मंगलवार, 29 जून 2010

नीति-नीतीश

नीतीश कुमार के मन में ठीक-ठीक क्या चल रहा है, कोई नहीं जानता। भाजपा के साथ गठबंधन की सरकार सफलता से चलाई, पर अब कुछ और सोचते लगते हैं। गहरी उधेड़बुन में हैं। अभी मौका मिला तो तेवर दिखा दिया। लेकिन मामला तो गड़बड़ लोकसभा चुनाव से ही लग रहा था। नरें्र मोदी और वरुण की आड़ में मुसलमानों को रिझाने में लगे हैं। लेकिन इस तरह कि सांप भी मरे, लाठी भी न टूटे। भाजपा भी उनके हाथों में एक ऐसे उपकरण की तरह है, जिसे बजाकर वे अपनी पार्टी में भी धाक जमाते-बढ़ाते रहते हैं। नीतीश कुमार की नीति की अंतिम व्याख्या तभी संभव है जब वे उसका खुद खुलासा करें। यह चुनाव के पहले, दौरान या बाद में कभी भी हो सकता है।



बिहार के मुख्यमंत्री हैं नीतीश कुमार। हाल में कोसी राहत कोष के तहत गुजरात के मुख्यमंत्री नरें्र मोदी द्वारा दिए गए पांच करोड़ रुपए का चेक उन्हें लौटाकर चर्चा में आए हैं। हालांकि यह बात बहुत से सीधी-सपाट सोच रखने वाले लोगों के लिए समझ से परे है कि जब चेक लौटाना ही था तो लिया क्यों? लेकिन राजनीति की थोड़ी-बहुत समझ रखने वाले भी अच्छी तरह जानते हैं कि यह सब वोट बैंक की राजनीति का हिस्सा है।

नीतीश कुमार जोर-शोर से राज्य विधानसभा चुनाव की तैयारियों में जुटे हैं और यह कतई नहीं चाहेंगे कि भाजपा, खासकर नरें्र मोदी की वजह से मुसलमान वोट उनसे बिदक जाए। हालांकि मुसलमानों का बहुत समर्थन उन्हें अब भी प्राप्त नहीं है। इसकी एक बड़ी वजह राज्य में भाजपा का उनके साथ होना है। लेकिन चुनाव से ठीक पहले नीतीश कुछ ऐसा खेल करना चाहते थे, जिससे भाजपा और खासकर नरें्र मोदी के प्रति उनका नापसंदगी सामने आए। ऐसा करके वे मुसलमानों को अपनी ओर खींचने की कोशिश करना चाहते थे। इसी कोशिश के तहत उन्होंने गुजरात के मुख्यमंत्री नरें्र मोदी द्वारा दिया गया चेक लौटा दिया और पटना में भाजपा की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक के दौरान पार्टी नेताओं को भोज का निमंत्रण देने के बाद भी उसे रद्द कर दिया। इतने अपमान पर भाजपा का नाराज होना स्वाभाविक था। वह हुई भी, पर इतनी नहीं कि जद (यू) से अलग हो जाए। उसे भी इस जमीनी हकीकत का अंदाजा है कि बिहार में सत्ता का स्वाद उसे जद (यू) के साथ ही मिल सकता है, उसके बगैर नहीं। इसलिए अपमान पर वह तिलमिलाई नहीं, सिर्फ कसमसाकर रह गई और थोड़े ना-नुकुर के बाद फिर मिला लिया हाथ। उप मुख्यमंत्री सुशील मोदी ने पहले तो नीतीश की विश्वास यात्रा का बहिष्कार कर दिया, लेकिन फिर आ गए साथ।

इस पूरे प्रकरण में नीतीश कुमार एक मंङो हुए राजनेता के रूप में सामने आए। लेकिन इसका जो फायदा वे लेना चाहते थे, वह फिलहाल मिलता दिखाई नहीं दे रहा। बहरहाल, बतौर मुख्यमंत्री नीतीश कुमार का यह दूसरा कार्यकाल है। पहला कार्यकाल केवल सात दिन का था। पहली बार वर्ष 2000 में 03 मार्च को उन्होंने मुख्यमंत्री का कार्यभार संभाला था, लेकिन बहुमत साबित नहीं कर पाने की स्थिति में 10 मार्च को ही उन्होंने इस्तीफा दे दिया। इस बीच वे कें्र में मंत्री भी बने और कृषि व रेल मंत्रालय संभाला। इससे पहले भी वे कें्र में विभिन्न मंत्रालयों की जिम्मेदारी संभाल चुके थे। लेकिन वर्ष 2005 के बिहार विधानसभा चुनाव में उनकी पार्टी सबसे बड़े दल के रूप में उभरी और भाजपा के सहयोग से उन्हें राज्य में सरकार बनाने का मौका मिला। नवंबर, 2005 में वे राज्य के मुख्यमंत्री बने। इस बार बहुमत की समस्या आड़े नहीं आई।

अपने दूसरे कार्यकाल में नीतीश ने बिहार की जनता को भाजपा के साथ मिलकर स्थाई सरकार दी। पिछले 15 साल से लालू-राबड़ी के शासन से निराश लोगों को बहुत सी उम्मीदें थी इस सरकार से। बतौर मुख्यमंत्री नीतीश कई उम्मीदों पर खरे भी उतरे। पिछले करीब साढ़े चार साल के शासन के दौरान नीतीश सरकार ने सड़कों व फ्लाईओवर का खूब निर्माण कराया। लेकिन राजधानी पटना सहित कुछ अन्य प्रमुख शहरों को छोड़ दिया जाए तो सड़कों की हालत अब भी बहुत बेहतर नहीं है। बिजली बिहार में एक स्थाई समस्या बनी हुई है। हां, अपराध पर थोड़ा अंकुश जरूर लगा है। शिक्षा को बढ़ावा देने के लिए भी सरकार ने कई कदम उठाए हैं। सबसे बढ़कर उन्होंने राज्य के लोगों को सकरात्मक बदलाव की उम्मीद दी, जिसे वे पिछले 15 साल के लालू-राबड़ी शासन के दौरान खो चुके थे।

अपने इस कार्यकाल के दौरान नीतीश ने काम तो किया ही, उसका प्रचार भी जमकर किया। इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि वर्ष 2005 में नीतीश के मुख्यमंत्री बनने के बाद विज्ञापन पर होने वाला राज्य सरकार का खर्च पहले के मुकाबले पांच गुना बढ़ गया। विज्ञापन नीति में भी साफ कहा गया है कि नकारात्मक खबरें राज्य के हित में नहीं हैं, इसलिए सिर्फ सकारात्मक खबरें आनी चाहिए। बिहार के अखबारों और पत्रिकाओं में छपने वाली खबरों को देखें तो नकारात्मक खबरें लगभग गायब हैं। मीडिया राज्य की साफ-सुथरी छवि पेश कर रही है तो मुख्यमंत्री को ‘विकास पुरुषज् के रूप में। विज्ञापनों के जरिये उन्हें ठीक उसी तरह बिहार का पर्याय बनाने की कोशिश की जा रही है, जसे गुजरात में नरें्र मोदी बन गए हैं।

पिछले करीब साढ़े चार साल के दौरान नीतीश सरकार विवादों में भी आई, जिनमें सबसे बड़ा विवाद भू-सुधार योजना को लेकर है। देवब्रत बंदोपाध्याय समिति की सिफारिशें लागू करने के अंदेशा भर से विधानसभा के 18 सीटों पर हुए उप चुनाव में भाजपा-जद (यू) को केवल छह सीटों पर संतोष करना पड़ा। उप चुनाव के दौरान नीतीश के धुर राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी लालू व रामविलास पासवान ने जम कर इस योजना के बारे में प्रचार किया और कहा कि इसके लागू होने के बाद भू-स्वामी जमीन पर अपना मालिकाना हक खो देंगे और यह उस पर खेती करने वाले को मिल जाएगा। इसे लेकर जद (यू) से असंतुष्ट चल रहे वरिष्ठ नेता दिग्विजय सिंह ने पटना में किसानों की महापंचायत बुलाई थी, जिसमें राज्यभर से करीब एक लाख किसान शामिल हुए थे। चुनाव परिणाम और किसानों की महापंचायत ने नीतीश को इस बात का आभास करवा दिया कि भू-सुधार की इस योजना को लागू करना कांटों पर चलने जसा है। इसलिए फौरन उन्होंने जनता को आश्वस्त किया कि कोई भी अपनी जमीन का मालिकाना हक नहीं खोएगा। यह योजना फिलहाल ठंडे बस्ते में डाल दी गई है।

नीतीश का जन्म एक मार्च, 1951 को बख्तियारपुर में कविराज राम लखन सिंह और परमेश्वरी देवी की संतान के रूप में हुआ। पिता स्वतंत्रता सेनानी थे। इसलिए राजनीतिक जीवन से बचपन से ही रू-ब-रू होते रहे। बिहार कॉलेज ऑफ इंजीनियरिंग से उन्होंने इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग की डिग्री ली। लेकिन 1974-75 में बिहार के छात्र आंदोलन ने उनका रुख इंजीनियरिंग से अलग राजनीति की ओर कर दिया। जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में उन्होंने छात्र आंदोलन में बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया। तब लालू भी उनके साथ थे। दोनों की गिनती कभी घनिष्ठ मित्रों में होती थी, लेकिन राजनीतिक दांव-पेंच ने आज दोनों को एक-दूसरे का प्रतिद्वंद्वी बना दिया है। छात्र आंदोलन ने नीतीश के जीवन की दिशा तय कर दी और फिर वे कभी राजनीति से अलग नहीं हो पाए। पहली बार 1977 में जनता पार्टी के टिकट पर बिहार विधानसभा का चुनाव लड़े, लेकिन जीत 1985 के चुनाव में मिली। फिर 1989 में पहली बार लोकसभा के लिए चुने गए। इसके बाद कई सरकारों में वे मंत्री भी रहे। अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व वाली राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन सरकार में रेल मंत्री के रूप में उनका कार्यकाल काफी चर्चित रहा। इस दौरान गैसल रेल दुर्घटना के बाद इस्तीफा देकर उन्होंने मिसाल कायम की थी।

विवादों का अर्जुन

पच्चीस साल पुराना है जख्म, लेकिन अब भी हरा। दर्द और तकलीफ कहीं से भी कम होती नहीं दिखती। कहते हैं, वक्त हर घाव भर देता है; लेकिन यहां यह बात भी लागू नहीं हुई। जिंदगी वक्त के साथ आगे बढ़ती रही। दूसरी व्यस्तताओं और कामकाज ने कई बार जख्म से ध्यान हटा दिया, लेकिन टीस बरकरार रही। इन पच्चीस सालों में कई बार उठी टीस ने जख्म के हरे होने का एहसास कराया। पीड़ित न्याय की गुहार लगाते रहे। न्याय मिला भी उन्हें। पर पच्चीस साल बाद और वह भी आंशिक।

भोपाल की एक अदालत ने दो और तीन दिसंबर, 1984 की रात यूनियन कार्बाइड कंपनी के कारखाने से निकली जानलेवा गैस के मामले में कंपनी के तत्कालीन प्रमुख वारेन एंडरसन को दोषी ठहराते हुए दो साल की सजा सुनाई। निश्चय ही पिछले पच्चीस साल से इंसाफ की बाट जोह रहे पीड़ितों के लिए यह सजा तरह राहत देने वाली नहीं थी। लेकिन इस मामले में मध्य प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री अर्जुन सिंह और कांग्रेस की भूमिका पर उठे सवाल ने पीड़ितों का गुस्सा और भड़का दिया। आरोप है कि बतौर मुख्यमंत्री अर्जुन सिंह ने एंडरसन को विदेश भगाया। तब न केवल राज्य में, बल्कि कें्र में भी कांग्रेस की सरकार थी और राजीव गांधी प्रधानमंत्री थे। पूरे प्रकरण में अर्जुन सिंह की भूमिका संदेह के घेरे में है। कांग्रेस बचाव की म्रुा में है तो भाजपा सहित अन्य विपक्षी दल आक्रामक। अर्जुन सिंह से जवाब सभी मांग रहे हैं। लेकिन वे कहते हैं, उनके पास कहने के लिए कुछ है ही नहीं।

अस्सी वर्षीय कांग्रेस के वरिष्ठ नेता अपने अब तक के लंबे राजनीतिक कॅरियर में बस कुछ दिनों के लिए पार्टी से अलग हुए। वे नेहरू-गांधी परिवार के करीबी रहे हैं, पर सोनिया गांधी के करीब नहीं रह पाए। कई मौके आए जब परिवार के प्रति वफादारी के बदले उन्हें बेहतर ईनाम की उम्मीद रही, लेकिन हुआ ठीक उल्टा। उन्हें और उनकी पत्नी सरोज देवी को इसका मलाल भी है। ‘अर्जुन सिंह : एक सहयात्री इतिहास काज् नाम से उनकी राजनीतिक जीवनी लिखने वाले वरिष्ठ पत्रकार राम शरण जोशी ने वर्ष 2007 में अर्जुन सिंह को राष्ट्रपति नहीं बनाने के मुद्दे पर सरोज देवी को बड़ी बेबाकी से यह कहते हुए उद्धृत किया है, ‘अगर मैडम (सोनिया गांधी) उन्हें राष्ट्रपति बना देतीं, तो उनका क्या चला जाता?ज्

इससे पहले वर्ष 2004 में भी जब सोनिया ने प्रधानमंत्री पद पर अपनी दावेदारी छोड़ते हुए मनमोहन सिंह को आगे किया था, तब भी अर्जुन ¨सह आहत हुए थे। और तब, मंच पर सार्वजनिक रूप से उनकी आंखों से आंसू छलक आए थे, जब पिछले साल लोकसभा चुनाव के दौरान कांग्रेस हाईकमान ने उनकी बेटी वीणा सिंह को सीधी और बेटे अजय सिंह को सतना संसदीय क्षेत्र से टिकट देने से मना कर दिया। लेकिन इसके बावजूद पार्टी के एक अनुशासित कार्यकर्ता के रूप में उन्होंने चुनाव के दौरान कांग्रेस के लिए प्रचार करने की बात कही।

अर्जुन सिंह को इस बात का भी मलाल है कि राजीव गांधी की हत्या के बाद सोनिया गांधी को सार्वजनिक जीवन में सक्रिय करने में अहम भूमिका निभाने के बावजूद संप्रग अध्यक्ष ने कभी उनकी सेवाओं को वह सम्मान नहीं दिया, जिसके वे हकदार थे। प्रधानमंत्री, राष्ट्रपति की कुर्सी से तो उन्हें दूर रखा ही गया; पार्टी में उनके बाद शीर्ष के दूसरे ताकतवर नेता का दर्जा भी नहीं दिया गया। लेकिन इन शिकायतों के बावजूद पार्टी व नेहरू-गांधी परिवार के लिए उनकी वफादारी कम नहीं हुई। उन्होंने राहुल गांधी को भविष्य के युवा प्रधानमंत्री ने पेश किया। तब इसे उनकी चाटुकारिता कहा गया, लेकिन आज वही राग मौजूदा प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और कांग्रेस के दूसरे नेता भी अलाप रहे हैं।

संप्रग सरकार के पहले कार्यकाल के दौरान अर्जुन सिंह को मानव संसाधन विकास मंत्रालय की जिम्मेदारी सौंपी गई थी और तब उन्होंने लोगों को एकबार फिर मंडल कमीशन की सिफारिशों की याद दिला दी, जिसे लागू कर सरकारी नौकरियों में पिछड़ी जाति के उम्मीदवारों के लिए आरक्षण का प्रावधान किया गया था और जिसके बाद पूरा देश सुलग उठा था। एकबार फिर उसी राह पर चलते हुए अर्जुन सिंह ने सरकारी व मान्यता प्राप्त विश्वविद्यालयों में पिछड़ी जाति के छात्रों के लिए नामांकन में भी आरक्षण का प्रावधान किया। इस निर्णय के बाद एकबार फिर छात्र सड़कों पर उतर आए, लेकिन अर्जुन सिंह अपने फैसले से पीछे नहीं हटे। इसे कांग्रेस के लिए वोट बैंक बनाने और खुद को पिछड़ों का मसीहा बनाने की अर्जुन ¨सह की कोशिश के रूप में देखा गया।

एक राजनीतिज्ञ के रूप में अर्जुन सिंह के साथ विवाद अक्सर जुड़े रहे। मध्य प्रदेश के रेवा जिले के चुरहट से ताल्लुक रखने वाले अर्जुन सिंह के पिता राव शिव बहादुर सिंह भी राजनीति से जुड़े थे। 1980 के दशक में मध्य प्रदेश का मुख्यमंत्री रहते हुए उन पर चुरहट लॉटरी मामले में भी संलिप्तता के आरोप लगे। कहा गया कि उन्होंने नकली लॉटरी की व्यवस्था करने वालों की मदद की। उन पर उत्तर प्रदेश सरकार ने दहेज उत्पीड़न का मामला भी दर्ज किया है, जिसमें अभियोग उनकी प्रपौत्री के पिता ने लगाया है। पीवी नरसिम्हा राव सरकार में भी वे मंत्री थे, लेकिन बाबरी मस्जिद विध्वंस के बाद उन्होंने इस्तीफा दे दिया। उन्होंने राव पर हिंदू विचारधारा की ओर झुकाव का आरोप भी लगाया। राव सरकार से इस्तीफे के बाद उन्होंने कांग्रेस भी छोड़ दिया और उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री नारायण दत्त तिवारी के साथ मिलकर ऑल इंडिया इंदिरा कांग्रेस (तिवारी) का गठन किया। लेकिन पार्टी 1996 में लोकसभा चुनाव हार गई। उधर, कांग्रेस को भी हार का सामना करना पड़ा और वह सत्ता से बाहर हो गई। इसके बाद अर्जुन ¨सह और नारायण दत्त तिवारी दोनों कांग्रेस में लौट आए। उन पर संप्रग सरकार के पहले कार्यकाल में मानव संसाधन विकास मंत्री रहते हुए घाटे में चल रही शिक्षण संस्थाओं को भी मान्यता प्राप्त विश्वविद्यालय का दर्जा देने का आरोप है। वे तीन बार मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री रह चुके हैं और एकबार पंजाब के राज्यपाल। हालांकि पंजाब के राज्यपाल के रूप में उनका कार्यकाल काफी छोटा था, लेकिन इस बीच उन्होंने पंजाब में शांति बहाल करने के लिए राजीव-लौंगवाल समझौता पर सराहनीय कार्य किया। उन्हें वर्ष 2000 में सर्वश्रेष्ठ सांसद का अवार्ड भी मिला।

उम्र छोटी, उपलब्धि बड़ी

उम्र सिर्फचौदह साल, लेकिन उपलब्धियां कईगुना अधिक।आंखोंमेंसपने हैंऔर उन्हेंपूरा करने का माद्दा भी। कई सपने पूरे हुए हैं, तो कुछ बाकी हैं। यह कोई और नहीं, आईआईटी-जेईई की प्रवेश परीक्षा में दिल्ली जोन का टॉपर और पूरे देश में 33वां स्थान हासिल करने वाला सहल कौशिक है। आंखों पर चश्मा लगाए चौदह साल का सहल पहली नजर में अपनी उम्र के दूसरे बच्चों सा ही दिखता है, लेकिन थोड़ा गौर से देखो तो यह ‘भीड़ से अलगज् और इसकी दुनिया दूसरे बच्चों से अलग दिखती है। उसे करीब से देखने व समझने वाला शायद ही कह सकता है कि उसका दिमाग कभी खाली रहता है। मानो कुछ न कुछ इसमें चल रहा है। शायद कोई कैल्कुलेशन या शोध।

सहल ने दस साल तक घर में पढ़ाई की, क्योंकि मां को लगा कि यदि इसे स्कूल भेजा जाता है तो यह आगे बढ़ने की बजाए और पीछे चला जाएगा। निश्चय ही यह फैसला बेहद हिम्मतभरा था, खासकर ऐसे समय में, जबकि हर मां-बाप अपने बच्चे को अच्छे से अच्छे स्कूल में दाखिला दिलाने की कोशिश में लगे रहते हैं। सहल की मां का यह फैसला जाहिर तौर पर बेटे की प्रतिभा में उनके अटूट शिस को दर्शाता है। उन्होंने बेटे के लिए अपने कॅरियर को भी दां पर लगाने से परहेज नहीं किया और डॉक्टर की प्रैक्टिस छोड़ दी। हालांकि तब उनके फैसले पर साल उठानेोले और उन्हें यह कहनेोले बहुत थे कि अपनी पढ़ाई-लिखाई को े बेकार कर रही हैं, लेकिन अब सब चुप हैं। सहल ने सबको जाब दे दिया है। उसकी प्रतिभा पर संदेह करनेोलों को भी और मां के फैसले पर साल उठानेोलों को भी। मां भी खुश हैं और उन्हें लगता है कि उनकी पढ़ाई कहीं बेकार नहीं गई, बल्कि यह तो उन्होंने अपने बेटे तक पहुंचाई और बेटे ने उसे सार्थक कर दिखाया।

मां ने बेटे की प्रतिभा तभी पहचान ली थी, जब ह महज दो-ढाई साल का था। इस छोटी सी उम्र में ह गणित के कई साल चुटकियों में हल कर लेता था। अंग्रेजी के लंबे-लंबे शब्द उसे याद थे और कतिाएं भी। चार साल की उम्र तक उसने सौ तक के टेबल भी याद कर लिए थे और छह साल में एचजी ेल्स की पुस्तक ‘टाइम मशीनज् पढ़ डाली थी। बेटे को घर में पढ़ाने का निश्चय करनेोली रुचि कौशिक ने उसके लिए लाखों की लागत से घर में ही लाइब्रेरी बनाई, जिसमें दो हजार से अधिक पुस्तकें हैं।

दस साल तक बेटे को घर में पढ़ानेोली रुचि शयद ही कभी उसे स्कूल भेजतीं, अगर आईआईटी के लिए 12ीं पास होना जरूरी नहीं होता। दस साल की उम्र में 2006 में उन्होंने बेटे का दाखिला नौीं में कराया। साल 2008 में उसने दसीं की परीक्षा पास की और 2010 में बारहीं की। हालांकि अंक दोनों ही कक्षाओं में औसत से बस थोड़ा बेहतर आया। दसीं में सहल को 76 प्रतिशत तो बारहीं में 73 प्रतिशत अंक मिले। यह अंक आईआईटी की तैयारी करनेोले किसी छात्र या उसके अभिभाकों के लिए निराशाभरा हो सकता है, लेकिन इससे न तो सहल निराश हुआ और न ही उसकी मां रुचि। रुचि को पूरा यकीन था कि भले ही यह अंक दिल्ली श्ििद्यालय के किसी अच्छे कॉलेज में दाखिले के लिए पर्याप्त नहीं है, लेकिन इससे उनके बेटे के आईआईटी निकालने पर कोई असर नहीं होगा और हुआ भी यही।

सहल के शिक्षक उदय प्रताप सिंह, जो रुचि कौशिक के बाद उसकी प्रतिभा को पहचाननेोले दूसरे शख्स हैं, कहते हैं कि दसीं और बारहीं का अंक किसी छात्र की प्रतिभा का मानक नहीं है। आईआईटी सहित किसी भी परीक्षा की तैयारी के लिए छात्रों को रटने के बजाय षिय को समझने पर जोर देना चाहिए। सहल ने ही किया और नतीजा सबके सामने है। हालांकि े यह भी कहते हैं कि निश्चय ही सहल जसा दिमाग सबके पास नहीं होता। लेकिन उसने षिय को समझने का जो तरीका अपनाया, उससे तो सीख ली ही जा सकती है। सहल की कामयाबी आईआईटी की तैयारी करनेोले दूसरे बच्चों के लिए एक संदेश भी है कि े रट्टूमल न बनें, बल्कि षिय को समझने पर जोर दें।

सहल ने इस मिथक को भी तोड़ा कि आईआईटी की प्रेश परीक्षा में सफल होने के लिए 12 से 15 घंटे पढ़ाई करने की जरूरत है। कोचिंग में छह घंटे की पढ़ाई के अलाा घर में बस एक से दो घंटे का क्त पढ़ाई पर दिया। उसमें भी ऐसा नहीं कि सिर्फ ज्ञिान और गणित की पुस्तकें पढ़ते रहे, बल्कि साथ-साथ कहानियों और इतिहास की किताबें भी पढ़ते रहे। दरअसल, कहानियों, उपन्यासों और इतिहास की किताबों से यह लगा आज से नहीं, बल्कि तब से है, जब से मां ने सहल को घर में ही पढ़ाने का फैसला किया। रुचि बताती हैं कि घर में उन्होंने सहल के लिए किसी षिेष शिक्षा की व्यस्था नहीं की, बल्कि सामान्य ज्ञान आधारित मिली-जुली शिक्षा पर जोर दिया। यही जह रही कि अब तक ह इतिहास कहानियों की कई किताबें, उपन्यास आदि पढ़ चुका है। हैरी पॉटर श्रंखला की सभी किताबें भी ह पढ़ चुका है।

बेहद संकोची स्भा का दिखनेोला सहल क्याोस्त में ऐसा ही है? जाब में उसकी मां रुचि कहती हैं, नहीं। सहल घुलता-मिलता है, लेकिन उन्हीं लोगों से जिन्हें वह चाहता है। इस छोटी सी उम्र में अंतर्राष्ट्रीय स्तर की कई प्रतियोगिताएं जीत चुके सहल को देश के बाहर अपनी उम्र के बच्चों के साथ घुलने-मिलने में कोई दिक्कत नहीं हुई। कोचिंग में भी सहल को ऐसी कोई दिक्कत नहीं हुई। हां, जब कोई अपरिचित व्यक्ति या खासकर मीडियाोले कुछ साल करते हैं तो जाब देने से पहले ह सोचता है या फिर मां की ओर देखता है। शायद इसलिए, क्योंकि मां उसे संबल, साहस, हौसला और आत्मशिस देती है।

चौदह साल का सहल सबके बीच में रहते हुए भी कभी-कभी हां से अलग दिखता है। उसे देखो तो लगता नहीं कि ह सबके बीच में बैठकर उनकी बातें सुन रहा है, बल्कि ह गणित के किसी साल को हल करने या भौतिकी के किसी पहलू के बारे में सोचता दिखता है। आईआईटी करनेोले हजारों बच्चों से अलग सहल की इच्छा इंजीनियर बनने की नहीं, बल्कि खुद को एक शोधकर्ता के रूप में देखने की है। ह भौतिकी में शोध करना चाहता है। इसलिए उसने आईआईटी कानपुर से पांच साल के इंटिग्रेटेड कोर्स में दाखिला लेना तय किया है। मैक्सेल, आइंसटीन और न्यूटन उसके हीरो हैं और ह उन्हीं की तरह बनना चाहता है।

सबसे कम उम्र में आईआईटी निकालनेोले सहल की उपलब्धियां यहीं तक नहीं हैं। एक साल पहले यानी 2009 में ह एशियन फिजिक्स ओलंपियाड में सिल्र मेडल जीत चुका है। इस साल हुई इसी प्रतियोगिता में उसने कांस्य पदक हासिल किया। किशोर ैज्ञानिक प्रोत्साहन योजना की स्कॉलरशिप भी उसकी उपलब्धियों के खाते में है। 2009 में जापान में हुए एशिया स्कूल कैंप का भी ह सदस्य रह चुका है। पढ़ाई से इतर सहल के शौक की बात की जाए, तो यहां भी ह दूसरे बच्चों से अलग दिखता है। आजकल के बच्चों को जहां आधुनिक संगीत आकर्षित करता है, हीं सहल को पुराने संगीत खासे पसंद हैं, खासकर किशोर कुमार के गाए गीत। घर में मां के हाथ का बना खाना खूब भाता है तो बाहर चाइनीज और मेक्सिन खाने भी पसंद हैं। खाली क्त में बैडमिंटन खेलना, तैराकी, घुड़सारी, ताइक्वांडो और र्पतारोहण भी पसंद है। इन सबका मौका खासतौर पर तब मिलता है, जब छुट्टियां बिताने ह पिता टीके कौशिक के पास असम पहुंचता है, जो सेना के अधिकारी हैं और फिलहाल असम के तेजपुर में तैनात हैं।

सोमवार, 28 जून 2010

विनाश की कीमत पर कैसा विकास!

वरिष्ठ पत्रकार देवदत्त से बातचीत पर आधारित

पांच जून का महत्व इस कारण है कि यह हमें यह सोच विचार का अवसर देता है कि मौजूदा समय में हम जलवायु परिवर्तन, बढ़ते तापमान आदि का जो संकट झेल रहे हैं, उसके कर्ताधर्ता हम खुद हैं। यह दिन संकल्प करने का दिन भी है कि हम पर्यावरण को और न बिगाड़ें, साथ ही बिगड़ने से रोकें। जरुरत गहरे सोच विचार की है। हमारे संकट का एक बड़ा कारण विकास का हमारा मॉडल है। पर्यावरण की कीमत पर विकास की अंधी दौड़ पर अंकुश लगाना बहुत जरूरी है।


हर साल पांच जून को मनाया जाता है पर्यावरण दिवस। लोगों में जागरू कता पैदा करने के लिए या उन्हें यह याद दिलाने के लिए कि दुनिया भर में पर्यावरण को हमारी ही गतिविधियों से नुकसान हो रहा है और जिसका खामियाजा अंतत: हमें ही भुगतना है। इस दिन लोग संकल्प भी लेते हैं कि आगे पर्यावरण के प्रति सचेत रहेंगे और उसे नुकसान से बचाएंगे। लेकिन यह भी सच है कि कभी- कभी यह सिर्फ खानापूर्ति बनकर रह जाता है। पर्यावरण दिवस को लेकर लोगों में चेतना 1972 में जगी, जब पांच जून को पर्यावरण समस्याओं पर विचार करने के लिए संयुक्त राष्ट्र ने सम्मेलन बुलाया। पर्यावरण को हो रहे नुकसान की समस्या तब पहली बार औपचारिक रूप से दुनिया के सामने आई थी। 1992 में सैनफ्रांसिस्को में इसे लेकर एक अन्य सम्मेलन हुआ, जिसमें कहा गया कि 189०-199० के बीच सौ साल में पर्यावरण को जो नुकसान हुआ, वह काफी चिंताजनक है। इससे पहले 198० के दशक में हुए एक अन्य सम्मेलन में वैज्ञानिकों ने दुनिया की जलवायु में हो रहे अपरिवर्तनीय बदलाव को लेकर चेतावनी दी थी और कहा था कि यह खतरनाक स्तर तक पहुंचता जा रहा है।
 
दरअसल, पर्यावरण प्रदूषण या जलवायु परिवर्तन कोई नई चीज नहीं है। दुनिया में अब तक जितनी भी सभ्यताएं बनी हैं या ध्वस्त हुई हैं, सभी जलवायु परिवर्तन की वजह से ही बनी या बिगड़ीं। लेकिन इस बार नई बात है इसकी रफ्तार। फिलहाल जिस तेजी से जलवायु परिवर्तन हो रहा है, उतनी तेजी से पहले कभी नहीं हुआ। इसके लिए जिम्मेदार है वह आधुनिक तकनीक, जिससे औद्योगीकरण का दुनियाभर में तेजी से विकास हुआ। हालांकि प्रारंभिक तौर पर इसकी जिम्मेदारी पश्चिमी देशों पर है, क्योंकि औद्योगीकरण की शुरुआत वहीं हुई, लेकिन बाद में विकासशील देश भी इससे जुड़ गए, जिससे खतरा बढ़ता चला गया। आगे चलकर विकसित और विकासशील देशों में समस्या पर चर्चा हुई, जिसमें समाधान के लिए सामूहिक प्रयास की वकालत की गई। लेकिन यह चर्चा बाद में राजनीतिक हो गई। विकसित देश अपने औद्योगिक विकास की रफ्तार कम करने या उसमें किसी भी तरह के संशोधन के पक्ष में नहीं थ्ो, जबकि विकासशील देशों का कहना था कि उन्होंने औद्योगिक विकास की प्रक्रिया अभी-अभी शुरू की है, इसलिए वे समाधान के लिए किसी तरह का कानूनी प्रतिबंध नहीं चाहते।
 
दुनिया भर में औद्योगीकरण से पर्यावरण को जो नुकसान हुआ, उसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि वर्तमान में 3० प्रतिशत उभयचर प्राणियों, 23 प्रतिशत स्तनपायी और 12 प्रतिशत चिड़ियों का अस्तित्व खतरे में है। यह अंधाधुंध बढ़ते औद्योगीकरण का ही नतीजा है कि हर साल 45 हजार वर्ग किलोमीटर जंगल समा’ हो रहे हैं। दुनिया की 6० प्रतिशत प्रमुख नदियों पर बांध बना दिए गए हैं, जिससे मछलियां 5० प्रतिशत तक कम हो गई हैं। बढ़ते पर्यावरण प्रदूषण से दुनियाभर में पक्षियों की 122 प्रजाति का अस्तित्व खतरे में पड़ गया है, जिसमें से 28 हिन्दुस्तान में हैं। औद्योगीकरण का एक अन्य नुकसान कार्बन गैसों के उत्सर्जन के रूप में सामने आया। विकास की दौड़ में बड़ी-बड़ी फैक्ट्रियों, गाड़ियों, एसी जैसी चीजों को तो हमने खूब प्राथमिकता दी, लेकिन इनसे निकलने वाले कार्बन गैसों के उत्सर्जन से पर्यावरण को हो रहे नुकसान की ओर हमारा ध्यान नहीं गया। आज चीन दुनिया में सबसे अधिक कार्बन गैसों का उत्सर्जन करता है। वहां प्रति व्यक्ति कार्बन उत्सर्जन की दर 21 टन है, जो दुनिया भर में होने वाले कार्बन उत्सर्जन का दस प्रतिशत है। उसके बाद अमेरिका, यूरोपियन यूनियन के देशों और रूस का स्थान आता है। भारत का स्थान इस मामले में पांचवां है और यहां प्रति व्यक्ति कार्बन उत्सर्जन की दर 1.2 टन है, जो दुनिया भर में होने वाले कार्बन उत्सर्जन का केवल तीन प्रतिशत है। यही वजह है कि भारत अपने विकास कार्यक्रमों पर पर्यावरण सुरक्षा के नाम पर किसी तरह का प्रतिबंध नहीं चाहता। वहीं, विकसित देशों के समूह दुनिया भर में होने वाले कार्बन गैसों के उत्सर्जन का 8० प्रतिशत उत्सर्जित करते हैं, जिसमें 45 प्रतिशत सिर्फ औद्योगीकरण से है। पर्यावरण सुरक्षा को दरकिनार कर विकसित देशों और फिर विकासशील देशों ने विकास का जो मॉडल तैयार किया है यह उसी का नतीजा है कि जगह-जगह बर्फ की चोटियां पिघल रही हैं, जिससे बाढ़ का खतरा बढ़ रहा है। इससे खासकर, नदियों के किनारे रहने वाले शहर अधिक प्रभावित होंगे। अकेले हिन्दुस्तान में 75०० किलोमीटर समुद्री तटीय क्षेत्र हैं, जहां तीन हजार 85 खरब डॉलर की संपत्ति है। यह खतरे में पड़ सकती है। वहां के लोगों के लिए पुनर्वास की व्यवस्था भी करनी होगी।
 
ऐसा नहीं है कि सरकार की पर्यावरण सुरक्षा को ल्ोकर कोई नीति नहीं है, बल्कि इसे लेकर प्रधानमंत्री ने एक परिषद भी बनार्इ है, जिसके 21 सदस्य हैं। लेकिन भारत जैसे संघीय देश में नीतियों का क्रियान्वयन एक बड़ी समस्या है, जहां राज्यों को भी काफी अधिकार दिए गए हैं। फिर, हमारी राजनीतिक मानसिकता भी अभी गरीबी, साम्प्रदायिक हिंसा, शिक्षा, स्वास्थ्य, जात-पात से ऊपर नहीं उठ पाई है। यहां तक कि युवा नेतृत्व भी इन सबसे ऊपर नहीं उठ पाया है। नवीन जिंदल जैसे युवा सांसद का खाप की वकालत करना इसी का परिचायक है। यानी जलवायु परिवर्तन जैसी समस्या के समाधान के लिए राजनीतिक फलक को विस्तृत करने की जरूरत है। जहां तक पर्यावरण को लेकर जनमानस का सवाल है, तो भारतीय जनमानस पर्यावरण से विमुख नहीं है, बल्कि वह तो प्रकृति को खुद से अलग मानता ही नहीं। पेड़-पौधों की पूजा का प्रचलन इसी मानसिकता का परिचायक है। लेकिन पश्चिमी देशों में ऐसा नहीं होता, बल्कि वहां प्रकृति को नियंत्रित करने की कोशिश होती है। हां, हमारे देश में भी जनता कई बार औद्योगीकरण से होने वाले तात्कालिक फायदे के प्रभाव में आ जाती है, क्योंकि उन्हें इससे होने वाले नुकसान की जानकारी नहीं होती। इसलिए उन्हें यह बताने और इसे लेकर उनमें चेतना जगाने की जरूरत है। इसमें मीडिया की अहम भूमिका हो सकती है। हमें यह ध्यान रखना होगा कि हम विकास तो करें, पर पर्यावरण की कीमत पर नहीं।

मंगलवार, 25 मई 2010

आनंद विश्व-नाथन

विश्वनाथन आनंद ने शतरंज में विश्व चैम्पियनशिप का खिताब लगातार तीसरी बार बरकारार रखा। उनकी जीत देश के करोड़ों खेल प्रेमियों के लिए खुशी लेकर आई, जो टी20 में भारतीय टीम की हार से आहत थे। उनकी मां को तो खर यकीन था बेटे की लगन और मेहनत पर, देश के लोगों को भी भरोसा था कि आनंद फिर चैम्पियन बनेंगे। लगातार खिताब जीतकर उन्होंने सभी को अपनी प्रतिभा का कायल किया है। उन्होंने यह यकीन बनाए रखा। बुल्गारिया के वेसलीन तोपालोव को उन्होंने कठिन मुकाबले में हराया और खुद माना कि तोपालोव एक मंङो हुए खिलाड़ी हैं।





विश्वनाथन आनंद, शतरंज के शहंशाह। अपनी लगन और एकाग्रता से चौथी बार और लगातार तीसरी बार जीता विश्व चैम्पियनशिप का खिताब। आखिर किसे न नाज हो, ऐसे चैम्पियन पर। उनके माता-पिता को भी है, उस राज्य को भी है जहां से वे आते हैं और देश की करोड़ों जनता को भी। यूं तो हर जीत मायने रखती है, लेकिन इस बार यह कुछ अधिक खास है। विशेषकर खेल प्रेमियों के लिए, जो टी20 में भारतीय टीम की हार के बाद करीब-करीब सदमे की हालत में थे। ऐसे में आनंद की जीत ने उनके हारे मन को जसे उत्साह व आशा से भर दिया।

दोस्तों में ‘विशिज् और समर्थकों में ‘टाइगर ऑफ म्रासज् के नाम से मशहूर आनंद को शतरंज के मोहरों से परिचित कराया उनकी मां ने, जब वे सिर्फ छह साल के थे। वह मां ही थीं, जिन्होंने उन्हें शतरंज की बिसात पर शह-मात का खेल सिखाया। मां और पिता के दुलारे ‘बाबाज् ने फिर कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा। स्कूल और पढ़ाई से जब भी वक्त मिलता, वे मां के साथ बैठ जाते थे शतरंज के प्यादों से शह-मात का खेल खेलने। बड़ा भाई और बड़ी बहन भी थीं घर में। बहन उम्र में करीब 11 साल बड़ी थीं तो भाई 13 साल। लेकिन कोई उनके साथ शतरंज खेलने नहीं बैठता था, क्योंकि इस खेल में जिस धर्य की जरूरत थी, वह उनमें नहीं था। इसलिए आनंद अधिकतर मां के साथ ही शतरंज के मोहरों से खेलते थे।

घर में खेलते-खेलते मां को ‘बाबाज् की प्रतिभा का भान हुआ। उन्हें लगा सिर्फ घर में खेलते रहे तो बेटे की पूरी प्रतिभा शायद निखर कर न आ पाए। इसलिए उन्होंने उसे प्रशिक्षण के लिए भेजा, तब शायद ही उन्हें अंदाजा हो कि उनका यह लाल एक दिन विश्व चैम्पियन बनकर न केवल उन्हें, बल्कि पूरे देश को गौरवान्वित करेगा। स्कूली पढ़ाई के दौरान आनंद सप्ताहांत में शतरंज से जुड़ी प्रतियोगिताओं में भाग लेने लगे और उसमें जीतने भी लगे। यह सिलसिला जिला स्तर की स्पर्धाओं में भी जारी रहा। फिर राज्य स्तरीय, राष्ट्र स्तरीय और अंतत: अंतर्राष्ट्रीय स्तर की प्रतियोगिताओं में आनंद ने आशानुरूप हमेशा उम्दा प्रदर्शन किया और जूनियर, सब-जूनियर व सीनियर श्रेणियों में कई खिताब अपने नाम किए।

उनकी मां याद करती हैं, जब आनंद के पिता की पोस्टिंग दो साल के लिए फिलिपीन्स में हुई तो कैसे शतरंज के प्रति वहां के लोगों में खास लगाव ने ‘बाबाज् को प्रभावित किया। उन्होंने वहां देखा कि लोग बसों और पार्क में भी वक्त मिलते ही शतरंज के मोहरों से खेलना शुरू कर देते थे। शतरंज के प्रति लोगों के इस लगाव को आनंद ने कई बार फिलिपीन्स में यहां-वहां आते-जाते देखा। निश्चय ही इन सबने शतरंज के प्रति उनकी रुचि और बढ़ाई। वहां की शतरंज प्रतियोगिताओं में तब जीतने वाले को किताबें मिला करती थीं। उन्हें याद है आनंद ने भी कई स्पर्धाएं जीतीं और पुरस्कारस्वरूप किताबें भी।

ग्यारह दिसंबर, 1969 को म्रास (अब चेन्नई) में पिता विश्वनाथन और मां सुशीला की तीसरी संतान के रूप में जन्मे आनंद ने केवल चौदह की साल की उम्र में 1983 में राष्ट्रीय सब-जूनियर चैम्पियनशिप जीता और सत्रह साल की उम्र में राष्ट्रीय चैम्पियनशिप। सभी इस किशोर की प्रतिभा से चकित थे, जो बड़ी तेजी से खेल निपटा लेता था। शतरंज की 40 चाल के लिए तय मानक समय 120 मिनट है, जबकि आनंद इसे केवल 30 मिनट में निपटा लेते हैं। बिजली की सी तेजी से शह-मात का खेल खेलन वाले इस ‘लाइटनिंग किडज् ने 1987 में वर्ल्ड जूनियर चेस चैम्पियनशिप जीता। यह खिताब जीतने वाले वे पहले एशियाई थे। 1988 में आनंद भारत के पहले ग्रैंडमास्टर बने और विश्व के सबसे कम उम्र के ग्रैंडमास्टर।

लेकिन इससे पहले ही वे अंतराष्ट्रीय स्तर पर छा गए थे। 1985 में जब उन्होंने लंदन में एक टूर्नामेंट के दौरान ब्रिटेन के ग्रैंडमास्टर जोनाथन मिशेल को हराया तो भारत के लिए यह एक बड़ी उपलब्धि थी। शतरंज में रूसी वर्चस्व को तोड़ने के लिए आनंद पश्चिमी जगत के लिए भी उम्मीद की एक किरण बनकर उभरे। इस टूर्नामेंट ने भारत में शतरंज के प्रति विशेष सम्मान पैदा किया। अखबारों और दूरदर्शन पर शतरंज से जुड़ी खबरों व कार्यक्रमों को प्राथमिकता दी जाने लगी। युवाओं की इस खेल में रुचि बढ़ी और अभिभावकों को भी लगा कि शतरंज के खेल में भी उनके बच्चों का भविष्य हो सकता है। साफ है आनंद की जीत ने शतरंज को लेकर देश में क्रांति ला दी।

पहला विश्वचैम्पियनशिप उन्होंने 1995 में रूस के गैरी कास्परोव के खिलाफ खेला। हालांकि वे इसमें हार गए, लेकिन हताश व निराश नहीं हुए। वे पहले की तरह ही पूरी लगन व एकाग्रता से अभ्यास करते रहे। उनके साथ-साथ करोड़ों देशवासियों का सपना साकार हुआ वर्ष 2000 में, जब आनंद पहली बार विश्व चैम्पियन बने। वर्ष 2007 में दूसरी बार उन्होंने यह खिताब जीता। फिर वर्ष 2008 में और अब 2010 में भी लगातार उन्होंने तीसरी बार जीत का सिलसिला बनाए रखना। आनंद की खेल रणनीति को समझने वाले उसे वन मैन आर्मी कहते हैं, जो अकेले ही विरोधियों को पराजित कर देता है।

आनंद केवल खेल में ही नहीं, बल्कि पढ़ाई में भी अव्वल रहे। डॉन बास्को स्कूल से उन्होंने स्कूली शिक्षा पूरी की और फिर चेन्नई के लोयला कॉलेज से बी. कॉम किया। हर जगह उनका प्रदर्शन उम्दा रहा। निजी जीवन में भी वे बेहद शांत और व्यवहारकुशल हैं। शतरंज से इतर किताबें पढ़ना, तैराकी, संगीत और फिल्में उनकी पसंद हैं। वे रॉक संगीत और एक्शन फिल्में खास तौर पर पसंद करते हैं। शतरंज पर उन्होंने ‘माई बेस्ट गेम ऑफ चेसज् नाम से एक किताब भी लिखी है, जिसे 1998 में ब्रिटिश चेस फेडरेशन ने ‘बुक ऑफ द ईयरज् के खिताब से नवाजा। उनकी उपलब्धियों को देखते हुए भारत सरकार ने 1987 में केवल अठारह साल की उम्र में उन्हें पद्म श्री सम्मान दिया। इसके अलावा वे अर्जुन पुरस्कार, नेशनल सिटीजन पुरस्कार, राजीव गांधी खेल रत्न पुरस्कार, चेस ऑस्कर, पद्म भूषण और पद्म विभूषण से भी सम्मानित हो चुके हैं।

सोमवार, 24 मई 2010

राजा बजाएगा बाजा

यूपीए-दो का एक साल पूरा हो गया। तमाम मुद्दों पर विपक्ष ने सरकार को घेरा, लेकिन सबसे ज्यादा हंगामा संचार मंत्री ए राजा के 2जी स्पेक्ट्रम का लाइसेंस निजी कंपनियों को देने पर यह कहकर हुआ कि इससे सरकार को करोड़ों का चूना लगा। यूपीए अपने तमाम वाचाल मंत्रियों से साल भर परेशान रही, पर उससे ज्यादा इस चुप्पा मंत्री से। राजा जितना हंगामा कराएं, उनका बाल भी बांका नहीं हो सकता, क्योंकि वे सहयोगी दल ्रमुक के सदस्य ही नहीं, उसके सुप्रीमो करुणानिधि के करीबी भी हैं।



हाल के दिनों में यूपीए सरकार अपने मंत्रियों के बड़बोलेपन के कारण खूब सुर्खियों में रही। कभी अपनी ही पार्टी कांग्रेस के मंत्रियों ने सरकार को अपनी इस आदत से पसोपेश में डाला तो कभी गठबंधन के सहयोगी दलों के मंत्रियों ने। ऐसे ही एक मंत्री हैं यूपीए के एक अहम सहयोगी दविड़ मुनेत्र कषगम के सांसद ए राजा। पूरा नाम अंदिमुथु राजा है, लेकिन जाने जाते हैं ए राजा के नाम से। कें्र में संचार एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय की जिम्मेदारी संभालते हैं। लेकिन यूपीए सरकार का यह मंत्री अपने बड़बोलेपन से नहीं, बल्कि अपनी खामोशी से चर्चा में है। स्पेक्ट्रम घोटला सरकार के गले की फांस बन गया, लेकिन मंत्री जी कुछ न बोले। विपक्ष ने संसद नहीं चलने दी, जमकर का हंगामा किया, लेकिन मंत्री जी फिर भी कुछ न बोले। अधिक पूछो तो केवल ‘नो कमेंटज् जसा छोटा सा कमेंट कर निकलते बनते हैं।

अब तक के सबसे बड़े घोटाले स्पेक्ट्रम घोटाले को लेकर मंत्रीजी काफी दिनों से सुर्खियों में हैं। आरोप है कि वर्ष 2008 में निजी कंपनियों को 2जी (सेकंड जेनेरेशन) का लाइसेंस आवंटित कर उन्होंने सरकार को करोड़ों का चूना लगाया। इन कंपनियों को 2जी का आवंटन वर्ष 2001 की दरों पर किया गया और इसके लिए बोली भी नहीं लगाई गई, बल्कि ‘पहले आओ, पहले पाओज् के आधार पर मंत्री जी ने रेवड़ियों के भाव लाइसेंस का आवंटन निजी कंपनियों को कर दिया। इससे सरकार को 22 हजार करोड़ रुपए का नुकसान होने की बात कही जा रही है, जबकि विपक्षी भाजपा इसे 60 हजार करोड़ रुपए बताती है। सीबीआई ने मामला भी दर्ज कर लिया है। कें्रीय सतर्कता आयोग और लेखा एवं महानियंत्रक परीक्षक भी मामले की जांच कर रखा है। आरोप है कि 2जी आवंटन में मंत्री महोदय ने दूरसंचार नियामक प्राधिकरण (ट्राई) के नियमों व अनुशंसाओं की भी अनदेखी की। उन सभी कंपनियों को दरकिनार कर उन्होंने निजी कंपनियों को लाइसेंस का आवंटन किया, जिसकी अनुशंसा ट्राई ने की थी।

सीबीआई ने मामले की जांच के दौरान दूरसंचार विभाग के दफ्तर में छापे भी मारे और कई अधिकारियों से इस सिलसिले में पूछताछ की। जाहिर तौर पर पूरे प्रकरण ने विपक्ष को एक बड़ा मुद्दा थमा दिया। घोटाले और दूरसंचार विभाग के दफ्तर में छापेमारी को मुद्दा बनाकर विपक्ष लगातार उनके इस्तीफे की मांग कर रहा है। विपक्ष ने इसे मुद्दा बनाकर संसद में कामकाज ठप कर दिया। लेकिन मंत्री महोदय ने सबको ठेंगा दिखा दिया। कहा, इस्तीफे का सवाल ही नहीं उठता। हालांकि यह मुद्दा सरकार के गले की फांस बन गया। विपक्ष ने संसद में कामकाज ठप कर दिया, लेकिन सरकार ने अपने एक अहम सहयोगी दल के इस मंत्री पर हाथ डालना मुनासिब नहीं समझा। इसकी वजह निश्चय ही डीएमके का एक बड़ा संख्या बल है, जिसके 18 सांसदों के जाने से सरकार की स्थिरता पर असर पड़ सकता है।

यूपीए सरकार में राजा दूसरी बार संचार मंत्री बने हैं। इससे पहले 2007 में उन्होंने संचार मंत्रालय की जिम्मेदारी संभाली थी। तब उन्होंने देश के कोने-कोने में जनता को सस्ती दरों पर टेलीफोन सुविधा मुहैया कराने का वादा किया था। काफी हद तक उन्होंने इसमें कामयाबी भी हासिल की, लेकिन स्पेक्ट्रम घोटाले ने उनकी तमाम उपलब्धियों पर ग्रहण लगा दिया। राजा जनता को दस पैसे की दर पर एसटीडी सुविधाएं मुहैया कराने की बात कह रहे हैं। इसमें वे कहां तक कामयाब होंगे, यह आने वाले दिनों में ही साफ हो पाएगा।

राजा तमिलनाडु में नीलगिरि संसदीय क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करते हैं। वे तीसरी बार सांसद निर्वाचित हुए हैं। पार्टी सुप्रीमो करुणानिधि के करीबी हैं, इसलिए भी कें्र ने उनके खिलाफ कोई कदम उठाने से परहेज किया, क्योंकि राजा के खिलाफ कार्रवाई का मतलब था, ्रमुक सुप्रीमो को नाराज करना, जिन्होंने काफी मोल-तोल के बाद दूसरी बार यूपीए सरकार को समर्थन देने पर सहमति जताई। हाल में करुणानिधि जब दिल्ली आए तब उन्होंने भी राजा के इस्तीफे से इनकार कर इस सिलसिले में उठ रहे शोर को दबा दिया। उन्होंने कहा कि राजा दलित हैं, इसलिए उनका विरोध हो रहा है।

राजा दक्षिण के राज्यों में उसी दलित राजनीति का हिस्सा हैं, जिसका उदय पेरियार के नेतृत्व में हुआ और जिसके बाद ऊंची जातियों की राजनीति वहां हाशिये पर चली गई। लेकिन घोटाले के आरोप से घिरा यह मंत्री दलितों के कम ‘दलित राजनीतिज् के अधिक करीब लगता है।

वैसे यह पहला मौका नहीं है, जब राजा पर भ्रष्टाचार का आरोप लगा। इससे पहले उन पर म्रास उच्च न्यायालय के न्यायाधीश को प्रभावित करने का आरोप भी लग चुका है। कहा गया कि उन्होंने एक डॉक्टर की अग्रिम जमानत को लेकर उच्च न्यायालय के न्यायाधीश को प्रभावित करने का प्रयास किया, जिनके खिलाफ आपराधिक मामले दर्ज थे। तब भी राजा ने अपने स्वाभानुसार बार-बार पूछे जाने पर भी केवल इतना कहा, ‘मैं सभी आरोपों से इनकार करता हूं। इस बारे में मैं कुछ नहीं जानता।ज्

राजा तब भी सुर्खियों में आए थे, जब वर्ष 2008 में श्रीलंका ने तमिल व्रिोहियों के खिलाफ सैन्य कार्रवाई शुरू की थी। कार्रवाई में तमिल नागरिकों के प्रभावित होने की बात कह ्रमुक के नेताओं ने कें्र पर इस बात के लिए दबाव बनाना शुरू कर दिया कि वह श्रीलंका सरकार से तमिल नागरिकों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए कहे। दबाव की इस रणनीति के तहत पार्टी के 14 सांसदों ने इस्तीफा दे दिया, जिसमें राजा भी शामिल थे। लेकिन यह इस्तीफा राजनीतिक खेल का एक हिस्सा था। सांसदों ने इस्तीफा अपने पार्टी सुप्रीमो को सौंपा था और इसमें तिथि भी बाद की लिखी थी।

सिर्फ उपचार, नहीं निदान

प्रसिद्ध पत्रकार व सामाजिक कार्यकर्ता देवदत्त से बातचीत पर आधारित


इस सारकार ने अपने पहले साल में यथास्थिति को बनाए रखने का ही काम किया है। न कोई नई नीति सामने आई और न ही कोई नया कदम उठता दिखा। महिला आरक्षण विधेयक, शिक्षा का अधिकार जसे काम महत्वपूर्ण जरूर हैं, पर राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना जसे काम अच्छा होते हुए भी राहत भर हैं, समस्या का समाधान नहीं। हमारी अमेरिका परस्ती बढ़ी है। नौकरशाही का वर्चस्व बढ़ा है और भ्रष्टाचार का तंत्र और मजबूत हुआ है।



सबसे पहले तो मीडिया में सरकारों के साल भर के कार्य का जो लेखा-जोखा होता है, वह रस्म अदायगी भर है। इसका कोई विशेष फायदा नहीं है और न ही यह कोई खास मायने रखता है। हां, इससे सरकार के कार्य के प्रति एक जनमत जरूर तैयार होता है, जिससे सरकार पर अपनी नीतियों को अमल में लाने और जनता से किए गए वादे को पूरा करने का दबाव बनता है। फिर, एक साल में किसी भी सरकार के कार्य का लेखा-जोखा देखकर उसकी सफलता या असफलता का अंदाज लगाना मुश्किल है। भारतीय लोकतंत्र में सरकारों का कार्यकाल पांच साल इसलिए निर्धारित किया गया है, क्योंकि उन्हें अपनी नीतियों के क्रियान्वयन में इतना वक्त तो लग ही जाता है। इसलिए मुङो लगता है, मीडिया को इस रस्म अदायगी पर दोबारा विचार करना चाहिए।

बहरहाल, यूपीए सरकार के दूसरे कार्यकाल को शुरू हुए एक साल हो गया है और जिन आधारों पर इसके कार्यो का मूल्यांकन किया जा सकता है, उन्हें राष्ट्रीय एवं सामाजिक-आर्थिक मुद्दों के रूप में विभाजित किया जा सकता है। महंगाई, नक्सलवाद और जाति आधारित जनगणना को राष्ट्रीय मुद्दों की श्रेणी में रखा जा सकता है, तो शिक्षा, खाद्य सुरक्षा, महिला आरक्षण जसे मुद्दों को सामाजिक श्रेणी में रखा जा सकता है। इन सभी मुद्दों पर यूपीए-2 सरकार का पिछले एक साल का कार्यकाल प्रथम दृष्टया पिछली स्थिति बनाए रखने जसा है। यानी इस एक साल में सरकार ने कोई नया कदम नहीं उठाया है और न ही कोई नई नीति तैयार की है।

खास तौर पर, नक्सलवाद के मुद्दे पर सरकार की नीति भ्रामक लगती है। नक्सलवाद की समस्या पिछले 20 साल से है, लेकिन इतनी बुरी स्थिति पहले कभी नहीं थी, जितनी आज है। गृह मंत्री पी चिदंबरम ने यह कहकर मामले को और उलझा दिया कि जो भी नक्सलियों की विचारधारा का समर्थन करेंगे, उसे लोकतंत्र विरोधी कहा जाएगा। सरकार नक्सल समस्या के कारण का मूल ढूंढ़ने की कोशिश नहीं कर रही है। इसे लेकर सरकार की कोई स्पष्ट नीति सामने नहीं आ रही और न ही लोगों को इसका पता चल पा रहा है। प्रधानमंत्री की भी इस मुद्दे पर कोई स्पष्ट राय नहीं है।

महंगाई के मुद्दे पर भी सरकार कुछ कर पाने की स्थिति में नहीं दिख रही। आम लोगों को फिलहाल इससे राहत मिलती नहीं दिख रही। हां, सरकार म्रुास्फीति व महंगाई दर के तमाम आंकड़े पेश कर अपनी पीठ थपथपाने की कोशिश जरूर कर रही है। लेकिन यह ऐसा मुद्दा है, जिसे आंकड़ों से नहीं, बल्कि बुनियादी सूझ-बूझ से ही सुलझाया जा सकता है। अक्सर इसे लेकर राज्य सरकारों पर जिम्मेदारी थोपकर कें्र अपनी जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ने की कोशिश करता है।

दरअसल, वित्त मंत्री रहते हुए मनमोहन सिंह ने 1990-91 में आर्थिक उदारीकरण की जो नीति शुरू की थी, यह उसी का परिणाम है कि आज ये समस्याएं वैश्विक रूप ले चुकी हैं और इनका कोई समाधान नहीं दिखता। हमारी सरकार जिस तरह की अमेरिकी आर्थिक नीति पर चल रही है, उससे भारत की ग्रामीण समस्याओं का समाधान नहीं किया जा सकता। राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना को लागू करना निश्चय ही एक अच्छा कदम है, लेकिन यह राहत देने जसा भर है, समाधान नहीं।

इसी तरह, जाति आधारित जनगणना की अनुमति देकर सरकार ने एक नई बहस छेड़ दी है। इसे लेकर दो खेमों में बहस छिड़ गई है, एक वे जो इसके पक्ष में हैं और दूसरे वे जो इसके खिलाफ हैं। के सुब्रमण्यम जसे बुद्धिजीवियों ने तो इसके खिलाफ अभियान छेड़ने की बात भी कही है। कुल मिलाकर, इन तीनों मुद्दों पर सरकार की कोई स्पष्ट नीति नहीं दिखती और न ही कोई स्पष्ट प्रतिक्रिया।

विदेश नीति की बात की जाए तो सरकार ने पूरी तरह इसे अमेरिका समर्थित बना दिया है। अमेरिका से भारत की निकटता जितनी आज है, पहले कभी नहीं थी। अमेरिका के साथ इसके संबंधों को देखते हुए कहा जा सकता है कि भारत केवल औपचारिक रूप से गुटनिरपेक्ष राष्ट्रों का हिस्सा भर बनकर रह गया है, जबकि इसे शुरू करने में कभी भारत ने अहम भमिका निभाई थी। पाकिस्तान के साथ संबंध बेहतर बनाने की भी सरकार ने कोशिश की है। खासकर, दोनों देशों के नागरिकों को जोड़ने के लिए कई कदम उठाए गए हैं, लेकिन इसके पीछे भी वजह के रूप में अमेरिका से हमारे संबंधों को खारिज नहीं किया जा सकता। अब देखने वाली बात यह होगी कि कश्मीर जसे ठोस मुद्दों को हल करने में सरकार का फैसला अमेरिकी झुकाव वाला होता है या राष्ट्रीय हितों के हक में। वहीं दूसरी ओर, सरकार ने उत्तर-पूर्व के राज्यों को राष्ट्रीय चेतना के साथ जोड़ने का कोई विशेष प्रयास नहीं किया, जो चिंता की बात है।

पिछले कुछ सालों में भारत विश्व पटल पर एक महत्वपूर्ण राष्ट्र के रूप में उभरा है। विशेषकर, एशिया की एक बड़ी ताकत के रूप में उसे देखा जा रहा है, लेकिन उसने कोई ठोस कदम नहीं उठाए हैं। वैश्विक स्तर पर नेतृत्व के मामले में देश की स्थिति कुछ-कुछ कांग्रेस जसी ही है, जहां नेतृत्व का संकट है और लोगों को मनमोहन के बाद राहुल गांधी के अलावा प्रधानमंत्री पद का कोई योग्य दावेदार नहीं मिल रहा। कहा जा सकता है कि हमारा देश सैन्य, सुरक्षा व कूटनीतिक रूप से तो मजबूत है, लेकिन राजनीतिक रूप से कमजोर।

यूपीए सरकार के दूसरे कार्यकाल में नौकरशाही का वर्चस्व बढ़ा है। नए सांसदों का कार्य भी बहुत बेहतर नहीं है। भ्रष्टाचार एक बड़ी समस्या है, जो आज भी बरकरार है। हां, इन दिनों यह नए रूप में उभरकर सामने आया है। भ्रष्टाचार का नया रूप औद्योगिक भ्रष्टाचार के रूप में सामने आया है। इसके लिए भी काफी हद तक आर्थिक उदारीकरण की नीति जिम्मेदार है, जिससे औद्योगिक इकाइयों का बोलबाला बढ़ा है और सरकार उसके प्रभाव में है।

हां, महिला आरक्षण और शिक्षा के अधिकार को लेकर सरकार ने सराहनीय काम किया है। अनिवार्य शिक्षा अधिकार का विधेयक पारित कर सरकार ने अशिक्षा समाप्त करने की कोशिश तो की है, लेकिन इसे लागू करने में अभी कई मुश्किलें आनी हैं। कई राज्यों की सरकारों ने पैसा कम होने की बात कह इसे लागू करने में होने वाली मुश्किलें सामने रख दी हैं। इसी तरह, सरकार ने महिला आरक्षण का विधेयक राज्य सभा में तो पारित करवा लिया, लेकिन लोकसभा और राज्यों की विधानसभाओं से इसे पारित करवाना एक मुश्किल काम होगा।

सोमवार, 10 मई 2010

तूलानी नहीं तहलियानी

न्यायाधीश मदन लक्ष्मणदास तहलियानी को पूरा देश जानता है। सभी तारीफ कर रहे हैं कि कस्साब मामले की सुनवाई रिकॉर्ड समय में हुई। लेकिन यह उनकी मेहनत और अपने कार्य के प्रति एकाग्र निष्ठा के कारण संभव हुआ। तहलियानी का यह विशेष गुण है और इसे वे पहले भी कई बार प्रदर्शित कर चुके हैं।

मुंबई हमलावारों में से पकड़े गए एक मात्र जिंदा आतंकवादी अजमल आमिर कस्साब को मौत की सजा सुनाई गई। उसे सजा सुनाने वाले न्यायाधीश हैं एम एल तहलियानी, यानी मदन लक्ष्मणदास तहलियानी। अपने करीब 23 साल के न्यायिक कॅरियर में पहली बार मौत की सजा सुनाने वाले न्यायमूर्ति तहलियानी ने दो टूक कहा कि कस्साब को जीने का कोई अधिकार नहीं है। उसने जो जुर्म किया, उसके लिए मौत की सजा से कम कुछ नहीं दिया जा सकता। उन्होंने बचाव पक्ष की यह दलील भी पूरी तरह खारिज कर दी कि कस्साब कच्ची उम्र का है और वह पाकिस्तान में बैठे लश्कर के आकाओं के हाथों बस मोहरा बन गया। उसे सुधरने का एक मौका दिया जाए। न्यायाधीश ने साफ कहा कि उसके सुधरने की कोई संभावना नहीं है। वह अपनी मर्जी से आतंकवादी बना और भारत पर हमला किया। उसे मौत से कम कोई भी सजा देने का अर्थ होगा लोगों का न्यायपालिका पर से भरोसा उठ जाना। न्यायपालिका पर लोगों का भरोसा बनाए रखने के लिए भी जरूरी है कि उसे मौत की सजा दी जाए।

आपराधिक व दीवानी, दोनों कानूनों में पारंगत तहलियानी कठोर, पर निष्पक्ष न्याय के लिए जाने जाते हैं। इस मामले में एक बार फिर उनकी निष्पक्षता साफ हुई। एक ओर उन्होंने कस्साब को पांच मामलों में मौत और इतने ही मामलों में उम्रकैद की सजा सुनाई तो हमलावरों को मदद मुहैया कराने के आरोप में गिरफ्तार फहीम अंसारी और सबाउद्दीन को उनके खिलाफ पर्याप्त सबूत नहीं होने की बात कह बरी भी कर दिया। निश्चय ही न्यायाधीश तहलियानी का फैसला ऐतिहासिक है। इतना ही नहीं, जब कोई भी वकील कस्साब की पैरवी के लिए तैयार नहीं था, तो उन्होंने इस मामले में सख्ती अपनाते हुए वकीलों को कस्साब की पैरवी के लिए कहा, क्योंकि वे सिर्फ अभियोजन पक्ष की दलीलों पर एक तरफा फैसला नहीं सुनाना चाहते थे। सबसे पहले उन्होंने अंजलि वाघमारे को कस्साब का वकील नियुक्त किया। लेकिन जब उन्हें पता चला कि वे इस मामले में एक गवाह की भी वकील हैं, तो उन्होंने अंजलि को कस्साब की पैरवी से हटा दिया और अब्बास काजमी को उसका वकील नियुक्त किया। हालांकि बाद में उन्हें भी अदालत से सहयोग न करने के आधार पर हटा दिया गया और केपी पवार को कस्साब का वकील नियुक्त किया गया।

न्यायमूर्ति तहलियानी इससे पहले भी कई हाई प्रोफाइल मामलों की सुनवाई कर चुके हैं। संगीत सम्राट कहे जाने वाले गुलशन कुमार के साथ-साथ उन्होंने ट्रेड यूनियन के नेता दत्ता सामंत की हत्या मामले की भी सुनवाई की, जिन्हें छोटा राजन गिरोह के गुंडों ने 1997 में गोली मार दी थी। न्यायमूर्ति तहलियानी बेहद कठिन परिस्थितियों में भी अपना धर्य व संयम बनाए रखने के लिए जाने जाते हैं। मुंबई हमले की सुनवाई के दौरान भी कई बार ऐसे मौके आए, जब अदालत का माहौल तनावपूर्ण हो जाता था। खास कर तब जब अभियोजन और बचाव पक्ष के बीच तीखी बहस हो जाती थी। लेकिन ऐसे वक्त में भी उन्होंने अपना आपा नहीं खोया और अपनी व्यवहार कुशलता से अदालत की गरिमा बनाए रखी।

वे मामलों की त्वरित सुनवाई के लिए भी जाने जाते हैं, लेकिन इस क्रम में कभी मामले से जुड़े विभिन्न पहलुओं या तथ्यों की अनदेखी नहीं करते। जब तक मामला पूरी तरह से न निपटा लें, कोई छुट्टी न तो खुद लेते हैं और न ही अपने सहयोगियों को देते हैं। अदालत की सुनवाई स्थगित करने की दलीलों को भी वे सिरे से खारिज कर देते हैं। मुंबई हमलों की सुनवाई उन्होंने रिकॉर्ड एक साल से भी कम समय में पूरी की। इस दौरान उन्होंने दीवाली के दिन भी काम किया और उस दिन भी जब अदालत की सुनवाई नहीं थी। मामले जुड़े प्रशासनिक कार्य में भी उन्होंने आगे बढ़कर रुचि ली और इसे पूरा किया, ताकि मामले का निपटारा जल्द से जल्द किया जा सके। इसके लिए लोग उनके कायल हैं, लेकिन उनका यही रुख कई बार बचाव पक्ष के वकीलों के लिए सिरदर्द बन जाता है। उन्होंने तब भी अदालत की कार्यवाही स्थगित नहीं की, जब अब्बास काजमी ने मामले के अध्ययन के लिए थोड़ा वक्त मांगा था। न्यायाधीश तहलियानी से यह शिकायत फहीम अंसारी की वकील सबा कुरैशी को भी रही।

तेरह जनवरी, 2009 को वे मुंबई हमले से जुड़े मामले की सुनवाई के लिए न्यायाधीश नियुक्त होने के बाद लगभग हर दिन उन्होंने आर्थर रोड जेल जाकर वहां ट्रायल रूम के लिए चल रहे काम-काज का जायजा लिया, जिसे वातानुकूलित बनाया जा रहा था। 56 वर्षीय न्यायाधीश तहलियानी कई भाषाओं के जानकार हैं। वे जितनी अच्छी हिंदी और अंग्रेजी बोलते हैं, उतनी ही अच्छी मराठी भी। उन्हें उर्दू की भी काफी हद का जानकारी है, जिसका फायदा उन्हें मामले की सुनवाई के दौरान कस्साब से बातचीत में हुआ। राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय मामलों में उनकी गहरी रुचि है और अक्सर रात में वे इंटरनेट के जरिये ऑनलाइन विदेशी अखबार पढ़ते हैं।

बतौर न्यायधीश मामले के पक्ष को लेकर वे कस्साब के साथ सख्ती से पेश आए तो कैदी के मानवाधिकारों को ध्यान में रखते हुए वे कभी उससे उसके स्वास्थ्य के बारे में पूछना नहीं भूलते थे। अनुशासन व साफ-सफाई पसंद न्यायमूर्ति तहलियानी को बागवानी का भी शौक है। उनका परिवार मूलत: राजस्थान का रहने वाला है, जो आगे चलकर महाराष्ट्र के चं्रपुर जिले में बस गया। सिंधी परिवार में जन्मे तहलियानी ने नागपुर से दसवीं की परीक्षा पास की और फिर नागपुर विश्वविद्यालय के गोंदिया के एनएमडी कॉलेज से वाणिज्य एवं कानून में स्नातक की डिग्री ली। गोंदिया से ही उन्होंने बतौर अधिवक्ता प्रैक्टिस शुरू की, लेकिन बाद में चं्रपुर आ गए। फिर गढ़चिरौली, वाडसा और सिरोंचा में वे सरकारी वकील रहे। बतौर न्यायाधीश उनका कॅरियर 1987 में मुंबई की बां्रा अदालत में मेट्रोपॉलिटन मजिस्ट्रेट के रूप में शुरू हुआ। एक दशक बाद यानी 1997 में उन्हें मुंबई की सत्र अदालत में सत्र न्याधीश के रूप में पदोन्नत किया गया। फिर वर्ष 2000 में उन्हें शहर के दीवानी व सत्र न्यायाधीश के रूप में भी पदोन्न किया गया। उसी साल वे मुंबई हाई कोर्ट के रजिस्ट्रार भी बनाए गए। विशेष न्यायाधीश के रूप में उन्होंने सीबीआई से जुड़े मामलों की भी सुनवाई की। मुंबई हमले में सजा सुनाने के दिन ही उन्हें चैन नसीब हुआ और मामले से जुड़े दस्तावेजों की फाइलें ले जाने से छुट्टी भी। उस दिन शाम को वे टहलने भी निकले।

मंगलवार, 4 मई 2010

कलंकित माधुरी!

माधुरी गुप्ता के कारनामे से देश सकते में है। पाक के लिए जासूसी कर रही यह महिला कहने को वहां उच्चायोग में भारतीय राजनयिक थी। गनीमत यह है कि अतिगोपनीय सूचनाएं इस बी ग्रेड अधिकारी की पहुंच से दूर थीं। फिर उसका कारनामा उसके पेशे पर दाग लगा गया। उसके जासूसी में पड़ने के जो भी कारण रहे हों, यह साफ है कि उसने संगीन अपराध किया। हर कारण इस अपराध से बहुत छोटा है।



माधुरी गुप्ता जासूस! या भारतीय विदेश सेवा की अधिकारी! किस रूप में उन्हें पहचाना जाए, कहना मुश्किल। आरोप है कि उसने पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी आईएसआई को संवेदनशील जानकारियां दी और ऐसा करके उसने देश से गद्दारी की। हाल में दिल्ली पुलिस ने उन्हें ऐसे वक्त गिरफ्तार किया, जब वह भारत आई। या यूं कहें कि उन्हें भारत बुलाया गया, गिरफ्तारी के लिए, दक्षिण एशियाई क्षेत्रीय सहयोग संगठन (सार्क) की तैयारियों के सिलसिले में बातचीत के बहाने। वह आई और गिरफ्तार हो गई। अब जारी है पुलिस की उससे पूछताछ।

माधुरी ने आईएसआई को भारत से संबंधित संवेदनशील जानकारियां किस तरह मुहैया करवाई, यह भी खासा दिलचस्प है। भारतीय विदेश सेवा के समूह-बी की यह अधिकारी एक पाकिस्तानी के प्रेमजाल में इस कदर उलझीं कि फिर देश सेवा कहीं बहुत पीछे रह गई। फिलहाल यह साफ नहीं हो पाया है कि ‘राणाज् नाम का वह व्यक्ति आईएसआई से संबद्ध है या वहां की सेना से। समझा जा रहा है कि माधुरी ने धर्म परिवर्तन भी कर लिया और अब वह एक शिया मुस्लिम महिला है। इस्लाम में उसकी गहरी आस्था बताई जा रही है, जिसमें धर्म परिवर्तन उसने छह साल पहले ही कर लिया था। लेकिन आलोचनाओं और अतिवादियों के डर से उसने इसे छिपाए रखा।

उसके द्वारा पाकिस्तान तक खुफिया जानकारी पहुंचाने का एक अन्य कारण काम की बेहतर परिस्थितियां न होना भी बताया जा रहा है। शुरुआती पूछताछ में उसने बताया भी है कि उसके काम करने की परिस्थितियां बेहद निराशाजनक थीं और एक लंबे अरसे से उसकी तरक्की नहीं हुई थी। इसलिए भारतीय अधिकारियों के प्रति उसमें गुस्सा था। ऐसे में उसने भारत के खिलाफ पाकिस्तान के लिए काम करने का मन बनाया। ऐसा करके वह भारतीय विदेश सेवा के अधिकारियों को सबक सिखाना चाहती थी, जो माधुरी के ही अनुसार लोगों से अच्छा व्यहार नहीं करते। उसे इस बात का भी दु:ख था कि भले ही वह कितनी भी प्रतिभावान हो, लेकिन विदेश सेवा में उसे दोयम दज्रे के अधिकारी का स्थान ही मिला।

पाकिस्तान स्थित भारतीय उच्चायोग में द्वितीय सचिव के पद पर तैनात 53 वर्षीया माधुरी को यह दर्जा कई साल बाद मिला, जबकि मुख्य आईएफएस के अधिकारियों को आम तौर पर तीन साल के बाद ही यह दर्जा मिल जाता है। 2007 में उसकी नियुक्ति पाकिस्तान स्थित भारतीय उच्चायोग में हुई थी। पाकिस्तान में नियुक्ति से पहले वह नई दिल्ली के सप्रू हाऊस में भारतीय विदेश नीति के थिंक टैंक इंडियन काउंसिल ऑफ वर्ल्ड अफेयर (आईसीडब्ल्यूए) में कार्यरत थी। 2006-07 के दौरान उसने आईसीडब्ल्यू में सहायक निदेशक के रूप में कार्य किया। पाकिस्तान के लिए जासूसी करने की उसकी गतिविधियां तब संदेह के घेरे में आई, जब वह अपने कार्यक्षेत्र से बाहर जाकर वहां दूसरे काम भी करने लगीं। वह वहां उच्चायोग के प्रेस व सूचना विभाग में कार्यरत थी। उर्दू भाषा पर उसकी बेहतरीन पकड़ है। उसे पाकिस्तान भेजने का एक बड़ा कारण यह भी है। उर्दू के अखबारों में वह खास तौर पर दिलचस्पी लेती थी। कभी उसने उर्दू अखबारों के बारे में कहा भी था कि ‘वास्तविक खबरज् इनमें ही होती है, अंग्रेजी के अखबार नीरस होते हैं और प्राय: एक दिन बाद की खबरें छापते हैं। पिछले करीब एक साल से उसकी गतिविधियां संदेह के घेरे में थीं। उस पर तभी से नजर रखी जा रही थी। बताया जाता है कि ‘राणाज् नाम के व्यक्ति को वह इमेल के जरिये गोपनीय जानकारी मुहैया कराती थी और इसके लिए कार्यालय के कंप्यूटर का नहीं, बल्कि घर के कंप्यूटर का इस्तेमाल करती थी।

माधुरी का यह कदम पूरे देश और खास तौर पर भारतीय विदेश सेवा के लिए किसी झटके से कम नहीं है। भारतीय विदेश सेवा के इतिहास में ऐसा पहली बार हुआ, जब कोई अधिकारी दुश्मन देश के लिए जासूसी करते पकड़ा गया हो। इससे पहले वह बगदाद और कुआलालंपुर में भी भारतीय मिशन में काम कर चुकी है। कुआलालंपुर में उसने भारतीय विदेश मंत्रालय के विदेशी प्रकाशन विभाग की पत्रिका ‘इंडिया पर्सपेक्टिवज् में काम किया। वह मुख्य भारतीय विदेश सेवा की सदस्य नहीं है, बल्कि भारतीय विदेश सेवा के निचले कैडर आईएफएस-बी से संबद्ध थी। अब उसे लंदन या वाशिंगटन जसे किसी देश में पोस्टिंग की उम्मीद थी। कुछ महीने पहले अपने काम को बेहतर बताते हुए उसने बड़े विश्वास से वहां पोस्टिंग की बात कही थी।

जासूसी प्रकरण ने निश्चय ही भारतीय जनमानस और सरकारी प्रतिष्ठानों में उसकी छवि धूमिल कर दी है, लेकिन उसके पुराने परिचितों के लिए इन बातों पर यकीन करना किसी सपने पर यकीन करने जसा ही है। मित्र उसे आज भी सरल व ईमानदार अधिकारी के रूप में याद करते हैं। उनके अनुसार यह उसकी खासियत है कि वह बड़ी आसानी से लोगों से घुलमिल जाती है और नई चीजों को तेजी से अपनाती है। चाहे कपड़ों की बात हो या नए हेयर स्टाइल की, वह हर चीज पर बड़ी बेबाकी से बात करती है। 2007 में पाकिस्तान में नियुक्ति से पहले उसने एक मुस्लिम महिला से उर्दू सीखी। इसके अलावा दिल्ली के जवाहर लाल विश्वविद्यालय से वह पहले ही एक अन्य विदेशी भाषा में सीख चुकी थी। उर्दू पर उसकी पकड़ इतनी अच्छी है कि एक बार के लिए यह यकीन करना मुश्किल हो जाता है कि यह उसकी दूसरी भाषा है।

गुरुजी अपरंपार

कटौती प्रस्ताव पर मतदान सबसे दिलचस्प मामला था शिबू सोरेन का। वे झारखंड में भाजपा के साथ सरकार चला रहे थे। मुख्यमंत्री होते हुए उन्हें खास तौर पर बुलाया गया कि पक्ष में वोट बढ़ेगा, लेकिन उन्होंने वोट दिया यूपीए के पक्ष में। जाहिर तौर पर भाजपा भन्ना गई। गुरुजी ने सतता खिसकते देख गलती मानी। माफी मांगी। लुभावनी पेशकश से भाजपा को ललचा दिया।



एक वोट संसदीय प्रणाली में भूचाल ला सकता है। इसकी वजह से कभी सरकार गिर सकती है, तो कभी उसकी स्थिरता पर संकट छा सकता है। बारह साल पहले सिर्फ एक वोट से प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में कें्र की भाजपा नीत राजग सरकार गिर गई थी। बारह साल बाद ऐसी ही स्थिति फिर सामने आई, जब झारखंड की सरकार की स्थिरता पर संकट के बादल मंडराने लगे। यह भी गजब का इत्तेफाक रहा कि दोनों वोट दो राज्यों के मुख्यमंत्रियों ने दिया, जो राज्य में सत्ता संभालने के बावजूद तब तक लोकसभा के सदस्य थे।

बारह साल पहले यानी 1998 में यह वोट था, उड़ीसा के मुख्यमंत्री गिरिधर गोमांग का और इस बार यह वोट है झारखंड के मुख्यमंत्री शिबू सोरेन का। 1998 में गोमांग ने वाजपेयी सरकार द्वारा लाए गए विश्वास पक्ष के खिलाफ मतदान कर उनकी तेरह दिन पुरानी सरकार गिरा दी थी, तो इस बार बीस अप्रैल, 2010 को सोरेन ने विपक्ष द्वारा लाए गए कटौती प्रस्ताव पर यूपीए सरकार के खिलाफ मतदान न कर उसके पक्ष में कर दिया। जाहिर तौर पर सोरेन के इस कदम ने भाजपा को आहत किया और उसने इसे गठबंधन धर्म का उल्लंघन बताते हुए ‘विश्वासघातज् करार दिया। भाजपा ने, जो झारखंड में सोरेन की सरकार को समर्थन दे रही थी, तत्काल समर्थन वापसी का फैसला किया। लेकिन समर्थकों में ‘गुरुजीज् के नाम से मशहूर राजनीति के इस चतुर खिलाड़ी ने तुरंत माफी मांग ली। कहा, गलती से डाल दिया सरकार के पक्ष में वोट। पार्टी नेताओं ने कहा कि सोरेन ‘अल्जाईमर्सज् से पीड़ित हैं और इसलिए कई बार उन्हें पता नहीं होता कि वे क्या कर रहे हैं। कटौती प्रस्ताव पर यूपीए सरकार के पक्ष में भी उन्होंने मतदान इसी बीमारी के प्रभाव में किया।

लेकिन सोरेन के अब तक के राजनीतिक कॅरियर को देखते हुए यह बात इतनी छोटी और आसान नहीं जान पड़ती। यह तर्क गले नहीं उतरता कि उन्होंने गलती से सरकार के पक्ष में मतदान कर दिया। दरसअल, सोरेन राजनीति के ऐसे चतुर खिलाड़ी हैं, जो सत्ता में रहने के लिए हर किसी को तौलते हैं। जानकारों के मुताबिक कटौती प्रस्ताव पर मतदान के दौरान उन्होंने न केवल लाल बटन दबाया, बल्कि पर्ची पर भी यूपीए सरकार के पक्ष में ही मतदान किया। ऐसे में यह गलती से उठाया गया कदम नहीं हो सकता। संभव है कि अंदर ही अंदर कांग्रेस से उनकी कोई डील हो गई हो, कें्र में किसी मंत्री पद के लिए उन्होंने ऐसा किया हो, क्योंकि झारखंड राज्य की राजनीति में उनका कॅरियर ढलान पर है। लेकिन कांग्रेस से नकार पाकर उन्होंने एक ऐसा प्रस्ताव भाजपा से कर लिया कि वह बगलें झांकने लगी। समर्थन वापसी के फैसले को जाम कर दिया। सोरेन ने कहा कि वे भाजपा के मुख्यमंत्री के साथ काम करने को तैयार हैं। अब भाजपा में उल्टा बवाल है कि मुख्यमंत्री कौन हो?

पिछले साल तमार विधानसभा सीट से चुनाव हारने के बाद सोरेन को मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देना पड़ा था, जिसके बाद राज्य में राष्ट्रपति शासन लगा। इस बीच लोकसभा चुनाव में उन्हें जीत मिली। राज्य में हुए विधानसभा चुनाव में भी उनकी पार्टी 18 सीट जीतकर आई। भाजपा व कुछ अन्य सहयोगियों के समर्थन से सोरेन फिर मुख्यमंत्री बने। लेकिन मुख्यमंत्री बने रहने के लिए छह माह के अंदर उनका विधानसभा सदस्य चुना जाना आवश्यक है। पर कोई भी उनके लिए सीट खाली करने को तैयार नहीं है। न तो उनके बेटे हेमंत सोरेन दुमका विधानसभा सीट और न ही बहू सीता सोरेन जामा विधानसभा सीट छोड़ने को तैयार हैं।

अब भाजपा भले ही सोरेन के इस कदम को ‘विश्वासघातज् करार दे, लेकिन पिछले करीब तीन दशक के सोरेन के राजनीतिक जीवन को देखते हुए यह उनका कोई चौंकानेवाला कदम मालूम नहीं होता। अपने अब तक के राजनीतिक कॅरियर में सोरेन हमेशा सत्ता के करीब रहे और इसके लिए बार-बार पाला बदलते रहे। 1980 में जब वे पहली बार लोकसभा के लिए चुने गए तो कांग्रेस (आई) के साथ थे। लेकिन तीन साल बाद ही उन्होंने जनता पार्टी का दामन थाम लिया। पर 1985 में विधानसभा चुनाव के दौरान वे फिर कांग्रेसी खेमे में आ गए। 1990 में वे फिर कांग्रेस के खिलाफ चले गए और 1991 का लोकसभा चुनाव उन्होंने जनता पार्टी के सहयोगी के रूप में झारखंड मुक्ति मोर्चा से लड़ा। सोरेन सहित पार्टी के छह सांसद चुने गए। लेकिन जब कें्र की कांग्रेस नीत नरसिम्हा राव सरकार संसद में विश्वास प्रस्ताव लेकर आई तो सोरेन सहित उनके सभी सांसदों ने सरकार के पक्ष में मतदान किया। आरोप लगा कि झामुमो के सांसदों ने नरसिम्हा राव सरकार को बचाने के लिए साढ़े तीन-तीन करोड़ रुपए लिए। भारतीय संसदीय प्रणाली के अब के सबसे बड़े सांसद रिश्वत कांड में उन्हें जेल भी हुई।

वर्ष 2000 में जब झारखंड बिहार से अलग हुआ तो सोरेन कें्र की तत्कालीन राजग सरकार के साथ हो गए, इस उम्मीद में कि संभवत: भाजपा मुख्यमंत्री बनने में उनका साथ देगी। लेकिन जब पार्टी ने बाबू लाल मरांडी को अपने मुख्यमंत्री रूप में पेश किया तो सोरेन उससे अलग हो गए और एक बार फिर कांग्रेस के साथ चले गए। बाद में वे कें्र में यूपीए सरकार के कार्यकाल के दौरान कोयला मंत्री भी बने। लेकिन चिरुडीह नरसंहार में वारंट जारी होने के बाद उन्हें अपने पद से इस्तीफा देना पड़ा। इस बीच 2005 में वे पहली बार कांग्रेस और राष्ट्रीय जनता दल के समर्थन से मुख्यमंत्री बने, लेकिन उनकी सरकार नौ दिन ही चल पाई। विश्वास मत हासिल नहीं कर पाने के कारण उनकी सरकार गिर गई। 2007 में निर्दलीय विधायक मधु कोड़ा को मुख्यमंत्री बनाने की कांग्रेस और आरजेडी की मुहिम को भी उन्होंने समर्थन दिया, लेकिन सालभर बाद ही उन्होंने सरकार से समर्थन वापस ले लिया। वे स्वयं मुख्यमंत्री बने, लेकिन तमार विधानसभा का उपचुनाव हार जाने के कारण उन्हें इस्तीफा देना पड़ा। राज्य में फिर चुनाव हुए। हालांकि किसी भी दल को बहुमत नहीं मिला, लेकिन नतीजे का अंकगणित सोरेन के साथ था। उनके बिना किसी की सरकार नहीं बन सकती थी। राज्य में एक बार फिर अपनी सरकार बनाने के लिए अब तक यूपीए के घटक रहे गुरुजी को सरकार बनाने के लिए एनडीए का सहयोग लेने में कोई हर्ज नहीं दिखा।

एक बार फिर ‘अल्जाईमर्सज् के नाम पर उन्होंने पलटी मारते हुए लोकसभा में कटौती प्रस्ताव पर यूपीए के पक्ष में मतदान कर दिया। सोरेन के पिछले तीन दशक के राजनीतिक उलट-पुलट को देखते हुए कहा जा सकता है कि वे राजनीति के ऐसे चतुर सुजान हैं, जो जानते हैं कि कब किस करवट होना फायदेमंद होगा।

मंगलवार, 27 अप्रैल 2010

मुखर मनोहर

शशांक मनोहर की खास बात यह है कि वे मितभाषी हैं, पर दो टूक बोलने में नहीं हिचकते। क्रिकेट की दुनिया में उनकी तरक्की का ग्राफ शरद पवार के दबदबे के साथ बढ़ता गया। राजनीतिक मोर्चे पर पवार के सिपहसालार प्रफुल्ल पटेल हैं तो क्रिकेट में शशांक। लेकिन कुछ अदद आरोपों और बीसीसीआई के कुछेक अहम फैसलों के अलावा बोर्ड के मौजूदा अध्यक्ष का अपना कोई व्यक्तित्व उभर कर नहीं आया था। वो तो ललित मोदी का कारनामा जब रंग लाया और आईपीएल के पिटारे से अजीबोगरीब प्रेत निकलने शुरू हुए तो शशांक मनोहर का कद भी बढ़ने लगा। मोदी का जवाब फौरी तौर मनोहर दिख रहे हैं। वे अब मुखर हैं। मोदी को तुर्की-ब-तुर्की जवाब देने में लगे हैं। अंतत: किसका सवाल पिटेगा और किसका जवाब हिट होगा, यह देखना दिलचस्प रहेगा।



भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड (बीसीसीआई) के अध्यक्ष हैं शशांक मनोहर। कम, पर स्पष्ट व असरदार बोलने के लिए जाने जाते हैं। आईपीएल विवाद सामने आया तो बीसीसीआई भी हरकत में आई और इसके अध्यक्ष के स्वर भी मुखर हुए। उन्होंने इंडियन प्रीमियर लीग (आईपीएल) के कमिश्नर ललित मोदी पर ‘गोपनीयताज् के नियम का उल्लंघन करने आरोप लगाया। कहा कि ट्विटर के जरिये शेयरधारकों के नाम सार्वजनिक कर मोदी ने बोर्ड और फ्रेंचाइजी में हुए समझौते का उल्लंघन किया, जिसके कारण बोर्ड कानूनी झमेले में पड़ सकता है।

मोदी और मनोहर दोनों बीसीसीआई के पूर्व अध्यक्ष शरद पवार के करीबी हैं, लेकिन आईपीएल विवाद गहराया तो दोनों आमने-सामने आ गए। मनोहर ने मोदी को ‘खेल माफियाज् तक कह दिया। इस बीच चर्चा यह भी आई कि मोदी की जिम्मेदारी मनोहर को सौंपी जा सकती है। वे आईपीएल कमिश्नर का कार्यभार संभाल सकते हैं। लेकिन आईपीएल कमिश्नर के रूप में उनकी पारी बेहद चुनौतीपूर्ण होगी, क्योंकि आईपीएल की विभिन्न टीम के मालिकों की पसंद आज भी मोदी हैं। उन्हें संशय है कि शशांक शायद ही उस जिम्मेदारी को बखूबी निबाह सकें, जिसे पिछले तीन साल से मोदी निबाह रहे हैं। हालांकि फिलहाल मोदी के बाद आईपीएल कमिश्नर के रूप में रवि शास्त्री और राजीव शुक्ला का नाम भी सामने आ रहा है। बहरहाल, इस बारे में अंतिम फैसला सोमवार को आईपीएल की गवर्निग काउंसिल की बैठक में होगा।

शशांक मनोहर पवार की उस टीम का हिस्सा रहे हैं, जिसके माध्यम से उन्होंने बीसीसीआई के पूर्व अध्यक्ष जगमोहन डालमिया को किनारे करने की रणनीति अपनाई, जो 2006 में पवार के बीसीसीआई अध्यक्ष बनने के बाद भी काफी प्रभावी थे। ललित मोदी के बड़बोलेपन से अलग शशांक मनोहर बेहद कम, पर स्पष्ट बोलने के लिए जाने जाते हैं। 2008 में पवार के बाद बीसीसीआई के अध्यक्ष की कुर्सी संभालने के बाद उन्होंने खिलाड़ियों से लेकर चयन समिति तक के मामले में कई महत्वपूर्ण फैसले लिए। वर्ष 2007 में जब भारतीय क्रिकेट टीम वर्ल्ड कप हार गई तो उन्होंने खिलाड़ियों को प्रदर्शन के आधार पर मेहनताना देने का सुझाव दिया। उनका यह सुझाव सुर्खियों में रहा। चयन समिति के संदर्भ में भी उन्होंने कहा था कि इसमें केवल उन्हीं खिलाड़ियों को शामिल किया जाए, जिन्होंने नियुक्ति से 10 साल पहले अपना आखिरी अंतर्राष्ट्रीय मैच खेला हो। वे इस बात में यकीन करते हैं कि भारत में क्रिकेट को बेचने के लिए किसी विशेष बाजार की जरूरत नहीं है, बल्कि यह खुद-ब-खुद अपना बाजार तैयार कर लेता है। मनोहर का चुनाव भी बेहद दिलचस्प रहा। सितंबर 2007 में जब उनका चुनाव हुआ तो सामने प्रतिद्वंद्वी के रूप में कोई नहीं था। सेंट्रल जोन से वे एक मात्र उम्मीदवार थे।

मनोहर मूलत: महाराष्ट्र के नागपुर से संबंध रखते हैं। उन्नतीस सितंबर, 1957 को वहीं वीआर मनोहर के घर उनका जन्म हुआ। पिता पेशे से वकील थे। शरद पवार से उनके परिवार का शुरू से ही काफी करीबी रिश्ता रहा है। महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री के रूप में पवार के कार्यकाल के दौरान शशांक मनोहर के पिता वीआर मनोहर राज्य के महाधिवक्ता थे। पिता के पदचिह्नें पर चलते हुए शशांक ने भी कानून की पढ़ाई की और बतौर अधिवक्ता प्रैक्टिस भी शुरू की, लेकिन अंतत: वे क्रिकेट प्रशासक के रूप में उभरे। 1996 में वे विदर्भ क्रिकेट एसोसिएशन के अध्यक्ष बने और इसके बाद लगातार उनका कॅरियर इस दिशा में आगे बढ़ता रहा। 2006 में जब शरद पवार बीसीसीआई के अध्यक्ष बने तो शशांक मनोहर उसके उपाध्यक्ष चुने गए। शशांक बीसीसीआई के उन पांच उपाध्यक्षों में से हैं, जिन्होंने पवार के बीसीसीआई अध्यक्ष के कार्यकाल के दौरान काम किया। और फिर, 2008 में पवार के बाद वे बीसीसीआई अध्यक्ष बने।

लेकिन बीसीसीआई के अध्यक्ष जसा हाई-प्रोफाइल रुतबा होने के बावजूद वे सादगी पसंद हैं। वे आज भी मोबाइल फोन लेकर नहीं चलते। 2007 से पहले उनके पास पासपोर्ट भी नहीं था। उनका पहला विदेशी दौरा 2008 में हुआ, जब वे आईसीसी की बैठक में भाग लेने दुबई गए थे। उन्हें करीब से जानने वालों का कहना है कि वे आसानी से किसी पर भरोसा कर लेते हैं। लेकिन जब उन्हें धोखा मिलता है, तो सामने वाले के लिए फिर वे बेहद कड़ा रुख अपनाते हैं। क्रिकेट प्रशासक के रूप में अपने विवेक को तरजीह देते हैं, तो निजी जीवन में भी इससे अलग फैसला नहीं लेते।

इन सबसे अलग शशांक मनोहर से जुड़े विवादों की भी कमी नहीं है। आरोप है कि उनके परिवार का दाऊद गैंग से करीबी रिश्ता है और कई मौकों पर उनके परिवार के सदस्यों ने दाऊद गैंग का बचाव किया। इसी तरह, 26 नवंबर, 1995 को विदर्भ क्रिकेट एसोसिएशन के मैदान पर भारत और न्यूजीलैंड के बीच खेले जा रहे एक दिवसीय मैच के दौरान वहां की एक दीवार गिर गई थी, जिसमें 13 लोग मारे गए थे, जबकि 70 से अधिक घायल हो गए थे। क्रिकेट के इतिहास में मैदान पर हुई इतनी बड़ी त्रासदी के लिए भी शशांक मनोहर और उनके पिता को जिम्मेदार ठहराया जाता है, यह कहकर कि उन्होंने दीवार के निर्माण का ठेका अपने किसी करीबी रिश्तेदार को दिलवाया था। आरोपों के मुताबिक यह कहना भी गलत है कि शशांक मनोहर बीसीसीआई से एक भी पैसा नहीं लेते, बल्कि अपनी यात्राओं का खर्च भी वे स्वयं उठाते हैं। तथ्य इससे उलट है। उन्होंने विदर्भ क्रिकेट एसोसिएशन के खजाने से पैसे लेकर स्कूली बच्चों की एक टीम को आर्थिक मदद दी और उसे तीन माह के लिए इंगलैंड भेजा, क्योंकि इसमें उनका बेटा भी था। बहरहाल, ये सभी आरोप हैं। इनमें सच्चाई कितनी है, कहना फिलहाल मुश्किल है। पर इतना स्पष्ट है कि शशांक मनोहर आज की तारीख में बीसीसीआई के प्रभावी व्यक्तियों में से एक हैं।

शनिवार, 17 अप्रैल 2010

चंदा और सुनंदा

सुनंदा पुष्कर को अभी कुछ दिन पहले तक कोई नहीं जानता था। अब सभी की जुबान पर उनका नाम है। विदेश राज्य मंत्री शशि थरूर की दोस्त सुनंदा के कारण राजनीति में भूचाल आया हुआ है। कोच्चि टीम के शेयर धारकों में उनका क्या आया, गोया एक तूफान ही आ गया। थरूर की कुर्सी डगमगा गई। सुनंदा तो बयान देकर चुप हो गईं, पर विपक्ष शशि के पीछे पड़ा हुआ है। इस बार शशि-ग्रहण के पीछे है यह दोस्ती।



सुनंदा पुष्कर की पहचान फिलहाल विदेश राज्य मंत्री शशि थरूर की गहरी दोस्त के रूप में है। आईपीएल की नई टीम कोच्चि के शेयर धारकों को लेकर छिड़े विवाद में उनका जिक्र आया और फिर खुलती गई परत दर परत थरूर से उनके रिश्ते की बात। आईपीएल कमिश्नर ललित मोदी ने खुलासा किया कि कोच्चि टीम में उनकी भी हिस्सेदारी है, जो करीब 70 करोड़ की है। अब तक उन्होंने यह बात इसलिए नहीं जाहिर की थी, क्योंकि थरूर ने उन पर सुनंदा का नाम नहीं बताने के लिए दबाव बनाया था।

लेकिन जाने फिर क्या हुआ कि मोदी उस ‘दबावज् से उबर गए और उन्होंने गोपनीयता के नियम को दरकिनार करते हुए कोच्चि टीम के शेयर धारकों के नाम बता दिए। सारी कवायद में एक बात कहीं पीछे छूट गई कि सुनंदा एक सफल व्यवसायी भी हैं और कोच्चि टीम में उनकी हिस्सेदारी केवल थरूर की ‘मेहरबानीज् नहीं है। सुनंदा को इसी बात का मलाल है कि मीडिया ने उनके और थरूर के रिश्तों की तो खूब चर्चा की, लेकिन एक कामयाब महिला व्यवसायी के रूप में उनके व्यक्तित्व को नजरअंदाज किया।

सुनंदा मूलत: जम्मू-कश्मीर की रहने वाली हैं और फिलहाल दुबई में स्पा चलाती हैं। वहां स्पा का उनका लंबा-चौड़ा कारोबार है। साथ ही वे सऊदी अरब सरकार द्वारा संचालित एक इंफ्रास्ट्रक्चर कंपनी में कार्यकारी के पद पर भी कार्यरत हैं। इससे पहले उन्होंने वहां विज्ञापन कंपनियों और ट्रेवल एजेंसी के साथ भी काम किया। दुबई की एक रियल इस्टेट कंपनी में भी उन्होंने निदेशक के पद पर काम किया। कनाडा के टोरंटो शहर में भी उन्होंने आईटी फर्म में काम किया। वे सेल्स व मार्केटिंग की विशेषज्ञ मानी जाती हैं। पिछले कुछ दिनों में सुनंदा और थरूर कई मौकों पर साथ-साथ देखे गए। दो माह पहले कें्रीय मंत्री जितिन प्रसाद के विवाह समारोह में भी दोनों साथ गए थे। चर्चा तो यह भी है कि सुनंदा और थरूर ने कई कैबिनेट डिनर भी साथ-साथ लिए। तब विभिन्न मौकों पर सुनंदा का परिचय ‘थरूर की कनाडा की मित्रज् के रूप में कराया गया। दोनों के रिश्तों को लेकर चर्चा तो तभी से थी। थरूर ने भी बड़ी साफगोई से कहा कि वे सुनंदा को बहुत अच्छी तरह जानते हैं।

करीब एक माह पहले भी दिल्ली में विदेश मंत्रालय और फिक्की के बीच खेले गए एक दोस्ताना मैच के दौरान दोनों साथ-साथ देखे गए थे, जिससे उनके ‘गहरे रिश्तेज् को और बल मिला। मैच से इतर थरूर को जब भी फुर्सत मिली, उन्होंने सुनंदा के साथ ही वक्त बिताया। खबर के पिपासुओं ने ब्रेक के दौरान थरूर को सुनंदा के लिए चाय बनाते भी देखा। अब एक बार फिर आईपीएल की कोच्चि टीम के शेयर धारकों को लेकर छिड़े विवाद में सुनंदा का जिक्र बार-बार आया और थरूर से उनके रिश्तों की बात को भी खूब हवा मिली।

अड़तालीस वर्षीया सुनंदा मूलत: कश्मीर घाटी की रहने वाली हैं। उनका पैतृक घर सोपियां जिले के बोमई गांव में हैं। पिता पोष्कर नाथ दास सेना में कर्नल रह चुके हैं। 1983 में वे लेफ्टिनेंट कर्नल के पद से सेवानिवृत्त हुए। बारामूला के सनिक स्कूल से उन्होंने स्कूली शिक्षा पूरी की। श्रीनगर के सरकारी महिला कॉलेज से सुनंदा ने बीए की डिग्री ली। बाद में उन्होंने होटल मैनेजमेंट में डिप्लोमा भी किया। इस बीच 1989 में घाटी में शुरू हुए आतंकवाद का असर कर्नल दास के परिवार पर भी पड़ा। आंतकवादियों ने उनके घर जला दिए, जिसके बाद उनका पूरा परिवार जम्मू चला गया। उनके दो भाई भी हैं, जिनमें से एक बैंक में कार्यरत हैं तो दूसरे सेना में।

सुनंदा की दो शादी हो चुकी है। उनके पहले पति संजय रैना कश्मीर के ही रहने वाले थे, जो दिल्ली में एक होटल में काम करते थे। लेकिन यह शादी अधिक दिनों तक चल नहीं पाई और दोनों का तलाक हो गया। सुनंदा को जानने वाले उन्हें एक आधुनिक लड़की बताते हैं, जो तलाक के वक्त आम लड़कियों की तरह रोना-धोना नहीं, बल्कि सेलिब्रेशन कर रही थीं। तलाक के बाद सुनंदा दुबई चली गईं, जहां उन्होंने सुजीत मेनन से विवाह किया। मेनन मूलत: केरल के रहने वाले थे। वे अग्निशमन उपकरणों के बहुत बड़े डीलर थे और इवेंट मैनेजर भी। लेकिन दिल्ली में एक सड़क हादसे में उनकी मौत हो गई। उनका एक पं्रह साल का बेटा भी है। अब थरूर से उनके ‘गहरे रिश्तोंज् के आधार पर उनकी शादी की बात कही जा रही है। यदि थरूर और उनके रिश्ते शादी तक पहुंचते हैं तो यह उनकी तीसरी शादी होगी। उधर, थरूर की भी यह तीसरी शादी होगी। थरूर की पहली पत्नी तिलोत्तमा मुखर्जी कोलकता की रहने वाली थीं, जिनसे उनका तलाक हो गया। उनकी दूसरी पत्नी क्रिस्टा गिल्स कनाडा की रहने वाली हैं, जिनसे उनका तलाक होने वाला है। तलाक की प्रक्रिया पूरी होने के बाद थरूर और सुनंदा की शादी की बात कही जा रही है।

सुनंदा परंपराओं से हटकर काम करने के लिए भी जानी जाती हैं। पंडितों की सालों पुरानी परंपरा को तोड़ते हुए उन्होंने अपने पिता का पहला नाम अपने सरनेम के रूप में इस्तेमाल किया, हालांकि इसमें उन्होंने थोड़ी फेरबदल की। उन्होंने अपने पिता के पहले नाम पोष्कर को थोड़े फेरबदल के साथ पुष्कर किया और उसे अपने सरनेम के रूप में इस्तेमाल किया। इस तरह सुनंदा दास सुनंदा पुष्कर हो गईं।

किया-धरा ललित

आईपीएल हिट हुआ तो बदौलत ललित मोदी के और उन्हीं के कारण इस समय पिट रहा है आईपीएल। मोदी वाकई ललित हैं। उन्हीं की रंगीनियत बीसीसीआई के इस महाआयोजन की हर चीज पर नुमायां है। मुनाफ उनका गोया नशा है। क्रिकेट कमाऊ तो थी ही, मोदी ने उसे कामधेनु बना दिया। वे आईपीएल के सर्वेसर्वा हैं। नियम-कानून सब उनके। यही कारण है कि इसे सफल बनाने पर उनकी वाहवाही हुई तो सारे विवादों का ठीकरा भी उनके ही सिर है। इसमें सारा लेना-देना उन्हीं का है। ललित मोदी का लड़ाकू तेवर, बड़बोलापन, अहमन्यता और सब कुछ से बेपरवाही का अंदाज बड़े-बड़ों को हैरत में डाले हुए है।



एक तेज-तर्रार व मंङो हुए व्यवसायी का नाम है ललित मोदी, जिन्होंने क्रिकेट को एक नई शक्ल ही नहीं दी, बल्कि उसकी काया ही बदल दी। उन्होंने उसे शुद्ध व्यावसायिक शक्ल दे दी। अपनी व्यावसायिक महत्वाकांक्षा को पूरा करने के लिए इस शख्स ने क्रिकेट में हाथ आजमाया और कामयाबी के झंडे गाड़े। आईपीएल के कमिश्नर के रूप में उन्होंने तीन घंटे का बीसमबीस क्रिकेट शुरू किया, जो टेलीविजन के दर्शकों को खूब भाया। 20 ओवरों का सीमित मैच मानो उनके लिए क्रिकेट मैच न होकर कोई सिनेमा थी। खिलाड़ियों की भी बल्ले-बल्ले रही। उन पर तो उन्होंने धन की वर्षा ही करा दी। आईपीएल मैच में चीयर लीडर्स भी मोदी की परिकल्पना ही थी, दर्शकों के साथ-साथ खिलाड़ियों के भी मनोरंजन के लिए।

मोदी की इस परिकल्पना ने निश्चय ही क्रिकेट को व्यावसायिक मुनाफा दिया, जिससे आईपीएल को एक दिन में करीब छह करोड़ रुपए की आय होती है। लेकिन इसमें टेस्ट क्रिकेट या कहें परंपरागत शालीन क्रिकेट जसी चीज काफी पीछे छूट गई, जिसके चाहने वाले आज भी उसकी कसमें खाते हैं। यही वजह है कि क्रिकेट को मुनाफा देने के लिए व्यावसायिक स्तर पर उनकी तरीफ होती है तो क्रिकेट की शक्ल बिगाड़ने के लिए उन्हें आड़े हाथों भी लिया जाता है। लेकिन इन सबसे से परे मोदी जुटे हैं क्रिकेट के इस व्यवसाय को निरंतर आगे बढ़ाने में। उनकी मुनाफाखोर महत्वाकांक्षा इस कदर तुंद है कि अगर सरकार ने पिछले साल लोकसभा चुनाव के कारण सुरक्षा मुहैया कराने में असमर्थता जाहिर की तो पूरे खेल को लेकर वे दक्षिण अफ्रीका चले गए। उनका दावा है कि अगले चार साल में आईपीएल का आकार मौजूदा आकार से चार से छह गुना अधिक होगा। अगले साल से ही टीमें आठ से दस और मैचों की संख्या 60 से बढ़कर 90 हो जाएगी।

ऐसा नहीं है कि क्रिकेट को यह व्यावसायिक शक्ल देने में मोदी को यकायक कामयाबी मिल गई। काफी कोशिशों के बाद उन्होंने भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड (बीसीसीआई) को इसके लिए तैयार किया। 1990 के शुरुआती दशक में ही उन्होंने बीसीसीआई के सामने इसका प्रस्ताव रखा था, जिसे तब बीसीसीआई ने नकार दिया था। इसके बाद मोदी किसी भी तरह बीसीसीआई से जुड़ने की कवायद में जुट गए, क्योंकि उन्हें यकीन हो चला था कि यदि व्यवस्था बदलनी है तो उसका हिस्सा बनना पड़ेगा। सबसे पहले उन्होंने राजस्थान क्रिकेट एसोसिएशन की सदस्यता ली। बाद में वे इसके अध्यक्ष भी बने, जिससे उन्हें बीसीसीआई में एक सीट मिल गई।

इस बीच 2005 में बीसीसीआई के अध्यक्ष पद के लिए हुए चुनाव में शरद पवार की जीत हुई, जिसमें मोदी की भूमिका को काफी महत्वपूर्ण माना गया। उसी साल मोदी बीसीसीआई के उपाध्यक्ष बन गए। वे बीसीसीआई के अब तक के सबसे युवा उपाध्यक्ष थे। बीसीसीआई में रहते हुए उन्होंने इसके व्यावसायिक स्तर पर काम करना शुरू कर दिया। मोदी की कोशिशों का ही नतीजा रहा कि 2005 से 2008 के बीच बोर्ड के राजस्व में करीब सात गुनी वृद्धि हुई। अंतत: 2008 में उन्हें सीमित ओवर के फटाफट क्रिकेट को साकार रूप में देने में कामयाबी मिली, जब उन्होंने ट्वेंटी-ट्वेंटी के इंडियन प्रीमियर लीग (आईपीएल) की शुरुआत की।

इस बीच उन पर कई आरोप भी लगे। मामले अदालतों में घसीटे गए। उन पर स्वयं को राजस्थान का निवासी बताने के लिए गलत दस्तावेजों के आधार पर राजस्थान में जमीन खरीदने का आरोप है, क्योंकि नियमों के मुताबिक राजस्थान क्रिकेट एसोसिएशन के अध्यक्ष पद का चुनाव वहां का स्थाई निवासी ही लड़ सकता है। जयपुर पुलिस इसकी जांच कर रही है। वहीं सुप्रीम कोर्ट में उनके राजस्थान क्रिकेट बोर्ड के अध्यक्ष बनने को इस आधार पर चुनौती दी गई है कि वे अमेरिका में पढ़ाई के दौरान एक आपराधिक मामले में दोषी करार दिए जा चुके हैं और एसोसिएशन के नियमों के अनुसार आपराधिक मामले में दोषी करार दिए गए किसी व्यक्ति को इसका पदाधिकारी नहीं बनाया जा सकता। इसी आधार पर मुंबई हाईकोर्ट में भी एक जनहित याचिका दायर की गई है, जिसमें उनके बीसीसीआई के उपाध्यक्ष पद पर चुनाव को चुनौती दी गई है। 2009 में उन्हें एक और झटका मिला, जब वे राजस्थान क्रिकेट एसोसिएशन के अध्यक्ष पद का चुनाव कें्रीय ग्रामीण विकास मंत्री सीपी जोशी के हाथों हार गए।

संपन्न व्यावसायिक घराने से ताल्लुक रखने वाले मोदी राजस्थान की पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे के करीबी माने जाते हैं। मोदी पर 2008 के जयपुर धमाके के पीड़ितों के लिए मुख्यमंत्री सहायता कोष में छह करोड़ रुपए जमा कराने का आश्वासन देने के बावजूद ये रुपए जमा नहीं कराने काआरोप है। यह मामला भी फिलहाल अदालत में है। मोदी हाल में आईपीएल की नई टीम कोच्चि के शेयर धारकों का नाम जाहिर करने से चर्चा में आए हैं। उन्होंने विदेश राज्य मंत्री शशि थरूर का नाम भी लिया और कहा कि उन्होंने टीम की एक प्रमुख शेयर धारक सुनंदा पुष्कर का नाम नहीं बताने के लिए उन पर दबाव बनाया। लेकिन जब बात निकली तो फिर दूर तक गई। आईपीएल के पूरे व्यवसाय में उनके तीन करीबी रिश्तेदारों की हिस्सेदारी सामने आई, जिनमें से एक उनके दामाद गौरव बर्मन भी हैं। इस समय सारा देश कोच्चि विवाद में नए-नए खुलते रहस्यों का पर्दाफाश हैरत से देख रहा है। उनके आलोचक उनके पर काटने का दबाव बना रहे हैं। आईपीएल नखशिख विवाद में है। अपसंस्कृति से लेकर आर्थिक गड़बड़ियों के आरोप हैं। आयकर विभाग उसके मुख्यालय में छापा मार रहा है।

उन्नतीस नवंबर, 1963 को दिल्ली में एक संपन्न व्यावसायिक घराने में पैदा हुए मोदी को स्कूली शिक्षा कभी रास नहीं आई। उनके पिता कृष्ण कुमार मोदी ‘मोदी एंटरप्राइजेजज् के चेयरमैन हैं, जिसका कारोबार करीब 40 मिलियन का बताया जा रहा है। घरवालों ने स्कूली शिक्षा पूरी करने के लिए उन्हें शिमला और नैनीताल भेजा, लेकिन वे अक्सर वहां से भाग निकलते थे। उनकी इच्छा अमेरिका में पढ़ने की थी। इसलिए उन्होंने एसएटी क्वालीफाई किया, जो स्कूली शिक्षा पूरी किए बगैर ही अमेरिकी कॉलेज/विश्वविद्यालय में नामांकन की अर्हता तय करता है। वहां उन्हें नॉर्थ कैरोलिना में डरहाम के ड्यूक विश्वविद्यालय में दाखिला भी मिल गया। इसी दौरान 1985 में डरहाम काउंटी कोर्ट ने उन्हें चार सौ ग्राम कोकीन रखने और अपहरण के मामले में दोषी करार दिया।

1986 में ड्यूक विश्वविद्यालय से स्नातक करने के बाद वे भारत लौट आए। इस बीच 1987-1991 तक वे अंतर्राष्ट्रीय तंबाकू कंपनी के अध्यक्ष भी रहे। 1992 में वे गोडफ्रे फिलिप्स इंडिया के एग्जक्यूटिव डायरेक्टर भी बने। इसी दौरान उन्होंने टेलीविजन चैनलों से क्रिकेट मैच के प्रसारण पर बातचीत शुरू की और बीसीआई के समक्ष फुटबॉल लीग की तर्ज पर सीमित ओवर के मैच का प्रस्ताव रखा, जिसे तब बीसीसीआई ने नकार दिया था।

सोमवार, 12 अप्रैल 2010

सिर्फ भुट्टो नहीं फातिमा



भारत में जसे नेहरू-गांधी परिवार वैसे ही पाकिस्तान में भुट्टो परिवार। वहां की सियासत और सत्ता के बड़े दावेदार। लेकिन बेनजीर की भतीजी फातिमा परिवार की लीक से अलग हैं। वे सिर्फ भुट्टो नहीं हैं। और न वे भुट्टो होने को कोई खास अहमियत देती हैं। वे वंशवाद के खिलाफ हैं। उनकी लोकप्रियता उनके भुट्टो होने से नहीं, बल्कि एक जहीन लेखिका होने से है। कभी सबसे प्रिय फूफी रहीं बेनजीर से उनकी दूरी बढ़ गई। पुलिस ने उनके पिता मुर्तजा को गोलियों से भून दिया। तीन पुस्तकों की यह सत्ताइस वर्षीया लेखिका अपनी नई पुस्तक में जरदारी पर पिता की मृत्यु का इल्जाम लगाती हैं और बेनजीर पर बतौर प्रधानमंत्री अपराधियों को बचाने का। भारत-पाक संबंधों में घनिष्ठता की पैरोकार फातिमा यूं तो राजनीति से दूर हैं, लेकिन उनकी समझदारी, लोकप्रियता और उनके जुझारू तेवर उन्हें निकट भविष्य में राजनीति की मुख्यधारा में ले आएं तो इस पर ताज्जुब नहीं होना चाहिए।



फातिमा भुट्टो पाकिस्तान की पूर्व प्रधानमंत्री बेनजीर भुट्टो की भतीजी हैं। उनके भाई मुर्तजा भुट्टो की बेटी, जो अपने पिता से बेइंतहां मोहब्बत करती हैं। लेकिन इससे भी अलग भी है उनकी एक पहचान, जो किसी की भतीजी या किसी की बेटी होने की मोहताज नहीं। यह पहचान है उनकी लेखिका के रूप में, जो सिर्फ 27 साल की उम्र में तीन किताबें लिख चुकी हैं और निरंतर विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में कॉलम लेखिका के रूप में सक्रिय हैं। एक ऐसी युवा लेखिका, जो विभिन्न विषयों पर बेबाक राय रखती हैं। वे भारत-पाक के बीच बेहतर रिश्तों की पैरोकार हैं। उन्हें दोनों देश सहोदरों से लगते हैं।

पाकिस्तान के सामाजिक-राजनीतिक हालात वे बेखौफ होकर चर्चा करती हैं, राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी अक्सर उनके निशाने पर होते हैं, लेकिन वे राजनीति से दूरी बनाए रखना चाहती हैं। वे कहती हैं कि यहां हालात रहने लायक नहीं रह गए हैं। यहां रहना किसी खतरे से कम नहीं है, जिसे कराची में रहते हुए वे अक्सर महसूस करती हैं। वे तकरीबन रोज उस रास्ते से गुजरती हैं, जहां उनके पिता को पुलिस ने 1996 में गोलियों से भून डाला था, जब पाकिस्तान की प्रधानमंत्री उनकी बुआ बेनजीर थीं। पिता की हत्या के लिए फातिमा खुलकर बेनजीर और उनके पति आसिफ अली जरदारी को जिम्मेदार ठहराती हैं।

पिता की हत्या के बाद फातिमा बेनजीर से कभी नहीं मिलीं, लेकिन उनकी तुलना अक्सर बुआ से होती रही। फातिमा काफी हद तक वैसी ही दिखती हैं, जसी इस उम्र में बेनजीर दिखती थीं। देश-विदेश में उनकी लोकप्रियता भी बिल्कुल वैसी ही है, जसी बेनजीर की थी। खूबसूरती और ग्लैमर के मामले में भी दोनों काफी करीब दिखती हैं। फातिमा बचपन से ही अपने और बुआ के बीच समानता की ऐसी बातें सुनती आ रही हैं, जो उन्हें कभी पसंद नहीं आई। पिता की हत्या के बाद बेनजीर के लिए मन में नफरत और बढ़ गई, जो दिसंबर, 2007 में उनकी मौत के बाद ही खत्म हुई।

हाल ही में उनकी तीसरी किताब ‘द सांग ऑफ ब्लड एंड सोर्डज् आई है, जिसमें उन्होंने भुट्टो परिवार की चर्चा एक ऐसे सामंती परिवार के रूप में की है, जो ब्रिटिश शासन से आजादी के बाद पाकिस्तान में सत्ता का एक प्रमुख कें्र बन बैठा। लेकिन इस परिवार की चार पीढ़ियों को इसकी बड़ी कीमत चुकानी पड़ी। पिछले चार दशक में तकरीबन हर दशक में इस परिवार ने एक सदस्य को खोया। फातिमा के दादा जुल्फिकार अली भुट्टो जनरल जिया उल हक क शासनकाल में 1979 में फांसी पर लटका दिए गए। जुलाई, 1985 में फातिमा के चाचा शाहनवाज की संदिग्ध पिरिस्थितियों में मौत गई। 20 सितंबर, 1996 को फातिमा के पिता मुर्तजा भुट्टो की पुलिस ने गोली मार कर हत्या कर दी और 27 दिसंबर, 2007 को बेनजीर भी खूनी हिंसा का शिकार हो गईं। इससे पहले ‘व्हिस्पर्स ऑफ डेजर्टज् नाम से उनका एक कविता संग्रह आ चुका है। दूसरी पुस्तक उन्होंने अक्टूबर 2005 में आए भीषण भूकंप पर लिखी है, जिसने इस्लामाबाद से कश्मीर घाटी तक को हिलाकर रख दिया था। पुस्तक का शीर्षक ही उन्होंने ‘8:50ए एम, 8 अक्टूबर 2005ज् दिया है।

इस खूबसूरत युवा लेखिका की आस्था लोकतंत्र में है, लेकिन वे बेनजीर की चुनी हुई सरकार को सैनिक शासन से कम भयावह नहीं मानतीं। वे सवाल करती हैं कि जो सरकार ‘ऑपरेशन क्लीन अपज् के नाम पर तीन हजार लोगों को मरवा दे, वह सैनिक शासन से बेहतर कैसे हो सकती है? वे मीडिया में बेनजीर की तुलना इंदिरा गांधी से किए जाने का भी खंडन करती हैं और साफ कहती हैं कि बेनजीर गांधी नहीं थीं। वे वंशवाद के सख्त खिलाफ हैं और कहती हैं कि उनका नाम किसी भी चीज के लिए उनकी योग्यता को साबित नहीं करता।

बड़ी बेबाकी से वे कहती हैं कि पाकिस्तान में इन दिनों कई तरह की राजनीति चल रही है- सामंती राजनीति, अल्पतंत्र की राजनीति, सैन्य राजनीति और अमेरिकी आदेश पर चलने वाली राजनीति। इसी पर आज पाकिस्तान का शासन चल रहा है और पाकिस्तान की सामाजिक-राजनीतिक दुर्दशा का कारण भी यही है। पाकिस्तान के राजनीतिक संकट का एक बड़ा कारण वे यह भी मानती हैं कि आजादी के बाद से सत्ता वहां कभी सैनिक शासन तो कभी भुट्टो परिवार और फिर नवाज शरीफ के हाथों में घूमती रही, जिसे बदलने की जरूरत है।

पाकिस्तान में हालात सुधारने के लिए वे सबसे पहले ‘राष्ट्रीय मेलमिलाप अध्यादेशज् को समाप्त करना जरूरी बताती हैं, जो भ्रष्ट नेताओं के लिए सत्ता का मार्ग प्रशस्त करती है। यहां भी उनका इशारा सीधे और साफ तौर पर जरदारी की तरफ है। इसी तरह वे हदूद अध्यादेश को भी समाप्त करना जरूरी बताती हैं, जो महिलाओं और अल्पसंख्यकों के खिलाफ कानून का सबसे हिंसक रूप है। साथ ही पाकिस्तान की सामंती अर्थव्यवस्था को समाप्त करते हुए एक बार फिर उसी तरह सही मायने में भू-सुधार लागू करने की वकालत करती हैं, जसा उनके दादा जुल्फिकार अली भुट्टो के कार्यकाल में हुआ था।

उन्नत्तीस मई, 1982 को अफगानिस्तान के काबुल में पैदा हुईं फातिमा का बचपन कई मुल्कों में बीता। उनका जन्म तब हुआ था जब जनरल जिया उल हक के शासन के दौरान पिता को फांसी दिए जाने के बाद मुर्तजा अफगानिस्तान में निर्वासित जीवन बिता रहे थे। वहीं उन्होंने अफगान सरकार के एक अधिकारी की बेटी से निकाह किया था, जिससे फातिमा हुईं। लेकिन दोनों का साथ अधिक दिनों तक नहीं रह सका और उनके बीच तलाक हो गया। पर मुर्तजा को अपनी बेटी से बहुत प्यार था और इसलिए वे उसे लेकर वहां से भाग निकले। इस बीच वे फातिमा को लेकर त्रिपोली, फ्रांस और दमस्कस में छिपकर जीवन बिताते रहे, क्योंकि पाक खुफिया एजेंसी भी उन्हें ढूंढ़ रही थी। सीरिया में उनकी मुलाकात लेबनानी महिला गिनवा इटोई से हुई, जिससे उन्होंने निकाह कर लिया। इस वक्त फातिमा अपनी सौतेली मां गिनवा के साथ ही कराची में रह रही हैं, जिनसे उनके रिश्ते काफी अच्छे रहे हैं।

मुर्तजा 1993 में फातिमा और पत्नी गिनवा को लेकर पाकिस्तान लौटे, जहां से उनकी सेकेंडरी शिक्षा पूरी हुई। इसके बाद उन्होंने कोलंबिया विश्वविद्यालय से मध्य-पूर्व विषयों में बीए की डिग्री ली। लंदन विश्वविद्यालय से उन्होंने दक्षिण एशियाई विषयों में एमए की डिग्री ली। छात्र जीवन से ही वे लेखन में सक्रिय रहीं, जो आज तक जारी है। फातिमा ने भले ही फिलहाल राजनीति में आने से इनकार किया है और लेखन के जरिये ही सक्रिय रहने की बात कही है, लेकिन आने वाले दिनों में वे जरदारी और उनके बेटे बिलावल, जो पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी के मौजूदा अध्यक्ष हैं, के लिए एक बड़ा खतरा बन सकती हैं।