सोमवार, 29 मार्च 2010

पानी की करुण कहानी


जल संकट दुनिया भर की समस्या है, लेकिन हमारे यहां यह अभाव है। हर स्तर पर पानी के साथ खिलवाड़ हो रहा है। नदियां सूख गईं या प्रदूषित हैं। तालाब, कुएं गायब हो गए। भूजल नीचे जा रहा है। प्यास बढ़ रही है, पानी खत्म हो रहा है। आजादी के बाद हमने सोचा जरूर, किया कुछ नहीं। दोषपूर्ण सरकारी परियोनाओं ने पानी के स्रोत को बिगाड़ दिया। बढ़ती आबादी के साथ भविष्य के लिए कोई कारगर योजना नहीं बनाई। समाज भी बेखबर और लापरवाह रहा। अपने जीवन के मूल तत्वों से उसकी इस बेरुखी का नतीजा है जल संकट। बल्कि हम जिस पर्यावरण विनाश से जूझ रहे हैं, उसमें भी इसका कम दोष नहीं है। लालच प्रकृति के अथाह खजाने को खाली कर रहा है। आज जल दिवस पर हमें इन खतरों के प्रति सचेत होकर इनसे लड़ने और सबक लेने का संकल्प करना चाहिए। हमारा उद्देश्य देश-समाज को हरा-भरा रखने का होना चाहिए और इसके लिए हरित अभियान छेड़ देना चाहिए।

इन दिनों पूरी दुनिया जल संकट से जूझ रही है। भारत भी इस समस्या से अछूता नहीं है, बल्कि यहां पानी का संकट दूसरे देशों के मुकाबले कहीं अधिक है। भूजल स्तर निरंतर नीचे गिर रहा है। कहीं-कहीं तो भूजल भंडार बिल्कुल खाली हो गया है। नदियों का पानी पीने लायक नहीं बचा। कहीं नदियां सूख गईं तो कहीं बुरी तरह प्रदूषित हैं।
आजादी के पिछले छह दशक में यह संकट कई गुना बढ़ा है। आजादी के समय जहां केवल 232 गांव ऐसे थे, जहां पीने का पानी नहीं था, वहीं अब ऐसे गांवों की संख्या सवा दो लाख हो गई है। गांव, शहर हर जगह लोग पेयजल संकट से जूझ रहे हैं। शहरों में भी विभिन्न स्थानों पर टैंकरों से पानी पहुंचाया जा रहा है। लोग बाल्टियां, डिब्बे आदि लेकर टैंकरों का बेसब्री से इंतजार करते हैं और उसे देखते ही टूट पड़ते हैं। ऐसे में कौन-कब-किस पर गिर पड़े और वहां लड़ाई-झगड़े की स्थिति पैदा हो जाए कोई नहीं कह सकता।
दरअसल, भूजल के भंडारों को पुनजीर्वित करने का काम नदियां करती हैं, लेकिन आज नदियां ही सूख गई हैं। कई जगह नदियां नालों में तब्दील हो गई हैं। नदियों में प्रदूषण का स्तर इतना बढ़ गया है कि भूजल भंडार भी इसकी चपेट में आ गए हैं। इसलिए जल जनित बीमारियों की संख्या भी बढ़ी है। यूएन की एक रिपोर्ट के अनुसार भारत में करीब 21 प्रतिशत बीमारियां जल जनित होती हैं।
पानी के संकट को देखते हुए यदि ऐसा कहा जा रहा है कि तीसरा विश्वयुद्ध पानी के लिए ही होगा तो यह गलत नहीं है। बल्कि मुङो तो लगता है पानी के लिए झगड़े की शुरुआत हो चुकी है। गली-मोहल्लों में पानी के लिए टैंकर के इंतजार में खड़े लोगों में तू-तू मैं-मैं आम चीज है। राजस्थान में पानी की लड़ाई में 15 लोग जान गंवा चुके हैं। ऐसी स्थिति दुनिया के अन्य हिस्सों में भी है।
पानी के इस बढ़ते संकट के तीन प्रमुख कारण हैं। पहला तो यह कि विकास के नाम पर सरकारों ने पानी की जो परियोजनाएं चलाईं, उससे उसका मूल स्रोत बिगड़ा। दूर-दूर से पानी लाकर शहरों को देने और बांध बनाने की जो नीति सरकार के अपनाई, उससे पानी का विकें्िरत प्रबंधन समाप्त हो गया और इसका स्थान कें्रीकृत प्रबंधन ने ले लिया। ऐसा करके सरकार ने एक तरह से समाज को इसकी जिम्मेदारी से मुक्त कर दिया, जबकि पानी का बेहतर प्रबंधन सामुदायिक तरीके से ही हो सकता है। पहले ऐसा होता भी था। तब लोग जल संचयन के जोहड़ों का निर्माण करते थे। लेकिन जबसे सरकार ने इसका प्रबंधन अपने जिम्मे लिया, जोहड़ उपेक्षित रह गए और अंतत: सूख गए।
दूसरा महत्वपूर्ण कारण यह है कि आजादी के बाद हमने पानी के पर्यावरणीय प्रवाह का हिसाब-किताब नहीं रखा। सरकार ने तय तो यह कर रखा है कि लोगों तक पीने का पानी पहुंचाना उसकी प्राथमिकता होगी, लेकिन पानी पहुंचाए जाते हैं उद्योगों को, खेती को। औद्योगिक जरूरतों के साथ-साथ कृषि कार्य के लिए भी भूमिगत जल का ही दोहन होता है।
बढ़ते जल संकट का तीसरा महत्वपूर्ण कारण लोगों द्वारा इसका अनुशासित उपयोग नहीं करना है। अक्सर लोग नलके खुला छोड़ ब्रश करना शुरू कर देते हैं। नहाने-कपड़े धोने के लिए बाल्टियों पानी का इस्तेमाल करते हैं। रास्तों और सार्वजनिक स्थलों पर लोगों के लिए लगाए गए नलके अक्सर खुले पाए जाते हैं। बहुत कम लोग आगे बढ़कर उसे बंद करने की जहमत उठाते हैं।
यदि यही स्थिति जारी रही और यूं ही भूमिगत जल का दोहन होता रहा तो आने वाले दिनों में स्थिति और बिगड़ेगी। इसलिए हमें अभी से इसके संरक्षण के उपाय सोचने होंगे। सबसे पहले तो हमें नदी और सीवर को अलग कर देने की जरूरत है। कई जगह सीवरों को नदियों में मिला दिया गया है, जिससे प्रदूषण का स्तर बढ़ा है। यमुना इसका उदाहरण है। इसके अतिरिक्त हमारे यहां सबसे अधिक भूमिगत जल का दोहन कृषि कार्यो के लिए होता है। इसे नियंत्रित करने की जरूरत है। कृषि एवं उद्योगों के लिए सीवरों के पानी का इस्तेमाल होना चाहिए, न कि भूमिगत जल का। भूमिगत जल का उपयोग केवल पीने के पानी के लिए किया जाना चाहिए।
नदियों के किनारे सीमेंट और कंक्रीट के जंगल बनाने के बजाय हमें ऐसे पेड़-पौधे लगाने चाहिए, जिससे भूमि का कटाव रुके। साथ ही लोगों को पानी के अनुशासनात्मक इस्तेमाल के लिए प्रेरित करना होगा। इसके लिए नियम-कायदे-कानून बनाने की भी जरूरत है। इसके अलावा सरकार ने पानी के प्रबंधन की जो कें्रीकृत नीति शुरू की है, उसे बदलने की जरूरत है। पानी के प्रबंधन के लिए सामुदायिक विकें्रीकरण को बढ़ावा देना होगा और जनमानस को वर्षा जल संचयन से जोड़ना होगा।

(राजें्र सिंह से बातचीत पर आधारित)

बांड बाला बड़ी बात


फ्रीडा पिंटो की अभी फिल्मी उम्र ही क्या है! बस एक मशहूर फिल्म। लेकिन वे अहर्निश चालू रहने वाले अफवाह कारखाने में भरपूर जगह पा गई हैं। पहले देव पटले के साथ रोमांस के चर्चे और अब जेम्स बांड फिल्मों के ऑफर की बात। सब कुछ इस तरह बताया गया कि लोग हैरत खा गए। फीस भी पच्चीस करोड़ रुपए। फिर आया सच कि ऐसा कोई करार नहीं। अखबारों ने भी लिखा, यह काई कम बड़ी बात नहीं कि बांड फिल्म के लिए नाम चला। यह वैसे ही कि आस्कर भले न मिले उसके लिए नामांकित होना ही बड़ी बात। आगे-आगे देखते रहिए फ्रीडा को।

फ्रीडा पिंटो, बॉलीवुड की उभरती अदाकारा। एक ऐसी अभिनेत्री, जिन्होंने अपनी पहली ही फिल्म से अंतर्राष्ट्रीय ख्याति अर्जित की। बहुत कम अभिनेता-अभिनेत्रियों को अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर चर्चित होने का ऐसा मौका मिला। बचपन से ही अभिनेत्री बनने का सपना देखने वाली फ्रीडा ने भी शायद ही अपने करियर की ऐसी शानदार शुरुआत की कल्पना की हो। लेकिन एक बार जब कामयाबी मिली तो फिर अभी उनके पीछे मुड़कर देखने का सवाल ही नहीं है।
हाल ही में फ्रीडा का नाम ‘बांड गर्लज् के रूप में सामने आया। किसी भी अदाकारा का सपना होता है यह किरदार निभाना। चर्चा जोरों पर थी कि फ्रीडा ने इस किरदार के लिए हामी भर दी है। पर्दे पर वे हॉलीवुड के प्रसिद्ध अभिनेता डेनियर क्रेग, जो लाखों हसीनाओं के दिल की धड़कन हैं, के साथ रोमांस करती नजर आएंगी। यह भी कहा गया कि उहोंने इसके लिए करोड़ों रुपए का करार किया है। लेकिन फ्रीडा के प्रवक्ता ने स्पष्ट किया कि उन्होंने ऐसा कोई करार नहीं किया है। वे क्रेग के साथ ‘बांड गर्लज् के रूप में कोई किरदार नहीं करने जा रही हैं। पर साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि ‘बांड गर्लज् के रूप में चर्चा पाना भी किसी कामयाबी से कम नहीं है। वह भी ऐसी अभिनेत्री के लिए जिसकी उम्र महज 26 साल हो और जिसने अपने फिल्मी करियर की अभी-अभी शुरुआत की हो।
सच है, यह कामयाबी सभी अभिनेत्रियों को नहीं मिलती। बॉलीवुड से यह कामयाबी अब तक किसी अभिनेत्री को नहीं मिली है। अगर ‘बांड गर्लज् के रूप में फ्रीडा के होने की चर्चा सच होती तो यह कामयाबी पाने वाली वे बॉलीवुड की पहली अभिनेत्री होतीं। इससे पहले ‘बांड गर्लज् के रूप में पूर्व मिस वर्ल्ड और बॉलीवुड की सफल अभिनेत्री ऐश्वर्य राय का नाम सामने आया था। लेकिन वह भी मात्र अफवाह साबित हुई।
बतौर अभिनेत्री ‘स्लमडॉग मिलिनियरज् फ्रीडा की पहली फिल्म थी, जिसमें उन्होंने झुग्गी में रहने वाले और बाद में एक टीवी शो के जरिये करोड़ों रुपए जीतने वाले जमाल की प्रेमिका लतिका का किरदार निभाया था। यह फिल्म उनके करियर के लिए मील का पत्थर साबित हुई। डेनी बॉयल निर्देशित इस फिल्म ने ऑस्कर, ग्लोडन ग्लोब, बाफ्टा जसे कई अंतर्राष्ट्रीय फिल्म समारोहों में अवार्ड जीते। फ्रीडा हर समारोह में मौजूद रहीं और अपनी प्रभावपूर्ण उपस्थिति दर्ज कराती रहीं।
इस फिल्म में बेहतरीन अदाकारी के लिए उन्हें स्क्रीन एक्टर्स गिल्ड अवार्ड मिला। पाम स्प्रिंग्स इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल में उन्होंने सफल प्रदर्शन का अवार्ड जीता। बाफ्टा अवार्ड के लिए उन्हें सर्वश्रेष्ठ सहायक अभिनेत्री के रूप में नामांकित किया गया। हालांकि वे यह अवार्ड जीत नहीं पाईं, लेकिन शुरुआती फिल्म से ही नामांकन की कामयाबी भी कम करके नहीं आंकी जा सकती। एमटीवी ने भी उन्हें कई श्रेणियों में अवार्ड के लिए नामांकित किया।
एक बार जब कामयाबी मिली उसका सिलसिला आज तक जारी है। आज उनकी झोली में कई फिल्में हैं, जिनमें से ज्यादातर अंतर्राष्ट्रीय स्तर की हैं। हाल ही में उन्होंने हॉलीवुड के ख्याति प्राप्त निर्माता-निर्देशक जूलियन श्नाबेल की फिल्म ‘मिरालज् की शूटिंग पूरी है। वूडी एलन की फिल्म ‘यू विल मीट अ टॉल डार्क स्ट्रेंजरज् में भी वे कई नामचीन हस्तियों के साथ काम कर रही हैं, जिसमें बॉलीवुड के अभिनेता अनुपम खेर भी हैं।
अंतर्राष्ट्रीय स्तर की कई पत्र-पत्रिकाओं ने बॉलीवुड की इस अदाकारा को सबसे खूबसूरत और स्टाइलिस्ट अभिनेत्री बताया है। आस्कमेन डॉट कॉम ने उन्हें पुरुषों की पसंदीदा महिला बताया है, तो डेली टेलीग्राफ के अनुसार इस समय वे बॉलीवुड में सबसे अधिक मेहनताना पाने वाली अभिनेत्री हैं। उनके ड्रेसिंग सेंस की भी खूब तारीफ हुई।
‘स्लमडॉग मिलिनियरज् ने फ्रीडा को व्यावसायिक कामयाबी दी तो उनकी निजी जिंदगी को भी प्रभावित किया। पिंटो ने, जो फिल्म साइन करने से पहले ही अपने बचपन के दोस्त रोहन अंटाओ से सगाई कर चुकी थीं, फिल्म की कामयाबी के बाद करियर का हवाला देकर सगाई तोड़ दी। इस बीच उन्हें कई जगह फिल्म के अभिनेता देव पटेल के साथ देखा गया। चर्चा जोरों पर रही कि देव के साथ उनका रोमांस चल रहा है।
अट्ठारह अक्टूबर, 1984 को मुंबई में एक मंगलोरियन कैथोलिक परिवार में जन्मी फ्रीडा पांच साल की उम्र से ही फिल्म अभिनेत्री बनने का सपना देखा करती थीं, जबकि इस उम्र में बच्चे आम तौर पर खेलकूद में मशरूफ रहते हैं। 1994 में सुष्मिता सेन के मिस यूनीवर्स बनने की घटना ने फ्रीडा के जीवन और सपनों को गहरे ढंग से प्रभावित किया। तब उनकी उम्र केवल दस साल थी। हालांकि घर का माहौल फिल्मी बिल्कुल नहीं था। मां गोरेगांव के एक स्कूल में प्रिंसिपल थीं तो पिता बैंक में मैनेजर और बहन एक प्रसिद्ध समचार चैनल में एसोसिएट प्रोड्यूसर। लेकिन फ्रीडा तो दिन-रात फिल्मों के सपने देखती थी। मलाड के सेंट जोसेफ स्कूल से शुरुआती शिक्षा हासिल करने के बाद उन्होंने मुंबई के सेंट जेवियर्स कॉलेज से अंग्रेजी साहित्य में बीए की डिग्री ली। इस दौरान वे रंगमंच से भी जुड़ी रहीं और कई नाटकों में अभिनय किया। वे बेहतरीन नृत्यांगना भी हैं। खासकर सालसा नृत्य में उन्हें महारत हासिल है।
फ्रीडा ने अपने करियर की शुरुआत मॉडल के रूप में की। कॉलेज खत्म होने के बाद वे प्रसिद्ध मॉडलिंग एजेंसी ‘एलीट मॉडल मैनेजमेंटज् से जुड़ीं और करीब ढाई साल तक उसके लिए मॉडलिंग की। ‘स्लमडॉग मिलिनियरज् साइन करने से पहले उन्होंने टेलीविजन और पिंट्र मीडिया के लिए कई उत्पादों की मॉडलिंग की। उनका मॉडलिंग करियर करीब चार साल का रहा, जिस दौरान उन्होंने कई शो में रैंप पर चहलकदमी की और कई पत्रिकाओं के कवर पेज पर छपीं। बेरी जॉन के अंधेरी स्थित एक्टिंग स्टूडियो से उन्होंने अभिनय की तालीम भी ली, जहां उन्हें स्वयं प्रसिद्ध थिएटर निर्देशक बेरी जॉन ने प्रशिक्षित किया। यह अभिनय की दुनिया में उनके संघर्ष के दिन थे। तभी डेनी बॉयल ने अपनी फिल्म ‘स्लमडॉग मिलेनियरज् के लिए ऑडीशन टेस्ट लेने की घोषणा की। फ्रीडा ने भी किस्मत आजमाई और लगभग छह महीने के ऑडीशन के बाद वे चुन ली गईं, लतिका के किरदार के लिए।

रविवार, 21 मार्च 2010

वही कसक, छह दशक


अल्पसंख्यकों के साथ दलित राजनीति भी हमारी चुनाव रणनीति का अभिन्न हिस्सा। दलितों समेत कमजोर/वंचितों के लिए कई कदम उठाए गए। उनके नेताओं को सत्ता भी मिली, लेकिन संतोष करने लायक कुछ नहीं बदला। दलित आज भी वंचित और दमित हैं।
बाबा साहब भीम राव अम्बेडकर आजाद भारत में दलितों के लिए भी वही स्थान चाहते थे, जो उच्च जाति को बहुत पहले से प्राप्त था। वे जानते थे कि सदियों से पिछड़े व शोषित दलित आजाद भारत में और हाशिये पर जा सकते हैं। उनका यह भी मानना था कि जब तक दलितों को राजनीतिक सत्ता नहीं मिलती, उनका उत्थान संभव नहीं है। इसलिए उन्होंने संविधान में दलितों के लिए आरक्षण का प्रावधान किया। हालांकि पहले यह केवल दस साल के लिए तय किया गया और लक्ष्य रखा गया कि इन दस सालों में दलित राजनीतिक ताकत हासिल कर लेंगे। लेकिन बाबा साहब का यह सपना आजादी के साठ दशक बाद भी पूरा नहीं हुआ और आरक्षण का प्रावधान हर दस साल पर बढ़ता रहा।
हालांकि इस बीच मायावती, राम विलास पासवान जसे कुछ दलित नेता उभरकर सामने आए और उन्होंने सत्ता भी हासिल की, लेकिन दलितों की स्थिति में जिस सुधार की उम्मीद थी, वह नहीं हुई। आजादी के इन साठ सालों में देश के विकास से जितना फायदा समाज की अगड़ी जातियों को हुआ, उतना दलितों को नहीं हुआ। आज भी वे हाशिये पर हैं। संविधान में उनके लिए अनिवार्य व नि:शुल्क शिक्षा का प्रावधान होने के बावजूद उनमें शिक्षा की दर काफी कम है।
दलितों में शिक्षा के स्तर का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि देश में जितने भी अशिक्षित लोग हैं, उनमें 95 प्रतिशत दलित हैं। दलितों में, जिनकी संख्या देश में तकरीबन 25 करोड़ है और जो हमारी कुल आबादी का 24.4 प्रतिशत हैं, पुरुषों की साक्षरता दर 31.48 प्रतिशत और महिलाओं की 10.93 फीसदी है। साफ है कि संविधान में उनके शैक्षणिक उत्थान के लिए जो प्रावधान किए गए हैं, उसका पूरा लाभ उन्हें नहीं मिल रहा। इसकी कई वजह है, जिनमें से एक प्रमुख वजह उनके भीतर घर कर गई सामाजिक असुरक्षा की भावना है। ऊंची जातियों के शोषण से डरा-सहमा समाज का यह तबका आज भी अपने बच्चों को स्कूल भेजते समय एक अनजाने डर से ग्रस्त रहता है। कई इलाकों में दलित महिला कर्मियों ने ऊंची जाति के अपने पुरुष सहकर्मियों के खिलाफ छेड़खानी, शोषण या उन्हें परेशान करने की शिकायत की है। आज भी तकरीबन 80 प्रतिशत दलित देश के दूर-दराज व ग्रामीण इलाकों में रहते हैं, जहां शिक्षा, स्वास्थ्य जसी बुनियादी सुविधाएं भी नहीं हैं। तकरीब 60 प्रतिशत दलित आज भी भूमिहीन हैं, जबकि लगभग 37 प्रतिशत गरीबी रेखा से नीचे जीवन बसर करते हैं। दलित बच्चों में कुपोषण की दर 54 फीसदी तक है, जिनमें से 21 प्रतिशत का वजन स्वास्थ्य के लिए निर्धारित मापदंड से काफी कम है, जबकि कुपोषण के कारण 12 प्रतिशत दलित बच्चों की मौत पांच साल से पहले हो जाती है।
छुआछूत को असंवैधानिक घोषित किए जाने के बावजूद उनके साथ अछूतों का व्यवहार समाप्त नहीं हुआ है। खासकर, ग्रामीण इलाकों में और दक्षिणी राज्यों में इसका प्रभाव आसानी से देखा जा सकता है। आज भी उन्हें स्कूलों व ग्राम सभाओं की बैठक में एकसाथ बैठने की अनुमति नहीं है। मंदिरों, धर्मशालाओं और थानों में उनका प्रवेश वर्जित है। डॉक्टर उन्हें स्वास्थ्य सेवा देने से मना कर देते हैं। डाकिये भी उनके गांवों में डाक पहुंचाने से इनकार कर देते हैं। यहां तक कि मौत के बाद भी उन्हें समानता का हक नहीं मिलता। उन्हें न तो सार्वजनिक रास्तों के इस्तेमाल की अनुमति होती है और न ही सार्वजिक श्मशान के इस्तेमाल की। आंकड़ों के मुताबिक करीब 37.8 प्रतिशत सरकारी स्कूलों में दलित और ऊंची जाति के बच्चे भोजन के समय अलग-अलग बैठते हैं। ये सब आजाद भारत का ऐसा सच है, जिसे शहरों में बैठे नहीं देखा जा सकता, जहां जाति बंधन धीरे-धीरे दम तोड़ने लगा है।
देश के आर्थिक विकास में इस वर्ग का अहम योगदान है। खासकर कृषि क्षेत्र में, जहां ज्यादातर मजदूर दलित ही होते हैं। लेकिन विकास की दौड़ में वे स्वयं काफी पीछे रह गए हैं। भूस्वामियों द्वारा उनका शोषण किसी से छिपा नहीं है। दिनभर खेतों में काम करने के बाजवूद उन्हें नाममात्र का वेतन दिया जाता है। कार्य सहभागिता दर दलित महिलाओं की 25.98 फीसदी तो पुरुषों की 22.25 प्रतिशत है, लेकिन आज भी उनके श्रम का इस्तेमाल आम तौर पर चमड़ा उद्योग, बीड़ी उद्योग जसे असंगठित क्षेत्र के मजदूरों और बुनकर, मेहतर, कारीगर के रूप में ही होता है, जहां उनका जमकर आर्थिक शोषण होता है।
तमाम संवधानिक सुरक्षा के बावजूद दलितों का शोषण और उनके खिलाफ होने वाले अपराधों पर अंकुश नहीं लग रहा। आंकड़ों पर यकीन करें तो प्रतिदिन करीब तीन दलित महिलाएं बलात्कार की शिकार होती हैं, जबकि दो दलितों की हत्या कर दी जाती है और इतने के ही घर जला दिए जाते हैं। करीब ग्यारह दलित प्रतिदिन पीटे जाते हैं। दरअसल, हमारा सामाजिक ताना-बाना ही कुछ इस तरह का है कि संवैधानिक प्रावधान उसके सामने बौने हो जाते हैं। पुलिस-प्रशासन सब जाति-व्यवस्था के आगे बेबस हो जाते हैं। दलितों की स्थिति में यदि वास्तव में सुधार लाना है, तो हमें सबसे पहले इस सामाजिक ताने-बाने को बदलना होगा और दलितों में शिक्षा का स्तर व जागरुकता बढ़ानी होगी, जिसकी बात बाबा साहब भीम राव अम्बेडकर ने भी कही थी। तभी वास्तव में उनका विकास हो पाएगा और आजाद भारत में उन्हें वह स्थान मिलेगा, जिसका सपना बाबा साहब भीम राव अम्बेडकर ने देखा था। हालांकि 1960 के दशक में भू सुधार आंदोलन लागू होने के बाद दलितों की स्थिति में काफी सुधार हुआ है। उनमें अपने अधिकारों को लेकर जागरुकता भी आई है, जिसकी वजह से समाज के कुछ हिस्सों से ही सही छुआछूत जसी कुरीतियां मिटने लगी हैं। दलित अब समाज में अपने हक के लिए आवाज उठाने लगे हैं। लेकिन आज भी उनके उत्थान के लिए बहुत कुछ किया जाना बाकी है।

सोमवार, 8 मार्च 2010

एक मकसद मुइवा


थुइंगलेंग मुइवा नगा जनजातियों के नेता हैं। उन पर लोगों का जबरदस्त भरोसा है। वे प्रतिबंधित नेशनलिस्ट सोशलिस्ट काउंसिल ऑफ नगालिम के इसाक-मुइवा धड़े के महासचिव हैं। कई दशकों से वे वृहत्तर नगालैंड के लिए संघर्ष कर रहे हैं। इससे कम पर वे राजी नहीं। वे गांधी और अहिंसा को आदर्श मानते हैं, लेकिन अपने लक्ष्य की प्राप्ति के लिए उन्होंने हथियार उठाए। उनका यकीन माननवाधिकारों पर है, लेकिन उनके संगठन के हाथों मारे जाने वाले भारतीय फौजियों को वे इसकी परिधि से बाहर रखते हैं। उन्हें संतोष है कि भारत सरकार भी अब उनकी ताकत और उनके जज्बे को भांपकर समझने लगी है कि इस मामले का समाधान सैनिक कार्रवाई से नहीं हो सकता।

थुइंगलेंग मुइवा, प्रतिबंधित संगठन नेशनलिस्ट सोशलिस्ट काउंसिल ऑफ नगालिम (एनएससीएन) के इसाक-मुइवा (आईएम) धड़े के महासचिव हैं। एनएससीएन-आईएम, जो उत्तर-पूर्वी राज्यों में पिछले करीब छह दशक से वृहत्तर नगालैंड की स्वतंत्रता की लड़ाई लड़ रहा है। मुइवा नगा जनजातियों के सर्वाधिक विश्वसनीय नेता हैं। उन पर लोगों को भरोसा है कि वे उनकी संप्रभुता की मांग से कोई समझौता नहीं करेंगे। संप्रभुता भी वृहत्तर नगालैंड की, जिसमें नगालैंड के अलावा आसपास के राज्यों और म्यांमार में रहने वाले नगा जनजाति के लोग भी शामिल होंगे।
मुइवा को नगा स्वतंत्रता और संप्रभुता से कम कुछ भी स्वीकार नहीं। वे न खुद को और न ही नगा लोगों को भारत का हिस्सा मानते हैं। इसलिए उनका विश्वास भारतीय लोकतंत्र में भी नहीं है, हालांकि लोकतांत्रिक प्रक्रिया में उनका यकीन है। नगालैंड में उनकी पीपुल्स रिपब्लिक ऑफ नगालैंड नाम से समानांतर सरकार है, जो नगा जनजातियों के लिए सभी प्रशासनिक कामकाज देखती है। यह सरकार जनता से टैक्स भी वसूलती है और उससे उनके लिए सुविधाएं जुटाती है। वे नगा स्वाधीनता के लिए भारत सरकार अधिनियम, 1935 का हवाला देते हैं, जिसमें नगा हिल्स को ब्रिटिश इंडिया से बाहर रखने की बात कही गई थी।
मुइवा, जो महात्मा गांधी को पढ़ते हुए बड़े हुए और उनके अहिंसा व सविनय अवज्ञा आंदोलन जसे सिद्धांतों को आदर्श बताते हैं, लेकिन नगा समस्या के समाधान के लिए इन्हें कारगर नहीं मानते। यही वजह रही कि उन्होंने हथियार उठा लिया और लोगों को भारतीय सेना के खिलाफ लामबंद किया। उनका कहना है कि नगा स्वभाव से शांति प्रिय लोग हैं, लेकिन भारत सरकार ने नगालैंड में सेना भेजकर जो दमनचक्र चलाया, उसके बाद लोगों के पास हथियार उठाने के अलावा कोई अन्य विकल्प नहीं रह गया। मुइवा आज भी गांधी के उस आश्वासन को याद करते हैं, जो उन्होंने नगा स्वतंत्रता के पक्ष में दिया था और जिससे लोगों को भरोसा हो चला था कि इस समस्या का समाधान शांतिपूर्ण तरीके से निकाला जाएगा। लेकिन उनकी हत्या के बाद प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने शांतिपूर्ण समाधान के सभी रास्ते बंद कर दिए। वहां सेना भेज दी गई, लोगों के घर जला दिए गए, महिलाओं की अस्मत पर हमला हुआ, जिसके बाद लोगों को जंगलों में भागकर जान बचानी पड़ी। ऐसे ही लोगों में मुइवा का परिवार भी था।
यहीं से शुरू हुआ मुइवा का संघर्ष। नगा स्वतंत्रता का संघर्ष, नगा जनजातियों के लिए सम्मान का संघर्ष, आत्म निर्णय का संघर्ष। जब सेना के कहर से उनके परिवार को जंगल का रुख करना पड़ा, मुइवा की उम्र बहुत छोटी थी। लेकिन इस घटनाक्रम ने किशोर मुइवा के मस्तिष्क पर गहरी छाप छोड़ी। अन्य नगा जनजातीय परिवारों की भांति ही उनका परिवार भी गरीबी से जूझ रहा था। माता-पिता अशिक्षित थे, लेकिन ईसाई धर्म में उनकी गहरी आस्था थी, जिससे उन्हें हर संकट से उबर जाने की ताकत मिलती रही। मुइवा माता-पिता से ईसा मसीह की कहानियां सुनकर बड़े हुए। इन कहानियों ने किशोर मुइवा के मन पर अमिट छाप छोड़ी। क्रिश्चनिटी में उनकी आस्था इतनी गहरी हो गई कि ‘नगालिम फॉर क्राइस्टज् और ‘नगालैंड फॉर क्राइस्टज् उनके आंदोलन का नारा बन गया।
इस बीच, उन्होंने गांधी, माओत्से तुंग, मार्क्स, लेनिन सहित दुनिया के कई बड़े नेताओं को पढ़ा। उनके दर्शन को समझा, जिससे सेना के दमन के खिलाफ और नगालैंड की स्वतंत्रता के लिए उनके संघर्ष को बल मिलता रहा। मुइवा आज करीब 68 साल के हो चुके हैं, लेकिन उनका संघर्ष अब भी खत्म नहीं हुआ है। नगालैंड के लिए संघर्ष करते हुए उन्होंने अपने जीवन के 27 साल जंगलों में बिता दिए। पिछले करीब तीन साल से वे भारत से बाहर आम्सटर्डम में थे। लेकिन उन्हें संतोष इस बात है कि पिछले करीब छह दशक का उनका संघर्ष रंग लाया। जो भारत सरकार कभी कहा करती थी कि नगा संघर्ष को कुचलने के लिए सेना को महज कुछ दिन लगेंगे, वह अब मानने लगी है कि नगा समस्या का सैनिक समाधान नहीं हो सकता।
मुइवा की वृहत्तर नगालैंड की अवधारणा माओत्से तुंग की विचारधारा पर आधारित है। वे वृहत्तर नगालैंड में एक ऐसा समाजवाद चाहते हैं, जिसमें सभी के लिए समान आर्थिक विकास हो। लेकिन राज्य का स्वरूप वे धार्मिक रखना चाहते हैं, जो ईसाई आस्था पर आधारित होगा। वृहत्तर नगालैंड की लड़ाई के लिए ही उन्होंने जनवरी 1980 में इशाक कीसी सू के साथ मिलकर एनएससीएन बनाया था, जब नगा स्वाधीनता की लड़ाई लड़ रहे नगा नेशनल काउंसिल (एनएनसी) ने 1975 में भारत के साथ ‘शिलांग समझौताज् कर भारतीय संविधान को स्वीकार कर लिया और अपने हथियार छोड़ दिए। मुइवा ने इसे नगा लोगों के साथ धोखा करार दिया। हालांकि मुइवा के एनएससीएन में भी एकजुटता नहीं रह सकी और एसएस खपलांग के नेतृत्व में एक गुट 1988 में इससे अलग हो गया।
थाइलैंड, म्यांमार, चीन से उनके बेहतर संबंध हैं और उनका कहना है कि यह उनकी राजनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा है। मुइवा नगा समस्या के शांतिपूर्ण समाधान की बात करते हैं, लेकिन एनएनसी की तरह हथियार छोड़ना उन्हें मंजूर नहीं है। उनका साफ कहना है कि नगा समस्या के पूर्ण समाधान तक उनके नेतृत्व में एनएससीएन शस्त्र, स्वतंत्रता और अपनी भूमि कभी नहीं छोड़ेगा। मुइवा नगालैंड की चुनी हुई सरकार को कठपुतली सरकार मानते हैं।
उनका मानवाधिकारों में यकीन है, लेकिन नगा व्रिोहियों द्वारा सेना के जवानों की हत्या को वे मानवाधिकारों की परिधि से बाहर मानते हैं। उनका मानना है कि नगालैंड में भारतीय सेना की उपस्थिति अवैध है और वे स्थानीय लोगों के मानवाधिकारों का हनन करते हैं। लेकिन संघर्ष में सेना के जो जवान मारे जा रहे हैं, वे नगा सेना के हाथों जान गंवा रहे हैं। मतलब यह एक सेना की दूसरी सेना से लड़ाई है। किसी के मानवाधिकारों का हनन नहीं।

क्या इतिहास बनाएगा महिला दिवस!


एक बार फिर महिला आरक्षण विधेयक संसद में पेश होने को तैयार है। तेरह वर्षो से टलते आए इस विधेयक को लेकर सरकार इस बार आशान्वित है। उसे भाजपा और वाम दलों का समर्थन प्राप्त है। महिला दिवस पर यह पेश होगा। अगर यह पारित हो जाता है, तो यह एक ऐतिहासिक और क्रांतिकारी घटना होगी। भारतीय महिलाओं के लंबे संघर्ष की सबसे बड़ी सफलता।

कैबिनेट से मंजूरी मिलने के बाद एक बार फिर महिला आरक्षण विधेयक संसद में पेश होने को तैयार है। बहुमत की दृष्टि से देखा जाए तो इसके पारित होने में कोई परेशानी नजर नहीं आती। कांग्रेस, भाजपा और वाम दलों का समर्थन इसे हासिल है, लेकिन राजद, सपा के साथ-साथ बसपा भी महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत आरक्षण के अंदर दलित व पिछड़े वर्ग की महिलाओं के लिए आरक्षण की मांग करके इसमें अड़ंगा लगाने की तैयारी में है। पिछले करीब डेढ़ दशक से यह विधेयक आम सहमति के अभाव में लटका पड़ा है। सरकार चाहे भाजपा की रही हो या कांग्रेस की, कई विधेयक बहुमत के आधार पर पारित कराए गए, लेकिन यह एक मात्र विधेयक है, जिसे आम सहमति से पारित कराने की बात कहकर लगातार टाला जा रहा है।
इस बार हालांकि इसके पारित हो जाने की संभावना दिखती है। माहौल पूरी तरह इसके पक्ष में है। महंगाई के मुद्दे पर एकजुट हुआ विपक्ष इस मुद्दे पर अलग-थलग नजर आता है। भाजपा और वाम दल इस विधेयक को पारित कराने के मुद्दे पर कांग्रेस के साथ नजर आते हैं, लेकिन संशय अब भी बरकार है। कहीं आम सहमति का जिन्न फिर से न बाहर आ जाए और एक बार फिर यह विधेयक संसद में सिर्फ पेश होकर न रह जाए। दअसल, आजादी के पिछले छह दशक में पुरुष प्रधान समाज में महिलाओं के साथ जिस तरह दोयम दज्रे का व्यवहार होता रहा है, उससे इस संशय को और बल मिलता है।
बेशक आजादी के पिछले छह दशक में देश ने कई क्षेत्रों में प्रगति की। महिला सशक्तिकरण की बात भी जोर-शोर से उठाई गई। कई क्षेत्रों में महिलाओं ने कामयाबी के झंडे गाड़े। इस वक्त राष्ट्रपति से लेकर लोकसभा अध्यक्ष तक महिला हैं और अब विपक्ष की नेता सभी महिलाएं हैं। लेकिन यह महिला सशक्तिकरण के सिक्के का एक ही पहलू है। दूसरा पहलू आज भी महिलाओं दयनीय स्थिति को दर्शाता है। चाहे, स्वास्थ्य का मामला हो या शिक्षा का, महिलाओं को कभी बराबरी का हक नहीं मिला। हालांकि संविधान और कानून समानता की बात करते हैं, लेकिन वास्तविकता के धरातल पर स्थिति बिल्कुल भिन्न है।
महिलाओं का उत्पीड़न रोकने के लिए सरकार ने दहेज निषेध कानून बनाया; सबको समान शिक्षा मिल सके, इसके लिए शिक्षा के अधिकार का अधिनियम भी पारित किया; महिलाओं को घरेलू हिंसा ने निजात दिलाने के लिए भी कानून बनाए गए, लेकिन इनकी समुचित अनुपालना के अभाव में आज भी प्रति दिन औसतन छह नववधुएं दहेज की भेंट चढ़ती हैं, महिलाएं घरेलू हिंसा का शिकार हो रही हैं। समान और नि:शुल्क शिक्षा का प्रावधान होने के बावजूद केवल 39 प्रतिशत महिलाएं प्राथमिक स्कूलों का मुंह देख पाती हैं। माता-पिता उन्हें इसलिए स्कूल नहीं भेजते, क्योंकि उन्हें घर के कामकाज में हाथ बंटाना होता है। अधिकांश क्षेत्रों में महिलाएं आज भी पुरुषों के भोजन करने के बाद ही खाना खाती हैं और अगर भोजन कम पड़ जाए तो पुरुषों के खाने के बाद बचे भोजन से ही उसे अपनी भूख मिटानी होती है। फिर उनके स्वास्थ्य की फिक्र कौन करे? यहां बराबरी का कोई सिद्धांत लागू नहीं होता। देश के कई क्षेत्रों में कन्या भ्रूण की पहचान कर गर्भ में ही उनकी हत्या कर दी जाती है।
महिला आरक्षण विधेयक भी महिलाओं के प्रति पुरुष प्रधान राजनीति के इसी दोयम दज्रे के रुख का शिकार हुआ है। अब तक इस पर सिर्फ राजनीति की जाती रही है, इसे पारित कराने को लेकर किसी भी राजनीतिक दल या सरकार में इच्छाशक्ति नजर नहीं आई। संयुक्त मोर्चा और भाजपा की सरकार ने बारी-बारी से इसे संसद में पेश तो किया, लेकिन आम सहमति का हवाला देकर इसे पारित होने से रोके रखा। 2004 में सत्ता में आने के बाद कांग्रेस नीत यूपीए सरकार ने इसे अपने न्यूनतम साझा कार्यक्रम में शामिल किया। लेकिन यूपीए सरकार इसे संसद में पेश करने में नाकाम रही। दूसरी बार सत्ता हासिल करने के बाद यूपीए सरकार इसे संसद में पेश करने और पारित करने की तैयारी में है। हालांकि इस पर उसे भाजपा और वाम दलों का साथ तो है, लेकिन मुलायम, शरद, लालू के रुख आरक्षण के भीतर आरक्षण की मांग को लेकर बेहद कड़े हैं। विधेयक का हश्र पहले की तरह होगा या इस बार कुछ नया, यह तो आठ मार्च के बाद ही पता चलेगा, जब इसे राज्यसभा में पेश किया जाएगा।


अड़ंगा-दर-अड़ंगा
सबसे पहले सितंबर, 1996 में संयुक्त मोर्चा सरकार के कार्यकाल में विधि मंत्री रमाकांत डी खालप ने इसे लोकसभा में पेश किया। लेकिन मुलायम सिंह यादव और लालू प्रसाद ने आरक्षण के भीतर आरक्षण की मांग कर इसे पारित होने से रोक दिया। जून, 1998 में राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन सरकार के कार्यकाल में भी इसे पेश किया गया, लेकिन बात नहीं बनी। नवंबर, 1999 में राजग सरकार ने इसे एक बार फिर लोकसभा में पेश किया, लेकिन कांग्रेस और वाम दलों के समर्थन के लिखित आश्वासन के बावजूद यह पारित नहीं हो सका। वर्ष 2002 और 2003 में भी इसे लोकसभा में पेश किया गया, लेकिन नतीजा वही ढाक के तीन पात वाला रहा।

बुधवार, 3 मार्च 2010

दर-बदर अब कतर


कैसी विडंबना है! महान चित्रकार मकबूल फिदा हुसैन अब ‘भारतीय मूलज् के रह गए। अब वे कतर के नागरिक हो जाएंगे। कई साल से वे मजबूरी में अपने देश से बाहर रह रहे थे। उस देश से जिसको वे बेहद प्यार करते हैं और जहां पर रहकर और काम करके ही वे और उनकी कला दुनियाभर में मकबूल हुई। लेकिन संस्कृति के ठेकेदार हिंदू कट्टरपंथियों को तब तक चैन नहीं आया जब तक वे देश छोड़कर नहीं चले गए। यहां इन फासीवादी ताकतों ने उन पर हरसंभव हमला किया। ताज्जुब की बात यह है कि धर्मनिरपेक्षता के नाम पर वोट बटोरने वाली सरकार उस कलाकार को सुरक्षा और निर्द्वद्व काम करने का वातावरण देने का ठोस भरोसा नहीं दे सकी। अब जब कतर ने उन्हें खुद अपनी नागरिकता देने का प्रस्ताव किया है तो सरकार फिर कह रही है कि उन्हें सुरक्षा दी जाएगी।

मकबूल फिदा हुसैन, दुनिया के मशहूर पेंटर और सबसे महंगे भी। लेकिन उतने ही विवादास्पद। वे फिल्मकार भी हैं। फिल्मों का उन्हें नशा ही है। ‘गजगामिनीज् और ‘मिनाक्षी: ए टेल ऑफ थ्री सिटीजज् जसी फिल्में उन्होंने बनाईं। लेकिन उनकी डॉक्यूमेंट्री ‘थ्रू द आईज ऑफ अ पेंटरज् को बर्लिन फिल्म फेस्टिवल में गोल्डन बीयर पुरस्कार मिला।
जिस कला ने उन्हें दुनियाभर में चर्चित किया, एक पहचान दी, उसी से वे विवादों में आए। विवाद भी इतने गहरे कि उन पर एक हजार से अधिक आपराधिक मामले दर्ज हो गए। कुछ अतिवादी संगठनों ने उन्हें जान से मारने की धमकी दी, आखें फोड़ डालने और उन हाथों को काट डालने की धमकी दी, जिससे वे कैनवास पर रंग उकरते हैं। विभिन्न मामलों की सुनवाई के दौरान अदालतों ने कई बार उन्हें समन जारी किया, लेकिन वे उपस्थित नहीं हुए। ऐसे में उनके खिलाफ गैर-जमानती वारंट जारी हो गया और गिरफ्तारी से बचने के लिए उन्हें देश छोड़ना पड़ा।
हालांकि निर्वासन का विकल्प उन्होंने खुद चुना, लेकिन ऐसा उन्होंने स्वेच्छा से नहीं, मजबूरन किया। ‘भीड़तंत्रज् के खौफ से देश छोड़ने की टीस उनके मन में हमेशा रही और यह भी कि सरकार ने उनकी सुरक्षा के लिए कुछ विशेष नहीं किया। हालांकि सर्वोच्च न्यायालय ने हाल ही में उनके खिलाफ जारी गिरफ्तारी वारंटों को निलंबित कर दिया था, लेकिन उनका खौफ अब भी बरकरार है, जो कानून अपने हाथ में लेकर घूमते हैं और कला-संस्कृति को अपनी जागीर समझते हैं। शायद यही वजह है कि हुसैन की देश वापसी नामुमकिन-सी हो गई है।
उन्हें चर्चा में रहने का भी कम शौक नहीं है। इस समय वे एक बार फिर चर्चा में हैं, लेकिन इस बार उनकी चर्चा किसी पेंटिंग या फिल्म को लेकर नहीं है, बल्कि उनकी नागरिकता को लेकर है। जहां जन्मे, पले-बढ़े, वहां से उनकी कला को तो पहचान मिली, लेकिन उन्हें सुरक्षा नहीं मिली। अतिवादी संगठनों की धमकियों और कानूनी उलझनों ने उन्हें देश से दूर कर दिया। लेकिन आज जबकि 95 वर्ष की उम्र में कतर उन्हें अपनी नागरिकता से नवाज रहा है और उनके हमेशा के लिए देश से दूर जाने का अंदेशा हो गया है, तो देश में हलचल मची है। सरकार देश वापसी पर उन्हें पूरी सुरक्षा मुहैया कराने को कह रही है, तो कला प्रेमियों में इस बात को लेकर नाराजगी है कि एक कलाकार की सुरक्षा को लेकर इतनी असंवेदनशीलता क्यों? इतनी देर क्यों? सरकार के रवैये पर कला प्रेमी और हुसैन प्रेमी अपनी शर्मिदगी का इजहार कर रहे हैं।
हुसैन अपनी कला की प्रयोगधर्मिता के लिए जाने जाते हैं। पेंटिंग से लेकर फिल्म निर्माण तक में उन्होंने नित-नए प्रयोग किए और सफल भी हुए। यही वजह रही कि किसी ने उन्हें भारत का जीवित किंवदंती कहा, तो अमेरिका की फोर्ब्स मैगजीन ने ‘भारत का पिकासोज्। वे दुनियाभर में कला के क्षेत्र में एक आइकॉन बन चुके हैं। लेकिन अब शायद हम उन्हें गर्व से ‘अपनाज् नहीं कह सकेंगे। उनकी सुरक्षा को लेकर सरकार की उदासीनता और अतिवादियों का खौफ हमारे इस पिकासो और जीवित किंवदंती को हमसे दूर कर रहा है।
हुसैन की पेंटिंग में मानवीय स्थिति का चित्रण होता है और यही उनकी खासियत भी है। अपनी फिल्मों के जरिए भी उन्होंने यही दिखाने की कोशिश की। उन्होंने महाभारत और रामायण से प्रेरणा लेकर सैकड़ों चित्र बनाए, जो देश-विदेश में खूब बिके। लेकिन उनके बनाए हिंदू देवी-देवताओं के प्रयोगधर्मी चित्रों से हिंदू कट्टरपंथी नाराज हो गए। उनके खिलाफ अश्लीलता फैलाने एवं जान-बूझकर लोगों की भावनाएं आहत करने के कई मामले देशभर की अदालतों में दर्ज हो गए और लोगों का रुख भी उन्हें लेकर आक्रामक हो गया। वैसे, यह आज भी समझ से परे है कि जो चित्र उन्होंने 1970 के दशक में बनाए थे, उसे लेकर विवाद 1996 में क्यों हुआ, जब वे चित्र हिन्दी मासिक ‘विचार मीमांसाज् में प्रकाशित हुए? लोग यह भी भूल जाते हैं कि हुसैन ने डॉ. राममनोहर लोहिया के कहने पर रामायण की कथा पर आधारित चित्रों की श्रंखला बनाई थी। कला की प्रयोगधर्मिता और उसे आधुनिक रूप देने की कोशिश उनके लिए काफी महंगी साबित हुई।
सत्रह सितंबर, 1915 को महाराष्ट्र के पंढरपुर में जन्मे हुसैन ने कामयाबी विरासत में नहीं पाई। वे सिर्फ एक साल के थे, जब मां का साया सिर से छिन गया। शुरुआती दिनों में वे फिल्मी होर्डिग्स की पेंटिंग बनाया करते थे, जिसके लिए उन्हें काफी कम पैसे मिलते थे। एक चित्रकार के रूप में हुसैन को पहचान 1947 में मिली, जब बॉम्बे आर्ट सोसाइटी की वार्षिक प्रदर्शनी में उनकी पेंटिंग ‘सुनहरा संसारज् को अवार्ड मिला। इसके बाद उन्होंने पीछे मुड़कर नहीं देखा। 1952 में उनकी पहली एकल चित्र प्रदर्शनी ज्यूरिख में लगी। भारत, अमेरिका, यूरोप सहित दुनियाभर में उनके चित्रों की प्रदर्शनी लगी, जिसमें उन्होंने कई पुरस्कार जीते। इस बीच उन्हें पद्मश्री (1966) पद्म भूषण (1973) और पद्म विभूपषण (1991) जसे नागरिक सम्मानों से नवाजा गया। 1986 में वे राज्यसभा के लिए भी नामित हुए।

मंगलवार, 23 फ़रवरी 2010

अपना दोस्त राम बरन


राम बरन यादव अभी भारत की यात्रा पर आए हुए थे। उनकी भारत यात्रा राजनयिक तो थी ही साथ ही उन्होंने हरिद्वार में चल रहे कुम्भ मेले में भी एक भक्त की हैसियत से भाग लिया। वे चाहते हैं कि भारत और नेपाल के संबंध मधुर बने रहें। वे हरेक क्षेत्र में भारत के साथ मिलकर काम करना चाहते हैं। राष्ट्रपति पद तक पहुंचने के क्रम में उन्हें काफी संघर्ष करना पड़ा है। यह राम बरन यादव की स्पष्टवादिता का ही प्रमाण है कि राष्ट्रपति पद पर रहते हुए भी वे देश की वर्तमान राजनीतिक व्यवस्था से असंतुष्ट हैं और उसको आमूल-चूल बदलने की बात करते हैं।

राम बरन यादव, नेपाल के राष्ट्रपति। एक ऐसे नेता जो लोकतंत्र की स्थापना के लिए न केवल राजतंत्र से लड़ते रहे, बल्कि माओवादियों से भी लड़े और आज भी उनका विरोध ङोल रहे हैं। नेपाल में करीब ढाई सौ साल पुराने राजतंत्र की विदाई और गणतंत्र की स्थापना के बाद वहां पहली बार जनता का कोई प्रतिनिधि राष्ट्रपति बना और यह मौका मिला राम बरन यादव को। निश्चय ही, इस उपलब्धि में लोकतंत्र की स्थापना के लिए उनकी अंतहीन लड़ाई का महत्वपूर्ण योगदान रहा। आखिर, लंबे समय से नेपाल में जड़ें जमाए राजतंत्र की विदाई आसान तो न थी।एक लंबी लड़ाई के बाद वर्ष 2008 में नेपाल में 240 पुराने राजतंत्र का अंत हुआ और वहां संघीय लोकतांत्रिक गणराज्य की स्थापना हुई। उसी साल अप्रैल में वहां संविधानसभा के चुनाव हुए, जिसमें कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ नेपाल (माओवादी) माओवादियों को सबसे अधिक सीटें मिलीं। लेकिन जुलाई में हुए राष्ट्रपति चुनाव में उनका उम्मीदवार हार गया। नेपाली कांग्रेस के उम्मीदवार राम बरन यादव ने सीपीएनएम उम्मीदवार राम राजा प्रसाद सिंह को हराकर जीत हासिल की। इससे पहले उन्होंने अपने गृह जिले धनुषा के ही पांच नंबर कांस्टीच्वेंसी से संविधानसभा का चुनाव जीता था। राष्ट्रपति पद पर जीत के तुरंत बाद उन्होंने कहा था कि यह लोकतंत्र की जीत है और वे आगे भी इसे मजबूत करने के लिए काम करते रहेंगे।चार फरवरी, 1948 को नेपाल के मधेशी क्षेत्र में धनुषा जिले में एक मध्यमवर्गीय किसान परिवार में पैदा हुए राम बरन यादव के लिए राष्ट्रपति पद तक का सफर आसान नहीं रहा और न ही यह कामयाबी उन्हें विरासत में मिली। उन्होंने जो कुछ भी पाया अपनी मेहनत व जुझारूपन से पाया। पिता मध्यमवर्गीय परिवार के किसान थे। परिवार आर्थिक रूप से बहुत संपन्न नहीं था। लेकिन किसान पिता को यह पसंद नहीं था कि बेटा भी खेत-खलिहान में उलझकर रह जाए। इसलिए उन्होंने बेटे को स्कूल भेजा। उनकी शुरुआती शिक्षा-दीक्षा उनके गृह जिले में ही हुई। लेकिन उच्च शिक्षा के लिए वे काठमांडू रवाना हो गए।बाद में उन्होंने भारत का रुख किया और पश्चिम बंगाल के कलकत्ता मेडिकल कॉलेज से एमबीबीएस की पढ़ाई की। इस दौरान वे विभिन्न लोकतांत्रिक संगठनों से जुड़े रहे। वहां छात्र राजनीति में उनकी महत्वपूर्ण भागीदारी रही। एमबीबीएस की डिग्री लेने के बाद उन्होंने चंडीगढ़ के मेडिकल एजुकेशन और शोध संस्थान से एमडी किया। पढ़ाई पूरी करने के बाद वे नेपाल लौट गए। वहां उन्होंने करीब चार साल तक प्रैक्टिस भी की। उन्होंने जनकपुर में एक मेडिकल क्लिनिक भी खोला। एक डॉक्टर के रूप में भी वे कामयाब रहे।लेकिन डॉक्टरी का पेशा शायद उनके लिए नहीं बना था। पहले से ही राजनीति में रुचि रखने वाले डॉ. यादव 1980 के दशक में नेपाल के पूर्व प्रधानमंत्री बीपी कोइराला के आखिरी दिनों में उनके निजी चिकित्सक बने, जो उनके राजनीतिक जीवन का टर्निग प्वाइंट साबित हुआ। बीपी कोइराला की सामाजिक-लोकतांत्रिक विचारधारा ने उन्हें सक्रिय राजनीति में आने के लिए प्रेरित किया। वे नेपाली कांग्रेस से जुड़ गए और पार्टी में विभिन्न पदों पर उन्होंने महत्वपूर्ण जिम्मेदारी निभाई। 1991-1994 के बीच वे गिरिजा प्रसाद कोइराला की सरकार में स्वास्थ्य मंत्री भी बने। वैसे नेपाल में लोकतंत्र की लड़ाई से वे तभी जुड़ गए थे, जब दिसंबर, 1960 में तत्कालीन राजा महें्र ने लोकतांत्रिक ढंग से चुनी हुई प्रधानमंत्री बीपी कोइराला की सरकार गिरा दी और सभी शक्तियां अपने अधीन कर ली। पड़ोसी देश भारत के लिए उनके दिल में स्नेह है और इसलिए वे दोनों देशों के संबंध मधुर बनाना चाहते हैं। पिछले सप्ताह भारत की यात्रा के दौरान उन्होंने इसके स्पष्ट संकेत दिए। राष्ट्रपति चुने जाने के बाद भी उन्होंने साफ कहा था कि वे शिक्षा, स्वास्थ्य और पर्यावरण के क्षेत्र में भारत के साथ मिलकर काम करना चाहते हैं। शायद यही वजह रही कि वर्ष 2008 में राष्ट्रपति का पदभार ग्रहण करने के बाद अपनी पहली औपचारिक विदेश यात्रा के रूप में उन्होंने भारत को चुना। भारत से उनके लगाव की वजह न केवल उनका ऐसे क्षेत्र से होना है, जहां की संस्कृति और रीति-रिवाज काफी हद तक यहां से मिलते-जुलते हैं, बल्कि उनकी शिक्षा-दीक्षा भी हो सकती है, जो उन्होंने भारत में ही पाई।नेपाल में राम बरन यादव की छवि एक ऐसे जुझारू नेता की है, जो जनता के लोकतांत्रिक हितों व अधिकारों के लिए प्रतिबद्ध हैं और देश की एकता व अखंडता के लिए हर झंझावात ङोलने को तैयार हैं। शायद यही वजह है कि नेपाल के मधेश क्षेत्र में मधेशी प्रांत की मांग का वे खुलकर विरोध करते हैं, जबकि वे स्वयं उसी क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करते हैं। उनका सपना नेपाल को आर्थिक रूप से संपन्न और शांतिपूर्ण बनाना है, जो फिलहाल विकास की बाट जोह रहा है। साथ ही वे नेपाल के तराई क्षेत्र में सक्रिय कुछ हथियारबंद समूहों को मुख्यधारा में लाना चाहते हैं। उनका साफ मानना है कि देश में जो मौजूदा राजनीतिक संस्कृति है, उसके कारण विकास अवरुद्ध हो गया है। इसमें आमूल-चूल बदलाव की जरूरत है। एकजुटता और प्राकृतिक संसाधनों के इस्तेमाल से ही नेपाल तरक्की कर सकता है।वे स्पष्टवादिता के लिए भी जाने जाते हैं और इस क्रम में अपनी उम्र भी नहीं छिपाते। राष्ट्रपति चुनाव से पहले इस बारे में पूछे जाने पर बड़ी साफगोई से ठहाके के साथ उन्होंने कहा, ‘यूं तो मैं 64 साल पहले पैदा हुआ था, लेकिन जन्म प्रमाण-पत्रों के अनुसार मेरी उम्र चूंकि 61 साल ही है, इसलिए राष्ट्रपति चुनाव के लिए दाखिल नामांकन-पत्र में भी यही उम्र लिखी गई है।‘

मंगलवार, 16 फ़रवरी 2010

बेगुन का गुनग्राहक


कौन नहीं जानता कि जयराम रमेश नव पूंजीवाद और उदारीकरण के घनघोर समर्थक हैं। लेकिन बीटी बैगन के मामले में उन्होंने पर्यावरण मंत्री के नाते जो फैसला लिया, वह उनकी अपनी आर्थिक विचारधारा के उलट था। उनकी नजर इस बहस के सामाजिक पहलू को नहीं काट पाई और उन्होंने फिलहाल उस पर रोक लगा दी। उनके इस फैसले पर अब वे बीटी बैगन विरोधी भी वाह-वाह कर रहे हैं, जिनके लिए तैश खाकर जयराम रमेश ने कहा था कि उन लोगों को अपने दिमाग का इलाज कराना चाहिए। वैसे भी रमेश तैश में आकर ऐसे बयान देते रहते हैं जो आगे बड़े विवाद बनते हैं।

पर्यावरण से प्यार है उन्हें। आज से नहीं, नौ साल की उम्र से, जब ब्रिटिश लेखक एडवर्ड प्रिचार्ड गी की पुस्तक ‘द वाइल्ड लाइफ ऑफ इंडियाज् हाथ आई। पर्यावरण से इस विशेष लगाव की वजह से ही शायद यूपीए सरकार के दूसरे कार्यकाल में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और यूपीए अध्यक्ष सोनिया गांधी ने वन एवं पर्यावरण मंत्रालय की जिम्मेदारी के लिए उन्हें चुना। ये हैं जयराम रमेश। वे राष्ट्रीय सलाहकार परिषद के सदस्य भी हैं। इससे पहले की यूपीए सरकार में वे वाणिज्य व उद्योग मंत्रालय में राज्य मंत्री रह चुके हैं।
यूपीए सरकार के दूसरे कार्यकाल में पर्यावरण व मंत्री के रूप में जयराम रमेश अक्सर विवादों में रहे। कभी जलवायु परिवर्तन पर उनके बयान ने विपक्ष को नाराज किया तो कभी भोपाल में यूनियन कार्बाइड कंपनी के परिसर स्थल का दौरा करने के बाद दिए गए उनके बयान ने आम लोगों को नाराज कर दिया। इन दिनों वह बीटी बैंगन को लेकर चर्चा में हैं। हालांकि लोगों के भारी विरोध के बाद इसे भारतीय कृषि जगत में उतारने पर रोक लगा दी गई है, लेकिन इसे लेकर उनका आग्रह किसी से छिपा नहीं है। इसका विरोध करने वालों को उन्होंने ‘मानसिक इलाजज् की सलाह तक दे डाली।
रमेश कांग्रेस के उन खास नेताओं में हैं, जिनकी गिनती गांधी-नेहरू परिवार के करीबी नेताओं में होती है। यही वजह रही कि पिछले साल लोकसभा चुनाव अभियान की जिम्मेदारी पार्टी अध्यक्ष सोनिया गांधी ने उन्हें सौंपी। रमेश ने भी उन्हें निराश नहीं किया। पार्टी के एक अनुशासित कार्यकर्ता की तरह उन्होंने तुरंत वाणिज्य व उद्योग राज्य मंत्री के पद से इस्तीफा दिया और जुट गए चुनाव की रणनीति तैयार करने में। चुनाव अभियान को लेकर बनाई गई उनकी रणनीति कामयाब रही और यूपीए पिछली बार की तुलना में अधिक सीटें लेकर एकबार फिर सत्तासीन हुई, जिसमें उन्हें पर्यावरण व वन मंत्रालय का स्वतंत्र कार्यभार सौंपा गया।
लेकिन यूपीए सरकार के अन्य मंत्रियों से अलग उनके कमरे में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह या सोनिया गांधी की तस्वीर नहीं, बल्कि दक्षिण भारत के देवी-देवताओं को दर्शाती तंजौर पेंटिंग और बौद्ध धर्म के कुछ चिह्न् हैं। इसके अलावा कोई तस्वीर है तो वह महात्मा गांधी और जवाहर लाल नेहरू की है, वह भी गंभीर बहस की म्रुा में। हालांकि उनकी आदर्श इंदिरा गांधी हैं। रमेश के मुताबिक, हर क्षेत्र में उन्होंने बेहतर काम किया। पर्यावरण भी इसका अपवाद नहीं है। अगर बतौर प्रधानमंत्री उन्होंने वन संरक्षण की दिशा में जरूरी कदम नहीं उठाए होते, तो आज यह पूरी तरह खत्म हो चुका होता।
कर्नाटक के चिकमगलूर में नौ अप्रैल, 1954 को जन्मे रमेश तकनीक व आधुनिकीकरण के हिमायती हैं। इसकी वजह शायद उनकी शिक्षा-दीक्षा और पारिवारिक पृष्ठभूमि रही है। उनके पिता प्रो. सीके रमेश आईआईटी, बॉम्बे के सिविल इंजीनियरिंग डिपार्टमेंट के विभागाध्यक्ष थे। तीसरी से पांचवीं की स्कूली शिक्षा उन्होंने रांची के सेंट जेवियर स्कूल से पूरी की। 1970 में उन्होंने आईआईटी, बॉम्बे में दाखिला लिया और वहां से मैकेनिकल इंजीनियरिंग में बीटेक किया। 1975-77 में उन्होंने अमेरिका के कार्नेगी यूनिवर्सिटी से प्रबंधन और लोक नीति में मास्टर डिग्री ली।
पढ़ाई खत्म करने के बाद वे विश्व बैंक से जुड़े। दिसंबर, 1979 में वे भारत लौटे और यहां योजना आयोग सहित कें्र सरकार के उद्योग व आर्थिक विभाग से संबंधित विभिन्न संस्थाओं में महत्वपूर्ण जिम्मेदारी निभाई। वे 1991 में पीवी नरसिम्हा राव सरकार में वित्त मंत्री मनमोहन सिंह के सलाहकार भी रहे। वे राजीव गांधी के भी करीबी रहे। 1989 में जब कांग्रेस चुनाव हार हार गई थी, तो कांग्रेस के पुनर्जीवन के लिए उन्होंने राजीव गांधी के सलाहकार की भूमिका निभाई थी। आज उसी भूमिका में वे सोनिया गांधी के साथ हैं।
रमेश आंध्र प्रदेश से राज्य सभा के सदस्य हैं। उनकी मातृभाषा तेलुगू है। कर्नाटक संगीत और भरतनाट्यम में उन्हें खासी दिलचस्पी है। वे चीन के साथ भारत के अच्छे संबंधों के पैरोकार रहे हैं। उनका कहना है कि दोनों देशों के बीच व्यापार, कला, संस्कृति सहित अन्य क्षेत्रों में भी सहयोग की भरपूर गुंजाइश है और इससे दोनों पक्ष लाभान्वित होंगे। उन्होंने भारत-चीन संबंधों पर आधारित ‘मेकिंग सेंस ऑफ चीनींडिया : रिफ्लेक्शन ऑन चाइना एंड इंडियाज् नामक पुस्तक भी लिखी। जयवायु परिवर्तन पर कोपेनहेगन सम्मेलन के दौरान भी उन्होंने ब्राजील, दक्षिण अफ्रीका और चीन के साथ मिलकर प्रभावशाली तरीके से विकासशील देशों का पक्ष रखने की मुहिम चलाई। उन्होंने बिजनेस स्टैंडर्ड, बिजनेस टुडे, द टेलीग्राफ, टाइम्स ऑफ इंडिया और इंडिया टुडे के लिए कॉलम भी लिखा है। साथ ही टेलीविजन पर भी बिजनेस और अर्थ से जुड़े कई कार्यक्रम प्रस्तुत किए।
लेकिन कई बार उनके बयानों ने विवाद पैदा किया, जिस पर खासा हंगामा हुआ। देश के पहले जीन परिवर्धित बीटी बैंगन को व्यावसायिक मंजूरी से पहले उन्होंने लोगों से इस बारे में परामर्श लेना जरूरी समझा। इसके लिए उन्होंने हैदराबाद में लोगों को आमंत्रित कर अनूठी पहल की। वहां देश के सात शहरों से करीब आठ हजार लोग पहुंचे। इस दौरान लोगों ने विरोध प्रदर्शन भी किए, जिसके जवाब में रमेश ने यहां तक कह डाला कि बीटी बैंगन का विरोध करने वालों को ‘मानसिक इलाजज् की जरूरत है। इसी तरह, यूपीए सरकार के पहले कार्यकाल में प्रधानमंत्री के ब्राजील दौरे से ठीक पहले उन्होंने यह कहकर विदेश मंत्रालय के लिए मुश्किल खड़ी कर दी कि आखिर ऐसे देश से व्यापार समझौते की क्या उपयोगिता है, जो हमसे काफी दूर है। भोपाल में यूनियन कार्बाइड कंपनी से हुए गैस रिसाव ने स्थानीय लोगों को जो घाव दिए, वे आज भी नहीं भरे हैं। इसे लेकर आज भी लोगों में रोष है। लेकिन रमेश ने कंपनी परिसर में पहुंचकर और वहां से हाथ में मिट्टी उठाकर यह कहते हुए लोगों को नाराज कर दिया कि देखिये, यह मेरे हाथ में है, फिर भी मैं जिंदा हूं। जलवायु परिवर्तन पर कोपेनहेगन सम्मेलन के दौरान कार्बन उत्सर्जन कम करने को लेकर दिए गए उनके बयान ने भी खासा हंगामा बरपाया।

सोमवार, 8 फ़रवरी 2010

अमर नहीं था प्रेम


अमर सिंह कब खबरों में नहीं रहते। लेकिन इधर खूब थे और वह भी उलट कारणों से। पहले उनका खबरों में होना समाजवादी पार्टी के लिए होता था। इस बार सपा से उनकी बेआबरू विदाई इसका कारण बनी। मुलायम-अमर की जोड़ी टूट गई। दोस्त-दोस्त न रहा। प्यार, प्यार न रहा!

अमर सिंह, भारतीय राजनीति के कॉरपोरेट नुमाइंदे। एक ऐसे कारोबारी नेता, जिसने धुर समाजवादी पार्टी को दिया पूंजीवादी चेहरा। पैसा हाथ बदलते हैं, यह कहावत जानी-मानी। लेकिन वह हाथ ही बदल देता है मनुष्य को भी। गरीब-गुरबों की राजनीति करने वाली पार्टी अचानक हो गई पांच सितारा। कॉरपोरेट और फिल्मी सितारों से लकदक। खांटी समाजवादी हाशिये पर। जनता भी पार्टी से होती गई दूर। तब कहीं ‘नेताजीज् को एहसास हुआ कि पूंजीवाद ने उनके समाजवाद का निकाल दिया दीवाला। यह समझने में लग गए पूरे चौदह साल। फिर भी सबकुछ लुटा के आखिर होश में आ ही गए। अमर सिंह पार्टी से बाहर हो गए, इस आरोप के साथ कि वे समाजवाद की नींव हिलाने की एक साजिश के रूप में पार्टी में शामिल हुए थे। इस तरह, समाजवाद और पूंजीवाद का प्रेम अमर नहीं हो पाया।
करीब चौदह साल पहले 1996 में अमर सिंह समाजवादी पार्टी में शामिल हुए थे। तब सपा का अपना जनाधार था। पार्टी प्रमुख मुलायम सिंह यादव दो बार राज्य के मुख्यमंत्री बन चुके थे। कें्र में जब संयुक्त मोर्चा की सरकार बनी तो वे रक्षा मंत्री बने। ऐसा इसलिए हो सका, क्योंकि गरीब, पिछड़े और अल्पसंख्यक; जिसकी वे राजनीति करते थे, उनके साथ थे। लेकिन अमर सिंह के आने के बाद पार्टी की रीति-नीति बदलने लगी। पूंजीपतियों और उद्योगपतियों की भूमिका बढ़ी। अमर सिंह पार्टी और उनके बीच संपर्क सूत्र का काम करने लगे। रिलायंस अनिल धीरूभाई अंबानी समूह के प्रमुख अनिल अंबानी जसे उद्योगपति और अमिताभ बच्चन, जया बच्चन, जया प्रदा, राजबब्बर, संजय दत्त, मनोज तिवारी जसी फिल्मी हस्तियां पार्टी से जुड़ीं। पार्टी को बड़ी मात्रा में वित्तीय अनुदान मिलने लगा, जिसकी उसे सख्त जरूरत थी।
पैसे की ताकत के अलावा उनके पास वक्तृत्व कला भी थी। शेरो-शायरी से लेकर अंग्रेजी भाषा पर भी उनकी अच्छी पकड़ है, जो सपा के दूसरे नेताओं में नहीं थी। जो गिने-चुने नेता अंग्रेदां थे भी, वे नेताजी के विश्वासपात्र नहीं बन पाए। उनके इन्हीं गुणों और पैसे की धमक ने उन्हें नेताजी के करीब ला दिया। इतने करीब कि नेताजी बहुत से फैसलों के लिए उन पर निर्भर हो गए। जयललिता से बात करनी हो या चं्रबाबू नायडू से, सपा के प्रतिनिधि अमर सिंह ही होते थे। वे सपा प्रमुख की एक बड़ी जरूरत बन गए। नेटवर्क में माहिर अमर सिंह को नेटवर्क नेता के रूप में भी जाना जाता है।
अमर सिंह पार्टी के लिए राजपूत वोट बैंक की दृष्टि से भी फायदेमंद थे। सपा जो केवल पिछड़ों और अल्पसंख्यकों की राजनीति के लिए जानी जाती थी, को राजपूतों का वोट मिलने की उम्मीद भी बंध गई। उनके आने के बाद पार्टी से कई राजपूत नेता जुड़े भी। लेकिन आजम खां जसे पुराने व जनाधार वाले नेता पार्टी से अलग भी हुए।
अमर सिंह के बोलबाले के दौर में पार्टी उस कांग्रेस के करीब जाने लगी, जिसका विरोध ही उसकी राजनीति का आधार था। कल्याण सिंह जसे नेता भी पार्टी में आए, जिसकी वजह से सपा के परंपरागत मुसलमान वोटर नाराज हो गए। एक अरसे से अमर नीति से परेशान सपा के जमीनी कार्यकर्ताओं में विरोध के स्वर मुखर होने लगे। इस बीच अपनी भूमिका कमजोर होती देख अमर सिंह ने पार्टी सुप्रीमो पर दबाव बनाने के लिए इस्तीफे की राजनीति अपनाई। पार्टी के सभी पदों से उन्होंने इस्तीफा दे दिया। पार्टी में रहते हुए ही उन्होंेने स्वयं को राजपूतों का सच्चा प्रतिनिधि बताते हुए लोकमंच का गठन किया। निश्चय ही उनका यह कदम पार्टी के खिलाफ बगावत का बिगुल था।
अमर सिंह का विवादों से हमेशा चोली-दामन का साथ रहा है। ‘वोट के बदले नोटज् कांड ऐसा ही एक मामला है। वर्ष 2008 में अमेरिका के साथ परमाणु समझौते को लेकर जब वामपंथी दलों ने कें्र की संप्रग सरकार से समर्थन वापस ले लिया था, तब अमर सिंह ही सरकार के लिए तारणहार बनकर आए थे। कांग्रेस को समर्थन के लिए उन्होंने सपा प्रमुख को मनाया। कहा तो यहां तक गया कि लोकसभा में नोटों से भरा जो बैग लहराया गया था, वह अमर सिंह ने ही भाजपा सांसदों को संप्रग के पक्ष में मतदान के लिए दिया था। अब सपा के नेता भी दबी जुबान से यह कहने लगे हैं, हालांकि तब उन्होंने इससे इनकार किया था। सपा के इस रवैये ने उसके परंपरागत वोट बैंक मुसलमानों को नाराज कर दिया, क्योंकि वे इस समझौते का विरोध कर रहे थे।
दिल्ली के जामिया नगर में हुए मुठभेड़ की जांच की मांग कर उन्होंने एक नए विवाद को जन्म दिया, जबकि इससे पहले उन्होंने मुठभेड़ में शहीद हुए दिल्ली पुलिस के जवान मोहन चंद शर्मा के परिवार को दस लाख रुपए की सहायता राशि देकर अपनी संवेदना जताई थी। 26/11 के बाद यह बयान देकर उन्होंने पार्टी के लिए मुश्किल खड़ी कर दी कि यदि हमलावर पाकिस्तान के नागरिक नहीं हुए तो सपा कें्र की यूपीए सरकार से समर्थन वापस ले लेगी। ऐसे गंभीर हालात में अमर सिंह के इस बयान ने पार्टी को हंसी का पात्र बना दिया। हाल ही में अमर सिंह की रुचि ‘ब्लॉगिंगज् में भी हो गई है। ‘बड़े भाईज् अमिताभ बच्चन से प्रेरणा लेकर उन्होंने अपना ब्लॉग भी शुरू किया।
अमर सिंह का जन्म सत्ताइस जनवरी, 1956 को उत्तर प्रदेश के आजमगढ़ जिले में हुआ। उनकी शुरुआती शिक्षा जिले के हिंदी माध्यम स्कूलों से ही हुई। लेकिन आगे की पढ़ाई के लिए उन्होंने पश्चिम बंगाल का रुख किया। वहां कोलकाता के सेंट जेवियर कॉलेज से उन्होंने उच्च शिक्षा प्राप्त की। अपने राजनीतिक करियर की शुरुआत उन्होंने कांग्रेस से की। सपा में शामिल होने से पहले वे कोलकाता में कांग्रेस के हार्डकोर नेता थे। 1980 के दशक में कांग्रेस के तत्कालीन नेता माधव राव सिंधिया ने उन्हें ऑल इंडिया कांग्रेस कमेटी के लिए भी नामांकित किया था, क्योंकि कोलकता में भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड के अध्यक्ष के लिए हुए चुनाव में उन्होंने जगमोहन डालमिया को हराने में सिंधिया की मदद की थी। बाद में वे हिंदुस्तान टाइम्स, सहारा इंडिया सहित कई अन्य कंपनियों के निदेशक भी बने। अब सपा से बाहर होने के बाद कहा जा रहा है कि वे घर वापसी यानी कांग्रेस में जाने की सोच रहे हैं। सपा नेताओं का भी आरोप है कि पिछले एक साल में कांग्रेस से उनकी नजदीकियां बढ़ी हैं।

मंगलवार, 2 फ़रवरी 2010

गांधी और मैं


राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की पुण्यतिथि (30 जनवरी) अभी-अभी बीती है। हर साल उनकी पुणयतिथि और जन्म तिथि (2 अक्टूबर) पर कुछ कार्यक्रम आयोजित उन्हें श्रद्धांजलि देकर हम अपने कर्तव्यों की इतिश्री समझ लेते हैं। कार्यक्रमों में उनके दर्शन की बात की जाती है, उनके बताए रास्तों पर चलने की बात की जाती है, लेकिन वास्तव में उन्हें आत्मसात कोई नहीं करता। उनके दर्शन, उनकी नीतियों पर अमल में कई मुश्किलों व अड़चनों का हवाला देकर उन्हें टाल दिया जाता है। कुछ युवा तो इन दिनों गांधी दर्शन को पुराना व अप्रसांगिक करार देते हुए इसकी आलोचना को फैशन समझने लगे हैं। लेकिन जहां तक मैंने गांधी को पढ़ा और समझा है, उनकी नीतियां व दर्शन मुङो हर तरह से प्रासंगिक लगे।

मेरे लिए गांधी का अर्थ है एक मजबूत इरादों वाला इंसान, जो अपने शुरुआती जीवन में निहायत ही संकोची स्वभाव के थे। तब उनमें कुछ भी ऐसा नहीं था, जो उन्हें असाधारण बना दे। अपने बचपन में वह भी दूसरे बच्चों की तरह ही थे, जो बुरी संगत में पड़ने पर सिगरेट के कश लेता है और घर में वैष्णव धर्म का अनुपालन होने के बावजूद छिपकर मांस भी खाता है। आम युवाओं की तरह उन्हें भी ‘पत्नी सुखज् प्रिय लगता है और वह भी इतना कि पिता की बीमारी में भी पत्नी से मिलने की इच्छा कम नहीं होती।
लेकिन एक चीज थी, जो गांधी को सबसे अलग करती है और जिसकी बदौलत वे आज हम सबके बीच आम नहीं, खास हैं; साधारण नहीं, असाधारण हैं। वह थी, सही और गलत को पहचानने की उनकी क्षमता। दिल की आवाज सुनने की क्षमता और उसके बताए रास्ते पर तमाम मुश्किलों के बाद भी चलने का दृढ़ निश्चय। मुङो लगता है कि यह क्षमता हम सबमें होती है, लेकिन हम उसका इस्तेमाल नहीं करते, या यूं कहें कि कर नहीं पाते और अक्सर सही-गलत के भंवर में फंसे रहते हैं।
सिगरेट का कश लगाने के बाद उन्हें यह एहसास होता है कि यह अनुचित है और बगैर किसी सलाह-मशविरे या दबाव के वह इसे छोड़ देते हैं। उन्हें यह भी एहसास होता है कि घरवालों को बिना बताए मांस खाकर उन्होंने ‘पापज् किया है। ‘पापज् का यह एहसास इतना तीव्र होता है कि आत्महत्या तक के खयाल आते हैं मन में। लेकिन इसे त्यागकर वे इस ‘पापज् का प्रायश्चित भी करते हैं और पूरी दुनिया को इस तर्क के साथ शाकाहार के लिए प्रेरित करते हैं कि जिस प्रकार मनुष्य को जीने का हक है, उसी तरह जानवरों को भी जीवन का अधिकार है और मानव को उसकी हत्या का कोई हक नहीं है। साथ ही, वे यह भी कहते हैं कि मनुष्य के शरीर की बनावट कुछ इस तरह है कि वह केवल कंद-मूल खाकर भी स्वस्थ रह सकता है, जसा कि प्राचीन मानव करता था। फिर भोजन के लिए जीव हत्या क्यों?
‘पत्नी सुखज् के प्रति हमेशा आकर्षित रहने वाले गांधी बाद में इसे तृष्णा बताते हुए ब्रह्मचर्य का व्रत लेते हैं और उसका अनुपालन भी करते हैं। गांधी जब पढ़ाई के लिए ब्रिटेन जाते हैं, तो आम युवाओं की तरह वे भी स्वयं को वहां अविवाहित दिखाना चाहते हैं। युवतियों का साथ उन्हें भी अच्छा लगता है। लेकिन जल्द ही उन्हें एहसास होता है कि यह ‘झूठज् है और पत्नी के साथ ‘अन्यायज् भी। सत्य का यह पुजारी उस झूठ को अधिक दिनों तक ढो नहीं पाता।
तो कहां हैं गांधी हम सबसे अलग? क्या वे हम सबके बीच के, हम सबके जसे ही नहीं हैं? हैं, बिल्कुल हैं। लेकिन उनमें सत्य को लेकर जो आग्रह था, वह हम सबमें कहां? गांधी जो थे, वही दिखते थे और दिखना चाहते भी थे। लेकिन आज हम हैं कुछ और, जबकि दिखना चाहते हैं कुछ और। कुल मिलाकर, आज हमारे खाने के दांत हाथी की तरह ही अलग और दिखाने के अलग हैं। हम सबने झूठ व फरेब का आवरण ओढ़ रखा है, जिसे उतार फेंकने की जरूरत है।
मेरे लिए गांधी का अर्थ एक ऐसे दृढ़ निश्चयी इंसान से भी है, जो पत्नी और बच्चों के बुरी तरह बीमार पड़ने पर भी उन्हें मांस व मदिरा देने के डॉक्टरी सलाल को दरकिनार करते हुए उनके स्वास्थ्य लाभ के लिए देसी तरीके अपनाता है और इसमें जीतता भी है। हालांकि मैं यह नहीं कहती और न ही गांधी जी ने कहा था कि हम सबको भी बीमारी से पार पाने का वही तरीका बिना सोचे-समङो अपनाना चाहिए। पर, इतना तो जरूर है कि उस इंसान ने विपरीत परिस्थितियों में भी हिम्मत नहीं हारी और अपने निश्चय पर अडिग रहने की सीख दी।
मेरे लिए गांधी का अर्थ ऐसे संवेदनशील इंसान से भी है, जिसने देश-दुनिया का भ्रमण करने के बाद जब यह देखा कि एक बड़ी आबादी के पास पहनने के लिए कपड़े तक नहीं हैं, तो उन्होंने स्वयं भी सिर्फ धोती से तन ढंकने का निर्णय लिया। उनके इस निर्णय ने कई लोगों को आश्चर्य में डाला। ब्रिटिश अधिकारियों ने उन पर फब्तियां भी कसी। उन्हें ‘अधनंगा फकीरज् कहा। लेकिन अपने इस निर्णय से यह अधनंगा फकीर लाखों-करोड़ों दिलों का सम्राट बन बैठा।
मेरे लिए गांधी का अर्थ एक ऐसे इंसन से है, जो उस वक्त मुङो सहारा देता है, जब निराशा हर तरफ से मुङो घेर लेती है, वह चाहे व्यक्तिगत स्तर पर हो या व्यावसायिक स्तर पर। गांधी का यह जंतर कि जब भी दु:खी होओ, अपने से अधिक दु:खी लोगों के बारे में सोचो, मुङो बहुत सुकून देता है। खुद को कष्ट पहुंचाने वाले को माफ कर देने का उनका प्रयोग भी अद्भुत है। कई बार मैंने महसूस किया कि खुद को आहत करने वाले को कष्ट देने के लिए हम जो भी कोशिश करते हैं, उससे कहीं न कहीं हम स्वयं भी आहत होते हैं। मैंने कई बार यह भी समझा कि बदले की आग में जलना किसी सजा से कम नहीं होता। सामने वाले को तो सजा तब मिलती है, जब हम कुछ ऐसा कर बैठते हैं, जिससे उसे तकलीफ हो; लेकिन बदले की यह आग इतनी देर में हमें बहुत तकलीफ दे जाती है।
इसी तरह, उनके ‘आत्मसंयमज् के सिद्धांत को हम कैसे नकार दें? खासकर, उपभोक्तावाद और बाजारवाद के इस युग में जबकि हम सबको इसकी बेहद जरूरत है, व्यक्तिगत संबंधों में भी और बाजार-उपभोक्ता के संबंधों में भी। अगर इसका अनुपालन किया गया होता तो आर्थिक संकट एकबार फिर सिर नहीं उठाता। इसी तरह, एक बेहतर इंसान बनने के लिए तो इसकी और भी जरूरत है।
गांधी मुङो हर वक्त संयम न खोने की प्रेरणा देते हैं। किसी के लिए मन में दुर्विचार लाकर अपने और उसके प्रति मानसिक हिंसा नहीं करने की सीख देते हैं और हर बुरे वक्त में मेरा संबल व सहारा बनते हैं। हालांकि उनकी कई बातें विरोधाभासी हैं और सबका अनुपालन या अनुसरण नहीं किया जा सकता, क्योंकि आज परिस्थितियां और हालात काफी हद तक बदल गए हैं, लेकिन आज भी मुङो देश-दुनिया की अधिकांश समस्याओं का समाधान गांधी दर्शन में नजर आता है, यहां तक कि नक्सलवाद और आतंकवाद का भी, क्योंकि हिंसा की जवाबी कार्रवाई और फिर उसकी प्रतिक्रिया में की गई हिंसा का कोई अंत नहीं हो सकता।

सोमवार, 1 फ़रवरी 2010

बवाल में चटवाल

संत सिंह चटवाल को पद्मश्री मिलने पर काफी बवाल है। बिल और हिलेरी क्लिंटन के साथ अक्सर दिखने वाले चटवाल को लोग उनकी अमीरी औरे बेटे की शाही शादी के लिए भी जानते हैं। यह भी सच्चाई है कि उन्होंने अपना साम्राज्य अपनी मेहनत से खड़ा किया। एक बेहद छोटी शुरुआत से शानदार समृद्धि की उनकी यात्रा सफलता की एक बड़ी कहानी है। पर विवाद और घोटाले भी उनसे जुड़े हुए हैं।

संत सिंह चटवाल, भारतीय मूल के अमेरिकी व्यवसायी। बॉम्बे पैलेस रेस्तरां की श्रंखला और हैम्पशायर होटल व रिजार्ट के मालिक। इस बार गणतंत्र दिवस पर उन्हें श्रेष्ठ नागरिक सम्मान में से एक पद्मश्री पुरस्कार से नवाजा गया। अमेरिका सहित दुनिया के अन्य देशों में ‘इंडियन करी के बादशाहज् नाम से मशहूर चटवाल ने विदेशों में भारतीय व्यंजन की खूब धाक जमाई। उनके होटलों व रेस्तरां में लोग भारतीय व्यंजन का खूब स्वाद ले रहे हैं। भारत के कई शहरों में भी उनके होटल व रेस्तरां हैं, जहां लोगों को स्वादिष्ट भोजन परोसा जाता है। कुल मिलाकर, करोड़ों-अरबों का व्यवसाय। लेकिन उनके पद्मश्री ने कई के मुंह का जायका बिगाड़ दिया है।
लेकिन चटवाल की शख्सियत का एक अन्य पहलू भी है और वह बेहद विवादास्पद है। कई ऐसे मामले हैं, जिन्होंने चटवाल को विवादों में घेरा। क्लिंटन दंपति से उनके रिश्ते की बात हो या बेटे की सबसे खर्चीली शादी का मामला या फिर बैंकों से ण लेकर धांधली के आरोप, सबने उनकी विवादित छवि ही पेश की। लेकिन इन सबका उनके व्यवसाय पर कोई फर्क नहीं पड़ा। वह दिन-दूना रात-चौगुना बढ़ता ही रहा। चटवाल की विवादास्पद छवि की वजह से ही उन्हें पद्म पुरस्कार दिए जाने पर विवाद पैदा हुआ। भाजपा ने राष्ट्रपति व प्रधानमंत्री को पत्र लिखकर उनसे पुरस्कार वापस लेने की मांग की तो कांग्रेस के कुछ नेताओं ने भी पूरी प्रक्रिया से दूरी बनाए रखी।
चटवाल का जन्म 1946 में रावलपिंडी में हुआ था, जो आज पाकिस्तान का हिस्सा है। पाकिस्तान के पंजाब प्रांत के फरीदकोट में उनके पिता की एक छोटी सी चाय की दुकान थी। विभाजन के बाद उनका परिवार भारत आ गया। जाहिर तौर पर एक सफल व्यवसायी के रूप में चटवाल को यह कामयाबी विरासत में नहीं मिली। यह सब उन्होंने अपनी मेहनत से हासिल किया। हां, पिता एक छोटे से व्यवसायी थे और इसका लाभ उन्हें इतना जरूर मिला कि विरासत में उन्हें व्यवसाय की बारीकियों को जानने-समझने व सीखने का मौका मिला। अपनी इस जानकारी का इस्तेमाल उन्होंने विदेशों में अपना व्यवसाय बढ़ाने के लिए किया।
बचपन से ही चटवाल को ऊंची व गगनचुंबी इमारतें लुभाती थीं। वे ऊंची उड़ान भरने का सपना देखते थे। उनका सपना तब साकार हुआ, जब वे भारतीय नौसेना में पायलट बने। लेकिन यह उनके लिए काफी नहीं था। वे और ऊंची उड़ान भरना चाहते थे। उनका सपना कुछ अलग करने का था। अपने सपनों को उड़ान देने के लिए चटवाल ने 1970 के दशक में विदेश का रुख किया था। सबसे पहले वे पूर्वी अफ्रीका के देश इथियोपिया गए। वहां उन्होंने मेहमान नवाजी के क्षेत्र में अपना नया करियर शुरू किया। उन्होंने ‘उमर खय्यामज् नाम से रेस्तरां खोला और लोगों को भारतीय व्यंजन परोसना शुरू किया, जो उन्हें खूब रास आया। लेकिन उनका व्यवसाय यहां अधिक दिनों तक टिक नहीं पाया। 1974 में इथियोपिया के सम्राट हेल सेलसी का तख्ता पलट हो गया और चटवाल को वह देश छोड़ना पड़ा। अब तक उन्होंने जो भी बचत की थी, उसे लेकर वे कनाडा रवाना हो गए और वहां मांट्रायल में रेस्तरां खोला। वहां भारतीय व्यंजन परोसने के बजाए उन्होंने लोगों को ऐसा व्यंजन परोसना शुरू किया, जो भारतीय व फ्रांसीसी खानपान का मिलाजुला रूप था।
लेकिन चटवाल इससे भी बड़ा कुछ करना चाहते थे। इसलिए उन्होंने अमेरिका का रुख किया। 1979 में वे न्यूयॉर्क गए और वहां पहला बॉम्बे पैलेस रेस्तरां खोला। धीरे-धीरे उन्होनें अमेरिका के कई शहरों में इसकी शाखाएं खोली। आज अमेरिका के बेवर्ली हिल, शिकागो, डेनेवर, मियामी, ह्यूस्टन, सैन फ्रांसिस्को व वाशिंगटन डीसी के अलावा टोरंटो, वैनकोवर, बैंकाक, बुडापेस्ट, कुआलालंपुर, हांगकांग, लंदन, मांट्रायल और नई दिल्ली में भी इसकी कई शाखाएं हैं।
अमेरिका में होटल व्यवसाय स्थापित करने के दौरान चटवाल की नजदीकियां क्लिंटन परिवार से बढ़ीं। क्लिंटन परिवार से उनकी नजदीकियों ने कई विवादों को जन्म दिया। कहा गया कि राष्ट्रपति रहते हुए बिल क्लिंटन ने उन्हें कर भुगतान सहित कई मामलों में राहत पहुंचाई, जिसके बदले चटवाल ने क्लिंटन परिवार को खूब वित्तीय मदद दी। साल 2007 में चुनाव अभियान के दौरान राष्ट्रपति पद के लिए डेमोक्रेटिक पार्टी की उम्मीदवार व पूर्व राष्ट्रपति बिल क्लिंटन की पत्नी हिलेरी क्लिंटन के लिए उन्होंने 50 लाख अमेरिकी डॉलर का फंड इकट्ठा किया।
वे विलियम जे. क्लिंटन फाउंडेशन के ट्रस्टी भी हैं, जो स्वास्थ्य सुरक्षा, आर्थिक सशक्तिकरण के लिए काम करती है। जाहिर तौर पर फाउंडेशन के लिए उन्होंने खूब वित्तीय संसाधन जुटाए। क्लिंटन परिवार से उनकी नजदीकियों का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि वे उनके घर अक्सर डिनर व लंच के लिए आते हैं। बिल व हिलेरी क्लिंटन की कई यात्राओं में चटवाल उनके साथ भारत आए। जब हिलेरी अमेरिका की विदेश मंत्री बनीं, तो यहां तक कहा गया कि चटवाल उप विदेश मंत्री बन सकते हैं। इसके अलावा, जॉन कैरी, चार्ल्स शूमर, नैन्सी पेलोसी, जोसेफ क्राउली से भी उनके अच्छे संबंध हैं। आरोप है कि व्यक्तिगत हितों के लिए उन्होंने अपने राजनीतिक संपर्को का खूब इस्तेमाल किया।
उनसे जुड़ा यह एकमात्र विवाद नहीं है। उन पर लिंकन सेविंग्स, फर्स्ट न्यूयॉर्क बैंक फॉर बिजनेस, बैंक ऑफ बड़ौदा, बैंक ऑफ इंडिया और स्टेट बैंक ऑफ इंडिया सहित कई अमेरिकी व भारतीय बैंकों से ण लेकर गलत आधार पर स्वयं को दिवालिया घोषित करने का आरोप है। भारतीय बैंकों से धांधली के मामले में सीबीआई ने उन्हें गिरफ्तार भी किया, लेकिन वे बच निकलने में कामयाब रहे। अमेरिका के कई समाचार-पत्रों ने इन मुद्दों को प्रमुखता से छापा। चुनाव अभियान के दौरान ये खबरें हिलेरी क्लिंटन के लिए शर्मिदगी का कारण बनीं, तो भारत में यह कहते हुए बुद्धिजीवियों और राजनीतिक दलों के नेताओं ने उनकी आलोचना की कि इससे विदेशों में भारतीयों की गलत छवि पेश हो रही है। 1980 के दशक में अमेरिका के प्रतिभूति एवं विनिमय आयोग ने बॉम्बे पैलेस श्रंखला के संदर्भ में गलत दस्तावेज पेश करने के लिए उन पर आजीवन किसी सार्वजनिक कंपनी का निदेशक या अधिकारी बनने का प्रतिबंध लगा दिया।
बेटे विक्रम चटवाल की शादी के आयोजन को लेकर भी वे सुर्खियों में रहे। फरवरी, 2006 में विक्रम की शादी भारतीय मॉडल प्रिया सचदेव से हुई। विवाह समारोह का आयोजन दिल्ली में हुआ था, जिसमें लक्ष्मी मित्तल, अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति बिल क्लिंटन सहित कई बड़ी हस्तियां शामिल थीं। शादी समारोह की कवरेज के लिए विभिन्न देशों से 30 भाषाओं के सौ पत्रकार बुलाए गए थे। इसे ‘सदी की शादीज् का नाम देते हुए ‘भारत का अबतक का सबसे महंगा विवाह समारोहज् कहा गया।
इन विवादों से अलग चटवाल ने अमेरिका में अनिवासी भारतीयों के हितों की बात भी उठाई। सभी आरोपों से अलग उनका यह भी दावा रहा है कि अमेरिका में अपने राजनीतिक संपर्को का इस्तेमाल उन्होंने व्यक्तिगत हितों के लिए नहीं, बल्कि भारतीय समुदाय और अमेरिकियों के बीच नजदीकियां व सामंजस्य स्थापित करने में किया। शायद यही वजह रही कि उन्हें पंजाब सरकार ने अप्रैल, 1999 में उन्हें ‘ऑर्डर ऑफ खालसाज् सम्मान से नवाजा। यह सम्मान पाने वाले वे भारतीय मूल के एकमात्र अमेरिकी हैं।

सोमवार, 18 जनवरी 2010

लोकतंत्र की सयानी बेटी

शेख हसीना बड़ी जीवट वाली महिला हैं। बेहद जुझारू। अपने यशस्वी पिता शेख मुजीबुर्रहमान से राजनीति विरासत में पाई। लेकिन उन्हें काफी संघर्ष के बाद सत्ता मिली। उनका संघर्ष बांग्लादेश में लोकतंत्र की स्थापना को लेकर भी था। इसलिए भी उन्हें लोकतंत्र की बेटी कहा जाता है। हाल ही में उन्हें इंदिरा गांधी शांति सम्मान दिया गया।

बांग्लादेश में लोकतंत्र की स्थापना के लिए अगर किसी नेता का नाम लिया जाएगा, तो वह शेख हसीना होंगी। शायद यही वजह है कि उन्हें न केवल बांग्लादेश में, बल्कि पूरी दुनिया में ‘लोकतंत्र की बेटीज् कहा जाता है। शेख हसीना, बांग्लादेश की मौजूदा प्रधानमंत्री और वहां के प्रमुख राजनीतिक दल अवामी लीग की अध्यक्ष हैं, जो पिछले करीब तीन दशक से पार्टी का नेतृत्व कर रही हैं।
लोकतंत्र की स्थापना के लिए बांग्लादेश में उन्होंने जो लंबी लड़ाई लड़ी, उसने उनकी छवि जुझारू नेता के रूप में स्थापित की। बीबीसी ने उन्हें ‘आयरन लेडीज् कहा, जो लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए सालों निर्वासन में रहीं। लोगों के लोकतांत्रिक अधिकारों के लिए हमेशा लड़ती रहीं, लेकिन समझौता नहीं किया। वे गरीबों के हक के लिए भी उतनी ही संवेदनशील हैं और भ्रष्टाचार को भी समाप्त करना चाहती हैं। उन्हें दो बार सत्ता मिली। पहली बार 1996 से 2001 तक और दूसरी बार 2008 में, जिसके बाद वे अब तक सत्तासीन हैं। अपने शासनकाल के दौरान उन्होंने जो भी योजनाएं लागू कीं, उनकी राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय मीडिया में खूब चर्चा हुई। हालांकि कुछ विवादों ने भी उनका पीछा नहीं छोड़ा। जनता ने कभी सिर-आंखों पर बिठाया तो कभी पटखनी भी दी। उन पर भ्रष्टाचार, रिश्वतखोरी के आरोप भी लगे। लेकिन लोकतांत्रिक ताकतों को मजबूत करने की उनकी मुहिम ने ऐसे आरोपों को काफी हद तक दबा दिया।
राजनीति में उन्होंने अपने पिता शेख मुजीबुर्रहमान के नाम को खूब भुनाया और बार-बार दोहराया कि बांग्लादेश की नींव रखने वाले शेख मुजीबुर्रहमान ने वहां जिस भयमुक्त और लोकतांत्रिक समाज की कल्पना की थी, उसकी स्थापना के लिए वे हर संभव कोशिश करेंगी, भले इसकी कीमत उन्हें भी पिता की तरह जान देकर क्यों न चुकानी पड़े। जाहिर तौर पर हसीना की इस बेबाकी और प्रतिबद्धता ने लोगों का ध्यान अपनी ओर खींचा और वह एक ताकतवर नेता के रूप में उभरने लगीं।
स्वतंत्र व निष्पक्ष चुनाव के लिए उन्होंने बांग्लादेश में केयर टेकर गवर्नमेंट का सुझाव दिया, जो राजनीतिक विश्लेषकों को खूब भाया। उन्होंने इसे आने वाले दिनों में तीसरी दुनिया के अन्य देशों में भी चुनाव प्रक्रिया के लिए एक बेहतर व अनुकरणीय कदम बताया। भारत के साथ संबंधों को लेकर भी शेख हसीना का रवैया वहां के अन्य राजनीतिक दलों से अलग रहा है। वे और उनकी पार्टी ने हमेशा भारत के साथ मधुर संबंधों को तवज्जो दी। यही वजह है कि जब-जब बांग्लादेश में अवामी लीग की सरकार बनी, भारत में उम्मीद की गई कि अब वहां भारत विरोधी ताकतों पर अंकुश लग सकेगा। पड़ोसी पाकिस्तान के अलावा बांग्लादेश ही है, जहां भारत विरोधी ताकतें सबसे अधिक सक्रिय हैं।
अट्ठाइस सितंबर, 1947 को गोपालगंज जिले के छोटे से गांव तुंगीपारा में जन्मी हसीना ने राजनीतिक जीवन की शुरुआत छात्र नेता के रूप में की। पांच भाई-बहनों में हसीना सबसे बड़ी थीं। गरीबों व जरूरतंदों के लिए स्नेह की भावना उन्हें मां बेगम फजीलतुन्नेसा से विरासत में मिली। साल 1968 में परमाणु वैज्ञानिक डॉक्टर एमए वाजेद से उनका विवाह हुआ। इस बीच उन्होंने अपनी पढ़ाई जारी रखी। 1973 में ढाका विश्वविद्यालय से उन्होंने स्नातक किया। राजनीतिक सूझबूझ व सक्रियता उन्हें विरासत में मिली थी। कॉलेजों व विश्वविद्यालयों में छात्र राजनीति में वे खूब सक्रिय रहीं। बांग्लादेश मुक्ति संग्राम के समय उन्हें गिरफ्तार भी किया गया। 1971 में बांग्लादेश के गठन के बाद राजनीति में उनकी भागीदारी काफी कम रही। समझा जा रहा था कि उनके भाई शेख कमल ही पिता की राजनीतिक विरासत को आगे बढ़ाएंगे। लेकिन नियति को कुछ और ही मंजूर था। पं्रह अगस्त, 1975 को एक सैन्य व्रिोह में शेख मुजीबुर्रहमान सहित हसीना के तीनों भाइयों और मां की हत्या कर दी गई। तब हसीना और उनकी बहन पश्चिमी जर्मनी में छुट्टियां मना रही थीं। बांग्लादेश की तत्कालीन सरकार ने देश में उनके प्रवेश पर प्रतिबंध लगा दिया। पहले ब्रिटेन में और फिर भारत में उन्होंने निर्वासित जीवन बिताया। इस बीच वे अवामी लीग की मजबूती के लिए काम करती रहीं। सत्रह मई, 1981 को उन्हें बांग्लादेश लौटने की अनुमति मिली। तब देश में सैन्य शासन ही था।
लंबे समय के सैन्य शासन के बाद वर्ष 1991 में वहां पहली लोकतांत्रिक चुनाव हुए। लेकिन हसीना की पार्टी दूसरे नंबर पर रही। बांग्लादेश नेशनललिस्ट पार्टी पहले नंबर पर रही और उसकी नेता खालिदा जिया देश की पहली महिला प्रधानमंत्री बनीं। हसीना ने बीएनपी पर चुनाव में धांधली का आरोप लगाया। उन्होंने अगला चुनाव केयर टेकर गवर्नमेंट की देखरेख में करवाने और इसके लिए संविधान में प्रावधान करने की मांग रखी। काफी विरोध के बाद बीएनपी सरकार ने संविधान में केयर टेकर गवर्नमेंट का प्रावधान किया। उसी साल जून में न्यायाधीश हबीबुर्रहमान केयर टेकर गवर्नमेंट के मुखिया बने। उनके नेतृत्व में चुनाव हुए। 299 सदस्यीय संसद में अवामी लीग को 146 सीट मिली। कुछ अन्य दलों के सहयोग से उसकी सरकार बन गई और हसीना प्रधानमंत्री बनीं।
अपने इस कार्यकाल के दौरान हसीना ने कई महत्वपूर्ण काम किए। उनकी सरकार की सबसे महत्वपूर्ण उपलब्धि भारत के साथ फरक्का बांध समझौता रही। इसके बाद उन्होंने देश के दक्षिण-पूर्वी हिस्से में जनजातीय व्रिोहियों के साथ शांति समझौता किया, जिससे व्रिोही गतिविधियों में कुछ हद तक कमी आई। गरीबों को छत मुहैया कराने के लिए उन्होंने ‘आश्रयणज् योजना शुरू की।
इस बीच उनकी सरकार पर भ्रष्टाचार और राजनीति के अपराधीकरण को बढ़ावा देने के आरोप भी लगे। विपक्ष ने इन मुद्दों को खूब भुनाया। शायद यही वजह रही कि वर्ष 2001 में जब चुनाव हुए तो अवामी लीग केवल 62 सीटों पर सिमट गई, जबकि बीएनपी के नेतृत्व में चार दलों के गठबंधन को दो-तिहाई बहुमत मिला। वर्ष 2007 में बांग्लादेश में परिस्थतियां बदलीं, वहां आपातकाल लगा दिया गया और चुनाव स्थगित कर दिए गए। तब हसीना अमेरिका में थीं। अंतरिम सरकार ने उनके देश लौटने पर प्रतिबंध लगा दिया। लेकिन सरकारी विरोध के बावजूद सात मई, 2007 को वह बांग्लादेश आईं। हजारों समर्थकों ने हवाई अड्डे पर उनका स्वागत किया। पुलिस ने उन्हें घर में ही नजरबंद कर दिया। इस बीच नवंबर, 2008 में वहां चुनाव हुए, जिसमें अवामी लीग को 230 सीटें मिली और हसीना एकबार फिर प्रधानमंत्री बनीं।
शेख हसीना ने छह साल भारत में भी गुजारे। वित्त मंत्री प्रणव मुखर्जी और उनके परिवार में काफी घनिष्ठता है। प्रणव दा की पत्नी उनकी बेहद करीबी मित्र हैं। खास मौकों पर वे अब भी फोन करने से नहीं चूकतीं, जबकि प्रणव मुखर्जी उनसे कहते हैं कि अब आप प्रधानमंत्री हैं और प्रोटोकॉल भी कोई चीज होती है। जवाब में उनका कहना होता है कि उससे ज्यादा महत्वपूर्ण प्रणव दा आप हैं।

जुमा जुमा पांच

जकब जुमा अजब शख्सियत के मालिक हैं। वे दक्षिण अफ्रीका के राष्ट्रपति हैं। उनके जीवन की अनेक रंगते हैं। वे जुझारू हैं, पर बेहद विवादास्पद। वे संजीदा राजनेता हैं, पर बेहद रोमांटिक। वे लोकप्रिय हैं, पर बदनामी पीछा नहीं छोड़ती। वे साम्यवादी-समाजवादी समझ रखते हैं, पर निजी जिंदगी में सामंतवाद छाया हुआ है। अभी उन्होंने पांचवीं शादी रचाई है।


सार्वजनिक जीवन में बेहद जुझारू तो निजी जीवन में बेहद रोमांटिक। कई मामलों में बेहद विवादास्पद भी। ये हैं दक्षिण अफ्रीका के राष्ट्रपति जकब जुमा। कभी उप-राष्ट्रपति रह चुके जुमा पर सत्ता में रहते हुए भ्रष्टाचार, जबरन वसूली सहित बलात्कार जसे संगीन आरोप भी लगे। अदालतों में सुनवाई हुई। मीडिया में मामला उछला। लेकिन जनता और कार्यकर्ताओं के बीच लोकप्रियता कम न हुई।
हाल ही में उन्होंने पांचवीं शादी रचाकर सनसनी मचा दी। उन्हें इसमें कोई बुराई नजर नहीं आती। वे बड़ी साफगोई से कहते हैं कि अन्य राजनेता भी घर के बाहर दूसरी औरतों से लुके-छिपे संबंध रखते हैं। मैंने यह खुलेआम किया और ब्याह रचाया, तो इस पर ऐतजराज क्यों? और फिर, एक के सिवा किसी को छोड़ा भी तो नहीं। सब साथ में हैं। यहां बता दें कि उनकी पहली पत्नी का देहांत हो चुका है, जबकि एक से तलाक हो चुका है। शेष तीन पत्नियां अब भी उनके साथ हैं। तीनों की अलग-अलग क्षेत्रों में रुचि है और इसमें उन्हें महारत भी हासिल है।
सड़सठ वर्षीय जुमा की हर शादी के बाद उनकी पत्नियों में तनाव की स्वाभाविक खबर उड़ी। हर बार यह सवाल पैदा हुआ कि अब देश की प्रथम महिला का दर्जा किसे हासिल होगा? कौन राष्ट्रपति की आधिकारिक यात्राओं में उनके साथ होंगी। इस बार भी यह सवाल बरकरार था। लेकिन राष्ट्रपति भवन ने साफ कर दिया कि जुमा की नई शादी को लेकर उनकी पत्नियों में कोई मतभेद नहीं है। सभी उसी तरह मिलजुलकर रहेंगी, जसे कभी राजे-रजवाड़े के दिनों में महाराजों की कई पत्नियां साथ रहा करती थीं। इन पांच औपचारिक शादियों के अलावा भी जुमा के कई महिलाओं से अंतरंग संबंध रहे हैं। अब भी हैं। जुमा की एक अन्य मंगेतर हैं, जिनसे आने वाले दिनों में वे शादी रचा सकते हैं।
बारह अप्रैल, 1942 को दक्षिण अफ्रीका के कवाजुलू नटल प्रांत में जन्मे जुमा के शुरुआती जीवन की बात की जाए तो वह बेहद अभाव में गुजरा। पिता पुलिस में थे। लेकिन बचपन में ही बेटे के सिर से पिता का साया उठ गया। द्वितीय विश्वयुद्ध के आखिर में उनकी मौत हो गई। मां ने डरबन के घरों में छोटा-मोटा काम कर बेटे का पालन-पोषण किया। मां को सहयोग देने के लिए केवल पं्रह वर्ष की उम्र से जुमा ने भी काम शुरू कर दिया, जिसके बाद पढ़ाई-लिखाई बहुत पीछे छूट गई। जुमा ने केवल तीसरी तक पढ़ाई की। उसमें भी वे अच्छा नहीं कर पाए। पांचवीं ग्रेड में जसे-तैसे उन्होंने परीक्षा पास की। इस तरह जुमा का बचपन डरबन और जुलूलैंड के बीच आते-जाते बीता।
इस बीच वे कई ट्रेड यूनियनों के संपर्क में आए, जिसका उन पर गहरा प्रभाव पड़ा। इनके आदर्शो और सोच ने ही उन्हें राजनीति में आने के लिए प्रेरित किया। केवल सत्रह साल की उम्र में 1959 में वे अफ्रीकन नेशनल कांग्रेस (एएनसी) से जुड़ गए। हालांकि अगले ही साल इस पर प्रतिबंध लग गया, जिसके बाद 1963 में जुमा दक्षिण अफ्रीकन कम्युनिस्ट पार्टी से जुड़ गए। लेकिन कम्युनिस्ट पार्टी के कार्यकर्ता के रूप में भी वे अधिक दिनों तक काम नहीं कर सके। सरकार को उखाड़ फेंकने की कोशिश के आरोप में 45 लोगों को गिरफ्तार किया गया, जिसमें जुमा भी शामिल थे। नेल्सन मंडेला सहित एएनसी के अन्य लोकप्रिय नेताओं के साथ उन्होंने दस साल जेल में गुजारे।
जेल से निकलने के बाद उन्होंने एक बार फिर एएनसी को खड़ा करने की कोशिश की। उन्होंने दक्षिण अफ्रीका छोड़ दिया और स्वाजिलैंड व मोजाम्बिक में निर्वासित जीवन बिताया। वहां वे एएनसी की मजबूती के लिए काम करते रहे। फरवरी 1990 में जब पार्टी पर से प्रतिबंध खत्म हुआ तो स्वदेश लौटने वालों में जुमा पहले नेता थे। तब तक जुमा सर्वप्रिय नेता बन चुके थे। 1999 से 2005 के बीच वे दक्षिण अफ्रीका के उप राष्ट्रपति भी रहे। इस बीच भ्रष्टाचार, जबरन वसूली सहित बलात्कार के संगीन आरोप भी उन पर लगे, जिसके बाद तत्कालीन राष्ट्रपति थाबो म्बेकी ने उन्हें अपने पद से हटा दिया। लेकिन इससे न तो उनकी लोकप्रियता में कमी आई और न ही समर्थकों ने उनका साथ छोड़ा। दिसंबर 2007 में म्बेकी को हराकर वे पार्टी के अध्यक्ष बने। सितंबर 2008 में एनएनसी ने म्बेकी को वापस बुला लिया और साफ कर दिया कि अगले साल होने वाले आम चुनाव के बाद पार्टी जीती तो राष्ट्रपति जुमा ही होंगे। मई 2009 के आम चुनाव में उनकी पार्टी भारी बहुमत से जीतकर आई और वे राष्ट्रपति बन गए। जुमा की आर्थिक नीतियां काफी हद तक समाजवाद के करीब प्रतीत होती हैं। एक ओर उन्होंने निवेशकों को उनके हितों की सुरक्षा का आश्वासन दिया तो दूसरी ओर वंचितों के बीच संपत्तियों के पुनर्वितरण पर भी जोर दिया।
एक लोकप्रिय व जुझारू नेता से अलग जुमा की छवि काफी विवादास्पद भी रही है। उन्होंने कई बार ऐसे बयान दिए और ऐसा काम किया, जिससे वे सुर्खियों में रहे। उन्होंने यह कहते हुए धार्मिक समूमहों को नाराज कर दिया कि जीसस ने एएनसी को दक्षिण अफ्रीका में शासन करने के लिए कहा है और वह तब तक शासन करती रहेगी, जब तक जीसस लौट नहीं आते। वहीं, दक्षिण अफ्रीका में रहने वाले गोरों की यह कहते हुए नाराजगी मोल ले ली कि यहां रहने वाले सभी गोरे समूहों में केवल अफ्रीकन ही सही मायने में दक्षिण अफ्रीकी हैं। मीडिया से भी उनका छत्तीस का आंकड़ा रहा। उन पर लगे भ्रष्टाचार व बलात्कार के आरोप को मीडिया ने प्रमुखता से उछाला, जिसने जुमा को नाराज कर दिया। लेकिन जुमा अंतत: सभी मामलों से बरी हो गए और उन्होंने कई मीडिया संगठनों पर करोड़ों में मानहानि का मुकदमा ठोक दिया। समान लिंगी विवाह को ईश्वर और देश दोनों के लिए शर्मनाक बताते हुए उन्होंने यहां तक कह दिया कि यदि उनके सामने कोई लेस्बियन या होमो आ जाए तो वे उन्हें धक्का देकर भगा देंगे। हालांकि इस बयान के व्यापक विरोध के बाद उन्होंने माफी भी मांगी और देश के विकास में ऐसे लोगों के योगदान को भी स्वीकार किया। उधर, पश्चिमी सहारा की स्वतंत्रता का समर्थन करने पर उन्हें मोरक्को के राजदूत की आलोचना भी ङोलनी पड़ी।

एक गुरूजी, सब चेला

शिबू सोरेन की क्या-क्या फजीहत नहीं हुई, पर उनकी राजनीति लुहार की एक चोट की तरह सब पर भारी पड़ी। झारखंड चुनाव में उनके जनाधार वाले नेता की छवि फिर सामने आई। वहीं, उनकी हुनर व फायदेमंद राजनीति को भी उजागर किया। यूपीए से एनडीए के संग जाते उन्हें देर नहीं लगी और वे तीसरी बार मुख्यमंत्री बन गए।


शिबू सोरेन, झारखंड के नए मुख्यमंत्री। समर्थकों के बीच गुरूजी के नाम से मशहूर सोरेन राजनीति के चतुर खिलाड़ी हैं। राज्य गठन के नौ वर्षो में वहां सात बार सरकार बनी, जिसमें सोरेन ने अपनी राजनीतिक सूझ-बूझ व दांव-पेंच का इस्तेमाल करते हुए तीसरी बार मुख्यमंत्री बनने का गौरव हासिल किया। हालांकि पिछली दो बार का उनका कार्यकाल काफी छोटा रहा। पहला 2005 में सिर्फ नौ दिन का, जब विधानसभा में बहुमत साबित नहीं कर पाने के कारण उनकी सरकार गिर गई और दूसरा अगस्त 2008 से जनवरी 2009 के बीच करीब चार माह का, जब तमार विधानसभा सीट से उपचुनाव हार जाने के बाद उन्हें इस्तीफा देना पड़ा।
हजारीबाग जिले के नेरमा गांव में ग्यारह जनवरी 1944 को जन्मे सोरेन की छवि जूझारू व विवादास्पद नेता की रही है। जमींदारों और ‘बाहरियोंज् के खिलाफ आंदोलन छेड़कर आदिवासियों के बीच वे हीरो बन बैठे, तो 1991 में कें्र की नरसिम्हा राव सरकार को बचाने के लिए वोटोंे की खरीद-फरोख्त मामले में उनकी मिलीभगत ने उन्हें एक अवसरवादी नेता के रूप में पेश किया। चिरुडीह नरसंहार और अपने निजी सचिव शशिनाथ झा की हत्या के मामले में अदालती फैसले ने उनके आपराधिक चेहरे को भी उजागर किया।
सोरेन ने अपने राजनीतिक करियर की शुरुआत 1970 के दशक के शुरुआती दिनों में एक जूझारू आदिवासी नेता के रूप में की, जिसने साहूकारों द्वारा भोले-भाले व मासूम आदिवासियों के शोषण के खिलाफ आंदोलन छेड़ा। आंदोलन की आग उनके भीतर तब जगी, जब साहूकारों के लोगों ने कथित रूप से उनके पिता की हत्या कर दी। इस घटना ने उन्हें साहूकारों के खिलाफ खड़ा कर दिया। पिता की कथित हत्या के बाद सोरेन ने पढ़ाई छोड़ दी। तब उनकी उम्र केवल 18 साल थी। उन्होंने संथाल नवयुवक संघ का गठन किया और साहूकारों के खिलाफ आंदोलन छेड़ दिया। वे लोग उनसे खौफ खाने लगे, जो जरूरतमंद आदिवासियों को ऊंची दरों पर ण दिया करते थे और जबरन उसकी वसूली भी करते थे। इस बीच गैर-आदिवासियों को उन्होंने ‘बाहरियोंज् के रूप में परिभाषित किया और उनके खिलाफ भी आंदोलन छेड़ा।
जगह-जगह ‘बाहरियोंज् को निशाना बनाया गया। 23 जनवरी, 1975 को जामतारा जिले के चिरुडीह गांव में कुछ हथियारबंद आदिवासियों ने एक बस्ती पर हमला कर दिया, जिसमें 11 लोग मारे गए। आदिवासियों ने जहरीले तीर-कमान से हमला किया, जो बाद में झारखंड मुक्ति मोर्चा का चुनाव चिह्न् बना। इस मामले में 68 लोगों के खिलाफ हत्या का मुकदमा दर्ज किया गया, जिसमें सोरेन का नाम भी शामिल था। कहा गया कि वे भी हलावरों की भीड़ का हिस्सा थे। लेकिन जामताड़ा की अदालत ने उन्हें बरी कर दिया। बस फिर क्या था? आदिवासियों के बीच वे भगवान बन बैठे।
साहूकारों के खिलाफ लंबी लड़ाई के बाद उन्होंने राजनीति की ओर रुख किया। 1977 में वे पहली बार लोकसभा चुनाव लड़े, लेकिन हार गए। हालांकि 1980 में उन्होंने लोकसभा चुनाव जीत लिया। इसके बाद 1989, 1991 और 1996 में वे लगातार लोकसभा चुनाव जीतते रहे। जीत का यह सिलसिला 1998 और 1999 के आम चुनाव में जारी नहीं रह सका। साल 2002 में भाजपा के सहयोग से वे राज्यसभा के लिए चुने गए। बाद में उसी साल दुमका लोकसभा सीट से उन्होंने उपचुनाव जीता। 2004 के आम चुनाव में भी वे जीते और मनमोहन सिंह के नेतृत्व में बनी कें्र की संयुक्त प्रगतिशील सरकार में कोयला मंत्री बने। लेकिन चिरुडीह नरसंहार मामले में वारंट जारी होने के बाद 24 जुलाई 2004 को उन्हें अपने पद से इस्तीफा देना पड़ा। करीब एक माह की न्यायिक हिरासत के बाद वे जमानत पाने में कामयाब रहे, जिसके बाद उसी साल 27 नवंबर को उन्हें फिर कें्रीय मंत्रिमंडल में शामिल कर लिया गया। लेकिन फरवरी-मार्च 2005 में झारखंड विधानसभा चुनाव के बाद उन्होंने प्रदेश का रुख किया और मुख्यमंत्री बने। हालांकि विधानसभा में बहुमत साबित नहीं कर पाने के कारण उनकी सरकार गिर गई। वर्ष 2006 में उन्हें फिर कें्रीय मंत्रिमंडल में शामिल कर लिया गया।
इस बीच 5 दिसंबर 2006 को दिल्ली की एक अदालत ने अपने निजी सचिव की हत्या के 12 साल पुराने मामले में उन्हें दोषी करार देते हुए आजीवन कारावास की सजा सुनाई। ऐसा पहली बार हुआ, जब किसी मंत्री के खिलाफ ऐसी सजा सुनाई गई। सीबीआई पर भी कें्र के प्रभाव से मामले को कमजोर करने का आरोप लगा। अदालत ने साफ कहा कि अभियोजन पक्ष जानबूझकर कमजोर सबूत पेश कर रहा है। अदालत के इस फैसले के बाद उन्हें फिर कें्रीय मंत्रिमंडल से बाहर कर दिया गया। लेकिन 2007 में दिल्ली उच्च न्यायालय ने निचली अदालत के फैसले को बदल दिया। सोरेन मामले से बरी हो गए। बदली परिस्थितियों में 27 अगस्त 2008 को वे दूसरी बार झारखंड के मुख्यमंत्री बने। इस बार बहुमत उनके साथ था। लेकिन अपने पद पर बने रहने के लिए छह माह के भीतर उन्हें विधानसभा की सदस्यता लेनी थी, जिसमें वे नाकाम रहे।
इस बार चुनाव में उनकी पार्टी फिर जीती। नतीजे का अंकगणित उनके साथ था। उनके बिना किसी की सरकार नहीं बन सकती थी। यूपीए के घटक रहे गुरूजी को सरकार बनाने के लिए एनडीए का सहयोग लेने में कोई हर्ज नहीं दिखा। इसने साबित किया कि न सिर्फ जनता में उनकी पैठ है, बल्कि वे राजनीति के ऐसे चतुर सुजान हैं, जो जानते हैं कि कब किस करवट होना फायदेमंद होगा।

भागवत प्रसाद गडकारी

नितिन गडकरी ठेठ संघ की पसंद वाले अध्यक्ष हैं। वे उन चार-पांच से बाहर के हैं, संघ प्रमुख भागवत जिनकी पतंग पहले ही काट चुके थे। युवा और कर्मठ होना उनकी सबसे बड़ी संपदा बताई जा रही है, लेकिन दिल्ली की राजनीति आसान नहीं है। बड़े-बड़े दिग्गजों के बीच उनका कितना जोर चलेगा, यह समय बताएगा। लेकिन एक बात तय है उन्हें संघ का मुंह जोहते रहना पड़ेगा।

हाल ही में हुए सांगठनिक फेरबदल में भाजपा को एक नया व युवा चेहरा दिया गया। नितिन गडकरी (52) के रूप में पार्टी को नया अध्यक्ष मिला, जो भाजपा के अब तक के सबसे युवा अध्यक्ष हैं। गडकरी ‘वेंटिलेटरज् पर चल रही भाजपा को स्वस्थ व जिताऊ बनाने में कहां तक कामयाब होंगे, यह तो आनेवाला समय बताएगा, पर इतना तो तय है कि भाजपा में आमूल-चूल परिवर्तन की राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की चाह पूरी हो गई है और अब पार्टी में संघ का दखल बढ़ेगा।
गडकरी संघ प्रमुख मोहन भागवत के करीबी और उनकी पसंद माने जाते हैं। इस साल सितंबर से ही पार्टी अध्यक्ष के रूप में उनके नाम की चर्चा थी। लोकसभा चुनाव में हार के बाद संघ प्रमुख भागवत कई बार पार्टी संगठन में रद्दो-बदल की आवश्यकता जता चुके थे। हालांकि उन्होंने यह भी कहा कि ये भाजपा का अंदरूनी मामला है और संघ इसमें किसी तरह का हस्तक्षेप नहीं करने जा रहा। लेकिन भाजपा में संघ का दखल व प्रभाव सर्वविदित है। इसलिए अटकलें लगाई जा रही थीं कि पार्टी अध्यक्ष के रूप में जो भी कार्यभार संभालेगा, वह संघ का करीबी होगा। यह भी कहा गया कि वह दिल्ली से बाहर का नेता होगा। गडकरी की नियुक्ति से ये अटकलें सही साबित हुई हैं। उनकी साफ-सुथरी छवि ने भी अध्यक्ष पद के लिए उन्हें एक योग्य उम्मीदवार बनाया।
गडकरी महाराष्ट्र के नागपुर जिले से संबंध रखते हैं, जो संघ प्रमुख भागवत का कार्यक्षेत्र रहा है। उनका जन्म सत्ताइस मई, 1957 को नागपुर के देशास्थ ब्राह्मण परिवार में हुआ था। राजनीतिक पारी की शुरुआत उन्होंने भाजपा के युवा मोर्चा और इसकी छात्र इकाई अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के साथ की। इस बीच उनकी पढ़ाई भी जारी रही। उन्होंने महाराष्ट्र से ही एमकॉम, एलएलबी और डीबीएम की पढ़ाई की।
पार्टी का राष्ट्रीय अध्यक्ष बनने से पहले 2004-2009 के बीच उन्होंने महाराष्ट्र भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष के रूप में अपनी सेवा दी। हालांकि उनके नेतृत्व में भाजपा हाल का विधानसभा चुनाव हार गई, लेकिन इससे उनके राजनीतिक भविष्य पर किसी तरह का संकट नहीं छाया, जसा कि राजस्थान में वसुंधरा राजे सिंधिया और उत्तरांचल में बीसी खंडूरी के साथ हुआ, बल्कि अध्यक्ष बनाकर एक तरह से उन्हें इनाम दिया गया। संभवत: यहां ‘हारने वाला ही जीतने वाला होता हैज् का फॉर्मूला अपनाया गया।
इससे पहले 1995 से 1999 के बीच वह महराष्ट्र की भाजपा-शिवसेना सरकार में मंत्री भी रहे। लोक कल्याण मंत्री के रूप में उन्होंने कई महत्वपूर्ण काम किए। इस दौरान उनकी कार्यप्रणाली से प्रतीत होता है कि वे आधुनिक तकनीक के हिमायती हैं। उन्होंने विभाग में आमूल-चूल बदलाव किए और बहुराष्ट्रीय कंपनियों की तर्ज पर विभागीय कर्मचारियों के लिए नियम लागू किए। निर्माण कार्यो में गुणवत्ता लाने के लिए उन्होंने अंतराष्ट्रीय स्तर की तकनीक अपनाने पर जोर दिया और इसके लिए एक समिति का भी गठन किया। उन्होंने पूरी तरह सरकार द्वारा नियंत्रित महाराष्ट्र स्टेट रोड डेवेलपमेंट कापरेरेशन (एमएसआरडीसी) का गठन किया, जिसने मुंबई में कई फ्लाईओवर बनाए। अपने कार्यकाल के दौरान उन्होंने खासतौर पर ग्रामीण क्षेत्रों को सड़क मार्ग से जोड़ने को प्रमुखता दी, ताकि विकास की गाड़ी दूर-दराज के गांवों में भी पहुंच सके।
इस क्षेत्र में उनके विशेष कार्यो को देखते हुए बाद में कें्र की भाजपा सरकार ने उन्हें राष्ट्रीय ग्रामीण सड़क विकास समिति का अध्यक्ष नियुक्त किया। विस्तृत अध्ययन व कई बैठकों के बाद गडकरी ने कें्र को इस बारे में अपनी रिपोर्ट सौंपी, जिसके बाद ग्रामीण क्षेत्रों में सड़क संपर्क के लिए प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना शुरू की गई। सड़क निर्माण के क्षेत्र में उनके महत्वपूर्ण योगदान को देखते हुए उन्हें हाइवे वाले गडकरी भी कहा जाता है। वह विदर्भ आंदोलन के भी हिमायती रहे हैं।
गडकरी की पहचान केवल राजनेता के रूप में नहीं रही है, बल्कि उद्योगपति और कृषिविज्ञ के रूप में भी रही है। वह कई कंपनियों के संस्थापक व अध्यक्ष रहे हैं। वहीं, कृषि के क्षेत्र में आधुनिक तकनीक अपनाने पर उन्होंने जोर दिया, तो सौर ऊर्जा, जल प्रबंधन के क्षेत्र में भी कई परियोजनाएं लागू की। हाल में उन्होंने कई देशों के साथ फलों का निर्यात शुरू किया है।
हालांकि गडकरी के साथ ये उपलब्धियां हैं, लेकिन अध्यक्ष के रूप में उनके सामने कहीं अधिक चुनौतियां हैं। महाराष्ट्र सरकार के मंत्री और प्रदेश भाजपा अध्यक्ष के रूप में अब तक उनका कार्यक्षेत्र मुख्यत: मुंबई और नागपुर तक ही सिमटा रहा। लेकिन अब उनकी जिम्मेदारी देशव्यापी हो गई है। पार्टी को एकबार फिर से खड़ा करना, खासकर उत्तर भारत के कई प्रमुख राज्यों में, आसान नहीं होगा। इसके अलावा, वे भाजपा का कोई राष्ट्रीय चेहरा नहीं हैं और न ही राष्ट्रीय स्तर के नेता हैं। फिर, पार्टी के कई वरिष्ठ नेताओं को दरकिनार कर उन्हें यह जिम्मेदारी सौंपी गई है। ऐसे में उन्हें इन नेताओं का असंतोष व असहयोग ङोलना पड़ सकता है। अब तक उन्होंने कोई विधानसभा या लोकसभा चुनाव नहीं जीता है, यह बात भी उनके खिलाफ जा सकती है। इसलिए कदम-कदम पर उन्हें संघ के सहयोग व समर्थन की आवश्यकता होगी।

शनिवार, 5 दिसंबर 2009

बेहतर दुनिया तीन कदम

(देवें्र शर्मा से बातचीत पर आधारित)

जलवायु परिवर्तन के शोर में हम एक गहरे विरोधाभास को नजरअंदाज कर रहे हैं। एक ओर कोपेनहेगन है तो दूसरी तरफ जेनेवा, जहां विश्व व्यापार संगठन व्यापार बढ़ाने का आह्वान कर रहा है। व्यापार बढ़ेगा तो पर्यावरण बिगड़ेगा ही। दरअसल तीन बातें जरूरी हैं- अमेरिकी मॉडल का त्याग, व्यापार में कटौती और लोगों को जागरूक बनाना। हमारे कई संकटों का यही हल है।

आज हर तरफ जलवायु परिवर्तन की चर्चा है। इससे होने वाले नुकसान को लेकर दुनिया आशंकित है। खास तौर पर सम्रु के किनारे रहने वाले क्षेत्रों में इसका सबसे अधिक नुकसान हो सकता है। आनेवाले सालों में ये क्षेत्र पूरी तरह से डूब सकते हैं। मालदीव सहित भारत के लक्ष्यद्वीप और पश्चिम बंगाल में सुंदरवन को सबसे अधिक नुकसान हो सकता है। जलवायु परिवर्तन के खतरे से पूरी तरह आगाह मालदीव ने हाल ही में सम्रु के अंदर कैबिनेट की बैठक बुलाकर दुनिया को एक संदेश देने की कोशिश की। लेकिन इसे लेकर कहीं कोई कारगर कोशिश होती नहीं दिखती।
भारत में अक्सर यह कहकर पल्ला झाड़ लिया जाता है कि जलवायु परिवर्तन के लिए जिम्मेदार कार्बन गैसों के उत्सर्जन के लिए हम उतने जिम्मेदार नहीं हैं, जितने अमेरिका, चीन या अन्य विकसित देश। इसके लिए कार्बन गैसों के उत्सर्जन में प्रति व्यक्ति योगदान का हवाला दिया जाता है। लेकिन यह गलत है, क्योंकि गैस उत्सर्जन के लिए प्रति व्यक्ति की जिम्मेदारी का प्रतिशत जब निकाला जाता है, तो उसमें देश की पूरी जनसंख्या को शामिल किया जाता है, जबकि ग्रामीण क्षेत्र की आबादी का इसमें कोई योगदान नहीं होता। कार्बन उत्सर्जन के लिए शहरों व महानगरों के लोग और वहां मौजूद औद्योगिक इकाइयां जिम्मेदार हैं। साफ तौर पर जलवायु परिवर्तन के लिए हम भी उतने ही जिम्मेदार हैं, जितने अमेरिका, चीन या अन्य विकसित देश। इसलिए आज अगर जलवायु परिवर्तन पर वैश्विक चर्चा हो रही है, तो सबसे पहले हमें अपना घर सुधारना होगा।
दरअसल, अमेरिका की राह पर चलते हुए हमने विकास का एक ऐसा मॉडल चुना है, जो पर्यावरण प्रदूषण की मात्रा भी साथ-साथ बढ़ाता है। कार, फ्रिज, टेलीविजन, एयरकंडीशन सहित अन्य बाजारी सुविधाएं को विकास का पैमाना माना जाने लगा है। लेकिन कोई इससे पर्यावरण को होने वाले नुकसान की चर्चा नहीं करता। कार से जो प्रदूषण फैलता है, वह अगले सौ साल तक पर्यावरण में मौजूद रहता है और इस वक्त देश में तकरीबन 170 लाख कार हैं। आखिर हम अपनी आनेवाली पीढ़ी को कितना सुरक्षित पर्यावरण देंगे?
जलवायु परिवर्तन के खतरों को लेकर विकसित देश हायतौबा तो खूब मचा रहे हैं, लेकिन इसे कम करने को लेकर ईमानदार व गंभीर कोशिश कहीं नहीं दिखती। दरअसल सारा खेल 200 मिलियन डॉलर का है। वास्तव में, कार्बन गैसों का उत्सर्जन रोकने और पर्यावरण को सुरक्षित बनाने के नाम पर वे विकासशील देशों को ऐसी तकनीक बेचना और वहां निवेश करना चाहते हैं, जिससे उनकी अर्थव्यवस्था को फायदा हो सके। भारत, चीन, ब्राजील, दक्षिण अफ्रीका भी इसी दौड़ में शामिल है और इसलिए इन देशों में जलवायु परिवर्तन का शोर अधिक सुनाई देता है।
यदि वास्तव में दुनिया इसके प्रति गंभीर होती तो इसे लेकर विरोधाभास नहीं दिखता। यह विरोधाभास नहीं तो और क्या है कि एक ओर जेनेवा में विश्व व्यापार संगठन जसी संस्था व्यापार बढ़ाने पर जोर दे रही है, तो कोपेनहेगन में जलवायु परिवर्तन और इसके खतरों पर चर्चा होने जा रही है। लेकिन कोई इस बारे में बात नहीं करता कि यदि व्यापार बढ़ेगा तो क्या प्रदूषण नहीं बढ़ेगा? आखिर व्यापार जहाजों और विमान से ही किया जाएगा, जिसके चलने व उड़ान भरने में बड़ी मात्रा में ऊर्जा खपत होती है और कार्बन गैसों का उत्सर्जन होता है।
जलवायु परिवर्तन का प्रमुख कारण अमेरिका की आरामपसंद जीवन शैली है, जिसमें अधिकतर चीजों का मशीनीकरण हो गया है। आज अगर वैश्विक स्तर पर जलवायु परिवर्तन और इसके खतरों की चर्चा हो रही है, तो हमें अमेरिकी जीवनशैली को टेबल पर रखने की जरूरत है। हालांकि अमेरिका पहले ही इसमें किसी तरह के फेरबदल से इनकार कर चुका है, लेकिन जब तक इसे परिवर्तनीय नहीं बनाया जाता, खतरे को कम नहीं किया जा सकता।
यदि जलवायु परिवर्तन के खतरे को कम करना है, तो इसके लिए तीन चीजों पर खास ध्यान देना होगा। सबसे पहले तो विकास के अमेरिकी मॉडल का अनुसरण बंद करना होगा। दूसरे, व्यापार में कटौती करनी होगी और तीसरे, लोगों में जागरुकता लानी होगी। इसके लिए हम स्वीडेन को आदर्श मान सकते हैं, जहां सभी उत्पाद सामग्रियों पर कार्बन फुट प्रिंट होता है। इससे लोगों को पता चलता है कि विभिन्न स्थानों से आयाजित सामानों में कार्बन उत्सर्जन कितना हुआ है। यदि भारत में भी यही चीज शुरू की जाए तो लोगों में जागरुकता जरूर आएगी और धीरे-धीरे लोग उन चीजों को खरीदना बंद कर देंगे, जिसके आयात में कार्बन गैसों का उत्सर्जन अधिक हुआ हो। जलवायु परिवर्तन को कम करने की दिशा में यह एक कारगर कदम हो सकता है।

गिलट नहीं गिलानी

कम चर्चित और बेहद संकोची राजनेता से शुरू हुआ सैयद युसुफ रजा गिलानी का राजनीतिक जीवन। पाकिस्तान के प्रधानमंत्री वे बने या बनाए गए, अपने इन्हीं गुणों के कारण। लेकिन कुछ ही समय में गिलानी अपने तेजतर्रार नए अवतार में उभरने लगे। अब वे पूर्णावतार ले चुके हैं। जरदारी पिछड़ रहे हैं। खुद गिलानी उन्हें सिर्फ राष्ट्राध्यक्ष और स्वयं को शासन का प्रमुख कर्ताधर्ता बता रहे हैं।

सैयद युसुफ रजा गिलानी, पाकिस्तान के प्रधानमंत्री, जो अपने समर्थकों के बीच ‘हमेशा सही काम करने वाले नेताज् के रूप में जाने जाते हैं, भले ही व्यक्तिगत रूप से इसके लिए उन्हें कोई भी कीमत चुकानी पड़े। उनकी पहचान एक मृदुभाषी राजनीतिज्ञ के रूप में भी रही है। पाकिस्तान में करीब एक दशक के सैनिक शासन के बाद 2008 में जब उन्होंने लोकतांत्रिक ढंग से चुनी हुई सरकार का नेतृत्व संभाला तो गिलानी कोई हाईप्रोफाइल राजनीतिज्ञ नहीं थे।
सच कहा जाए तो बेनजीर की हत्या के बाद पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी (पीपीपी) ने उन्हें प्रधानमंत्री पद के लिए चुना भी इसलिए था। इसके लिए पार्टी के तत्कालीन सबसे चर्चित नेता अमीन फहीम की दावेदारी को दरकिनार कर दिया गया। समझा जा रहा था कि इस कम चर्चित नेता के जरिये बेनजीर के पति व राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी के लिए पाकिस्तान के शासन में हस्तक्षेप आसान रहेगा और कुछ ही महीनों में गिलानी के हाथ से सत्ता अपने हाथ में लेना उनके लिए आसान होगा। हालांकि बेनजीर के प्रति कुछ उनकी वफादारी भी थी, जिसके लिए उन्हें यह इनाम मिला।
लेकिन गिलानी जब एकबार पाकिस्तान की सत्ता पर काबिज हुए तो उनकी कम चर्चित व संकोची राजनेता की छवि जाती रही। वे धीरे-धीरे सत्ता के प्रमुख कें्र के रूप में उभरने लगे और अब जरदारी को किनारे करते हुए उन्होंने दो टूक कह दिया है कि असली सरकार वे ही चला रहे हैं। जरदारी राष्ट्राध्यक्ष हैं, न कि शासनाध्यक्ष। उन्होंने इन दावों को भी खरिज कर दिया कि पाकिस्तान का शासन नेतृत्वविहीन है और इसके कई कें्र हैं। साफ है, जरदारी की अगर ऐसी कोई चाह थी कि गिलानी के जरिये वे अपनी मर्जी चला सकेंगे, तो गिलानी उसे पूरा करने के मूड में नहीं हैं।
पाकिस्तान में, जहां संवैधानिक रूप से सत्ता संसद में निहित है, सत्ता परिवर्तन के बाद शासन के कई कें्र नजर आने लगे। यह सब शुरू हुआ 1999 के सैनिक तख्ता पलट से, जब पाकिस्तान के सेना अध्यक्ष जनरल परवेज मुशर्रफ ने लोकतांत्रिक ढंग से चुनी हुई पाकिस्तान मुस्लिम लीग (पीएमएल) की नवाज शरीफ सरकार को सत्ता से बेदखल करते हुए सत्ता हथिया ली थी। बाद में इसे लोकतांत्रिक रूप देने के लिए उन्होंने सैन्य शासक का चोंगा उतार फेंका और राष्ट्रपति बन बैठे। लेकिन सत्ता की कुंजी अपने हाथ में ही रखी। उन्होंने संविधान में कई संशोधन किए और वे सारी शक्तियां, जो संसद व प्रधानमंत्री के पास थीं, अपने हाथों में ले ली।
सत्ताइस दिसंबर 2007 को पीपीपी अध्यक्ष बेनजीर भुट्टो की हत्या के बाद हुए आम चुनाव और उसके बाद बने नए निजाम में गिलानी प्रधानमंत्री व जरदारी राष्ट्रपति बने। उम्मीद की गई कि पाकिस्तान में एक बार फिर संसदीय शासन प्रणाली से कामकाज होगा। प्रधानमंत्री शासन का कें्र होगा और प्रमुख शक्तियां उसके हाथों में ही होंगी। लेकिन जरदारी ने मुशर्रफ द्वारा संशोधन के बाद राष्ट्रपति में निहित की गई शक्तियों को लौटाने की उदारता नहीं दिखाई। यहीं से शुरू हुआ राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री की सत्ता में टकराव। गिलानी के शासन में जरदारी की टोकाटाकी व हस्तक्षेप बढ़ता रहा। लेकिन अंतत: गिलानी ने जरदारी के हर हुक्म की तामील करना मुनासिब नहीं समझा। इसका कारण शायद उन्हें विरासत में मिली राजनीतिक सूझबूझ रही।
अपनी सूझबूझ से ही उन्होंने धीरे-धीरे सत्ता अपने हाथ में ले ली। वे सबसे अधिक चर्चित हुए पाकिस्तान के मुख्य न्यायाधीश इफ्तिखार मोहम्मद चौधरी की पुनर्बहाली करवाकर, जिन्हें जनरल मुशर्रफ ने बर्खास्त कर दिया था। जरदारी उनकी बहाली के लिए आसानी से तैयार नहीं थे, क्योंकि उन्हें अपने खिलाफ भ्रष्टाचार के कई मामले खुल जाने का अंदेशा था। लेकिन गिलानी ने जरदारी को आश्वस्त किया और न्यायाधीश बहाल हुए। हाल के दिनों में जरदारी ने परमाणु आयुध के नियंत्रण का अधिकार भी प्रधानमंत्री गिलानी को सौंप दिया। गिलानी अन्य शक्तियां भी राष्ट्रपति से प्रधानमंत्री को स्थानांतरित करने में लगे हैं।
गिलानी का जन्म नौ जून 1952 को कराची में हुआ था, हालांकि उनका परिवार पंजाब प्रांत से ताल्लुक रखता है। गिलानी परिवार पंजाब के मुल्तान का एक प्रभावी राजनीतिक व आध्यात्मिक परिवार है। गिलानी के पिता मखदूम आलमदार हुसैन गिलानी पाकिस्तान के निर्माण के बने प्रस्ताव के प्रमुख हस्ताक्षरी थे। गिलानी की शुरुआती शिक्षा-दीक्षा मुल्तान में ही ला सल्ले हाई स्कूल में हुई। उच्च शिक्षा उन्होंने लाहौर के फोरमैन क्रिश्चयन कॉलेज से पाई। पंजाब विश्वविद्यालय से उन्होंने पत्रकारिता की पढ़ाई की।
गिलानी ने अपने राजनीतिक जीवन की शुरुआत 1978 में पिता की मौत के बाद जनरल जिया-उल-हक के सैनिक शासन के दौरान की थी। वह पीएमएल की कें्रीय कार्य समिति में शामिल हुए। प्रधानमंत्री मुहम्मद खान जुनेजो की सरकार में वह मंत्री भी बने। लेकिन जल्द ही पीएमएल से उनका मोहभंग हो गया और 1988 में वह पीपीपी में शामिल हो गए। पीपीपी में शामिल होने की अर्जी लेकर जब वे बेनजीर भुट्टो से मिलने गए थे, तब पाकिस्तान में जनरल जिया-उल-हक का ही शासन था और पीपीपी अनिश्चतता के दौर से गुजर रहा था। बेनजीर ने कहा भी था कि वे उन्हें कुछ भी दे पाने की स्थिति में नहीं हैं, फिर क्यों वे पीपीपी का दामन थामना चाहते हैं? तब गिलानी ने कहा था, ‘दुनिया में तीन तरह के लोग हैं, एक वे जो सम्मान चाहते हैं, दूसरे वे जो बुद्धि चाहते हैं और तीसरे वे जो दौलत चाहते हैं। मैं पहले तरह का इंसान हूं और इसलिए पीपीपी में शामिल होना चाहताा हूं।ज् इसके बाद शक व शुबहे की कोई गुंजाइश ही नहीं रह गई। गिलानी की यह वफादारी बेनजीर की आखिरी सांस तक उनके साथ बनी रही।
यही वजह रही कि 2001 में उन्होंने परवेज मुशर्रफ के साथ समझौते से इनकार कर दिया, जिसके तहत उन्हें पीपीपी के जनाधार वाले नेताओं को साइडलाइन करना था। उन्हें इसकी कीमत जेल जाकर चुकानी पड़ी। मुशर्रफ शासन ने उन पर सरकार में रहते हुए गैर-कानूनी नियुक्तियां करने का आरोप लगाकर उन्हें जेल में डाल दिया। 7 अक्टूबर 2006 को वह जेल से रिहा हुए। जेल में उन्होंने एक किताब लिखी, ‘चाह-ए-युसुफ की सदा।ज् पुस्तक में उन्होंने पीएमएल छोड़ने और पीपीपी में शामिल होने के कारणों का जिक्र किया है। इससे पहले जनरल जिया की मौत के बाद 1988-90 की बेनजीर की सरकार में वे मंत्री बने। बेनजीर के दूसरे कार्यकाल में 1993-97 के बीच उन्होंने पाकिस्तान की नेशनल एसेम्बली के स्पीकर के रूप में अपनी सेवा दी।

मंगलवार, 1 दिसंबर 2009

बहुत शोर था . . . लिब्रहान . . .!

न्यायमूर्ति एमएस लिब्रहान ने तीन महीने के लिए बने आयोग की रिपोर्ट सत्रह साल बाद सौंपी और पिछले हफ्ते वह संसद में रखी गई। बाबरी मस्जिद ध्वंस को लेकर बने इस जांच आयोग पर सबकी नजरें थीं। पर साल-दर-साल माहौल-मूल्य-मुद्दे बदलते गए और अब जब यह नुमायां हो गई है, तो हम पाते हैं कि अब वह मुद्दा ही बेदम हो चुका है कि जिसके कारण बाबरी ध्वंस की शर्मनाक घटना घटी। फिर भी लोगों को दिलचस्पी तो थी ही। लेकिन वह भी रिपोर्ट के निष्कर्ष से शांत हो गई, क्योंकि इसमें आमतौर पर वही है, जिसका अंदाजा था। वही संघ परिवार और भाजपा इसमें षड्यंत्रकारी बताए गए हैं, जिन्हें देश का आमजन भी इस धत्कर्म का दोषी माने हुए था। अटल बिहारी वाजपेयी को दोषियों में रखना और तब के प्रधानमंत्री पीवी नरसिम्हा राव को बख्श देना जरूर इसमें ऐसी बातें रहीं, जिन पर काफी कोहराम मचा।

देश के सर्वाधिक विवादास्पद, संवेनशील और दो समुदायों की धार्मिक भावनाओं से जुड़े बहुप्रतीक्षित बाबरी विध्वंस मामले पर रिपोर्ट आ गई है। रिपोर्ट में यूं तो कोई नई बात नहीं है। जसा कि उम्मीद थी, भगवा बिग्रेट को इसमें जमकर लताड़ लगाई गई है। लेकिन पूरे प्रकरण में भाजपा के उदारवादी माने जाने वाले वरिष्ठ नेता व पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के नाम ने राजनीतिक हलके में तूफान मचा दिया। रिपोर्ट सीधे तौर पर वाजपेयी को दोषी नहीं बताती। लेकिन यह कह कर एक बड़ा आरोप तय करती है कि बाबरी विध्वंस कोई अचानक हुई घटना नहीं, बल्कि एक सोची-समझी रणनीति थी और भाजपा के वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी सहित अटल बिहारी वाजपेयी भी इससे पूरी तरह वाकिफ थे। इन नेताओं ने जानबूझकर पूरे प्रकरण से दूरी बनाए रखी। वास्तव में इन्होंने जनता के विश्वास व लोकतंत्र को धोखा दिया है और इसलिए वे उनके अपराधी हैं।
बाबरी विध्वंस पर यह रिपोर्ट न्यायमूर्ति एमएस लिब्रहान के नेतृत्व में गठित लिब्रहान आयोग ने दी है। छह दिसंबर, 1992 को कारसेवकों द्वारा बाबरी विध्वंस को अंजाम देने के करीब दस दिन बाद ही यानी 16 दिसंबर 1992 को तत्कालीन प्रधानमंत्री पीवी नरसिम्हा राव ने इस आयोग का गठन किया था और म्रास उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति एमएस लिब्रहान को मामले की जांच का जिम्मा सौंपा था। तब मामले की जांच के लिए उन्हें तीन माह का समय दिया गया था। लेकिन जांच पूरी होते-होते 17 साल लग गए, जिसके लिए कुल 48 बार आयोग का कार्यकाल बढ़ाया गया। इन 17 सालों में न्यायमूर्ति लिब्रहान ने कई लोगों के बयान लिए, ऑडियो-वीडियो टेप की जांच की और उसके बाद अपनी रिपोर्ट दी। एक सदस्यीय इस आयोग की जांच पर करीब आठ करोड़ रुपए का खर्च आया है।
तकरीबन एक हजार पन्ने की रिपोर्ट में न्यायमूर्ति लिब्रहान ने भाजपा के कई वरिष्ठ नेताओं सहित 68 लोगों को नामजद किया है। राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ को बाबरी विध्वंस का मुख्य साजिशकर्ता करार देते हुए उन्होंने उत्तर प्रदेश की तत्कालीन कल्याण सिंह सरकार को इस साजिश को अमल में लाने का दोषी करार दिया है। साथ ही कें्र की तत्कालीन पीवी नरसिम्हाराव सरकार को भी यह कहते हुए आड़े हाथों लिया है कि उसने बाबरी विध्वंस को रोकने के लिए कोई गंभीर कदम नहीं उठाए। हालांकि यह कहकर उनका बचाव किया कि राज्य सरकार की ओर से कें्र से किसी तरह की मदद नहीं मांगी गई।
अपनी रिपोर्ट में न्यायमूर्ति लिब्रहान ने भाजपा के वरिष्ठ नेताओं, लाल कृष्ण आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी व अटल बिहारी वाजपेयी को पर्दे के पीछे से भूमिका निभाने वाला करार दिया है। रिपोर्ट में साफ कहा गया है कि ये नेता बाबरी विध्वंस की आरएसएस की साजिश से पूरी तरह वाकिफ थे और उन्होंने जानबूझकर राम जन्मभूमि अभियान से दूरी बनाए रखी। अपनी रिपोर्ट में न्यायमूर्ति लिब्रहान नेताओं पर भी खूब बरसे। उन्होंने किसी दल विशेष का नाम लिए बगैर सभी नेताओं को यह कहते हुए आड़े हाथों लिया कि अपने क्ष्रु राजनीतिक स्वार्थ के लिए वे एक महान राष्ट्र व दुनिया की पुरानी सभ्यताओं में से एक को असहिष्णुता और बर्बरता की ओर ढकेल रहे हैं।
बाबरी विध्वंस पर लिब्रहान आयोग की बहुप्रतीक्षित रिपोर्ट कई तरह से विवादों में घिरी है। सबसे पहले तो भाजपा और सहयोगी दलों ने रिपोर्ट लीक होने को लेकर हंगामा किया। रिपोर्ट लीक होने का आरोप सरकार पर लगा, अंगुली न्यायमूर्ति लिब्रहान पर भी उठी। लेकिन इन आरोपों को लेकर न्यायमूर्ति लिब्रहान का रवैया ‘नो कमेंटज् का रहा। उन्होंने कुछ भी कहने से इनकार कर दिया। हालांकि रिपोर्ट लीक होने के मामले में वह मीडिया पर भड़के जरूर।
रिपोर्ट का एक अन्य विवादास्पद पहलू इसका अत्यधिक समय लेना है। सरकार ने इसके लिए तीन माह की समय सीमा निर्धारित की थी, जबकि रिपोर्ट सौंपते-सौंपते न्यायमूर्ति लिब्रहान को 17 साल लग गए। इसके लिए उन्होंने प्रमुख गवाहों के असहयोगात्मक रवैये और आयोग के कामकाज के शुरुआती दिनों में ही कर्मचारियों के लगातार स्थानांतरण को जिम्मेदार ठहराया। रिपोर्ट में देरी की एक प्रमुख वजह न्यायमूर्ति लिब्रहान ने आयोग के सलाहकार अनुपम गुप्ता के असहयोगात्म रवैये को भी बताया है। तकरीबन एक हजार पन्ने की रिपोर्ट में न्यायमूर्ति लिब्रहान ने 18 पन्नों में इस बात का जिक्र किया है कि आखिर क्यों जांच पूरी करने में उन्हें 17 साल लग गए।
अनुपम गुप्ता के असहयोगात्म रवैये का जिक्र करते हुए न्यायमूर्ति लिब्रहान ने कहा है कि निहित कारणों से गुप्ता ने आयोग के सलाहकार के रूप में अपनी भूमिका नहीं निभाई, जिसके चलते उन्हें बार-बार परेशानी हुई और अंतत: उन्हें इसके लिए दूसरे अधिवक्ता की मदद लेनी पड़ी। वहीं, अनुपम गुप्ता ने न्यायमूर्ति लिब्रहान पर भाजपा नेता लालकृष्ण आडवाणी को बचाने का आरोप लगाते हुए 2007 में ही आयोग के सलाहकार का पद छोड़ दिया था।
इसके अलावा बिना सुनवाई के रिपोर्ट में वाजयपेयी का नाम आने से भी न्यायमूर्ति लिब्रहान की किरकिरी हो रही है। प्रेक्षक जांच आयोग अधिनियम, 1952 की धारा 8बी का हवाला देते हुए रिपोर्ट में वाजपेयी को नामजद करने पर सवाल उठा रहे हैं, जिसमें किसी भी व्यक्ति पर आरोप तय करने से पहले उसका पक्ष जानने का प्रावधान है। साथ ही वे प्राकृतिक न्याय के सिद्धांत का भी हवाला दे रहे हैं, जिसके अनुसार किसी भी व्यक्ति के खिलाफ कोई प्रतिकूल टिप्पणी करने से पहले उसे सुनवाई का अधिकार होना चाहिए। इसे मानहानि से जोड़कर भी देखा जा रहा है।