या हेडली लश्कर-ए-तैयबा के किसी प्रशिक्षण शिविर में भी शामिल हुआ था, जिसमें मुंबई हमले को अंजाम देने वाले दस आतंकवादियों ने प्रशिक्षण लिया था?
हेडली ने, जिसका मूल नाम दाऊद गिलानी है, पहचान छिपाने के लिए अपना नाम तक बदल लिया। उसने भारत के कई शहरों का और कई बार दौरा किया। इस दौरान वह कई होटलों में रुका, मुंबई में उसने दलालों के माध्यम से किराए पर मकान भी लिया। इस दौरान निर्माता-निर्देशक महेश भट्ट के बेटे राहुल भट्ट से भी उसकी मुलकात हुई। राहुल से अपने संपर्क का इस्तेमाल उसने मुंबई में अपना कारोबार जमाने में किया और उससे कई तरह की मदद ली। पुलिस को दी जानकारी में राहुल ने बताया है कि हेडली से उसकी मुलाकात एक जिम में हुई थी। वह अक्सर उससे स्वास्थ्य और व्यायाम के बारे में ढेर सारी बातें करता था। इस तरह जाहिर होता है कि हेडली स्वास्थ्य को लेकर काफी सजग व गंभीर था। इस बीच कहीं कोई उसके खतरनाक मंसूबों को भांप नहीं पाया। लेकिन अब जबकि वह जांच एजेंसियों की गिरफ्त में आ चुका है, दुनिया के अन्य आतंकवादी हमलों और षड्यंत्रों में भी उसका नाम सामने आ रहा है। उस पर आतंकवादियों को हर तरह की सहायता मुहैया कराने के भी आरोप हैं।
डेनमार्क का समाचार-पत्र ‘जिलैंड्स-पोस्टेनज् भी उसके निशाने पर था, जिसने 2005 में पैगम्बर मुहम्मद साहब के 12 कार्टून प्रकाशित किए थे। इसके लिए उसने पाकिस्तान में अल कायदा के फील्ड कमांडर इलियास कश्मीरी और लश्कर-ए-तैयबा के दो अन्य कमांडर से भी मुलाकात की थी। इलियास कश्मीरी पाक अधिकृत कश्मीर में हरकत-ऊल-जिहाद इस्लामी (हुजी) का सरगना है, जिसके तार अलकायदा से जुड़े हैं। उल्लेखनीय है कि ‘जिलैंड्स-पोस्टेनज् में पैगम्बर मुहम्मद साहब के कार्टून के प्रकाशन के बाद दुनियाभर में इस्लामिक जगत में उबाल आ गया था और अखबार के संपादक के खिलाफ फतवा भी जारी किया गया था। समझा जाता है कि इसी बीच हेडली ने कई बार अखबार के दफ्तर का मुआयना किया और आतंकवादियों को इसके बारे में अंदरूनी जानकारी दी।

सत्याग्रही शर्मिला

इरोम शर्मिला को अनशन करते अब दसवां साल लग गया है। अनशन तुड़ाने के तमाम सरकारी दांवपेंच और उनकी मांग को लेकर घोर असंवेदनशीलता से शर्मिला का हौसला पस्त नहीं हुआ, बल्कि इरादा और पुख्ता हो गया। वे मणिपुर की जनता को आर्म्ड फोर्सेस स्पेशल पावर एक्ट से मुक्ति दिलाना चाहती हैं। मणिपुर इरोम के साथ है और सरकार की दुविधा भी यही है। मणिपुर ही नहीं, इरोम शर्मिला पूरे देश में नैतिकता, साहस और प्रतिरोध की प्रतीक बन चुकी हैं।

इरोम शर्मिला का नाम लेते ही उभरती है एक ऐसी छवि, जिसने अपने शांतिपूर्ण विरोध से पिछले नौ साल से कें्र और मणिपुर सरकार की नाक में दम कर रखा है। एक ऐसी महिला, जो अपने साहस और जीवट से लाखों लोगों उम्मीद बन गई है; जिसने लोगों के दिलों में यह एहसास जगाया कि आज नहीं तो कल उनकी बात सुनी जाएगी और मणिपुर के लोगों को आर्म्ड फोर्सेस स्पेशल पावर एक्ट से छुटकारा मिलेगा। एक ऐसा कानून, जो ‘शांति विघ्नज् की स्थिति में देश के किसी भी हिस्से में थोपा जा सकता है, जिसकी आड़ में अक्सर सेना मानवाधिकारों का उल्लंघन करती है और जिसकी वजह से मणिपुर के लोग खुली हवा में सांस तक नहीं ले पा रहे। अपने स्वतंत्र देश में उन्हें उसी सेना के डर और आतंक के साए में जीना पड़ रहा है, जो उनकी ‘सुरक्षाज् के लिए है। शर्मिला इसी कानून को हटाने की मांग कर रही हैं, जिसके लिए वे पिछले नौ साल से आमरण अनशन पर बैठी हैं। दो नवंबर को उनका अनशन दसवें साल में प्रवेश कर गया।
इस कानून को लेकर मणिपुर की जनता में आक्रोश बहुत पहले से है, जिसे और बुलंद किया ईरोम शर्मिला ने। उन्होंने मणिपुर की जनता के लिए स्वयं को होम कर दिया। इस बात की परवाह नहीं की कि आमरण अनशन की उनकी जिद उन्हें मौत के द्वार तक ले जा सकती है। उनकी उम्र केवल 35 साल है, लेकिन वे इससे कहीं अधिक दिखती हैं। लेकिन इन सबकी परवाह उन्हें कहां? वे तो अपना जीवन जनता के लिए समर्पित कर चुकी हैं। स्वयं शर्मिला के शब्दों में कहें तो, ‘हम सबके जीवन का एक मकसद है, हम इस दुनिया में कुछ करने आए हैं। जहां तक शरीर की बात है तो एक न एक दिन इसे खत्म होना है। लेकिन जरूरी यह है कि हम जो करने यहां आए हैं, उसे पूरा करें।ज् आखिर कौन न शर्मिला की इस बेबाकी का मुरीद हो जाए? और मणिपुर की जनता, जिसके लिए उन्होंने अपनी जिंदगी दांव पर लगा दी, क्यों न उन्हें अपने तारणहार के रूप में देखे?
मणिपुर की जनता के लिए उनके इसी प्रेम ने उन्हें लोगों के बीच कुछ इस तरह लोकप्रिय बना दिया कि लोग अपने हर कदम के लिए उनके इशारे की प्रतीक्षा करते रहते हैं। उनके इस साहसपूर्ण कदम ने उन्हें मणिपुर के साथ-साथ देशभर में और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भी पहचान दिलाई। देशभर के बुद्धिजीवी व मानवाधिकार कार्यकर्ता उन्हें खुलकर अपना वैचारिक समर्थन दे रहे हैं, तो जनता में उनके लिए गजब की सहानुभूति है। ईरान की मानवाधिकार कार्यकर्ता व नोबेल पुरस्कार से सम्मानित शिरीन ईबादी भी उनसे मिलकर उन्हें अपना समर्थन घोषित कर चुकी हैं। सरकार भी जानती है कि अगर उन्हें कुछ हो गया, तो मणिपुर की जनता में जो उबाल आएगा, उसे दबाना उसके बूते में नहीं होगा। अगर वह इसमें काययाब हो भी जाए तो राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर उसकी जो थू-थू होगी, उससे वह कैसे उबरेगी? आखिर किस-किसको और क्या जवाब देगी सरकार? शायद इसलिए पूरा सरकारी अमला शर्मिला को जिंदा रखने में जुटा है। वे भोजन नहीं कर रहीं, तो प्रशासन ने इसकी भी तैयारी कर ली है। उन्हें पाइप के जरिये नाक से विटमिन व खनिज से भरा पेय पदार्थ दिया जा रहा है, ताकि जिंदा रखा जा सके।
नाक में पाइप लगा है, पूरा अमला अनशन तोड़ने के लिए हर तरह से जोर आजमाइश कर चुका है, लेकिन शर्मिला को मणिपुर से ‘आर्म्ड फोर्सेस स्पेशल पावर एक्टज् हटाने से कम कुछ भी मंजूर नहीं। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह आश्वासन देते हैं कि इस कानून में फेरबदल कर सेना के उन अधिकारों को सीमित किया जाएगा, जिससे जनता को परेशानी हो रही है; लेकिन शर्मिला टस से मस नहीं। शर्मिला के आमरण अनशन से डरी सरकार राज्य के कुछ हिस्सों से यह कानून हटा देती है। लेकिन वे तो पूरे राज्य से हटवाना चाहती हैं और वह भी पूरी तरह।
उत्तर-पूर्व की इस शेरनी का जीवट, शांतिपूर्ण विरोध का यह तरीका बरबस ही महात्मा गांधी के सत्याग्रह और अहिंसा की याद दिला देता है, जिससे उन्होंने अंग्रेजी शासन की चूलें हिला दी थी। नौ साल पहले दो नवंबर, 2000 को शर्मिला ने अपनी मांगों को लेकर उपवास शुरू किया था, जब असम राइफल्स के जवानों ने मालोम में हमला कर दस युवकों को उप्रवी होने के केवल संदेह के आधार पर मार गिराया था। सेना की इस कार्रवाई का आधार भी ‘आर्म्ड फोर्सेस स्पेशल पावर एक्टज् ही था, जिसके तहत सेना या अर्धसैनिक बल के किसी भी जवान को केवल संदेह के आधार पर नागरिकों को गिरफ्तार करने, बिना वारंट उनके घरों की तलाशी लेने और यहां तक उन्हें गोली मारने और जान से मार डालने का भी अधिकार दिया गया है। सेना की इसी कार्रवाई ने शर्मिला को उद्वेलित किया और वह इस कानून को हटाने के लिए आमरण अनशन पर बैठ गईं। हालांकि तीन दिन बाद ही पुलिस ने उन्हें गिरफ्तार कर लिया। उनके खिलाफ आत्महत्या के प्रयास का मामला दर्ज किया गया। बाद में उन्हें न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया। दो अक्टूबर, 2006 को महात्मा गांधी के जन्मदिन पर मणिपुर सरकार ने उन्हें मुक्त कर दिया, लेकिन इस चेतावनी के साथ कि वे दोबारा अनशन पर नहीं बैठेंगी। लेकिन वे तुरंत दिल्ली के लिए कूच कर गईं। वहां वे महात्मा गांधी के समाधिस्थल राजघाट गईं और जंतर-मंतर पर एकबार फिर अनशन शुरू कर दिया। वे एकबार फिर गिरफ्तार कर ली गईं। उन्हें पुलिस की नजरबंदी में अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान में भर्ती कराया गया। लेकिन शर्मिला की हिम्मत नहीं खोई। उनकी जंग आज भी जारी है और इसमें न केवल मणिुपर की जनता, बल्कि उनका परिवार भी उनके साथ है। मां ने पिछले कई साल से सिर्फ इसलिए बेटी से मुलाकात नहीं कि वह उन्हें देखकर रो देंगी और बेटी उनके आंसुओं से पिघल जाएगी।

नॉट स्टुपिड नशीद

मोहम्मद नशीद लड़ाकू हैं, यह बात वे सब जानते हैं, जो मालदीव में लोकतंत्र के लिए उनके जुझारूपन से परिचित हैं। कई साल जेल में, निर्वासन में बिताने के बाद वह अंतत: जीते और मालदीव के निर्वाचित राष्ट्रपति भी बने। लेकिन वह मानवीय व सामाजिक सरोकारों वाले व्यक्ति हैं और इसमें अंतर्राष्ट्रीय चिंताएं भी शामिल हैं। जलवायु परिवर्तन से सबसे ज्यादा नुकसान उठाने वाले देशों में मालदीव भी होगा। पर्यावरण में बिगाड़ रोकने के लिए नशीद अलख जगाने में लगे हैं। उन्होंने इसके लिए अपने मंत्रिमंडल की बैठक सम्रु के गहरे पानी के अंदर की, ताकि दुनिया का ध्यान इस विकराल समस्या के प्रति आकर्षित हो। असंवेदनशील और नादान लोगों के आज के समय में वह एक संवेदनशील और समझदार राजनेता हैं। ऐसा एक सम्मान वह पा भी चुके हैं।


आज सारी दुनिया जलवायु परिवर्तन के खतरों को लेकर सहमी नजर आ रही है। दुनिया भर से इसको लेकर कुछ सार्थक प्रयास करने की बात कही जा रही है, लेकिन इस दिशा में कारगर कदम क्या हो, इसे लेकर सहमति नहीं बन पा रही। ऐसे में इस खतरे की ओर समूची दुनिया का ध्यान आकर्षित करने का प्रयास किया है मालदीव के राष्ट्रपति मोहम्मद नशीद ने। उन्होंने इसके लिए एक अनोखा तरीका ढूंढ निकाला। सम्रु के अंदर कैबिनेट की बैठक बुलाई और उसमें वैश्विक स्तर पर कार्बन का उत्सर्जन कम करने के दस्तावेज पर हस्ताक्षर किया। नशीद इसे दिसंबर में कोपेनहेगन में होने वाले संयुक्त राष्ट्र के जलवायु परिवर्तन से संबंधित सम्मेलन में पेश करेंगे। सम्मेलन का मुख्य उद्देश्य 1997 के क्योटो प्रोटोकॉल, जो 2012 में समाप्त हो रहा है, के स्थान पर एक नए प्रस्ताव पर सहमति बनाना है।
नशीद सौ फीसदी मुस्लिम आबादी वाले मालदीव के लोकतांत्रिक तरीके से निर्वाचित पहले राष्ट्रपति हैं, जिन्होंने वहां न सिर्फ लोकतंत्र को मजबूत किया, बल्कि सम्रु से सटे इस छोटे से द्वीपसमूह को जलवायु परिवर्तन से होने वाले नुकसान से बचाने की कवायद भी शुरू की। मालदीव उन चंद द्वीप देशों में है, जिन्हें जलवायु परिवर्तन से सबसे ज्यादा खतरा है। मालद्वीपीयन द्वीप सम्रु तल से केवल 1.5 मीटर ऊपर है और जलवायु परिवर्तन से संबंधित अंतर्राष्ट्रीय पैनल आगाह कर चुका है कि यदि ग्रीन हाऊस गैसों के उत्सर्जन को नहीं रोका गया तो 21वीं सदी के अंत तक सम्रु के जल स्तर में आधे मीटर की बढ़ोत्तरी हो सकती है और आने वाले दिनों में मालदीव जसे-द्वीप देश पानी में समा जाएंगे।
मोहम्मद नशीद भी कहते हैं कि यदि इस दिशा में कोई कारगर कदम नहीं उठाया गया तो आने वाले दिनों में हमारे नाती-पोते इस द्वीपसमूह को पानी में विलीन पाएंगे। वह जलवायु पविर्तन के खतरों को आतंकवाद से भी अधिक खतरनाक मानते हैं। एक अनुमान के मुताबिक ग्लोबल वार्मिग से हर साल तीन लाख लोग शरणार्थी हो रहे हैं। नशीद कहते हैं कि सम्रु का जल स्तर बढ़ने से न केवल खाद्य संकट पैदा हो रहा है, बल्कि बड़े पैमाने पर लोगों के विस्थापन और बीमारियों की समस्या भी पैदा हो रही है। मालदीव ने जलवायु परिवर्तन के खतरों को बहुत पहल से महसूस करना शुरू कर दिया है। अब दुनिया के अन्य देशों को भी इस दिशा में कारगर कदम उठाने की जरूरत है। वरना आने वाले दिनों में यह उनके लिए भी इसी तरह खतरनाक हो सकता है, जसे आज मालदीव के लिए है।
जलवायु परिवर्तन के खतरों को कम करने के लिए वह यह कहकर दुनिया का आह्वान करते हैं कि यदि मनुष्य चांद पर जा सकता है तो एकजुटता से कार्बन गैसों के उत्सर्जन को भी रोका जा सकता है, जो हम सबका समान दुश्मन है। कार्बन गैसों के उत्सर्जन से होने वाले पर्यावरणीय नुकसान को देखते हुए ही नशीद ने सत्ता संभालने के चार महीने बाद ही मालदीव को एक दशक के भीतर कार्बन-रहित और पवन व सौर ऊर्जा पर निर्भर देश बनाने की परिकल्पना रखी। उनका कहना है कि इस पर आने वाला खर्च उससे अधिक कतई नहीं होगा, जो मालदीव अब तक ऊर्जा के अन्य स्रोतों पर खर्च कर चुका है। पर्यावरण संरक्षण को लेकर नशीद के प्रयासों को अब तक कई अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कार व सम्मान मिल चुके हैं। इस साल सितंबर में उन्हें ‘एज ऑफ स्टुपिडज् के वैश्विक प्रीमियर में ‘नॉट स्टुपिडज् का खिताब दिया गया। वहीं, टाइम मैगजीन उन्हें इस साल पर्यावरण की बेहतरी के लिए काम करने वाले दुनिया के चंद नेताओं में शुमार किया।
नशीद केवल जलवायु परिवर्तन के खतरों को कम करने के लिए ही मुहिम नहीं चला रहे, बल्कि उन्होंने मालदीव में लोकतंत्र की स्थापना में भी अहम योगदान दिया। वह जेल गए, निर्वासन में रहे, लेकिन लोकतंत्र की लड़ाई के लिए हौसला नहीं छोड़ा। मई 1967 में एक व्यवसायी के घर जन्मे मोहम्मद नशीद की शुरुआती शिक्षा-दीक्षा मजीदिया स्कूल से हुई। बाद में वह श्रीलंका के कोलंबो चले गए और वहां से ब्रिटेन। 1980 के आखिरी दशक में वह मालदीव लौटे और यहीं से शुरू हो गई उनकी लोकतांत्रिक लड़ाई व उनकी परेशानियों का दौर।
यहां उन्होंने अपनी पत्रिका ‘संगूज् निकाली और उसमें तत्कालीन राष्ट्रपति मौमून अब्दुल गयूम के शासन को भ्रष्ट और मानव अधिकारों के उल्लंघन का दोषी बताते हुए उसके खिलाफ खोजी रिपोर्टों का प्रकाशन शुरू किया। जाहिर तौर पर अपनी इन गतिविधियों से वह सरकार की नजर में आ गए। पुलिस ने उनकी पत्रिका के दफ्तर पर छापे मारे और नशीद को गिरफ्तार कर लिया। तब उनकी उम्र केवल 23 साल थी। विभिन्न मौकों पर उन्हें 16 बार गिरफ्तार किया गया। छह वर्ष उन्होंने जेल में बिताए, जिनमें से 18 माह वह कालकोठरी में रहे। इस दौरान उनकी दो बच्चियां भी हुईं, लेकिन वह इस मौके पर पत्नी के साथ नहीं रह सके, जिसका अफसोस एक पिता और पति के नाते उन्हें आज भी है।
सरकार के दमन से नवंबर 2003 में उन्हें देश छोड़ना पड़ा। इस दौरान वह श्रीलंका और ब्रिटेन में रहे और वहां निर्वासन में ही मोहम्मद लतीफ के साथ मिलकर मालदीवियन डेमोक्रेटिक पार्टी का गठन किया। 2004 में ब्रिटिश सरकार ने उन्हें राजनीतिक शरणार्थी के रूप में स्वीकार किया। 18 महीने के स्वनिर्वासन के बाद अप्रैल 2005 में वह मालदीव लौटे और यहां अपनी पार्टी का प्रचार-प्रसार शुरू किया। जून में उनकी पार्टी को एक राजनीतिक दल के रूप में मान्यता भी मिल गई। उसी साल अगस्त में उनकी फिर गिरफ्तारी हुई। पहले कहा गया कि यह उनकी सुरक्षा के लिए किया गया, लेकिन बाद में सरकार ने उनके खिलाफ आतंकवाद निरोधी अधिनियम के तहत मुकदमा दर्ज कर दिया। लेकिन इस घटना से उन्हें जबरदस्त फायदा हुआ। जनता में उनकी लोकप्रियता बढ़ गई। लोग उनके लिए सड़कों पर उतर आए। अक्टूबर 2008 में देश में पहली बार राष्ट्रपति चुनाव में कई राजनीतिक पार्टियों के उम्मीदवारों ने शिरकत की और डेमोक्रेटिक पार्टी के नशीद विजयी रहे। 11 नवंबर को उन्होंने बतौर राष्ट्रपति मालदीव की सत्ता संभाली। नशीद महात्मा गांधी के घनघोर प्रशंसक हैं और मानते हैं कि आज की अधिकतर समस्याओं के, जिनमें पर्यावरण प्रदूषण भी शामिल है, हमें गांधी के रास्ते पर लौटना होगा।

बुधवार, 28 अक्टूबर 2009

बखटके खांडू

महाराष्ट्र में कांग्रेस की सरकार। हरियाण में वह सरकार बनाने की राह पर। लेकिन इन सबसे अलग और ऊपर अरुणाचल। कांग्रेस जहां महाराष्ट्र में बमुश्किल कामचलाऊ बहुमत जुटा पाई और हरियाणा में छह सीटें कम रह गई, वहीं अरुणाचल में उसने दो तिहाई बहुमत हासिल किया। यह सब करिश्माई दोर्जी खांडू का कमाल था। उनके नेतृत्व में कांग्रेस का कायाकल्प हो गया। इसलिए महाराष्ट्र और हरियाणा में जहां आलाकमान नेता चुनने की मशक्कत में पड़ा है, वहीं खांडू सर्वमान्य रूप से नेता चुने गए।

तीन राज्यों, महाराष्ट्र, हरियाणा और अरुणाचल प्रदेश में हुए विधानसभा चुनाव परिणाम से कांग्रेस उत्साहित है। हो भी क्यों न, हर जगह लोगों ने पिछले पांच साल के शासन को कमोवेश ठीकठाक मानते हुए दोबारा शासन का जनादेश जो दिया। हालांकि हरियाणा की बहुमत से छह सीटें कम की जीत ने कांग्रेस का उत्साह थोड़ा फीका जरूर किया, लेकिन अरुणाचल की दो तिहाई बहुमत से जीत ने विजय के जश्न को बहुत फीका होने से बचा भी दिया। अरुणाचल में कांग्रेस को यह ऐतिहासिक जीत मिली दोर्जी खांडू के नेतृत्व में, जिन्होंने करीब ढाई साल पहले अप्रैल, 2007 में बतौर मुख्यमंत्री राज्य की सत्ता संभाली थी।
खांडू ने अप्रैल, 2007 में तब मुख्यमंत्री का पद ग्रहण किया था, जब गोगांग अपांग के नेतृत्व वाली कांग्रेस सरकार के विरोध में पार्टी के अपने ही विधायक खड़े हो गए थे। अपांग पर तानाशाही रवैया अपनाने का आरोप लगाते हुए नेतृत्व परिवर्तन की मांग को लेकर कांग्रेसी विधायकों ने दिल्ली में डेरा जमा लिया था। तब साफ लग रहा था कि अगर कांग्रेस ने नेतृत्व के इस मुद्दे को तत्काल नहीं सुलझाया तो पार्टी की अंतर्कलह उसे ले डूबेगी। पार्टी आलाकमान ने भी मामले की गंभीरता समझी और अरुणाचल में कांग्रेस को इस संकट से उबारने का जिम्मा दोर्जी खांडू को सौंपा। खांडू ने पिछले ढाई साल में राज्य में कांग्रेस को एक सफल नेतृत्व दिया, जिसका परिणाम विधानसभा चुनाव में पार्टी को मिले दो तिहाई बहुमत के रूप में सामने आया।
अरुणाचल की जीत केवल कांग्रेस के लिए ही महत्वपूर्ण नहीं है, बल्कि देश के लिए भी उतनी ही अहम है। चीन की सीमा से सटा यह प्रदेश दोनों देशों के आपसी संबंधों को लेकर काफी संवेदनशील रहा है। चीन बार-बार अरुणाचल के कुछ हिस्सों को अपने नक्शे में दर्शाता रहा है। वह तिब्बतियों के धर्म गुरू दलाई लामा ही नहीं, प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के भी अरुणाचल दौरे पर सवाल उठाता रहा है। ऐसे मौकों पर खांडू ने चीन को दो टूक जवाब दिया। उन्होंने कहा, ‘अरुणाचल भारत का अभिन्न हिस्सा था, है और रहेगा। हमें उस वक्त रक्षात्मक रवैया अपनाने की कोई जरूरत नहीं है, जब चीन इसे लेकर अनावश्यक शोर मचाता है। दलाई लामा के अरुणाचल दौरे को लेकर भी चीन को किसी तरह की आपत्ति जताने का हक नहीं है।ज्
खांडू के नेतृत्व में प्रदेश की जनता ने जिस उत्साह से चुनाव में भाग लिया और अपने मताधिकार का इस्तेमाल किया, वह भी चीन के लिए करारा जवाब है। इससे पहले 2004 के विधानसभा चुनाव में प्रदेश की जनता ने 70.21 प्रतिशत मतदान किया था, जबकि इस बार मतदान का प्रतिशत 72 फीसदी रहा। साफ है कि लोगों ने उनमें भारत से अलगाव की भावना जसे चीन के मिथ्या प्रचार को ठेंगा दिखा दिया। चीन की तमाम कोशिशों के बावजूद मुख्यमंत्री की ही तर्ज पर जनता ने भी बता दिया कि उनकी आस्था भारतीय लोकतंत्र में है, क्योंकि वे स्वयं को इसका अभिन्न हिस्सा मानते हैं। निश्चय ही लोगों में यह भावना विकसित करने में खांडू के योगदान को कमतर नहीं आंका जा सकता।
तीन मार्च, 1955 को अरुणाचल के गांगखर गांव में स्व. लेकी दोर्जी के घर में जन्मे खांडू ने राजनीति से पहले सेना के खुफिया विभाग में सात साल तक सेवा दी। खासकर 1971 में बांग्लादेश युद्ध के समय उनकी सेवा विशेष रूप से उल्लेखनीय रही, जिसके लिए उन्हें गोल्ड मेडल भी दिया गया। लेकिन सामाजिक व सांस्कृतिक कार्यो में शुरू से ही उन्हें विशेष रुचि रही। यही वजह है कि सेना में रहते हुए भी उनका मन सामाजिक व सांस्कृतिक कार्यो से अलग नहीं हुआ। 1980 तक वह तवांग जिले में लोगों के कल्याणार्थ जुटे रहे। 1982 में वह सांस्कृतिक व को-ऑपरेटिव सोसाइटी के अध्यक्ष बने और दिल्ली में चल रहे एशियाड खेलों में अरुणाचल प्रदेश के सांस्कृतिक दल का प्रतिनिधित्व किया। उनके नेतृत्व में अरुणाचल ने बेहतर प्रदर्शन किया और उसे सिल्वर मेडल मिला।
इस बीच वह पश्चिमी कमांग जिला परिषद के उपाध्यक्ष चुने गए और उन्होंने क्षेत्र में कई विकासात्मक काम किए। 1987-90 तक उन्होंने दूर-दराज के क्षेत्रों में जलापूर्ति, विद्युत, परिवहन व्यस्था दुरुस्त करने और स्कूलों व धार्मिक संस्थाओं के निर्माण पर काम किया। 1990 में वह पहली बार विधनसभा के लिए चुने गए और इसके बाद उनका राजनीतिक सफर रुका नहीं। उन्होंने राज्य में हुए हर विधानसभा चुनाव में जीत दर्ज की और इस बीच कई मंत्रालयों का दायित्व संभाला। नौ अप्रैल, 2007 को कांग्रेस आलाकमान ने उन्हें मुख्यमंत्री के रूप में राज्य की बागडोर थमाई, जिसकी जिम्मेदारी भी उन्होंने बखूबी निभाई।
सामाजिक कार्यो के प्रति उनका विशेष लगाव राज्य की बागडोर संभालने के बाद स्वतंत्रता दिवस पर दिए गए उनके भाषण से भी झलकता है, जिसमें उन्होंने कहा था कि हमारे महान स्वतंत्रता सेनानियों के प्रति हमारी सच्ची श्रद्धांजलि यही होगी कि हम स्वयं को गरीबी, बीमारी, असमानता, सामाजिक अन्याय, असहिष्णुता और भ्रष्टाचार के जंजीर से आजाद करने के लिए दिन-रात मेहनत करें। भूख और गरीबी की जंजीर तोड़े बगैर हम सच्ची स्वतंत्रता को महसूस नहीं कर सकते। प्रदेश में लोगों के बीच उनकी लोकप्रियता का आलम यह है कि विधानसभा चुनाव में वह निर्विरोध चुने गए।

मंगलवार, 20 अक्टूबर 2009

एक खौफनाक मंसूबा महसूद

अभी तीन दिन पहले अखबारों में खबर छपी थी कि तालिबान ने धमकी दी है कि उसका अगला निशाना भारत है। अगला इसलिए कि अभी वह पाकिस्तान को सबक सिखाने पर आमादा है। यहां तालिबान का आशय है ‘तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तानज् से। इसके मुखिया बैतुल्ला के मारे जाने के बाद बिखरते हुए इस संगठन को न सिर्फ मजबूती से एकजुट किया, बल्कि उसमें एक नया उन्माद पैदा किया है उसके नए मुखिया हकीमुल्लाह महसूद ने। महज अट्ठाइस साल के हकीमुल्लाह के इरादे खौफनाक हैं। तबाही का एक नया इतिहास लिखने को वह बेचैन है। पाकिस्तान उसके हमलों से कराह रहा है। महसूद उसे अमेरिकापरस्ती का दंड दे रहा है और चाहता है कि वह इस्लामिक राष्ट्र बने। उसके निशाने पर भारत भी है और इसकी चेतावनी उसने दे दी है।

उम्र केवल 28 साल, पर इरादे खतरनाक। चेहरा और व्यवहार सौम्य, लेकिन मकसद तबाही का। पाकिस्तान के कबायली इलाकों में जन्मा और पला-बढ़ा यह शख्स है हकीमुल्लाह महसूद। उसकी आंखों में है भारत और अमेरिका की तबाही का मकसद। हालांकि फिलहाल वह अपनी गतिविधियों को पाकिस्तान में अंजाम दे रहा है, क्योंकि वह उसे एक इस्लामिक राष्ट्र बनाना चाहता है। उसका अगला निशाना होगा, भारत।
वह पाकिस्तान में तालिबानी संगठन ‘तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तानज् (टीटीपी) का कमांडर है। अमेरिकी ड्रोन हमले में अगस्त में बैतुल्ला महसूद के मारे जाने के बाद वह ‘सर्वसम्मतिज् से इस संगठन का ‘आमिरज् चुना गया। समझा जाता है कि बैतुल्ला की मौत के बाद निराशा व हताशा में बिखराव की कगार पर पहुंच चुके टीटीपी को संभालने और एकजुट रखने में हकीमुल्लाह ने अपनी सारी ऊर्जा लगा दी। अपनी सूझबूझ व नेतृत्व क्षमता से उसने टीटीपी को एक नई दिशा दी और उसके लड़कों में नया जोश भर दिया।
बैतुल्लाह के बेहद करीबी समङो जाने वाले हकीमुल्लाह ने टीटीपी की कमान संभालने से पहले चालक के रूप में भी काम किया। हकीमुल्लाह का जन्म 1981 में पाकिस्तान के दक्षिणी वजीरिस्तान में जनदोला के पास कोटकई इलाके में हुआ था। उसकी शिक्षा केवल मदरसे की तालीम तक सीमित रही। हंगू जिले के एक छोटे से गांव में मदरसे से उसने शुरुआती तालीम पाई। उस वक्त उस मदरसे में बैतुल्ला महसूद भी था। हकीमुल्लाह वहीं बैतुल्ला के संपर्क में आया।
हालांकि बैतुल्ला ने हकीमुल्लाह से बहुत पहले वह मदरसा छोड़ दिया था, लेकिन दोनों के बीच संपर्क लगातार बना रहा। मदरसे की तालीम पूरी करने के बाद हकीमुल्लाह बैतुल्ला के साथ जिहाद में कूद पड़ा। शुरू में उसने बैतुल्ला के अंगरक्षक व सहयोगी के रूप में काम किया। लेकिन हथियारों के साथ खेलने के उसके शगल और माहरी ने तालिबानियों के बीच उसकी लोकप्रियता बढ़ा दी। एके-47 के संचालन में उसे महारत हासिल है। लड़ाइयों के दौरान उसने अपनी बेहतर क्षमता का प्रदर्शन किया। अपनी इन्हीं योग्यताओं के बल पर वह न केवल तालिबानियों में लोकप्रिय हुआ, बल्कि बैतुल्ला के और करीब होता गया। उसकी लड़ाका क्षमता को देखते हुए ही बैतुल्ला ने उसे टीटीपी का उप कमांडर बनाया था। तालिबानी उसकी लड़ाका क्षमता की तुलना नेक मोहम्मद से करते हैं, जो करिश्माई पश्तून नेता माना जाता है। जून 2004 में अमेरिकी हवाई हमले में उसकी मौत हो गई थी। तालिबानियों के अनुसार नेक मोहम्मद के बाद हकीमुल्लाह में ही वे नेक मोहम्मद के जसी लड़ाका क्षमता देखते हैं।
अपनी इन्हीं क्षमताओं से बैतुल्ला की मौत के बाद उसने टीटीपी को एक मजबूत नेतृत्व दिया और हताश तालिबानी लड़ाकाओं को एक नया जोश। इस बीच कई बार उसकी मौत की खबरें भी आईं। अमेरिकी रिपोर्ट में कहा गया कि बैतुल्ला की मौत के बाद टीटीपी का नया कमांडर चुनने के लिए बुलाई गई ‘शूराज् में तालिबानियों के बीच जमकर गोलीबारी हुई, क्योंकि इस पद के लिए कई तालिबानी सामने आ गए थे। तालिबानियों के बीच इस आपसी लड़ाई में ही हकीमुल्लाह की मौत हो गई। लेकिन पिछले दिनों मीडिया के सामने आकर उसने अपनी मौत की अफवाहों को गलत साबित कर दिया।
आम तालिबानी नेताओं से अलग पाकिस्तान, अमेरिका और भारत तक अपने खतरनाक मंसूबों को पहुंचाने के लिए हकीमुल्लाह ने किसी रिकॉर्डेड सीडी का इस्तेमाल नहीं किया, बल्कि मीडिया कर्मियों को अगवा किया और उन्हें अपने ठिकाने पर ले गया। वहां उसने अमेरिका के प्रति अपना गहरा आक्रोश जाहिर किया। उसने साफ कहा कि वह अमेरिका से बैतुल्ला की मौत की बदला लेकर रहेगा। गौरतलब है कि अगस्त में अमेरिकी ड्रोन हमले में बैतुल्ला की मौत हो गई थी।
इसी तरह पाकिस्तान भी उसके निशाने पर है, क्योंकि यह सरकार अमेरिकी इशारे पर काम कर रही है। उसने हाल के दिनों में पाकिस्तान में हुए कई हमलों की जिम्मेदारी ली और कहा कि जब तक सरकार अमेरिकी सैनिकों को अपनी धरती से रवाना नहीं करेगी, हमले जारी रहेंगे। बकौल हकीमुल्लाह, हम सैनिक, पुलिस और नागरिक सेना से लड़ रहे हैं, क्योंकि वे अमेरिकी आदेश पर काम कर रहे हैं। यदि वे अमेरिकी आदेश का अनुपालन बंद कर दें, तो हम हमले भी रोक देंगे। हकीमुल्लाह ने यह भी साफ किया कि उसका मकसद पाकिस्तान को एक इस्लामिक राष्ट्र बनाना है और इसमें कामयाबी मिलने के बाद उसका अगला निशाना भारत होगा।
हकीमुल्लाह सीधे-सीधे पाकिस्तान के पीपीपी और एएनपी नेताओं को मारने की धमकी देता है, क्योंकि उसके अनुसार पीपीपी और एएनपी के नेताओं ने ही सेना को तालिबानियों के खिलाफ हमले का आदेश दिया। उसने पाकिस्तान सरकार को अमेरिकी समर्थक नीतियां बदलने के लिए अल्टीमेटम दिया और धमकी दी कि यदि वह ऐसा नहीं करती है, तो आने वाले दिनों में तालिबान पेशावर सहित पाकिस्तान के अन्य शहरों पर कब्जा कर लेगा। उसका दावा है कि बैतुल्ला की ‘शहादतज् के बाद उसका संगठन अधिक मजबूत हुआ है और उसके लड़ाके ‘एकजुटज् होकर अमेरिकी और पाकिस्तानी सेना का मुकाबला कर रहे हैं।

सोमवार, 12 अक्टूबर 2009

बड़े हमले की तैयारी में सरकार

नक्सलवाद को समझने के लिए इसके इतिहास को समझना जरूरी है। यह जानना जरूरी है कि आखिर किन कारणों से यह शुरू हुआ और निरंतर फैलता ही जा रहा है। जब तक यह नहीं समझा जाएगा, इसे खत्म करना मुश्किल है। सरकार भले ही हवाई हमले तक की योजना बना ले, लेकिन इस समस्या से नहीं निपटा जा सकता।
हमारे देश में नक्सलवादी आंदोलन की शुरुआत 1967 में पश्चिम बंगाल के नक्सलबाड़ी से हुई थी। आर्थिक विषमता, दमन व व्यवस्था के खिलाफ असंतोष ने लोगों को हथियार उठाने के लिए मजबूर किया। तब यह पूरे देश में चर्चा का विषय बना और इसने पश्चिम बंगाल व आंध्र प्रदेश को बुरी तरह प्रभावित किया। लोगों को पहली बार सामाज में गहराई से व्याप्त विषमता की सच्चाई मालूम हुई। चारु मजूमदार, कानू संन्याल के नेतृत्व में शुरू हुए नक्सलबाड़ी के इस आंदोलन ने देश के सामाजिक ताने-बाने को गहरे रूप में प्रभावित किया।
आखिर सरकार ने भी माना कि दूर-दराज के पिछड़े व जनजातीय इलाकों में विकास की जरूरत है। इसलिए बार-बार उन क्षेत्रों में भूमि सुधार सहित अन्य विकासपरक चीजें लागू करने की बात कही गई। लेकिन वास्तव में कभी इन्हें ठोस रूप नहीं दिया गया। फिर बाद की सरकारों ने इसे एक सामाजिक समस्या तो माना, लेकिन यह भी कहा कि इसके हिंसक स्वरूप से निटने के लिए दमन जरूरी है। पर वास्तव में इनका जोर दमन पर अधिक होता है।
मुङो लगता है कि जिन कारणों से 1967 में यह आंदोलन नक्सलबाड़ी में शुरू हुआ था, आज वे अधिक तीव्रता से मौजूद हैं। ऐसे में नक्सली समस्या का बढ़ना स्वाभाविक है। लेकिन यह भी सच है कि आज सरकार इसे जिस गंभीरता व व्यापकता के साथ प्रचारित-प्रसारित कर रही है, वास्तव में यह वैसा नहीं है। दरअसल, सारा खेल कॉरपोरेट घरानों को सुविधाएं और उन्हें यहां की संपदा लूटने का हक देने का है। उनके हितों को सुरक्षित रखने के लिए सरकार इस समस्या को बढ़ा-चढ़ाकर पेश कर रही है, ताकि दमन का रास्ता साफ हो सके और कोई उसकी कार्रवाई पर उंगली न उठा सके।
दरअसल, 1990 में जो आर्थिक नीति शुरू की गई, उसके अनुसार सरकार का काम वास्तव में कॉरपोरेट घरानों को सुविधाएं मुहैया करानाभर रह गया है। इस नीति के तहत सरकार की तकरीबन साढ़े पांच सौ विशेष आर्थिक क्षेत्र (एसईजेड) बनाने की योजना है। इसके लिए जगह-जगह किसानों से जबरन या औने-पौने दाम में जमीन ली जा रही है। जाहिर तौर पर किसान, जिनकी रोजी-रोटी का एकमात्र जरिया भूमि व खेती ही है, इसका विरोध कर रहे हैं। अभी सरकार ने इसकी शुरुआतभर की है, लेकिन हर जगह उसे तीव्र विरोध ङोलना पड़ा। उसे मालूम है कि जसे-जसे इस दिशा में वह आगे बढ़ेगी, विरोध तीव्र होता जाएगा। इसलिए पहले से ही उसने नक्सल समस्या को बढ़ा-चढ़ाकर पेश करना शुरू कर दिया है।
प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह इसे देश की आंतरिक सुरक्षा के लिए सबसे बड़ा खतरा बताते हैं, तो गृह मंत्री पी चिदंबरम कहते हैं कि नक्सल समस्या 20 राज्यों में फैल चुकी है। इसलिए इससे निपटने के लिए ठोस उपाय करने होंगे। यहां तक कि हवाई हमले से भी परहेज नहीं। मैं समझता हूं कि नक्सलियों से निपटने के लिए हवाई हमले की बात कहकर सरकार ने दुनिया के सबसे बड़े लोकतांत्रिक देश होने का दावा करने का हक खो दिया है। आखिर नक्सली कोई आतंकवादी नहीं, वे इसी देश का हिस्सा हैं, जो व्यवस्था से खिन्न हैं, अपने साथ हो रहे अन्याय से नाराज हैं। लेकिन इन सबमें दु:खद पहलू यह है कि आज मीडिया और समाज का बुद्धिजीवी तबका भी सरकार की सुर में सुर मिला रहा है, जबकि आपातकाल की बात हो या कोई अन्य आंदोलन, यह वर्ग हमेशा आंदोलनकारियों का साथ देता रहा है।
नक्सल समस्या की व्यापकता को लेकर खुद सरकारी आंकड़े उसकी पोल खोलते हैं। जरा पीछे जाएं, तो 1998 में तत्कालीन गृह मंत्री लाल कृष्ण आडवाणी ने नक्सल समस्या से निपटने पर विचार-विमर्श के लिए हैदराबाद में चार राज्यों के मुख्यमंत्रियों और पुलिस महानिरीक्षकों की बैठक बुलाई थी। इसके बाद 2005 और 2006 में तत्कालीन गृह मंत्री शिवराज पाटिल ने नक्सल प्रभावित राज्यों की बैठक बुलाई तो यह संख्या बढ़कर क्रमश: 13-14 हो गई। अब मौजूदा गृह मंत्री नक्सल प्रभावित राज्यों की संख्या 20 बता रहे हैं। यदि ये आंकड़े सच हैं तो वे करोड़ों रुपए कहां गए, जो सरकार ने इस समस्या से निपटने के लिए खर्च किए।
सरकार से यह भी पूछा जाना चाहिए कि यदि 20 राज्य नक्सल प्रभावित हैं, तो कितने राज्यों में वह सही तरीके से शासन कर रही है? उत्तर-पूर्व के सात राज्य पहले से ही अशांत हैं। यहां सरकार आर्म फोर्सेस स्पेशल पॉवर एक्ट के तहत शासन कर रही है। खासतौर से मणिपुर में इसके खिलाफ जबरदस्त जनाक्रोश है। इसी तरह जम्मू-कश्मीर आजादी के बाद से ही अशांत है। इस तरह गृह मंत्री के अनुसार जो 20 राज्य नक्सल प्रभावित हैं, उनमें उत्तर-पूर्व के सात राज्य और जम्मू कश्मीर को भी जोड़ दिया जाए, तो संख्या 28 राज्यों की हो जाती है। तो क्या यह माना जाए कि देश के सभी 28 राज्यों में जनता सरकार से नाखुश है, नाराज है। यदि ऐसा है, तो आखिर किस हक से सरकार शासन कर रही है? साफ है कि सरकार ने शासन का नैतिक अधिकार खो दिया है।
सरकार जो आंकड़े पेश कर रही है, यदि वैसा है, तो यह वास्तव में चिंताजनक है। लेकिन क्या वास्तव में ऐसा है? इसका सीधा जवाब है, नहीं। यहां यह बात भी गौर करने लायक है कि जिन क्षेत्रों को नक्सल प्रभावित बताया जा रहा है, वे खनिज संपदा से भरपूर हैं। लेकिन वहां के आम लोगों को उसका कोई फायदा आज तक नहीं मिला, बल्कि वहां के प्राकृतिक संसाधनों का सरकार ने अब तक अपने मतलब के लिए इस्तेमाल किया। आगे भी वह यही करने जा रही है। ऐसे में स्थानीय लोगों के मन में असंतोष पनपना स्वाभाविक है, जो एक हद के बाद यह हिंसक हो जाता है।
वास्तव में सरकार जानती है कि जब बाजारी शक्तियां महानगरों से शहरों, कस्बों और गांवों की ओर रुख करेगी, तो आम आदमी की तबाही में इजाफा होगा। स्थानीय शिल्पियों, कुटी उद्योगों, खुदरा व्यापारियों के व्यवसाय पर इसका सीधा असर होगा और इससे जो असंतोष व तनाव पैदा होगा, उससे निपटने के लिए सरकार को पुलिस व सेना की मदद लेनी होगी। ऐसे में सरकार यह तो नहीं कहेगी कि वह उद्योगपतियों को सुविधाएं मुहैया कराने या उनकी मदद के लिए जा रही है। वह तो यही कहेगी कि हम नक्सलियों से निपटने जा रहे हैं। इसलिए अभी से वह नक्सल समस्या को बढ़ा-चढ़ाकर पेश कर रही है।
जहां तक माओवादियों द्वारा अपनी मांगें रखने के लिए हथियार उठाने का सवाल है तो विरोध का हर शांतिपूर्ण तरीका विफल हो जाने के बाद ही उन्होंने हथियार उठाया है। वरना जिन लोगों ने हथियार उठाए हैं, वे आदिवासी है, जो अमूमन हथियार उठाने का स्वभाव नहीं रखते। दरअसल, जब दमन होता है, तो प्रतिरोध भी होता है। उस प्रतिरोध को दबाने के लिए सरकार फिर दमन का रास्ता अपनाती है, जिसके बाद प्रतिरोध और उग्र हो जाता है। इस तरह यह एक दुश्चक्र है, जिसमें सरकार खुद ही माओवादी पैदा करती है। इस तरह सरकार अपनी ही नीतियों से देश को गृह युद्ध की तरफ ले जा रही है।
सरकार का यह दावा भी गलत है कि स्थानीय लोगों से नक्सल आंदोलनकारियों को मदद नहीं मिल रही। सच्चाई तो यह है कि स्थानीय मदद के बगैर कोई भी आंदोलन इस हद तक सफल नहीं हो सकता। सरकार ने इस आंदोलन को खत्म करने के लिए ‘मछली को पानी से निकाल देनेज् का अमेरिकी फॉर्मूला अपनाया है और उसी के तहत ऐसा कह रही है। वह इस बात को प्रचारित कर रही है कि आम लोगों की मदद इन्हें नहीं मिल रही और तभी छत्तीसगढ़ में लोगों ने इनके खिलाफ हथियार उठा लिया। सरकार सलवा जुडूम का हवाला देती है, लेकिन यह स्थानीय जनता को आपस में लड़ाने का सरकारी फॉर्मूला है और कुछ नहीं। सलवा जुडूम पूरी तरह विफल हो चुका है।
जहां तक नक्सलियों के इस आंदोलन में आम लोगों के प्रभावित होने का सवाल है, तो इसे पूरी तरह खारिज नहीं किया जा सकता। लेकिन यह भी सच है कि किसी भी आंदोलन में कुछ हद तक आम लोग तो प्रभावित होते ही हैं। पर आंदोलनकारियों का यह मकसद नहीं होता। रांची में एक इंस्पेक्टर की जिस तरीके से हत्या की गई, उसे कतई जायज नहीं ठहराया जा सकता। लेकिन इसे लेकर माओवादियों का कोई स्टैंड फिलहाल सामने नहीं आया है, इसलिए इस बारे में कुछ भी कहना जल्दबाजी होगी।
हां, यह सच है कि चुनाव प्रक्रिया में माओवादियों की कोई आस्था नहीं है। लेकिन यह कोई बुरी चीज नहीं है। नेपाल में माओवादियों ने लंबे समय तक सशस्त्र संघर्ष के बाद चुनाव प्रक्रिया में शिरकत की और उसमें भी विजयी रहे। साफ है कि चुनाव में जीतकर उन्होंने अंतर्राष्ट्रीय सरकारों के इस दावे को गलत साबित किया कि उन्हें आम लोगों का समर्थन नहीं है। भारत में भी यह चीज हो सकती है। यहां के नक्सलवादी भी चुनाव प्रक्रिया में शामिल हो सकते हैं। लेकिन कब और कैसे इस बारे में कुछ कहा नहीं जा सकता।
जहां तक समस्या के समाधान की बात है, तो इसका एकमात्र तरीका माओवादियों से बातचीत है। उनसे बातचीत कर, उनकी समस्याओं को जानकर और उसका समाधान कर ही इससे निजात पाई जा सकती है। जब तक सरकार माओवादी आंदोलन, जो वास्तव में जवाबी हिंसा है और आतंवाद में फर्क नहीं करेगी, इस समस्या का समाधान मुश्किल है।

आनंदस्वरूप वर्मा से बातचीत पर आधारित

शुक्रवार, 2 अक्टूबर 2009

यह कैसा हक?

रविवार का दिन था। घर से निकली थी एक दोस्त के यहां जाने के लिए। काफी दिनों से सोच रही थी। आज का ही दिन मिल पाया। सुबह जल्दी-जल्दी करने के बाद भी देर हो ही गई। खर, जल्दी-जल्द बस स्टॉप पहुंची। इंतजार कर रही थी बस का। करीब 15-20 मिनट के इंतजार के बाद वह बस आई, जिसमें मुङो जाना था। बस रुकी और मैं चढ़ गई। बड़ा सुकून मिला यह देखकर कि महिलाओं के लिए आरक्षित कुछ सीटें खाली पड़ी थीं। आखिर लंबा सफर जो तय करना था।

बस चल पड़ी। दो-तीन स्टॉप बाद बस में एक बुजुर्ग चढ़े। उम्र 60 के पार होगी। वह मेरी सीट के आधे हिस्से पर बैठ गए, क्योंकि तब वही एक सीट खाली पड़ी थी। मुङो अच्छा लगा, यह देखकर कि बाबा को सीट मिल गई। बस कुछ ही दूर और चल पाई होगी। करीब दो स्टॉप आगे। वहां दो लड़की और एक लड़का चढ़े बस में। उम्र यही कोई 18-19 साल होगी। वे वहीं आकर खड़े हो गए, जहां हम बैठे थे। शायद अपेक्षा कर रहे थे कि बाबा महिलाओं के लिए आरक्षित जिस सीट पर बैठे थे, उसे खाली कर दें। मैंने बारी-बारी से दोनों को देखा। बाबा को भी, लड़के-लड़कियों को भी। बाबा कुछ कसमसाए। शायद यह सोच रहे थे कि ‘उनके कहने से पहले ही सीट खाली कर दूं या बैठा रहूं!ज् तभी लड़के ने दबी जुबान से कहा, ‘महिलाओं की सीट है। दे दीजिए प्लीज।ज् पलभर की देरी किए बगैर बाबा ने सीट छोड़ दी। मुङो बुरा लगा। मैं काफी देर तक उन लड़के-लड़कियों की तरफ देखती रही। सोचा जसे ही मेरी तरफ देखेंगे, पूछूंगी, ‘बाबा को खड़ा करवाना क्या इतना जरूरी था?ज् लेकिन उन्होंने देखा नहीं और मैंने पूछा नहीं।

इसके बाद चलने लगा मेरे मन में द्वंद्व। ‘क्या मैं अपनी सीट दे दूं? लेकिन अगर किसी और महिला या लड़की ने उन्हें यह कहकर उठा दिया कि यह महिलाओं के लिए आरक्षित सीट है, तो? फिर तो सीट न मेरी रहेगी, न उनकी। इससे तो बेहतर है कि मैं ही बैठी रहूं।ज् यह भी खयाल आया कि ‘आखिर मैं क्यों इतना सोच रही हूं? मैंने तो उनसे सीट खाली नहीं करवाई।ज् इसी उधेड़बुन में चार स्टॉप और निकल गए। पर द्वंद्व खत्म नहीं हुआ। आखिर मुझसे नहीं रहा गया। पांचवां स्टॉप आते-आते मैंने उन्हें अपनी सीट देने की पेशकश की। कहा, ‘आप यहां बैठ जाइये।ज् लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी। उस चार स्टॉप के बाद आने वाला पांचवां स्टॉप उनका गंतव्य था। उन्होंने बड़ी शालीनता से कहा, ‘कोई बात नहीं। बैठी रहो। मेरा स्टॉप आ गया। मुङो उतरना है।ज्

उन्होंने इतना कहा और बढ़ने लगे बस के अगले गेट की तरफ, उतरने के लिए। पर मुङो छोड़ गए शर्मिदगी, आत्मग्लानि और अपराधबोध के साथ। पलभर के लिए मुङो लगा जसे किसी ने मुझपर घड़ों पानी डज्ञल दिया हो। उस बुजुर्ग व्यक्ति ने कुछ न कहकर भी बहुत कुछ कह दिया था। मुङो तत्काल सबक मिल गया था और शायद आसपास बैठे व खड़े लोगों ने भी कुछ तो महसूस किया ही होगा। सबक लिया या नहीं, मुङो नहीं मालूम।

लेकिन इसके बाद भी अपराधबोध और आत्मग्लानि ने मेरा पीछा नहीं छोड़ा। रास्तेभर वही खयाल मन में उमड़ते-घुमड़ते रहे। दोस्त के घर से लौटने के बाद भी यही हाल था। मन में बार-बार यही खयाल आता रहा। खुद को कोसती रही यह सोच-सोच कर कि ‘आखिर क्यों इतनी देर कर दी मैंने? क्यों नहीं उनके उठते ही अपनी सीट दे दी उन्हें? क्यों सोचती रही इतनी देर तक?ज् और यह भी कि ‘जिसके लिए अब मुङो ग्लानि हो रही है, उसकी जिम्मेदार तो मैं भी उतनी ही हूं। आखिर मैं उन लड़के-लड़कियों को बोल सकती थी। क्यों इंतजार करती रही कि वे मेरी तरफ देखेंगे, तभी कुछ कहूंगी। सबसे बड़ी गलती तो यह हुई कि उनके उठते ही मैंने उन्हें अपनी सीट नहीं दी बैठने के लिए, जबकि उनकी उम्र को देखते हुए उसकी जरूरत उन्हें मुझसे कहीं अधिक थी।ज्

यह सोचकर मैंने दोस्तों को बताया, कई दूसरे लोगों से भी इस बारे में बात की कि शायद दिल का बोझ कुछ हल्का हो जाए। सभी ने यही कहा कि ‘दिल्ली की बसों में तो यह आम नजारा है। आए दिन ऐसे वाकये होते ही रहते हैं। तुम बस से अक्सर छोटी दूरी की यात्रा करती हो, इसलिए कभी देखा नहीं होगा। हम तो अक्सर देखते हैं।ज् उनके ये सब कहने का असर था या वक्त की धूल, मैं नहीं जानती। कुछ दिनों बाद उस घटना की याद मेरे जेहन में धुंधली पड़ने लगी। लेकिन इन सवालों के जवाब की तलाश मुङो आज भी है कि ‘आखिर क्या हो गया है हमारी युवा पीढ़ी (निस्संदेह इसमें लड़कियां भी आती हैं) को? अपने बुजुर्गो के प्रति इतनी संवेदनहीनता क्यों?ज् और यह भी कि ‘क्या बस में महिलाओं के लिए सीटें आरक्षित करवाने का यह मतलब है कि स्कूल-कॉलेज की लड़कियों को भी पुरुष बुजुर्गो से सीट छीनने का हक मिल गया? अगर हां, तो यह कैसा हक है?ज्