हर साल ग्यारह सितंबर की तारीख अब 9/11 के रूप में याद की जाने लगी है, जब 2001 में अमेरिका के वर्ल्ड ट्रेड सेंटर और सुरक्षा कार्यालय पेंटागन को आतंकवादियों ने निशाना बनाया था। लेकिन हमारे लिए इसका एक और महत्व है, जिसकी स्मृति लगभग क्षीण होती जा रही है। यह आचार्य विनोबा भावे की जयंती का भी दिन है। भारतीय समाज, राजनीति में उनका व्यक्तित्व और कृतित्व विलक्षण रहा है। 9/11 के संदर्भ में भी देखें तो उनकी दृष्टि सत्य, प्रेम, करुणा की थी। वे हृदय परिवर्तन करके बदलाव लाना चाहते थे। आज भी जमीन की समस्या देश की बड़ी समस्या है और उसके लिए बड़ी लड़ाइयां लड़ी जा रही हैं। बाबा ने इसका हल भी भूदान आंदोलन में ढूंढा था और दान के जरिए लाखों एकड़ भूमि प्राप्त की थी। आज न विनोबा हैं, न भूदान और न सर्वोदय। समस्याएं जहां की तहां हैं। विनोबा-विचार की प्रासंगिकता पर मैंने बात की गांधी शांति प्रतिष्ठान से जुड़े एसएन सुब्बाराव से, जो आज भी देशभर में गांधी के विचारों के प्रसार में जुटे हैं और युवाओं को जागरूक बनाने के लिए तरह-तरह के कार्यक्रम आयोजित कर रहे हैं। उनके विचारों की प्रासंगिकता पर मैंने वरिष्ठ पत्रकार देवदत्त से भी बातचीत की। यहां उनके विचारों पर आधारित दो लेख प्रस्तुत हैं।
आज भी उपयोगी यह विचार
(गांधी शांति प्रतिष्ठान से जुड़े एसएन सुब्बाराव से बातचीत पर आधारित)
किसी भी आंदोलन की सफलता के लिए जरूरी है कि उसे समाज और व्यवस्था का साथ मिले, सर्वोदय आंदोलन के साथ यह नहीं हो सका।
विनोबा मूलत: आध्यात्मिक व्यक्ति थे और इसी रूप में वे सभी समस्याओं का समाधान तलाशते थे। नेता बनने की इच्छा उनमें नहीं थी। वे सभी को समान रूप से देखते थे और एक आध्यात्मिक जीवन बिताना चाहते थे। यह भी सच है कि वे घर से मुक्ति की तलाश में निकले थे, लेकिन गांधी से मिलने के बाद उनके जीवन की दिशा बदल गई। वे उनके विचारों से इस कदर प्रभावित हुए कि उन्होंने आध्यात्मिक मुक्ति का मार्ग छोड़ दिया और सामाजिक जीवन में उतर आए। फिर आजादी के आंदोलन से लेकर एक नए समाज की रचना तक के गांधी के कार्यक्रम में वे हर जगह उनके साथ रहे। लेकिन 30 जनवरी, 1948 को गांधी की हत्या के बाद हालात बदल गए। एकाएक हुई इस वारदात ने लोगों को सकते में डाल दिया। सब किंकर्तव्यविमूढ़ की स्थिति में आ गए। किसी को समझ नहीं आ रहा था कि अब उन सपनों को कैसे पूरा किया जाएगा, जो गांधी जी ने आजाद भारत की जनता के लिए देखे थे। कैसे एक नए समाज की रचना हो, जिसमें हर व्यक्ति का कल्याण हो। ऐसे में सबको विनोबा में उम्मीद की किरण दिखी। गांधी के रूप में देश का जो नेतृत्व एकाएक खो गया, वह विनोबा के रूप में दिखा। लोग उनके निर्देश की प्रतीक्षा करने लगे। विनोबा ने भी महसूस किया कि सर्वजन के हित में जिस समाज की संकल्पना गांधी ने की थी, उसे आगे बढ़ाने की जरूरत है। यूं हाथ पर हाथ धरे रहने से बात नहीं बनेगी। उन्होंने गांधी के सपने को साकार करने के लिए लोगों का आह्वान किया और कहा कि देश ने आजादी तो हासिल कर ली, अब हमारा लक्ष्य एक ऐसे समाज की रचना करना होना चाहिए, जिसमें सबका कल्याण सुनिश्चित हो सके।
गांधी ने ऐसे ही कार्यो के लिए सेवा ग्राम आश्रम की स्थापना की थी और आजादी के बाद फरवरी, 1948 में शीर्ष नेतृत्व को इस पर विचार-विमर्श करने व कार्यक्रम की रूपरेखा तैयार करने के लिए आश्रम बुलाया कि सर्वोदय यानी सबका उदय, सबका कल्याण कैसे हो? लेकिन इससे पहले ही उनकी हत्या हो गई और देश के सामने एक बड़ा शून्य आ गया। बहरहाल, तत्कालीन नेतृत्व ने मार्च में यह बैठक बुलाई। गांधी के सपनों को साकार करने के लिए सर्व सेवा संघ का गठन किया गया, जिसका उद्देश्य समाज में सभी की सेवा करना था। अब तक विनोबा के मन में भू-आंदोलन जसी कोई संकल्पना नहीं थी। लेकिन देशभर का भ्रमण करने के बाद उन्हें इस बात का भान हो चला था कि समाज दो भागों में बंटा है, एक भूमिहीन लोगों का तबका और एक भू-स्वामियों का वर्ग। भूमिहीन लोगों की एक बड़ी संख्या है, जबकि मुट्ठीभर लोगों के पास अवश्यकता से अधिक भूमि है।
अपनी पदयात्रा के दौरान जब वे आंध्र प्रदेश के तेलंगाना पहुंचे तो वहां जमीन के टुकड़े के लिए लोगों को लड़ते देखा। भूमिहीन भू-स्वामियों से जमीन छीनने के लिए छापामार युद्ध चला रहे थे तो उन्हें काबू में करने की जिम्मेदारी पुलिस को दी गई थी। भूमिहीनों से उन्होंने हिंसा छोड़ने की अपील की तो उन्होंने अपने लिए जमीन की मांग की। खुद विनोबा को भी उस वक्त नहीं पता था कि वे इनकी समस्याओं का समाधान कैसे करेंगे? इसी उधेड़बुन के बीच उन्होंने ग्रामीणों की सभा बुलाई और लोगों के सामने उनकी समस्याएं रखी। तब स्वयं विनोबा को भी उम्मीद नहीं थी कि कोई उनकी समस्याओं के समाधान के लिए इस तरह आगे आएगा। सभा में से एक व्यक्ति ने सौ एकड़ जमीन देने की पेशकश की। यहीं से विनोबा को मिल गया भूमिहीनों की समस्या का समाधान। देशभर में पदयात्रा कर वे और उनके अनुयायी भू-स्वामियों को भूमिहीनों के लिए जमीन का एक टुकड़ा देने के लिए प्रेरित करते रहे। स्वयं विनोबा ने खराब स्वास्थ्य के बावजूद देशभर में लगभग छह हजार किलोमीटर तक पदयात्रा की। उनके प्रयास से देशभर में भू-स्वामियों द्वारा दान की गई लाखों एकड़ जमीन एकत्र की गई और इन्हें भूमिहीनों के बीच बांटा गया।
हां, यह सच है कि जमा की गई भूमि एक हिस्सा भूमिहीनों के बीच बंट नहीं पाया। लेकिन इसके लिए विनोबा और उनके अनुयायियों को दोष देना ठीक नहीं है। इसके लिए काफी हद तक सरकार भी जिम्मेदार है, जो जमीन का सही वितरण सुनिश्चित नहीं कर पाई। जहां तक सर्वोदय आंदोलन की प्रासंगिकता की बात है तो सिर्फ इस आधार पर इसे अप्रासंगिक नहीं कहा जा सकता कि विनोबा द्वारा चलाई गई यह मुहिम आगे चलकर विफल हो गई। किसी भी आंदोलन की सफलता के लिए जरूरी है कि उसे समाज और व्यवस्था का साथ मिले। सर्वोदय आंदोलन के साथ ऐसा नहीं हो पाया। वरना इसके विचार और अवधारणा आज भी प्रासंगिक है। आवश्यकता है तो उसे सही तरीके से समझने और उस दिशा में प्रयास करने की।
आज भी देश में भूमिहीनों की एक बड़ी तादाद है। नक्सल समस्या इसकी एक बड़ी वजह है। कभी विनोबा ने कहा था कि हर बेरोजगार हाथ बंदूक पाने का हकदार है। अगर उन्हें रोजगार मिले तो वे भला बंदूक क्यों उठाएंगे? आज सरकार नक्सल समस्या से निपटने के लिए तरह-तरह की कार्य योजनाएं बना रही और उस पर करोड़ों रुपए खर्च कर रही है। लेकिन यह समस्या ही न हो, इसके लिए कोई कार्य योजना नहीं बना रही। अगर योजना बन भी रही है तो उन्हें क्रियान्वित नहीं किया जा रहा। विकास कार्य के लिए भूमि अधिग्रहण जसी समस्या का समाधान भी विनोबा के सिद्धांतों में ढूंढा जा सकता है। विशेष आर्थिक क्षेत्र या अन्य विकासात्मक कार्यो के मद्देनजर अगर किसानों को स्वेच्छा से जमीन देने के लिए प्रेरित किया जाए तो देशभर में जमीनों के अधिग्रहण के लिए हो रहा विरोध रोका जा सकता है।
मंगलवार, 14 सितंबर 2010
सर्वोदय नहीं, भूदान विफल
(वरिष्ठ पत्रकार देवदत्त से बातचीत पर आधारित)
बाबा ने जो भूदान यज्ञ शुरू किया वह गांधी के सर्वोदय का एक हिस्साभर था, पूरा सर्वोदय नहीं।
सर्वोदय को लेकर विनोबा भावे के योगदान को जानने से पहले यह समझ लेना जरूरी है कि उन्होंने जिस सर्वोदय आंदोलन को 1950 व 1960 के दशक में आगे बढ़ाया, वह महात्मा गांधी के सर्वोदय के सिद्धांत की सोच से प्रेरित था। गांधी एक नए समाज की रचना करना चाहते थे, जिसमें वे सभी व्यक्ति का उत्थान एवं कल्याण चाहते थे। इसके लिए उन्होंने कई साधन सुझाए थे। भू-दान व ग्राम-दान उन्हीं में से एक था, जिसे लेकर विनोबा ने समाज को सुधारने की कवायद शुरू की। लेकिन 1950-60 के दशक के बाद इस आंदोलन का कोई नामलेवा नहीं रह गया। इसकी कई वजह थी। पहली तो यह कि जिस आंदोलन की शुरुआत विनोबा ने की, उससे आगे चलकर उन्होंने स्वयं ही अपने आप को अलग कर लिया। आंदोलन की विफलता का दूसरा महत्वपूर्ण कारण यह रहा कि विनोबा ने जिस भू-दान या ग्राम-दान योजना की शुरुआत की, वह गांधी के सर्वोदय का एक हिस्सामात्र था, पूरा सर्वोदय नहीं।
यहां यह जान लेना भी जरूरी है कि विनोबा अपने घर से ‘मुक्तिज् की तलाश में निकले थे, न कि किसी सामाजिक आंदोलन की मुहिम के तहत। इसी बीच, 1915-16 में वे गांधी के संपर्क में आए और उनके विचारों से प्रभावित होकर उन्होंने ‘मुक्तिज् का मार्ग छोड़ दिया। वे सार्वजनिक जीवन में उतर आए। गांधी की हत्या के बाद उन्होंने उनके विचारों को आगे बढ़ाने का प्रयास किया। लेकिन 1960 के दशक में भू-दान आंदोलन के सिलसिले में कोलकाता जाने के बाद उनका आध्यात्मिक मन एकबार फिर जागृत हुआ और उन्होंने गांधी से माफी मांगते हुए सार्वजनिक जीवन से किनारा कर लिया।
बहरहाल, विनोबा ने भू-दान व ग्राम-दान का जो आंदोलन चलाया, भूमि सुधार के संदर्भ में आज भी उसकी प्रासंगिकता है। जमीन की समस्या वास्तव में हिन्दुस्तान की समस्या है, जिसका दूसरा नाम कृषि है। 1947 में आजादी से लेकर अब तक किसी सरकार या राजनीतिक दल ने नहीं कहा कि देश कृषि प्रधान नहीं है। कृषि को यहां जीवन शैली माना गया और सरकारों की यह जिम्मेदारी तय की गई कि वह इसे सुरक्षित रखे। विनोबा के भू-दान आंदोलन ने भी इसी मुद्दे को उठाया। आगे चलकर यह योजना ग्राम-दान के रूप में तब्दील हुई। गांव को एक इकाई के रूप में देखा गया और कहा गया कि कृषि से संबंधित जो भी समस्या हो या इसके विकास की बात हो, पूरे गांव के संदर्भ में हो। आज की कृषि समस्या के संदर्भ में भी यह पूरी तरह प्रासंगिक है। इस सिद्धांत या रणनीति के तहत गांवों की रचना से देश की कई समस्याओं का समाधान हो सकता है। गांवों को एक इकाई मानकर सामाजिक सुधार की दृष्टि से भी यह फॉर्मूला प्रासंगिक है।
जहां तक मौजूदा समाज की समस्याओं की बात है तो इसके लिए सरकार जिम्मेदार है, जिसने नीतियां तो बहुत बनाई, लेकिन उन्हें क्रियान्वित नहीं किया। कृषि व भूमि की समस्या भी उन्हीं में से एक है। सरकार ने भूमि सुधार को लेकर भी नीतियां बनाई, लेकिन उन्हें क्रियान्वित नहीं किया। आज औद्योगिक विकास के लिए भूमि अधिग्रहण और देशभर में उसका विरोध इसी का परिणाम है। इसलिए यह कहना गलत है कि सर्वोदय के सिद्धांतों की आज उपयोगिता या प्रासंगिकता नहीं रह गई है। यह आज भी उतना ही प्रासंगिक है, जितना 1950-60 के दशक में था। जरूरत है तो उन्हें सही तरीके से अमल में लाने की।
इसके लिए बेहतर वातावरण पंचायती व्यवस्था में हो सकता है। लेकिन मौजूदा पंचायती व्यवस्था में नहीं। बल्कि उस पंचायती व्यवस्था में, जहां शक्तियां नीचे से ऊपर तक जाती हों, न कि ऊपर से नीचे आती हों। मौजूदा व्यवस्था में पंचायतों को जो भी शक्तियां मिली हुई हैं, उनका स्रोत कें्र है। यानी कें्र से राज्य सरकारों को और फिर राज्य सरकारों से पंचायतों को शक्तियां मिलती हैं। ऐसे में पंचायतों के कार्य व निर्णय लेने की क्षमता प्रभावित होती है और सत्ता के समुचित विकें्रीकरण का जो सपना महात्मा गांधी ने देखा था, वह पूरा नहीं हो पाता।
अब अगर विनोबा द्वारा शुरू किए सर्वोदय आंदोलन की विफलता की बात की जाए तो सबसे पहले यह स्पष्ट कर देना जरूरी है कि विनोबा द्वारा शुरू किया आंदोलन वास्तव में सर्वोदय आंदोलन था ही नहीं। यह भूमि सुधार आंदोलन था, जो भू-दान आंदोलन के नाम से प्रचलित हुआ। यह सर्वोदय का एक हिस्सामात्र था, पूरा सर्वोदय नहीं। फिर गांधी ने जिस सर्वोदय का विचार दिया था, वह समाज सुधार की बात नहीं करता, बल्कि इसके समानांतर एक नए समाज के निर्माण की बात करता है; जबकि विनोबा ने सर्वोदय के लिए आवश्यक एक सिद्धांत को अमल में लाकर सामाजिक सुधार की कवायद शुरू की थी। इसलिए यहां गांधी के सर्वोदय का सिद्धांत विफल नहीं हुआ, बल्कि भू-दान आंदोलन विफल हो गया। आंदोलन की विफलता का एक अहम कारण यह भी है कि विनोबा ने आगे चलकर इससे खुद को अलग कर लिया और इसमें सरकार को शामिल कर लिया। भूमि सुधार को लेकर कानून बनाने की जिम्मेदारी सरकार को सौंपकर आंदोलनकारियों ने सरकार के समक्ष लगभग घुटने टेक दिए।
विनोबा ने ‘सभय भूमि गोपाल कीज् का नारा दिया था। उन्होंने जमीन पर लोगों के मालिकाना हक को स्वीकार किया, लेकिन इसका इस्तेमाल समाज द्वारा करने की बात कही। पूंजीवादी एवं समाजवादी व्यवस्था से अलग उन्होंने ट्रस्टीशिप व्यवस्था में यकीन जताया और हृदय परिवर्तन के माध्यम से भूमि सुधार लागू करने की कवायद शुरू की। लेकिन आंदोलनकारियों द्वारा सरकार के समक्ष घुटने टेकने के बाद सब वहीं समाप्त हो गया। हालांकि आज भी भूमि सुधार की बात उठती है। राजनीतिक दलों से लेकर विभिन्न संगठनों के कार्यकर्ता भी किसान हितैषी होने की बात करते हैं। औद्योगिक विकास के लिए अगर कहीं जमीन का अधिग्रहण हो रहा है और किसान उसका विरोध कर रहे हैं तो उनके साथ खड़े होने के लिए राजनीतिक दलों से लेकर तमाम संगठनों के कार्यकर्ता भी आ जाते हैं। लेकिन वास्तव में वे किसानों के हितैषी नहीं, बल्कि प्रबंधात्म लोग हैं।
बाबा ने जो भूदान यज्ञ शुरू किया वह गांधी के सर्वोदय का एक हिस्साभर था, पूरा सर्वोदय नहीं।
सर्वोदय को लेकर विनोबा भावे के योगदान को जानने से पहले यह समझ लेना जरूरी है कि उन्होंने जिस सर्वोदय आंदोलन को 1950 व 1960 के दशक में आगे बढ़ाया, वह महात्मा गांधी के सर्वोदय के सिद्धांत की सोच से प्रेरित था। गांधी एक नए समाज की रचना करना चाहते थे, जिसमें वे सभी व्यक्ति का उत्थान एवं कल्याण चाहते थे। इसके लिए उन्होंने कई साधन सुझाए थे। भू-दान व ग्राम-दान उन्हीं में से एक था, जिसे लेकर विनोबा ने समाज को सुधारने की कवायद शुरू की। लेकिन 1950-60 के दशक के बाद इस आंदोलन का कोई नामलेवा नहीं रह गया। इसकी कई वजह थी। पहली तो यह कि जिस आंदोलन की शुरुआत विनोबा ने की, उससे आगे चलकर उन्होंने स्वयं ही अपने आप को अलग कर लिया। आंदोलन की विफलता का दूसरा महत्वपूर्ण कारण यह रहा कि विनोबा ने जिस भू-दान या ग्राम-दान योजना की शुरुआत की, वह गांधी के सर्वोदय का एक हिस्सामात्र था, पूरा सर्वोदय नहीं।
यहां यह जान लेना भी जरूरी है कि विनोबा अपने घर से ‘मुक्तिज् की तलाश में निकले थे, न कि किसी सामाजिक आंदोलन की मुहिम के तहत। इसी बीच, 1915-16 में वे गांधी के संपर्क में आए और उनके विचारों से प्रभावित होकर उन्होंने ‘मुक्तिज् का मार्ग छोड़ दिया। वे सार्वजनिक जीवन में उतर आए। गांधी की हत्या के बाद उन्होंने उनके विचारों को आगे बढ़ाने का प्रयास किया। लेकिन 1960 के दशक में भू-दान आंदोलन के सिलसिले में कोलकाता जाने के बाद उनका आध्यात्मिक मन एकबार फिर जागृत हुआ और उन्होंने गांधी से माफी मांगते हुए सार्वजनिक जीवन से किनारा कर लिया।
बहरहाल, विनोबा ने भू-दान व ग्राम-दान का जो आंदोलन चलाया, भूमि सुधार के संदर्भ में आज भी उसकी प्रासंगिकता है। जमीन की समस्या वास्तव में हिन्दुस्तान की समस्या है, जिसका दूसरा नाम कृषि है। 1947 में आजादी से लेकर अब तक किसी सरकार या राजनीतिक दल ने नहीं कहा कि देश कृषि प्रधान नहीं है। कृषि को यहां जीवन शैली माना गया और सरकारों की यह जिम्मेदारी तय की गई कि वह इसे सुरक्षित रखे। विनोबा के भू-दान आंदोलन ने भी इसी मुद्दे को उठाया। आगे चलकर यह योजना ग्राम-दान के रूप में तब्दील हुई। गांव को एक इकाई के रूप में देखा गया और कहा गया कि कृषि से संबंधित जो भी समस्या हो या इसके विकास की बात हो, पूरे गांव के संदर्भ में हो। आज की कृषि समस्या के संदर्भ में भी यह पूरी तरह प्रासंगिक है। इस सिद्धांत या रणनीति के तहत गांवों की रचना से देश की कई समस्याओं का समाधान हो सकता है। गांवों को एक इकाई मानकर सामाजिक सुधार की दृष्टि से भी यह फॉर्मूला प्रासंगिक है।
जहां तक मौजूदा समाज की समस्याओं की बात है तो इसके लिए सरकार जिम्मेदार है, जिसने नीतियां तो बहुत बनाई, लेकिन उन्हें क्रियान्वित नहीं किया। कृषि व भूमि की समस्या भी उन्हीं में से एक है। सरकार ने भूमि सुधार को लेकर भी नीतियां बनाई, लेकिन उन्हें क्रियान्वित नहीं किया। आज औद्योगिक विकास के लिए भूमि अधिग्रहण और देशभर में उसका विरोध इसी का परिणाम है। इसलिए यह कहना गलत है कि सर्वोदय के सिद्धांतों की आज उपयोगिता या प्रासंगिकता नहीं रह गई है। यह आज भी उतना ही प्रासंगिक है, जितना 1950-60 के दशक में था। जरूरत है तो उन्हें सही तरीके से अमल में लाने की।
इसके लिए बेहतर वातावरण पंचायती व्यवस्था में हो सकता है। लेकिन मौजूदा पंचायती व्यवस्था में नहीं। बल्कि उस पंचायती व्यवस्था में, जहां शक्तियां नीचे से ऊपर तक जाती हों, न कि ऊपर से नीचे आती हों। मौजूदा व्यवस्था में पंचायतों को जो भी शक्तियां मिली हुई हैं, उनका स्रोत कें्र है। यानी कें्र से राज्य सरकारों को और फिर राज्य सरकारों से पंचायतों को शक्तियां मिलती हैं। ऐसे में पंचायतों के कार्य व निर्णय लेने की क्षमता प्रभावित होती है और सत्ता के समुचित विकें्रीकरण का जो सपना महात्मा गांधी ने देखा था, वह पूरा नहीं हो पाता।
अब अगर विनोबा द्वारा शुरू किए सर्वोदय आंदोलन की विफलता की बात की जाए तो सबसे पहले यह स्पष्ट कर देना जरूरी है कि विनोबा द्वारा शुरू किया आंदोलन वास्तव में सर्वोदय आंदोलन था ही नहीं। यह भूमि सुधार आंदोलन था, जो भू-दान आंदोलन के नाम से प्रचलित हुआ। यह सर्वोदय का एक हिस्सामात्र था, पूरा सर्वोदय नहीं। फिर गांधी ने जिस सर्वोदय का विचार दिया था, वह समाज सुधार की बात नहीं करता, बल्कि इसके समानांतर एक नए समाज के निर्माण की बात करता है; जबकि विनोबा ने सर्वोदय के लिए आवश्यक एक सिद्धांत को अमल में लाकर सामाजिक सुधार की कवायद शुरू की थी। इसलिए यहां गांधी के सर्वोदय का सिद्धांत विफल नहीं हुआ, बल्कि भू-दान आंदोलन विफल हो गया। आंदोलन की विफलता का एक अहम कारण यह भी है कि विनोबा ने आगे चलकर इससे खुद को अलग कर लिया और इसमें सरकार को शामिल कर लिया। भूमि सुधार को लेकर कानून बनाने की जिम्मेदारी सरकार को सौंपकर आंदोलनकारियों ने सरकार के समक्ष लगभग घुटने टेक दिए।
विनोबा ने ‘सभय भूमि गोपाल कीज् का नारा दिया था। उन्होंने जमीन पर लोगों के मालिकाना हक को स्वीकार किया, लेकिन इसका इस्तेमाल समाज द्वारा करने की बात कही। पूंजीवादी एवं समाजवादी व्यवस्था से अलग उन्होंने ट्रस्टीशिप व्यवस्था में यकीन जताया और हृदय परिवर्तन के माध्यम से भूमि सुधार लागू करने की कवायद शुरू की। लेकिन आंदोलनकारियों द्वारा सरकार के समक्ष घुटने टेकने के बाद सब वहीं समाप्त हो गया। हालांकि आज भी भूमि सुधार की बात उठती है। राजनीतिक दलों से लेकर विभिन्न संगठनों के कार्यकर्ता भी किसान हितैषी होने की बात करते हैं। औद्योगिक विकास के लिए अगर कहीं जमीन का अधिग्रहण हो रहा है और किसान उसका विरोध कर रहे हैं तो उनके साथ खड़े होने के लिए राजनीतिक दलों से लेकर तमाम संगठनों के कार्यकर्ता भी आ जाते हैं। लेकिन वास्तव में वे किसानों के हितैषी नहीं, बल्कि प्रबंधात्म लोग हैं।
अब पैमाना योग्यता नहीं
शिक्षा में आई गिरावट और शिक्षक एवं छात्रों के बीच मौजूदा दौर में सम्बन्ध पर दिल्ली विश्वविद्द्यालय के सेवानिवृत प्रोफ़ेसर मुरली मनोहर प्रसाद सिंह से बातचीत पर आधारित आलेख.
शिक्षक दिवस सिर्फ भारत में नहीं मनाया जाता, बल्कि दुनियाभर में मनाया जाता है। हां, दुनिया के विभिन्न देशों में इसकी तिथि अलग-अलग जरूर है। हमारे यहां हर साल यह पांच सितंबर को मनाया जाता है। देश के पहले उप राष्ट्रपति व दूसरे राष्ट्रपति डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन के जन्मदिन पर इसे मनाने की परंपरा है, जिनकी गिनती महान दार्शनिक व शिक्षाविदों में होती है। समाज निर्माण में शिक्षकों की अहम भूमिका अतीत काल से है। आज भी शिक्षकों की भूमिका का महत्व कम नहीं हुआ है। हां, परिस्थितियां और हालात कुछ ऐसे हो गए हैं, जिसके कारण गुरु-शिष्य संबंध परंपरागत नहीं रह गए हैं। उसमें काफी बदलाव आया है।
यह सच है कि शिक्षकों और छात्रों का संबंध पहले जसा नहीं रह गया है। छात्रों के मन में शिक्षकों के लिए पहले जसा सम्मान नहीं रह गया है और न ही अब शिक्षक छात्र हितों की बात करते हैं। शिक्षक हों या छात्र, अपने-अपने हितों की बात ही उठाते हैं। इसकी बहुत बड़ी वजह यह है कि शिक्षकों की जो भर्ती हो रही है, उसका एकमात्र पैमाना योग्यता नहीं रह गया है। शिक्षकों की नियुक्ति अब जोड़तोड़ और तिकड़मों से होने लगी है। हालांकि सभी नियुक्तियों का आधार यही नहीं होता, लेकिन ज्यादातर भर्तियां इसी तरीके से होती हैं। ऐसे में वे लोग, जिनके पास सिर्फ योग्यता है, कहीं पीछे छूट जाते हैं। इसका असर स्कूल-कॉलेजों में पढ़ाई और शिक्षक-छात्र संबंध पर भी होता है। जाहिर है, जब शिक्षक ही योग्य नहीं होंगे तो वे छात्रों को कैसे उचित शिक्षा दे पाएंगे? इससे शिक्षा का स्तर तो गिरेगा ही। और अगर शिक्षक उचित शिक्षा नहीं दे रहे, तो छात्र उनका सम्मान क्यों करने लगे?
ऐसे में अगर छात्र अपनी राह और शिक्षक अपनी राह चल रहे हैं, तो इसमें आश्चर्यजनक कुछ भी नहीं। हां, योग्य शिक्षकों और छात्रों के बीच संबंध आज भी बेहतर होते हैं। लेकिन विडंबना यह है कि योग्य युवा शिक्षा के क्षेत्र में आना ही नहीं चाहते। इसका बड़ा कारण शिक्षकों का वेतन कम होना है। वैश्वीकरण और उदारीकरण के युग में जहां बहुराष्ट्रीय कंपनियां प्रोफेशनल्स को मोटा वेतन दे रहे हैं, वहां भला कौन युवा कम वेतन लेकर शिक्षा को अपने कॅरियर के रूप में अपनाना चाहेगा?
शिक्षा के गिरते स्तर के लिए सरकारी नीतियां भी कम जिम्मेदार नहीं हैं। सरकार साक्षरता दर बढ़ाने पर जोर दे रही है, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा पर नहीं। ब्रेन ड्रेन को रोकने के लिए सरकार कोई कदम नहीं उठा रही। युवाओं का एक बड़ा वर्ग देश में शिक्षा प्राप्त करके नौकरी के लिए विदेशों का रुख कर लेता है, क्योंकि वहां उन्हें वेतन और अन्य सुविधाएं यहां से बेहतर मिलती हैं। आखिर यही चीजें उन्हें यहां क्यों नहीं दी जा सकती? मैनेजमेंट गुरू और कुकुरमुत्ते की तरह उग आए संस्थानों और इसके शिक्षकों के संबंध में केवल इतना कहा जा सकता है कि ये दुकानें हैं, वास्तविक गुरु नहीं। गुरु-शिष्य परंपरा से इनका कोई लेना-देना नहीं है।
जहां तक आज छात्राओं द्वारा शिक्षकों पर लगाए जाने वाले यौन शोषण के आरोप की बात है तो यह निश्चित रूप से चिंताजनक है। ऐसे आरोप शोधार्थी छात्राओं के संदर्भ में अधिक प्रासंगिक हैं और निश्चित रूप से गुरु-शिष्य संबंध को लज्जित करते हैं। कई बार इसके लिए दोनों पक्ष जिम्मेदार होते हैं। बहुत से मामले ऐसे भी होते हैं, जहां छात्राएं नैतिकता को परे रखकर अपने कॅरियर को ध्यान में रखते हुए शिक्षकों के आगे समर्पण कर देती हैं। लेकिन मूल रूप से इसके लिए वे नियम जिम्मेदार हैं, जिसकी वजह से शिक्षकों को ऐसा अधिकार मिल जाता है कि वे छात्राओं को अपने इशारे पर नचा सकें। अगर छात्राओं को यह भरोसा हो जाए कि शिक्षक उनका कुछ नहीं बिगाड़ सकते तो वे कभी उनके आगे समर्पण नहीं करेंगी। इस संबंध में नियम व नीतियां बदलने की जरूरत है।
शिक्षक दिवस सिर्फ भारत में नहीं मनाया जाता, बल्कि दुनियाभर में मनाया जाता है। हां, दुनिया के विभिन्न देशों में इसकी तिथि अलग-अलग जरूर है। हमारे यहां हर साल यह पांच सितंबर को मनाया जाता है। देश के पहले उप राष्ट्रपति व दूसरे राष्ट्रपति डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन के जन्मदिन पर इसे मनाने की परंपरा है, जिनकी गिनती महान दार्शनिक व शिक्षाविदों में होती है। समाज निर्माण में शिक्षकों की अहम भूमिका अतीत काल से है। आज भी शिक्षकों की भूमिका का महत्व कम नहीं हुआ है। हां, परिस्थितियां और हालात कुछ ऐसे हो गए हैं, जिसके कारण गुरु-शिष्य संबंध परंपरागत नहीं रह गए हैं। उसमें काफी बदलाव आया है।
यह सच है कि शिक्षकों और छात्रों का संबंध पहले जसा नहीं रह गया है। छात्रों के मन में शिक्षकों के लिए पहले जसा सम्मान नहीं रह गया है और न ही अब शिक्षक छात्र हितों की बात करते हैं। शिक्षक हों या छात्र, अपने-अपने हितों की बात ही उठाते हैं। इसकी बहुत बड़ी वजह यह है कि शिक्षकों की जो भर्ती हो रही है, उसका एकमात्र पैमाना योग्यता नहीं रह गया है। शिक्षकों की नियुक्ति अब जोड़तोड़ और तिकड़मों से होने लगी है। हालांकि सभी नियुक्तियों का आधार यही नहीं होता, लेकिन ज्यादातर भर्तियां इसी तरीके से होती हैं। ऐसे में वे लोग, जिनके पास सिर्फ योग्यता है, कहीं पीछे छूट जाते हैं। इसका असर स्कूल-कॉलेजों में पढ़ाई और शिक्षक-छात्र संबंध पर भी होता है। जाहिर है, जब शिक्षक ही योग्य नहीं होंगे तो वे छात्रों को कैसे उचित शिक्षा दे पाएंगे? इससे शिक्षा का स्तर तो गिरेगा ही। और अगर शिक्षक उचित शिक्षा नहीं दे रहे, तो छात्र उनका सम्मान क्यों करने लगे?
ऐसे में अगर छात्र अपनी राह और शिक्षक अपनी राह चल रहे हैं, तो इसमें आश्चर्यजनक कुछ भी नहीं। हां, योग्य शिक्षकों और छात्रों के बीच संबंध आज भी बेहतर होते हैं। लेकिन विडंबना यह है कि योग्य युवा शिक्षा के क्षेत्र में आना ही नहीं चाहते। इसका बड़ा कारण शिक्षकों का वेतन कम होना है। वैश्वीकरण और उदारीकरण के युग में जहां बहुराष्ट्रीय कंपनियां प्रोफेशनल्स को मोटा वेतन दे रहे हैं, वहां भला कौन युवा कम वेतन लेकर शिक्षा को अपने कॅरियर के रूप में अपनाना चाहेगा?
शिक्षा के गिरते स्तर के लिए सरकारी नीतियां भी कम जिम्मेदार नहीं हैं। सरकार साक्षरता दर बढ़ाने पर जोर दे रही है, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा पर नहीं। ब्रेन ड्रेन को रोकने के लिए सरकार कोई कदम नहीं उठा रही। युवाओं का एक बड़ा वर्ग देश में शिक्षा प्राप्त करके नौकरी के लिए विदेशों का रुख कर लेता है, क्योंकि वहां उन्हें वेतन और अन्य सुविधाएं यहां से बेहतर मिलती हैं। आखिर यही चीजें उन्हें यहां क्यों नहीं दी जा सकती? मैनेजमेंट गुरू और कुकुरमुत्ते की तरह उग आए संस्थानों और इसके शिक्षकों के संबंध में केवल इतना कहा जा सकता है कि ये दुकानें हैं, वास्तविक गुरु नहीं। गुरु-शिष्य परंपरा से इनका कोई लेना-देना नहीं है।
जहां तक आज छात्राओं द्वारा शिक्षकों पर लगाए जाने वाले यौन शोषण के आरोप की बात है तो यह निश्चित रूप से चिंताजनक है। ऐसे आरोप शोधार्थी छात्राओं के संदर्भ में अधिक प्रासंगिक हैं और निश्चित रूप से गुरु-शिष्य संबंध को लज्जित करते हैं। कई बार इसके लिए दोनों पक्ष जिम्मेदार होते हैं। बहुत से मामले ऐसे भी होते हैं, जहां छात्राएं नैतिकता को परे रखकर अपने कॅरियर को ध्यान में रखते हुए शिक्षकों के आगे समर्पण कर देती हैं। लेकिन मूल रूप से इसके लिए वे नियम जिम्मेदार हैं, जिसकी वजह से शिक्षकों को ऐसा अधिकार मिल जाता है कि वे छात्राओं को अपने इशारे पर नचा सकें। अगर छात्राओं को यह भरोसा हो जाए कि शिक्षक उनका कुछ नहीं बिगाड़ सकते तो वे कभी उनके आगे समर्पण नहीं करेंगी। इस संबंध में नियम व नीतियां बदलने की जरूरत है।
हरेराम जयराम
पहले किसी उद्योग लगाने के लिए पर्यावरण मंत्रालय की स्वीकृति लेना महज औपचारिकता हुआ करती थी। लेकिन अब ऐसा नहीं है। वेदांता जसी कंपनी को उड़ीसा में बॉक्साइट खनन की अनुमति देने से पर्यावरण मंत्रालय ने मना कर दिया। इस हिसाब से देखें तो शेषन के पहले तक जो चुनाव आयोग की हैसियत हुआ करती थी, वही पर्यावरण मंत्रालय की जयराम रमेश के मंत्री बनने से पहले थी। माना जाता है कि रमेश को इस प्रकार के बड़े फैसले लेने की ताकत ऊपर से मिली है। राहुल गांधी के वे करीबी हैं, यह कोई दबी-छिपी बात नहीं है। रमेश की खास बात और भी है। वे काफी पढ़े-लिखे जहीन व्यक्ति हैं। अपनी बात खुलकर कहते हैं। इससे कई बार पार्टी और सरकार को भी बगलें झांकने पर मजबूर कर देते हैं। अपनी ही सरकार के दूसरे मंत्रालयों को भी पर्यावरण के मानकों पर कसते रहते हैं। फिर भी सबसे खास यही है कि वे एक ऐसे पर्यावरण मंत्री हैं, जिनके फैसलों से पर्यावरणवादी और प्रेमी गदगद हैं।
पर्यावरण मंत्रालय की छवि वैसी पहले कभी नहीं थी, जसी आज है। औद्योगिक इकाइयों को किसी परियोजना के लिए पर्यावरण मंत्रालय से स्वीकृति लेने में कभी कोई खास दिक्कत पेश नहीं आई। लेकिन हाल के दिनों में हालात बदले हैं। पर्यावरण मंत्रालय पहले की तुलना में अधिक सक्रिय नजर आता है और यह सब संभव हुआ है पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश के कारण। हालांकि उनकी गिनती नव पूंजीवाद और उदारीकरण की नीति के समर्थकों में होती रही है। लेकिन हाल के दिनों में उन्होंने कुछ ऐसे फैसले लिए हैं, जो उनकी आर्थिक विचारधारा के ठीक उलट है; चाहे वह बीटी बैंगन को कृषि जगत में नहीं उतारने का फैसला हो या निजी कंपनी वेदांता को उड़ीसा में बॉक्साइट खनन की अनुमति नहीं देने का फैसला। इन फैसलों से उन्होंने भले ही औद्योगिक घरानों को नाराज किया हो और लोग उन्हें विकास विरोधी कह रहे हों, लेकिन पर्यावरण प्रेमी उनके इन निर्णयों पर वाह-वाह कर रहे हैं।
वेदांता, जो उड़ीस के लांजीगढ़ में बड़े पैमाने पर बॉक्साइट खनन करना चाहती थी, को इसकी अनुमति न देने का आधार वन संरक्षण अधिनियम, 1980 और वन अधिकार अधिनियम, 2006 को बनाया गया। पर्यावरण मंत्री ने दो टूक कहा कि सरकार अधिनियम की शर्तो का उल्लंघन बिल्कुल बर्दाश्त नहीं करेगी और न ही विकास के लिए आदिवासियों के हितों से समझौता किया जाएगा। उल्लेखनीय है कि इलाके की डोंगरिया कोंड जनजाति ने वेदांता की परियोजना के संदर्भ में अपने हितों को लेकर सवाल उठाए थे। जयराम रमेश के इस फैसले को कांग्रेस महासचिव राहुल गांधी का भी समर्थन मिला, जब उन्होंने उड़ीसा के कालाहांडी में आदिवासियों के बीच जाकर उनके हितों की बात उठाई और कहा कि वे दिल्ली में उनके सिपाही हैं उनकी बातें उठाने के लिए। उनके कुछ अन्य फैसलों को भी राहुल गांधी का समर्थन मिल चुका है, जिनमें नदियों को जोड़ने की महत्वाकांक्षी परियोजना का विरोध भी शामिल है, जिसका समर्थन स्वयं देश के तकनीक प्रेमी राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम और सुप्रीम कोर्ट ने भी किया था। राहुल गांधी के समर्थन से खासतौर पर कांग्रेसी खेमे में उनका पक्ष अक्सर मजबूत हुआ और उन पर उंगली उठाने वाले शांत हो गए।
लेकिन यह भी सच है कि अपने विवादास्पद बयानों से उन्होंने कई बार पार्टी और सरकार के लिए मुश्किल खड़ी की। कुछ माह पहले चीन को लेकर दिए गए उनके बयान ने भी सरकार के लिए सिरदर्दी पैदा की। उन्होंने देश के गृह व रक्षा मंत्रालय को चीन के लिए डरावना बताया और यहां तक कह दिया कि भारतीय क्षेत्र में चीनी व्यवसायियों को सरकार अक्सर संदेह की नजर से देखती है। उनके इस बयान से सरकार की खूब किरकिरी हुई। विपक्ष ने उन्हें चीन का एजेंट तक कह दिया और कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी इस कदर नाराज हुईं कि उन्होंने जयराम से मिलने तक से इनकार कर दिया। एक अन्य समारोह में देश के शहरों को दुनिया के सबसे गंदे शहरों में शुमार करते हुए उन्होंने कहा कि यदि गंदगी के लिए नोबल पुरस्कार दिया जाए तो यह भारत को ही मिलेगा। भोपाल में यूनियन कार्बाइड कंपनी से हुए गैस रिसाव के पीड़ितों को उन्होंने कंपनी परिसर में पहुंचकर और वहां से हाथ में मिट्टी उठाकर यह कहते हुए नाराज कर दिया कि देखिये, यह मेरे हाथ में है, फिर भी मैं जिंदा हूं। भोपाल में ही इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ फॉरेस्ट मैनेजमेंट के दीक्षांत समारोह में गाउन को उपनिवेशवाद का प्रतीक बताते हुए उन्होंने इसे उतार फेंका और सादे लिबास में डिग्री लेने और देने की वकालत की। उनका यह बयान भी सुर्खियों में रहा। खासकर छात्रों की तालियां उन्हें खूब मिली।
कोपेनहेगन में जयवायु परिवर्तन पर सम्मेलन के दौरान उनके इस बयान ने प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह तक को नाराज कर दिया कि भारत चीन के बराबर कार्बन उत्सर्जन कम करेगा। हालांकि बाद में उन्होंने यह कहकर सरकार और विपक्ष की नाराजगी कम करने का प्रयास किया कि भारत कार्बन उत्सर्जन पर किसी कानूनी बाध्यता को नहीं मानेगा। इससे पहले यूपीए सरकार के पहले कार्यकाल में प्रधानमंत्री के ब्राजील दौरे से ठीक पहले उन्होंने यह कहकर विदेश मंत्रालय के लिए मुश्किल खड़ी कर दी कि आखिर ऐसे देश से व्यापार समझौते की क्या उपयोगिता है, जो हमसे काफी दूर है। उन्होंने यह कहकर नर्मदा नदी पर महेश्वर बांध के निर्माण के लिए चल रहा काम भी रोक दिया कि विस्थापित परिवारों का पुनर्वास नहीं हुआ है। फिर, सड़क एवं परिवहन मंत्री कमलनाथ के साथ उनके विरोध जगजाहिर रहे हैं। कमलनाथ अक्सर उन पर पर्यावरण क्लीयरेंस को आधार बनाकर सड़क परियोजनाओं में अड़ंगा डालने का आरोप लगाते रहे हैं। इसी तरह, कभी कोका कोला कंपनी के पर्यावरण संबंधी सलाहकार बोर्ड में शामिल रहे रमेश ने यह जानने के बाद अपने पद से इस्तीफा दे दिया कि यह पर्यावरण के लिए खतरनाक है और इससे पानी की समस्या पैदा हो सकती है।
कुल मिलाकार, उनकी कार्यशैली अक्सर मंत्रियों की तरह न होकर कार्यकर्ताओं और संगठनों की तरह रही है। यही वजह है कि मैगसाय साय पुरस्कार विजेता संदीप पांडे उनके बारे में कहते हैं कि देश को पहली बार स्वतंत्र सोच वाला पर्यावरण मंत्री मिला है या यूं कह लें कि पहली बार कोई पर्यावरणवादी मंत्री बना है। बीटी बैंगन को कृषि जगत में उतारने का फैसला लेने से पहले उन्होंने दफ्तर में बैठकर अधिकारियों से मंत्रणा करने से बेहतर देशभर का भ्रमण करना और किसानों, कृषि वैज्ञानिकों व पर्यावरणविदों की राय लेना समझा। परंपरा से हटकर सात शहरों- कोलकाता, भुवनेश्वर, अहमदाबाद, हैदराबाद, बेंगलुरु, नागपुर, चंडीगढ़- का भ्रमण करने और वहां जनसभाओं के माध्यम से लोगों का मत जानने के बाद उन्होंने फौरी तौर पर इसे कृषि जगत में उतारने पर रोक लगा दी। हालांकि कभी इसका विरोध करने वालों को उन्होंने ‘मानसिक इलाजज् की सलाह तक दे डाली थी। पर्यावरण चिंताओं का हवाला देकर उन्होंने महाराष्ट्र के नवी मुंबई में बन रहे राज्य के दूसरे हवाई अड्डे पर भी सवाल उठाए थे और कहा था कि इससे चार सौ एकड़ में फैले वन क्षेत्र व मैंग्रोव पर असर पड़ेगा, जो मुंबई के सम्रु तटों की रक्षा करते हैं। यह रमेश की आपत्ति ही थी कि नागरिक उड्डयन मंत्री प्रफुल्ल पटेल ने कहा कि हवाई अड्डे के निर्माणर में पर्यावरण सुरक्षा का पूरा खयाल रखा जाएगा। अब प्रस्तावित हवाई अड्डे का दायरा कम करने से लेकर इसे दूसरी जगह स्थानांतरित करने तक पर विचार किया जा रहा है।
कर्नाटक के चिकमगलूर में नौ अप्रैल, 1954 को जन्मे रमेश तकनीक व आधुनिकीकरण के हिमायती हैं। इसकी वजह शायद उनकी शिक्षा-दीक्षा और पारिवारिक पृष्ठभूमि रही है। उनके पिता प्रो. सीके रमेश आईआईटी, बॉम्बे के सिविल इंजीनियरिंग डिपार्टमेंट के विभागाध्यक्ष थे। तीसरी से पांचवीं की स्कूली शिक्षा उन्होंने रांची के सेंट जेवियर स्कूल से पूरी की। 1970 में उन्होंने आईआईटी, बॉम्बे में दाखिला लिया और वहां से मैकेनिकल इंजीनियरिंग में बीटेक किया। 1975-77 में उन्होंने अमेरिका के कार्नेगी यूनिवर्सिटी से प्रबंधन और लोक नीति में मास्टर डिग्री ली। पढ़ाई खत्म करने के बाद वे विश्व बैंक से जुड़े। दिसंबर, 1979 में वे भारत लौटे और यहां योजना आयोग सहित कें्र सरकार के उद्योग व आर्थिक विभाग से संबंधित विभिन्न संस्थाओं में महत्वपूर्ण जिम्मेदारी निभाई। वे 1991 में पीवी नरसिम्हा राव सरकार में वित्त मंत्री मनमोहन सिंह के सलाहकार भी रहे। वे राजीव गांधी के भी करीबी रहे। 1989 में जब कांग्रेस चुनाव हार हार गई थी, तो कांग्रेस के पुनर्जीवन के लिए उन्होंने राजीव गांधी के सलाहकार की भूमिका निभाई थी। आज उसी भूमिका में वे सोनिया गांधी के साथ हैं। रमेश आंध्र प्रदेश से राज्य सभा के सदस्य हैं। उनकी मातृभाषा तेलुगू है। कर्नाटक संगीत और भरतनाट्यम में उन्हें खासी दिलचस्पी है। वे चीन के साथ भारत के अच्छे संबंधों के पैरोकार रहे हैं।
पर्यावरण से उन्हें नौ साल की उम्र से ही प्यार है, जब उन्होंने ब्रिटिश लेखक एडवर्ड प्रिचार्ड गी की पुस्तक ‘द वाइल्ड लाइफ ऑफ इंडियाज् पढ़ी। पर्यावरण से इस विशेष लगाव की वजह से ही शायद यूपीए सरकार के दूसरे कार्यकाल में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और यूपीए अध्यक्ष सोनिया गांधी ने वन एवं पर्यावरण मंत्रालय की जिम्मेदारी के लिए उन्हें चुना। वे राष्ट्रीय सलाहकार परिषद के सदस्य भी हैं। इससे पहले की यूपीए सरकार में वे वाणिज्य व उद्योग मंत्रालय में राज्य मंत्री रह चुके हैं।
पर्यावरण मंत्रालय की छवि वैसी पहले कभी नहीं थी, जसी आज है। औद्योगिक इकाइयों को किसी परियोजना के लिए पर्यावरण मंत्रालय से स्वीकृति लेने में कभी कोई खास दिक्कत पेश नहीं आई। लेकिन हाल के दिनों में हालात बदले हैं। पर्यावरण मंत्रालय पहले की तुलना में अधिक सक्रिय नजर आता है और यह सब संभव हुआ है पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश के कारण। हालांकि उनकी गिनती नव पूंजीवाद और उदारीकरण की नीति के समर्थकों में होती रही है। लेकिन हाल के दिनों में उन्होंने कुछ ऐसे फैसले लिए हैं, जो उनकी आर्थिक विचारधारा के ठीक उलट है; चाहे वह बीटी बैंगन को कृषि जगत में नहीं उतारने का फैसला हो या निजी कंपनी वेदांता को उड़ीसा में बॉक्साइट खनन की अनुमति नहीं देने का फैसला। इन फैसलों से उन्होंने भले ही औद्योगिक घरानों को नाराज किया हो और लोग उन्हें विकास विरोधी कह रहे हों, लेकिन पर्यावरण प्रेमी उनके इन निर्णयों पर वाह-वाह कर रहे हैं।
वेदांता, जो उड़ीस के लांजीगढ़ में बड़े पैमाने पर बॉक्साइट खनन करना चाहती थी, को इसकी अनुमति न देने का आधार वन संरक्षण अधिनियम, 1980 और वन अधिकार अधिनियम, 2006 को बनाया गया। पर्यावरण मंत्री ने दो टूक कहा कि सरकार अधिनियम की शर्तो का उल्लंघन बिल्कुल बर्दाश्त नहीं करेगी और न ही विकास के लिए आदिवासियों के हितों से समझौता किया जाएगा। उल्लेखनीय है कि इलाके की डोंगरिया कोंड जनजाति ने वेदांता की परियोजना के संदर्भ में अपने हितों को लेकर सवाल उठाए थे। जयराम रमेश के इस फैसले को कांग्रेस महासचिव राहुल गांधी का भी समर्थन मिला, जब उन्होंने उड़ीसा के कालाहांडी में आदिवासियों के बीच जाकर उनके हितों की बात उठाई और कहा कि वे दिल्ली में उनके सिपाही हैं उनकी बातें उठाने के लिए। उनके कुछ अन्य फैसलों को भी राहुल गांधी का समर्थन मिल चुका है, जिनमें नदियों को जोड़ने की महत्वाकांक्षी परियोजना का विरोध भी शामिल है, जिसका समर्थन स्वयं देश के तकनीक प्रेमी राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम और सुप्रीम कोर्ट ने भी किया था। राहुल गांधी के समर्थन से खासतौर पर कांग्रेसी खेमे में उनका पक्ष अक्सर मजबूत हुआ और उन पर उंगली उठाने वाले शांत हो गए।
लेकिन यह भी सच है कि अपने विवादास्पद बयानों से उन्होंने कई बार पार्टी और सरकार के लिए मुश्किल खड़ी की। कुछ माह पहले चीन को लेकर दिए गए उनके बयान ने भी सरकार के लिए सिरदर्दी पैदा की। उन्होंने देश के गृह व रक्षा मंत्रालय को चीन के लिए डरावना बताया और यहां तक कह दिया कि भारतीय क्षेत्र में चीनी व्यवसायियों को सरकार अक्सर संदेह की नजर से देखती है। उनके इस बयान से सरकार की खूब किरकिरी हुई। विपक्ष ने उन्हें चीन का एजेंट तक कह दिया और कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी इस कदर नाराज हुईं कि उन्होंने जयराम से मिलने तक से इनकार कर दिया। एक अन्य समारोह में देश के शहरों को दुनिया के सबसे गंदे शहरों में शुमार करते हुए उन्होंने कहा कि यदि गंदगी के लिए नोबल पुरस्कार दिया जाए तो यह भारत को ही मिलेगा। भोपाल में यूनियन कार्बाइड कंपनी से हुए गैस रिसाव के पीड़ितों को उन्होंने कंपनी परिसर में पहुंचकर और वहां से हाथ में मिट्टी उठाकर यह कहते हुए नाराज कर दिया कि देखिये, यह मेरे हाथ में है, फिर भी मैं जिंदा हूं। भोपाल में ही इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ फॉरेस्ट मैनेजमेंट के दीक्षांत समारोह में गाउन को उपनिवेशवाद का प्रतीक बताते हुए उन्होंने इसे उतार फेंका और सादे लिबास में डिग्री लेने और देने की वकालत की। उनका यह बयान भी सुर्खियों में रहा। खासकर छात्रों की तालियां उन्हें खूब मिली।
कोपेनहेगन में जयवायु परिवर्तन पर सम्मेलन के दौरान उनके इस बयान ने प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह तक को नाराज कर दिया कि भारत चीन के बराबर कार्बन उत्सर्जन कम करेगा। हालांकि बाद में उन्होंने यह कहकर सरकार और विपक्ष की नाराजगी कम करने का प्रयास किया कि भारत कार्बन उत्सर्जन पर किसी कानूनी बाध्यता को नहीं मानेगा। इससे पहले यूपीए सरकार के पहले कार्यकाल में प्रधानमंत्री के ब्राजील दौरे से ठीक पहले उन्होंने यह कहकर विदेश मंत्रालय के लिए मुश्किल खड़ी कर दी कि आखिर ऐसे देश से व्यापार समझौते की क्या उपयोगिता है, जो हमसे काफी दूर है। उन्होंने यह कहकर नर्मदा नदी पर महेश्वर बांध के निर्माण के लिए चल रहा काम भी रोक दिया कि विस्थापित परिवारों का पुनर्वास नहीं हुआ है। फिर, सड़क एवं परिवहन मंत्री कमलनाथ के साथ उनके विरोध जगजाहिर रहे हैं। कमलनाथ अक्सर उन पर पर्यावरण क्लीयरेंस को आधार बनाकर सड़क परियोजनाओं में अड़ंगा डालने का आरोप लगाते रहे हैं। इसी तरह, कभी कोका कोला कंपनी के पर्यावरण संबंधी सलाहकार बोर्ड में शामिल रहे रमेश ने यह जानने के बाद अपने पद से इस्तीफा दे दिया कि यह पर्यावरण के लिए खतरनाक है और इससे पानी की समस्या पैदा हो सकती है।
कुल मिलाकार, उनकी कार्यशैली अक्सर मंत्रियों की तरह न होकर कार्यकर्ताओं और संगठनों की तरह रही है। यही वजह है कि मैगसाय साय पुरस्कार विजेता संदीप पांडे उनके बारे में कहते हैं कि देश को पहली बार स्वतंत्र सोच वाला पर्यावरण मंत्री मिला है या यूं कह लें कि पहली बार कोई पर्यावरणवादी मंत्री बना है। बीटी बैंगन को कृषि जगत में उतारने का फैसला लेने से पहले उन्होंने दफ्तर में बैठकर अधिकारियों से मंत्रणा करने से बेहतर देशभर का भ्रमण करना और किसानों, कृषि वैज्ञानिकों व पर्यावरणविदों की राय लेना समझा। परंपरा से हटकर सात शहरों- कोलकाता, भुवनेश्वर, अहमदाबाद, हैदराबाद, बेंगलुरु, नागपुर, चंडीगढ़- का भ्रमण करने और वहां जनसभाओं के माध्यम से लोगों का मत जानने के बाद उन्होंने फौरी तौर पर इसे कृषि जगत में उतारने पर रोक लगा दी। हालांकि कभी इसका विरोध करने वालों को उन्होंने ‘मानसिक इलाजज् की सलाह तक दे डाली थी। पर्यावरण चिंताओं का हवाला देकर उन्होंने महाराष्ट्र के नवी मुंबई में बन रहे राज्य के दूसरे हवाई अड्डे पर भी सवाल उठाए थे और कहा था कि इससे चार सौ एकड़ में फैले वन क्षेत्र व मैंग्रोव पर असर पड़ेगा, जो मुंबई के सम्रु तटों की रक्षा करते हैं। यह रमेश की आपत्ति ही थी कि नागरिक उड्डयन मंत्री प्रफुल्ल पटेल ने कहा कि हवाई अड्डे के निर्माणर में पर्यावरण सुरक्षा का पूरा खयाल रखा जाएगा। अब प्रस्तावित हवाई अड्डे का दायरा कम करने से लेकर इसे दूसरी जगह स्थानांतरित करने तक पर विचार किया जा रहा है।
कर्नाटक के चिकमगलूर में नौ अप्रैल, 1954 को जन्मे रमेश तकनीक व आधुनिकीकरण के हिमायती हैं। इसकी वजह शायद उनकी शिक्षा-दीक्षा और पारिवारिक पृष्ठभूमि रही है। उनके पिता प्रो. सीके रमेश आईआईटी, बॉम्बे के सिविल इंजीनियरिंग डिपार्टमेंट के विभागाध्यक्ष थे। तीसरी से पांचवीं की स्कूली शिक्षा उन्होंने रांची के सेंट जेवियर स्कूल से पूरी की। 1970 में उन्होंने आईआईटी, बॉम्बे में दाखिला लिया और वहां से मैकेनिकल इंजीनियरिंग में बीटेक किया। 1975-77 में उन्होंने अमेरिका के कार्नेगी यूनिवर्सिटी से प्रबंधन और लोक नीति में मास्टर डिग्री ली। पढ़ाई खत्म करने के बाद वे विश्व बैंक से जुड़े। दिसंबर, 1979 में वे भारत लौटे और यहां योजना आयोग सहित कें्र सरकार के उद्योग व आर्थिक विभाग से संबंधित विभिन्न संस्थाओं में महत्वपूर्ण जिम्मेदारी निभाई। वे 1991 में पीवी नरसिम्हा राव सरकार में वित्त मंत्री मनमोहन सिंह के सलाहकार भी रहे। वे राजीव गांधी के भी करीबी रहे। 1989 में जब कांग्रेस चुनाव हार हार गई थी, तो कांग्रेस के पुनर्जीवन के लिए उन्होंने राजीव गांधी के सलाहकार की भूमिका निभाई थी। आज उसी भूमिका में वे सोनिया गांधी के साथ हैं। रमेश आंध्र प्रदेश से राज्य सभा के सदस्य हैं। उनकी मातृभाषा तेलुगू है। कर्नाटक संगीत और भरतनाट्यम में उन्हें खासी दिलचस्पी है। वे चीन के साथ भारत के अच्छे संबंधों के पैरोकार रहे हैं।
पर्यावरण से उन्हें नौ साल की उम्र से ही प्यार है, जब उन्होंने ब्रिटिश लेखक एडवर्ड प्रिचार्ड गी की पुस्तक ‘द वाइल्ड लाइफ ऑफ इंडियाज् पढ़ी। पर्यावरण से इस विशेष लगाव की वजह से ही शायद यूपीए सरकार के दूसरे कार्यकाल में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और यूपीए अध्यक्ष सोनिया गांधी ने वन एवं पर्यावरण मंत्रालय की जिम्मेदारी के लिए उन्हें चुना। वे राष्ट्रीय सलाहकार परिषद के सदस्य भी हैं। इससे पहले की यूपीए सरकार में वे वाणिज्य व उद्योग मंत्रालय में राज्य मंत्री रह चुके हैं।
मंगलवार, 24 अगस्त 2010
कैमरावाली वयरावाला
अनठानवे साल की होमाय वयरावाला ने सत्तर के दशक में कैमरा अलग धर दिया। पति और फिर बेटे की मृत्यु के बाद उन्हें लगा कि जीवन की सारी अच्छी चीजें चली गईं। इन उम्दा चीजों में वह जमाना भी था, जिसमें वे असीम ऊर्जा और गहरी रचनात्मकता के साथ सक्रिय थीं। चाहे वे साथ काम करने वाले हों या प्रतिस्पर्धी फोटोग्राफर या उस वक्त के, जिसे नेहरू युग के तौर पर जाना जाता है, नेता हों। इसलिए जब जमाना उनके लायक या वे जमाने के लायक नहीं रह गईं तो अपनी सहज शालीनता के साथ ‘रंगमंचज् से हट गईं। वयरावाला कभी बहुत नामवर नहीं रहीं और कोई ऐसी चाहत उन्हें कभी उकसा नहीं पाई। वे हमेशा एक ‘स्मरणीय पलज् का इंतजार करती रहतीं, जबकि और लोग रूटीन शॉट लेकर चले जाते। आज वयरावाला के अनेकानेक चित्र हमारे बेहद उथल-पुथल दौर की विरासत की तरह हैं। खुद होमाय भी बीते दौर के संघर्ष, लगन और जीवट के साथ उस मासूम और पारदर्शी समय की जीवंत मिसाल की तरह हमारे बीच मौजूद हैं।
सच, तस्वीरें बोलती हैं। बयां कर देती हैं हजारों शब्द। लेकिन कमाल सिर्फ तस्वीरों का नहीं होता। असली कलाकारी तो तस्वीर लेने वाले की होती है, जो क्लिक सही समय पर करता है। हां, सारा माजरा बस एक क्लिक का होता है, लेकिन यह कब हो; इसी से तय होती है तस्वीरों की किस्मत। एक सही क्लिक ही तय करता है कि कौन सी तस्वीर ऐतिहासिक होगी और कौन साधारण, जो समय के साथ भुला दी जाएगी। होमाय वयरावाला एक ऐसी ही फोटोग्राफर हैं। देश की पहली महिला फोटोग्राफर, जिन्होंने अपने कैमरे में कैद किए कई ऐतिहासिक पल। उनकी खिंची तस्वीरें आज धरोधर हैं। तस्वीरें आजादी के पहले की भी और उसके बाद की भी। ये गवाह हैं कई ऐतिहासिक घटनाओं की, स्वाधीनता आंदोलन के दौरान आने वाले बदलावों की और उसके बाद की परिस्थितियों की भी। यानी वयरावाला की तस्वीरों से हमने परतंत्र भारत व उस वक्त की गतिविधियों को भी देखा और आजाद भारत को भी देखा। हालांकि उनकी तस्वीरें 1970 तक के दशक को ही दर्शाती हैं, क्योंकि उसके बाद उन्होंने लेंस से दूरी बना ली।
‘डालडा 13ज् के नाम से मशहूर वयरावाला की गिनती कभी हाई-प्रोफाइल फोटो जर्नलिस्ट के रूप में नहीं हुई। उन्होंने खुद को इससे बचाए रखा। वे सिर्फ अपने काम से मतलब रखती थीं। अनावश्यक मुस्कराना उनकी फितरत में नहीं था। साड़ी पहने और कंधे पर कैमरा टांगे वे साइकिल से निकल पड़ती थीं दिल्ली नापने। हालांकि फोटोग्राफी का कॅरियर उन्होंने बंबई से शुरू किया था, लेकिन दिल्ली उनकी कार्यस्थली रही। ‘डालडा 13ज्, वयरावाला का यह नाम क्यों पड़ा, इसके पीछे भी एक रोचक किस्सा है। उनका जन्म 1913 में हुआ, पति मानेकशॉ से 13 वर्ष की उम्र में ही मिलीं और दिल्ली में जब उन्होंने अपनी कार ली तो उसका नंबर उन्हें ‘डीएलडी 13ज् मिला। बस यहीं से लोग, खासकर सहकर्मी उन्हें ‘डालडा 13ज् के नाम से बुलाने लगे।
बॉम्बे में 1930 के दशक में बतौर फ्रीलांसर उन्होंने काम करना शुरू किया। पहली बार 1938 में उनकी आठ तस्वीरें द बॉम्बे क्रॉनिकल में छपीं और हर तस्वीर के लिए उन्हें एक-एक रुपया मिला। द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान ‘इलस्ट्रेटेड वीकलीज् के लिए उन्होंने युद्धकालीन परिस्थितियों की तस्वीरें खींची, जिसमें अस्पताल, फायर ब्रिगेड, एंबुलेंस वर्कर्स, राहतकर्मियों की तस्वीरें थीं, जो किसी भी आपातकालीन परिस्थिति के लिए तैयार थे। वर्सोवा के सम्रुी तटों की तस्वीरें लेकर उन्होंने मछुआरों के जीवन को दर्शाने का प्रयत्न किया। उनका लेंस कपड़ा उद्योग में काम करने वाली महिलाओं की ओर भी घूमा। इसके बाद उन्होंने दिल्ली का रुख किया। 1942 में वे पति के साथ दिल्ली आ गईं और तब से यहां के राजनीतिक गलियारों में उनका कैमरा खूब घूमा। उन्होंने देर रात होने वाली हाई-प्रोफाइल लोगों की पार्टी भी कवर की। फोटोग्राफी के लिए पंडित नेहरू उनके प्रिय चरित्र रहे। वे याद करती हैं, ‘फोटोग्राफरों के लिए नेहरू का रवैया बेहद सहयोगात्मक था। यहां तक कि ऊंघते हुए भी उनकी तस्वीर ली जा सकती थी और जसे ही क्लिक की आवाज से उनकी आखें खुलतीं, वे एक प्यारी सी मुस्कराहट देते थे।ज्
वयरावाला की कालजयी तस्वीरें द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान के हालात दर्शाती हैं, तो आजाद भारत की नई उम्मीदों और आशाओं को भी। दुनिया ने उनकी तस्वीरों के माध्यम से आजाद भारत के नए रूप को भी देखा और स्वाधीनता के उत्सव को भी। स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान की कई गतिविधियों को उन्होंने अपने कैमरे में कैद किया। उन दिनों जब स्वतंत्रता आंदोलन चरम पर था, लार्ड माउंटबेटन के भारत आगमन; आजादी से ठीक पहले विभाजन को लेकर हुई कांग्रेस की बैठक और आजादी के ठीक बाद 16 अगस्त, 1947 को लाल किले की प्राचीर से पंडित जवाहर लाल नेहरू का देश को संबोधन सहित कुछ ऐसी तस्वीरें हैं, जो अमूल्य निधि हैं। हालांकि उन्हें आधी रात को हुई उस बैठक में जाने की अनुमति नहीं मिली थी, जिसमें आजादी का फैसला किया गया था। तत्कालीन नौकरशाहों ने उन्हें यह अनुमति इसलिए नहीं दी, क्योंकि तब वे ब्रिटिश कंपनी के लिए काम करती थीं।
महारानी एजिलाबेथ द्वितीय और उनके पति ड्यूक एडिनबर्ग से लेकर हो ची मिन्ह, हेलेन केलर, एडमंड हिलेरी तक के भारत आगमन को उन्होंने अपने कैमरे में कैद किया। उनकी पसंदीदा तस्वीर विजयलक्ष्मी पंडित और जवाहलाल नेहरू की वह तस्वीर है, जो उन्होंने दिल्ली एयरपोर्ट पर खींची थी। पंडित नेहरू सोवियत संघ से लौट रहीं भारत की राजदूत व अपनी बहन की अगवानी के लिए खुद वहां पहुंचे थे। वयरावाला ने दोनों भाई-बहनों के गले मिलते ही ‘क्लिकज् किया। उस तस्वीर की जीवंतता आज भी देखते ही बनती है। उनकी वह तस्वीर भी कालजयी है, जिसमें पंडित नेहरू भारत में ब्रिटिश उच्चायुक्त की पत्नी साइमन के होठों के बीच दबी सिगरेट जला रहे हैं। यह तस्वीर उन्होंने लंदन से दिल्ली आ रहे विमान में खीचीं थी। लेकिन बतौर फोटोग्राफर उन्हें आज तक इस बात का अफसोस है कि 30 जनवरी, 1948 को जब महात्मा गांधी की हत्या हुई थी, वे प्रार्थना सभा में मौजूद नहीं थीं। हालांकि बाद में उन्होंने घटना के बाद उमड़े जनसैलाब और अन्य हालातों की तस्वीरें खींचीं, लेकिन प्रार्थना सभा में अनुपस्थिति पर उनका फोटोग्राफर मन आज भी अफसोस जाहिर करता है।
उन्होंने आजादी के आंदोलन में कभी शिरकत नहीं की और इसकी वजह वे अपने काम की व्यस्तता को बताती हैं। आजादी के बारे में उनका कहना है कि यह हमें बड़ी आसानी से मिल गई। कुछ ही लोगों ने इसके लिए बलिदान दिया और तकलीफें सही, जबकि आजादी का सुख सबको मिला। मूलत: गुजरात की रहने वाली वयरावाला का जन्म 1913 में गुजरात के एक छोटे से शहर नवसारी में हुआ था। पिता उर्दू-पारसी थियेटर के कलाकार थे। वहीं शुरुआती शिक्षा हुई। लेकिन आगे की पढ़ाई के लिए घरवालों ने उन्हें बॉम्बे भेज दिया। वहां बॉम्बे विश्वविद्यालय से उन्होंने स्नातक की डिग्री ली और जेजे स्कूल ऑफ आर्ट्स से कला में डिप्लोमा लिया। यहीं उनकी मुलाकात मानेकशॉ से हुई और बाद में दोनों विवाह बंधन में बंध गए। फोटोग्राफी के क्षेत्र में वे पति मानेकशॉ के कारण ही आईं। फोटोग्राफी की नई-नई परवान चढ़ती विधा में मानेकशॉ की दिलचस्पी थी। वयरावाला कहती हैं, ‘अगर मानेक आर्किटेक्ट होते तो मैं भी आर्किटेक्ट ही होती।ज् लेकिन 1969 में मानेकशॉ की मौत के बाद ये सारी चीजें उनके लिए निर्थक हो गई। बकौल, वयरावाला उनके दौर की सभी अच्छी चीजें खत्म हो चुकी थीं। अच्छे नेताओं का निधन हो चुका था या जा वहां से जा चुके थे। पति की मौत के बाद वयरावाला भी बेटे के साथ पिलानी चली गईं, जो वहीं बिरला इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी में केमिकल इंजीनियरिंग पढ़ाते थे। ग्यारह वर्ष वहां रहने के बाद मां-बेटे बडोदरा चले गए। लेकिन कुछ ही सालों बाद 1989 में बेटे की भी कैंसर से मौत हो गई, जिसके बाद वे नितांत अकेली रह गईं। उनके अनुसार यहीं उनका जीवन खत्म हो गया।
सच, तस्वीरें बोलती हैं। बयां कर देती हैं हजारों शब्द। लेकिन कमाल सिर्फ तस्वीरों का नहीं होता। असली कलाकारी तो तस्वीर लेने वाले की होती है, जो क्लिक सही समय पर करता है। हां, सारा माजरा बस एक क्लिक का होता है, लेकिन यह कब हो; इसी से तय होती है तस्वीरों की किस्मत। एक सही क्लिक ही तय करता है कि कौन सी तस्वीर ऐतिहासिक होगी और कौन साधारण, जो समय के साथ भुला दी जाएगी। होमाय वयरावाला एक ऐसी ही फोटोग्राफर हैं। देश की पहली महिला फोटोग्राफर, जिन्होंने अपने कैमरे में कैद किए कई ऐतिहासिक पल। उनकी खिंची तस्वीरें आज धरोधर हैं। तस्वीरें आजादी के पहले की भी और उसके बाद की भी। ये गवाह हैं कई ऐतिहासिक घटनाओं की, स्वाधीनता आंदोलन के दौरान आने वाले बदलावों की और उसके बाद की परिस्थितियों की भी। यानी वयरावाला की तस्वीरों से हमने परतंत्र भारत व उस वक्त की गतिविधियों को भी देखा और आजाद भारत को भी देखा। हालांकि उनकी तस्वीरें 1970 तक के दशक को ही दर्शाती हैं, क्योंकि उसके बाद उन्होंने लेंस से दूरी बना ली।
‘डालडा 13ज् के नाम से मशहूर वयरावाला की गिनती कभी हाई-प्रोफाइल फोटो जर्नलिस्ट के रूप में नहीं हुई। उन्होंने खुद को इससे बचाए रखा। वे सिर्फ अपने काम से मतलब रखती थीं। अनावश्यक मुस्कराना उनकी फितरत में नहीं था। साड़ी पहने और कंधे पर कैमरा टांगे वे साइकिल से निकल पड़ती थीं दिल्ली नापने। हालांकि फोटोग्राफी का कॅरियर उन्होंने बंबई से शुरू किया था, लेकिन दिल्ली उनकी कार्यस्थली रही। ‘डालडा 13ज्, वयरावाला का यह नाम क्यों पड़ा, इसके पीछे भी एक रोचक किस्सा है। उनका जन्म 1913 में हुआ, पति मानेकशॉ से 13 वर्ष की उम्र में ही मिलीं और दिल्ली में जब उन्होंने अपनी कार ली तो उसका नंबर उन्हें ‘डीएलडी 13ज् मिला। बस यहीं से लोग, खासकर सहकर्मी उन्हें ‘डालडा 13ज् के नाम से बुलाने लगे।
बॉम्बे में 1930 के दशक में बतौर फ्रीलांसर उन्होंने काम करना शुरू किया। पहली बार 1938 में उनकी आठ तस्वीरें द बॉम्बे क्रॉनिकल में छपीं और हर तस्वीर के लिए उन्हें एक-एक रुपया मिला। द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान ‘इलस्ट्रेटेड वीकलीज् के लिए उन्होंने युद्धकालीन परिस्थितियों की तस्वीरें खींची, जिसमें अस्पताल, फायर ब्रिगेड, एंबुलेंस वर्कर्स, राहतकर्मियों की तस्वीरें थीं, जो किसी भी आपातकालीन परिस्थिति के लिए तैयार थे। वर्सोवा के सम्रुी तटों की तस्वीरें लेकर उन्होंने मछुआरों के जीवन को दर्शाने का प्रयत्न किया। उनका लेंस कपड़ा उद्योग में काम करने वाली महिलाओं की ओर भी घूमा। इसके बाद उन्होंने दिल्ली का रुख किया। 1942 में वे पति के साथ दिल्ली आ गईं और तब से यहां के राजनीतिक गलियारों में उनका कैमरा खूब घूमा। उन्होंने देर रात होने वाली हाई-प्रोफाइल लोगों की पार्टी भी कवर की। फोटोग्राफी के लिए पंडित नेहरू उनके प्रिय चरित्र रहे। वे याद करती हैं, ‘फोटोग्राफरों के लिए नेहरू का रवैया बेहद सहयोगात्मक था। यहां तक कि ऊंघते हुए भी उनकी तस्वीर ली जा सकती थी और जसे ही क्लिक की आवाज से उनकी आखें खुलतीं, वे एक प्यारी सी मुस्कराहट देते थे।ज्
वयरावाला की कालजयी तस्वीरें द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान के हालात दर्शाती हैं, तो आजाद भारत की नई उम्मीदों और आशाओं को भी। दुनिया ने उनकी तस्वीरों के माध्यम से आजाद भारत के नए रूप को भी देखा और स्वाधीनता के उत्सव को भी। स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान की कई गतिविधियों को उन्होंने अपने कैमरे में कैद किया। उन दिनों जब स्वतंत्रता आंदोलन चरम पर था, लार्ड माउंटबेटन के भारत आगमन; आजादी से ठीक पहले विभाजन को लेकर हुई कांग्रेस की बैठक और आजादी के ठीक बाद 16 अगस्त, 1947 को लाल किले की प्राचीर से पंडित जवाहर लाल नेहरू का देश को संबोधन सहित कुछ ऐसी तस्वीरें हैं, जो अमूल्य निधि हैं। हालांकि उन्हें आधी रात को हुई उस बैठक में जाने की अनुमति नहीं मिली थी, जिसमें आजादी का फैसला किया गया था। तत्कालीन नौकरशाहों ने उन्हें यह अनुमति इसलिए नहीं दी, क्योंकि तब वे ब्रिटिश कंपनी के लिए काम करती थीं।
महारानी एजिलाबेथ द्वितीय और उनके पति ड्यूक एडिनबर्ग से लेकर हो ची मिन्ह, हेलेन केलर, एडमंड हिलेरी तक के भारत आगमन को उन्होंने अपने कैमरे में कैद किया। उनकी पसंदीदा तस्वीर विजयलक्ष्मी पंडित और जवाहलाल नेहरू की वह तस्वीर है, जो उन्होंने दिल्ली एयरपोर्ट पर खींची थी। पंडित नेहरू सोवियत संघ से लौट रहीं भारत की राजदूत व अपनी बहन की अगवानी के लिए खुद वहां पहुंचे थे। वयरावाला ने दोनों भाई-बहनों के गले मिलते ही ‘क्लिकज् किया। उस तस्वीर की जीवंतता आज भी देखते ही बनती है। उनकी वह तस्वीर भी कालजयी है, जिसमें पंडित नेहरू भारत में ब्रिटिश उच्चायुक्त की पत्नी साइमन के होठों के बीच दबी सिगरेट जला रहे हैं। यह तस्वीर उन्होंने लंदन से दिल्ली आ रहे विमान में खीचीं थी। लेकिन बतौर फोटोग्राफर उन्हें आज तक इस बात का अफसोस है कि 30 जनवरी, 1948 को जब महात्मा गांधी की हत्या हुई थी, वे प्रार्थना सभा में मौजूद नहीं थीं। हालांकि बाद में उन्होंने घटना के बाद उमड़े जनसैलाब और अन्य हालातों की तस्वीरें खींचीं, लेकिन प्रार्थना सभा में अनुपस्थिति पर उनका फोटोग्राफर मन आज भी अफसोस जाहिर करता है।
उन्होंने आजादी के आंदोलन में कभी शिरकत नहीं की और इसकी वजह वे अपने काम की व्यस्तता को बताती हैं। आजादी के बारे में उनका कहना है कि यह हमें बड़ी आसानी से मिल गई। कुछ ही लोगों ने इसके लिए बलिदान दिया और तकलीफें सही, जबकि आजादी का सुख सबको मिला। मूलत: गुजरात की रहने वाली वयरावाला का जन्म 1913 में गुजरात के एक छोटे से शहर नवसारी में हुआ था। पिता उर्दू-पारसी थियेटर के कलाकार थे। वहीं शुरुआती शिक्षा हुई। लेकिन आगे की पढ़ाई के लिए घरवालों ने उन्हें बॉम्बे भेज दिया। वहां बॉम्बे विश्वविद्यालय से उन्होंने स्नातक की डिग्री ली और जेजे स्कूल ऑफ आर्ट्स से कला में डिप्लोमा लिया। यहीं उनकी मुलाकात मानेकशॉ से हुई और बाद में दोनों विवाह बंधन में बंध गए। फोटोग्राफी के क्षेत्र में वे पति मानेकशॉ के कारण ही आईं। फोटोग्राफी की नई-नई परवान चढ़ती विधा में मानेकशॉ की दिलचस्पी थी। वयरावाला कहती हैं, ‘अगर मानेक आर्किटेक्ट होते तो मैं भी आर्किटेक्ट ही होती।ज् लेकिन 1969 में मानेकशॉ की मौत के बाद ये सारी चीजें उनके लिए निर्थक हो गई। बकौल, वयरावाला उनके दौर की सभी अच्छी चीजें खत्म हो चुकी थीं। अच्छे नेताओं का निधन हो चुका था या जा वहां से जा चुके थे। पति की मौत के बाद वयरावाला भी बेटे के साथ पिलानी चली गईं, जो वहीं बिरला इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी में केमिकल इंजीनियरिंग पढ़ाते थे। ग्यारह वर्ष वहां रहने के बाद मां-बेटे बडोदरा चले गए। लेकिन कुछ ही सालों बाद 1989 में बेटे की भी कैंसर से मौत हो गई, जिसके बाद वे नितांत अकेली रह गईं। उनके अनुसार यहीं उनका जीवन खत्म हो गया।
लेबल:
तस्वीर,
फोटो जर्नलिस्ट,
मानेकशॉ,
होमाय वयरावाला
मंगलवार, 17 अगस्त 2010
दाग-दाग उजाला, हक अदा न हुआ
वरिष्ठ पत्रकार व चिंतक देवदत्त से बातचीत पर आधारित
फैज ने आजादी मिलने के वक्त ही कहा था कि ‘वह सुबह अभी नहीं आई।ज् अब हमें स्वतंत्र हुए तिरसठ साल हो गए हैं पर लगता यही है कि जिस आजादी के लिए लंबी लड़ाई लड़ी, जिन उद्देश्यों और सपनों के लिए लाखों-लाख लोगों ने कुर्बानियां दीं, वह आजादी अब भी लाहासिल ही है। देश में विकास बेशक हुआ। कई मामलों में आशातीत सफलता हमने पाई लेकिन फिर भी एक समतामूलक, सबको समान अवसरों वाला और सबके लिए जीवन के जरूरी संसाधन जुटाने वाला समाज हम नहीं बना पाए। समाज में हिंसा और विभाजन बढ़ा है। पैसे की ताकत का बोलबाला है। आम जन हाशिये पर है। लोक पर तंत्र हावी है और भ्रष्टाचार शिष्टाचार बन गया है। निश्चय ही स्वतंत्रता एक महान उपलब्धि है, लेकिन उसके उद्देश्य अभी आधे-अधूरे हैं। हमने विकास का लाभोन्मुख मॉडल चुना है जनोन्मुख नहीं।
बेशक आजादी हमें 1947 में मिली और जब भी हम आजादी के आंदोलन को याद करते हैं तो महात्मा गांधी, जवाहरलाल नेहरू, सुभाष चं्र बोस, भगत सिंह, रासबिहारी बोस जसे आंदोलनकारियों की छवि बरबस ही सामने आ जाती है। लेकिन हम अक्सर उन लोगों को भूल जाते हैं, जिन्होंने आजादी के आंदोलन में सबसे अधिक और शुरुआती दिनों में योगदान दिया। सच कहें तो आजादी की लड़ाई उन्हीं लोगों ने शुरू की, जिसे बाद में गांधी, नेहरू जसे लोगों ने आगे बढ़ाया। ये हैं देश के दूर-दराज इलाकों में रहने वाले आदिवासी, जो 18वीं सदी से ही ब्रिटिश शासन के खिलाफ लड़ाई लड़ रहे थे। लेकिन आजादी के आंदोलन को याद करते वक्त हम अक्सर उन्हें भुला देते हैं। खासकर देश का अभिजात्य वर्ग उनके योगदान के प्रति आंखें मूंदे रहता है। इस प्रवृत्ति को दूर करने की जरूरत है। दूसरी महत्वपूर्ण बात यह कि आजादी निस्संदेह एक महान उपलब्धि है और 1947 से हर साल 15 अगस्त को हम इसका जश्न मनाते हैं। यह सही भी है, लेकिन इस जश्न और जलसे में एक उदासी भी होनी चाहिए। स्वतंत्रता के ठीक बाद हुई हिंसा को लेकर, दंगों को लेकर, जिसमें सैकड़ों लोग मारे गए और बेघर हुए। यह विडंबना ही है कि आजाद भारत में 1947 के बाद जब भी कहीं कोई दंगा-फसाद या हिंसा हुई, उसकी जांच के लिए आयोग बने। लेकिन आजादी के ठीक बाद की हिंसा की जांच के लिए अब तक कोई आयोग नहीं बनाया गया। साफ है कि हमारे हुक्मरानों ने उस हिंसक वारदात से कुछ भी सीखने की जरूरत महसूस नहीं की, जबकि हमें उससे सबक लेने की जरूरत है। वह घटना भारतीय जनमानस के एक पक्ष को भी उजागर करती है। आज समाज में बढ़ रही हिंसक प्रवृत्तियों को समझने के लिए भी उसे जानना और समझना जरूरी है।
यह भी मेरी समझ से परे है कि हर साल आजादी का जश्न लाल किले में ही क्यों मनाया जाता है? क्यों प्रधानमंत्री वहीं से देश की जनता को संबोधित करते हैं, जबकि यह आजादी की लड़ाई लड़ने वाले लोगों का नहीं, बल्कि मुगल सल्तनत का प्रतीक है। इसी तरह गणतंत्र दिवस समारोह के लिए इंडिया गेट को चुना गया, जो ब्रिटिश शासन का प्रतीक है। साफ है कि जिसके खून-पसीने से हमें आजादी मिली, हमने उसे ही भुला दिया। जलसे और जश्न के लिए हमें किसी ऐसी जगह को चुनना चाहिए था, जो लोगों की लड़ाई से जुड़ा था।
जहां तक उन सपनों के पूरे होने की बात है, जो आजादी की लड़ाई लड़ने वाले लोगों ने देखे थे, तो कहा जा सकता है कि वे अब तक पूरे नहीं हुए हैं। स्वतंत्रता, समानता और लोकतंत्र के लिए जो लड़ाई लड़ी गई थी, वह अब तक लोगों को नहीं मिली है। आदिवासियों को, जिन्होंने आजादी की लड़ाई शुरू की, अब तक व्यवस्था में हिस्सेदारी नहीं मिली और न ही हक। मौजूदा समय में नक्सली आंदोलन की यह एक बहुत बड़ी वजह है। कहा जा सकता है कि अंग्रेजों के शासनकाल में आदिवासियों का जो आंदोलन थम गया था, आज एक बार फिर शुरू हो चुका है। यानी आदिवासियों के लिए जो स्थिति ब्रिटिश शासनकाल में थी, वही आजाद भारत में भी है और इसलिए एक बार फिर उन्होंने शासन के खिलाफ बगावत कर दी है।
हरिजनों, दलितों का उत्थान हुआ है, लेकिन इस दिशा में और काम करने की जरूरत है। गांधी ने स्वतंत्र भारत में छुआछूत और जातिवाद की कल्पना नहीं की थी। इन्हें दूर करने के लिए उन्होंने अथक प्रयास भी किए। उन्होंने हिंदुओं को छुआछूत से दूर रहने की नसीहत दी तो दलितों को भी अपना समाज सुधारने के लिए कहा था। लेकिन आजादी के छह दशक बाद भी देश इन कुरीतियों के जंजाल से पूरी तरह नहीं छूटा है। छुआछूत जसी कुरीतियां कम हुई हैं, पर समाप्त नहीं। बड़े शहरों में इनका असर भले देखने को न मिले, लेकिन छोटे शहरों, कस्बों और दूरदराज के इलाकों में ये कुरीतियां अब भी देखी जा सकती हैं। जाति का बंधन भी आसानी से टूटता नहीं दिखता। कई राजनीतिक दलों की राजनीति का आधार ही जाति है। यानी सुधार की जो प्रक्रिया गांधी ने शुरू की थी, वह अधूरी रह गई है और दुखद यह कि सरकार इसके प्रति अपनी जिम्मेदारी नहीं समझती।
अगर लोकतंत्र की बात की जाए तो गांधी ने जिस लोकतांत्रिक व्यवस्था की कल्पना की थी, वह केवल पंचायती राज संस्थाओं में परिलक्षित हुआ। वह भी काफी देर से। यहां लोगों को दिया गया मताधिकार निश्चय ही एक ऐतिहासिक फैसला था। ऐसे में जबकि दुनियाभर में मताधिकार के लिए लोगों ने लंबी लड़ाई लड़ी, भारत में वयस्कों को यह अधिकार रातों-रात मिल गया।
आजादी के तुरंत बाद इसकी घोषणा हुई। लेकिन लोकतंत्र का जो स्वरूप यहां स्थापित हुआ, वह प्रतिनिध्यात्मक बनकर रह गया, उदारवादी नहीं। इस कड़ी में आपातकाल को नहीं भूला जा सकता। यह भारतीय इतिहास का बहुत बड़ा और दुखद अध्याय है, जिसमें लोकतांत्रिक व्यवस्था की धज्जियां उड़ा दी गईं। लेकिन अब तक किसी सरकार ने उससे सबक सीखने की जरूरत महसूस नहीं की। भारतीय इतिहास के उस काले अध्याय से सबक लेकर लोकतांत्रिक व्यवस्था को मजबूत बनाने की जरूरत है।
भूख आज भी एक बड़ी समस्या है। लेकिन सरकारी नीतियों का फोकस भुखमरी को दूर करने पर नहीं है। देश के करीब 47 प्रतिशत लोग कुपोषण के शिकार हैं। गरीबी से लोगों को निजात नहीं मिल रही। यानी जनता की समस्याएं जस की तस हैं। 1990-91 में वित्त मंत्री रहते हुए मनमोहन सिंह ने आर्थिक उदारीकरण की जो प्रक्रिया शुरू की थी, वह लाभोन्मुखी तो है, लेकिन जनोन्मुखी नहीं। इस व्यवस्था में सारा ध्यान उत्पादन बढ़ाने पर दिया जा रहा है, उसके समुचित वितरण पर नहीं। यही वजह है कि इस नीति से भले ही देश की आर्थिक विकास दर कई गुना बढ़ जाए, लेकिन जनता को इसका सीधा लाभ मिलता नहीं दिखाई दे रहा। जनता के एक बड़े वर्ग का गरीबी रेखा के नीचे होना सरकारी नीति की विफलता का ही प्रमाण है।
सभी चित्र गूगल से साभार. रेखाचित्र आज समाज दैनिक से साभार.
फैज ने आजादी मिलने के वक्त ही कहा था कि ‘वह सुबह अभी नहीं आई।ज् अब हमें स्वतंत्र हुए तिरसठ साल हो गए हैं पर लगता यही है कि जिस आजादी के लिए लंबी लड़ाई लड़ी, जिन उद्देश्यों और सपनों के लिए लाखों-लाख लोगों ने कुर्बानियां दीं, वह आजादी अब भी लाहासिल ही है। देश में विकास बेशक हुआ। कई मामलों में आशातीत सफलता हमने पाई लेकिन फिर भी एक समतामूलक, सबको समान अवसरों वाला और सबके लिए जीवन के जरूरी संसाधन जुटाने वाला समाज हम नहीं बना पाए। समाज में हिंसा और विभाजन बढ़ा है। पैसे की ताकत का बोलबाला है। आम जन हाशिये पर है। लोक पर तंत्र हावी है और भ्रष्टाचार शिष्टाचार बन गया है। निश्चय ही स्वतंत्रता एक महान उपलब्धि है, लेकिन उसके उद्देश्य अभी आधे-अधूरे हैं। हमने विकास का लाभोन्मुख मॉडल चुना है जनोन्मुख नहीं।
बेशक आजादी हमें 1947 में मिली और जब भी हम आजादी के आंदोलन को याद करते हैं तो महात्मा गांधी, जवाहरलाल नेहरू, सुभाष चं्र बोस, भगत सिंह, रासबिहारी बोस जसे आंदोलनकारियों की छवि बरबस ही सामने आ जाती है। लेकिन हम अक्सर उन लोगों को भूल जाते हैं, जिन्होंने आजादी के आंदोलन में सबसे अधिक और शुरुआती दिनों में योगदान दिया। सच कहें तो आजादी की लड़ाई उन्हीं लोगों ने शुरू की, जिसे बाद में गांधी, नेहरू जसे लोगों ने आगे बढ़ाया। ये हैं देश के दूर-दराज इलाकों में रहने वाले आदिवासी, जो 18वीं सदी से ही ब्रिटिश शासन के खिलाफ लड़ाई लड़ रहे थे। लेकिन आजादी के आंदोलन को याद करते वक्त हम अक्सर उन्हें भुला देते हैं। खासकर देश का अभिजात्य वर्ग उनके योगदान के प्रति आंखें मूंदे रहता है। इस प्रवृत्ति को दूर करने की जरूरत है। दूसरी महत्वपूर्ण बात यह कि आजादी निस्संदेह एक महान उपलब्धि है और 1947 से हर साल 15 अगस्त को हम इसका जश्न मनाते हैं। यह सही भी है, लेकिन इस जश्न और जलसे में एक उदासी भी होनी चाहिए। स्वतंत्रता के ठीक बाद हुई हिंसा को लेकर, दंगों को लेकर, जिसमें सैकड़ों लोग मारे गए और बेघर हुए। यह विडंबना ही है कि आजाद भारत में 1947 के बाद जब भी कहीं कोई दंगा-फसाद या हिंसा हुई, उसकी जांच के लिए आयोग बने। लेकिन आजादी के ठीक बाद की हिंसा की जांच के लिए अब तक कोई आयोग नहीं बनाया गया। साफ है कि हमारे हुक्मरानों ने उस हिंसक वारदात से कुछ भी सीखने की जरूरत महसूस नहीं की, जबकि हमें उससे सबक लेने की जरूरत है। वह घटना भारतीय जनमानस के एक पक्ष को भी उजागर करती है। आज समाज में बढ़ रही हिंसक प्रवृत्तियों को समझने के लिए भी उसे जानना और समझना जरूरी है।
यह भी मेरी समझ से परे है कि हर साल आजादी का जश्न लाल किले में ही क्यों मनाया जाता है? क्यों प्रधानमंत्री वहीं से देश की जनता को संबोधित करते हैं, जबकि यह आजादी की लड़ाई लड़ने वाले लोगों का नहीं, बल्कि मुगल सल्तनत का प्रतीक है। इसी तरह गणतंत्र दिवस समारोह के लिए इंडिया गेट को चुना गया, जो ब्रिटिश शासन का प्रतीक है। साफ है कि जिसके खून-पसीने से हमें आजादी मिली, हमने उसे ही भुला दिया। जलसे और जश्न के लिए हमें किसी ऐसी जगह को चुनना चाहिए था, जो लोगों की लड़ाई से जुड़ा था।
जहां तक उन सपनों के पूरे होने की बात है, जो आजादी की लड़ाई लड़ने वाले लोगों ने देखे थे, तो कहा जा सकता है कि वे अब तक पूरे नहीं हुए हैं। स्वतंत्रता, समानता और लोकतंत्र के लिए जो लड़ाई लड़ी गई थी, वह अब तक लोगों को नहीं मिली है। आदिवासियों को, जिन्होंने आजादी की लड़ाई शुरू की, अब तक व्यवस्था में हिस्सेदारी नहीं मिली और न ही हक। मौजूदा समय में नक्सली आंदोलन की यह एक बहुत बड़ी वजह है। कहा जा सकता है कि अंग्रेजों के शासनकाल में आदिवासियों का जो आंदोलन थम गया था, आज एक बार फिर शुरू हो चुका है। यानी आदिवासियों के लिए जो स्थिति ब्रिटिश शासनकाल में थी, वही आजाद भारत में भी है और इसलिए एक बार फिर उन्होंने शासन के खिलाफ बगावत कर दी है।
हरिजनों, दलितों का उत्थान हुआ है, लेकिन इस दिशा में और काम करने की जरूरत है। गांधी ने स्वतंत्र भारत में छुआछूत और जातिवाद की कल्पना नहीं की थी। इन्हें दूर करने के लिए उन्होंने अथक प्रयास भी किए। उन्होंने हिंदुओं को छुआछूत से दूर रहने की नसीहत दी तो दलितों को भी अपना समाज सुधारने के लिए कहा था। लेकिन आजादी के छह दशक बाद भी देश इन कुरीतियों के जंजाल से पूरी तरह नहीं छूटा है। छुआछूत जसी कुरीतियां कम हुई हैं, पर समाप्त नहीं। बड़े शहरों में इनका असर भले देखने को न मिले, लेकिन छोटे शहरों, कस्बों और दूरदराज के इलाकों में ये कुरीतियां अब भी देखी जा सकती हैं। जाति का बंधन भी आसानी से टूटता नहीं दिखता। कई राजनीतिक दलों की राजनीति का आधार ही जाति है। यानी सुधार की जो प्रक्रिया गांधी ने शुरू की थी, वह अधूरी रह गई है और दुखद यह कि सरकार इसके प्रति अपनी जिम्मेदारी नहीं समझती।
अगर लोकतंत्र की बात की जाए तो गांधी ने जिस लोकतांत्रिक व्यवस्था की कल्पना की थी, वह केवल पंचायती राज संस्थाओं में परिलक्षित हुआ। वह भी काफी देर से। यहां लोगों को दिया गया मताधिकार निश्चय ही एक ऐतिहासिक फैसला था। ऐसे में जबकि दुनियाभर में मताधिकार के लिए लोगों ने लंबी लड़ाई लड़ी, भारत में वयस्कों को यह अधिकार रातों-रात मिल गया।
आजादी के तुरंत बाद इसकी घोषणा हुई। लेकिन लोकतंत्र का जो स्वरूप यहां स्थापित हुआ, वह प्रतिनिध्यात्मक बनकर रह गया, उदारवादी नहीं। इस कड़ी में आपातकाल को नहीं भूला जा सकता। यह भारतीय इतिहास का बहुत बड़ा और दुखद अध्याय है, जिसमें लोकतांत्रिक व्यवस्था की धज्जियां उड़ा दी गईं। लेकिन अब तक किसी सरकार ने उससे सबक सीखने की जरूरत महसूस नहीं की। भारतीय इतिहास के उस काले अध्याय से सबक लेकर लोकतांत्रिक व्यवस्था को मजबूत बनाने की जरूरत है।
भूख आज भी एक बड़ी समस्या है। लेकिन सरकारी नीतियों का फोकस भुखमरी को दूर करने पर नहीं है। देश के करीब 47 प्रतिशत लोग कुपोषण के शिकार हैं। गरीबी से लोगों को निजात नहीं मिल रही। यानी जनता की समस्याएं जस की तस हैं। 1990-91 में वित्त मंत्री रहते हुए मनमोहन सिंह ने आर्थिक उदारीकरण की जो प्रक्रिया शुरू की थी, वह लाभोन्मुखी तो है, लेकिन जनोन्मुखी नहीं। इस व्यवस्था में सारा ध्यान उत्पादन बढ़ाने पर दिया जा रहा है, उसके समुचित वितरण पर नहीं। यही वजह है कि इस नीति से भले ही देश की आर्थिक विकास दर कई गुना बढ़ जाए, लेकिन जनता को इसका सीधा लाभ मिलता नहीं दिखाई दे रहा। जनता के एक बड़े वर्ग का गरीबी रेखा के नीचे होना सरकारी नीति की विफलता का ही प्रमाण है।
सभी चित्र गूगल से साभार. रेखाचित्र आज समाज दैनिक से साभार.
लेबल:
15 अगस्त,
आजादी,
आदिवासी,
लोकतंत्र,
स्वतंत्रता
सोमवार, 19 जुलाई 2010
यह शाह बेशऊर
ऐसा पहले कभी नहीं हुआ, जसा शुक्रवार को इस्लामाबाद में हुआ। भारत-पाक विदेश मंत्री स्तर की बातचीत एक दिन पहले हुई और उसमें बातचीत जारी रखने की ही बात की गई। पर अगले दिन जब भारतीय विदेश मंत्री कृष्णा पाकिस्तान में ही थे, तब विदेश मंत्री शाह महमूद कुरैशी ने जो कुछ किया-कहा, वह राजनयिक मर्यादा और शोभनीयता की धज्जियां उड़ाने वाला था। उन्होंने भारत की मंशा पर शक जताया, कृष्णा पर व्यक्तिगत आक्षेप किए और कश्मीर पर भड़ास निकाली। फिर भी भारत ने शांत और वार्ता के मुतल्लिक सकारात्मक प्रतिक्रिया जताई। कुरैशी वैसे पढ़े-लिखे और नफीस पाक नेता हैं, पर पाक की राजनेताओं की ही शायद यह मजबूरी है कि उन्हें सेना निर्देशित करती है।
पाकिस्तान ने फिर झटक दिया दोस्ती का हाथ। फिर दोहराया गया आगरा प्रकरण। मजमून वही था, बस मंच और किरदार अलग-अलग थे। तब आगरा था मंच, जो इस बार बदलकर हो गया इस्लामाबाद। पाकिस्तान के मुख्य पात्र थे तत्कालीन सैन्य शासक परवेज मुशर्रफ तो इस बार यही भूमिका निभाई वहां के विदेश मंत्री शाह महमूद कुरैशी ने। तब भी भारत-पाकिस्तान के बीच बातचीत की प्रक्रिया फिर शुरू करने की कवायद हुई थी, जो कारगिल युद्ध के बाद स्थगित हो गई थी। इस बार भी वही कोशिश। फिर शुरू हो दोनों देशों के बीच बातचीत, जो बंद हो गई थी 2008 के मुंबई हमले के बाद। कोशिश यही कि मुद्दे सुलङो। दोस्तों की तरह रहें पड़ोसी, न कि दुश्मनों की तरह। हालांकि यह सब इतना आसान नहीं है, वरना आजादी से अब तक साठ दशक से भी अधिक वक्त बीत जाने पर भी दोनों देशों के संबंधों में यह तल्खी न होती। लेकिन अच्छे परिणाम की उम्मीद में कोशिशें हमेशा होती रही हैं और आगे भी होती रहेंगी।
वर्ष 2001 में भी ऐसी ही कोशिश हुई थी। कारगिल में घुसपैठ के बाद पाकिस्तान से रुकी बातचीत को फिर से पटरी पर लाने के लिए तब वहां के सैनिक शासक परवेज मुशर्रफ को न्यौता गया था। वे आए भी थे। आगरा में तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के साथ बातचीत होनी थी। हुई भी, लेकिन मुशर्रफ बीच में ही आगरा शिखर सम्मेलन से पाकिस्तान से रवाना हो गए, नाराज होकर। इस बार भी कुछ-कुछ वैसा ही हुआ। पाकिस्तान ने हमारे विदेश मंत्री को न्यौता दिया। एमएम कृष्णा अपने पाकिस्तानी समकक्ष शाह महमूद कुरैशी से मिलने इस्लामाबाद पहुंचे। लेकिन बात जब परिणाम की आई तो वह कुछ-कुछ पहले जसा था, यानी ढाक के वही तीन पात। फिर वही तल्खी, फिर वही तेवर। कृष्णा ने उठाया आतंकवाद का मुद्दा तो कुरैशी ने अलापा कश्मीर का राग। बात सिर्फ इतनी होती तो शायद उसे बिगड़ी हुई न कहते। लेकिन तेवर में तल्खी इतनी थी कि वे हमारे गृह सचिव जीके पिल्लै की तुलना हाफिज सईद से कर बैठे। वही सईद, जिस पर मुंबई हमले के षड्यंत्र और उसे अंजाम देने वालों को मदद देने का आरोप है।
बात यहां तक भी नहीं रुकी। अब बारी विदेश मंत्री कृष्णा की थी। बिना किसी लाग-लपेट उन्होंने कह दिया कि कृष्णा बातचीत के लिए पूरी तरह अधिकृत नहीं थे। वे बार-बार फोन पर बात करते रहे और दिल्ली से आदेश लेते रहे। उनकी यह टिप्पणी कहीं से भी सामान्य शिष्टाचार के अनुकूल नहीं थी और न ही पिल्लै पर दिया गया बयान। पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी के पूर्व प्रमुख हामिद गुल ने भी कहा कि बोलते-बोलते बहुत बोल गए कुरैशी। फिर उनके तेवर भी नहीं बता रहे थे कि वे बातचीत को आगे बढ़ाने के मूड में हैं। ऐसा लगा मानो सबकुछ तय था। पाकिस्तान के नीति-निर्माताओं ने काफी सोच-समझकर इस बातचीत का तानाबाना बुना था और इसके लिए सामने किया था कुरैशी को। उन्हें यकीन था कि इतने अपमान के बाद भारत खुद ही बातचीत से इनकार कर देगा और पाकिस्तान अमेरिका सहित दुनिया को यह संदेश दे सकेगा कि वह तो बातचीत के लिए तैयार है, पर भारत नहीं। कुरैशी ने यही किया। वे खरे उतरे अपने नीति-निर्धारकों की उम्मीद पर या यूं कहें कि बखूबी निभाई उन्होंने अपनी जिम्मेदारी। कश्मीर पर कुरैशी के अड़ियल रुख से भी साफ लगता है कि वे आईएसआई के प्रभाव में थे। कुल मिलाकर, कुरैशी बातचीत को पटरी से उतारने में कामयाब रहे।
अपने तल्ख तेवर और विदेश मंत्री कृष्णा को ‘घर बुलाकर अपमानित करनेज् के रवैये के कारण भले ही कुरैशी यहां खलनायक बन गए हैं, लेकिन पाकिस्तान में वे हीरो बनकर उभरे हैं। एक ऐसे नेता के रूप में जो अपने हितों को लेकर बहुत सजग है और कश्मीर पर कोई भी समझौता करने को तैयार नहीं है। पाकिस्तान में कुरैशी की छवि एक मंङो हुए राजनेता के रूप में है। अपनी पार्टी पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी (पीपीपी) में भी वे धाक रखते हैं। भुट्टो परिवार के बेहद करीबी माने जाते हैं। इतने कि दिसंबर, 2007 में बम हमले में पार्टी की नेता बेनजीर भुट्टो की मौत के बाद वे पीपीपी की ओर से प्रधानमंत्री पद के स्वाभाविक व मजबूत दावेदार माने जा रहे थे। हालांकि यहां बाजी मार गए युसुफ रजा गिलानी।
54 वर्षीय कुरैशी पाकिस्तान में सामंती व खानदानी परिवार से ताल्लुक रखते हैं। उनके पिता मकदूम सज्जाद हुसैन कुरैशी मुल्तान के प्रभावशाली सामंती परिवार से आते थे। 1980 के दशक में जनरल जिया-उल-हक के शासन के दौरान वे पंजाब के गवर्नर थे। हालांकि सामंती परिवार में पैदाइश व परवरिश के बावजूद कुरैशी प्रगतिशील सोच के लिए जाने जाते हैं। 22 जून, 1956 को कुरैशी का जन्म मुरी में हुआ था, जो रावलपिंडी जिले के अंतर्गत सब-डिविजन है। पाकिस्तान में मुरी की गिनती आज प्रसिद्ध हिल स्टेशन के रूप में होती है, जहां बड़ी संख्या में पर्यटक आते हैं। यह कभी कश्मीर के महाराजा की ग्रीष्मकालीन राजधानी हुआ करती थी। शुरुआती शिक्षा के बाद आगे की पढ़ाई के लिए कुरैशी लाहौर चले गए और वहां के एचेन्सन कॉलेज में दाखिला लिया। इसके बाद उन्होंने कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय से 1983 में कानून की डिग्री ली। लेकिन एक वकील के रूप में प्रैक्टिस करने के बजाय उन्होंने राजनीति का रुख किया। पारिवारिक पृष्ठभूमि यहां काम आई। 1985 में पहली बार वे पीपीपी के उम्मीदवार के रूप में पंजाब प्रांत की एसेम्बली के लिए चुने गए। 1993 तक वे पंजाब एसेम्बली के सदस्य रहे। इस बीच उन्हें पार्टी से नेशनल एसेम्बली के लिए टिकट मिला और वे जीत भी गए। हालांकि 1997 में वे नेशनल एसेम्बली का चुनाव पाकिस्तान मुस्लिम लीग (नवाज) के उम्मीदवार से हार गए। लेकिन नेशनल एसेम्बली के चुनाव में यह उनकी एकमात्र हार है। इसके अलावा उन्होंने नेशनल एसेम्बली का कोई चुनाव नहीं हारा और वे लगातार सदन के सदस्य हैं।
पाकिस्तान ने फिर झटक दिया दोस्ती का हाथ। फिर दोहराया गया आगरा प्रकरण। मजमून वही था, बस मंच और किरदार अलग-अलग थे। तब आगरा था मंच, जो इस बार बदलकर हो गया इस्लामाबाद। पाकिस्तान के मुख्य पात्र थे तत्कालीन सैन्य शासक परवेज मुशर्रफ तो इस बार यही भूमिका निभाई वहां के विदेश मंत्री शाह महमूद कुरैशी ने। तब भी भारत-पाकिस्तान के बीच बातचीत की प्रक्रिया फिर शुरू करने की कवायद हुई थी, जो कारगिल युद्ध के बाद स्थगित हो गई थी। इस बार भी वही कोशिश। फिर शुरू हो दोनों देशों के बीच बातचीत, जो बंद हो गई थी 2008 के मुंबई हमले के बाद। कोशिश यही कि मुद्दे सुलङो। दोस्तों की तरह रहें पड़ोसी, न कि दुश्मनों की तरह। हालांकि यह सब इतना आसान नहीं है, वरना आजादी से अब तक साठ दशक से भी अधिक वक्त बीत जाने पर भी दोनों देशों के संबंधों में यह तल्खी न होती। लेकिन अच्छे परिणाम की उम्मीद में कोशिशें हमेशा होती रही हैं और आगे भी होती रहेंगी।
वर्ष 2001 में भी ऐसी ही कोशिश हुई थी। कारगिल में घुसपैठ के बाद पाकिस्तान से रुकी बातचीत को फिर से पटरी पर लाने के लिए तब वहां के सैनिक शासक परवेज मुशर्रफ को न्यौता गया था। वे आए भी थे। आगरा में तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के साथ बातचीत होनी थी। हुई भी, लेकिन मुशर्रफ बीच में ही आगरा शिखर सम्मेलन से पाकिस्तान से रवाना हो गए, नाराज होकर। इस बार भी कुछ-कुछ वैसा ही हुआ। पाकिस्तान ने हमारे विदेश मंत्री को न्यौता दिया। एमएम कृष्णा अपने पाकिस्तानी समकक्ष शाह महमूद कुरैशी से मिलने इस्लामाबाद पहुंचे। लेकिन बात जब परिणाम की आई तो वह कुछ-कुछ पहले जसा था, यानी ढाक के वही तीन पात। फिर वही तल्खी, फिर वही तेवर। कृष्णा ने उठाया आतंकवाद का मुद्दा तो कुरैशी ने अलापा कश्मीर का राग। बात सिर्फ इतनी होती तो शायद उसे बिगड़ी हुई न कहते। लेकिन तेवर में तल्खी इतनी थी कि वे हमारे गृह सचिव जीके पिल्लै की तुलना हाफिज सईद से कर बैठे। वही सईद, जिस पर मुंबई हमले के षड्यंत्र और उसे अंजाम देने वालों को मदद देने का आरोप है।
बात यहां तक भी नहीं रुकी। अब बारी विदेश मंत्री कृष्णा की थी। बिना किसी लाग-लपेट उन्होंने कह दिया कि कृष्णा बातचीत के लिए पूरी तरह अधिकृत नहीं थे। वे बार-बार फोन पर बात करते रहे और दिल्ली से आदेश लेते रहे। उनकी यह टिप्पणी कहीं से भी सामान्य शिष्टाचार के अनुकूल नहीं थी और न ही पिल्लै पर दिया गया बयान। पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी के पूर्व प्रमुख हामिद गुल ने भी कहा कि बोलते-बोलते बहुत बोल गए कुरैशी। फिर उनके तेवर भी नहीं बता रहे थे कि वे बातचीत को आगे बढ़ाने के मूड में हैं। ऐसा लगा मानो सबकुछ तय था। पाकिस्तान के नीति-निर्माताओं ने काफी सोच-समझकर इस बातचीत का तानाबाना बुना था और इसके लिए सामने किया था कुरैशी को। उन्हें यकीन था कि इतने अपमान के बाद भारत खुद ही बातचीत से इनकार कर देगा और पाकिस्तान अमेरिका सहित दुनिया को यह संदेश दे सकेगा कि वह तो बातचीत के लिए तैयार है, पर भारत नहीं। कुरैशी ने यही किया। वे खरे उतरे अपने नीति-निर्धारकों की उम्मीद पर या यूं कहें कि बखूबी निभाई उन्होंने अपनी जिम्मेदारी। कश्मीर पर कुरैशी के अड़ियल रुख से भी साफ लगता है कि वे आईएसआई के प्रभाव में थे। कुल मिलाकर, कुरैशी बातचीत को पटरी से उतारने में कामयाब रहे।
अपने तल्ख तेवर और विदेश मंत्री कृष्णा को ‘घर बुलाकर अपमानित करनेज् के रवैये के कारण भले ही कुरैशी यहां खलनायक बन गए हैं, लेकिन पाकिस्तान में वे हीरो बनकर उभरे हैं। एक ऐसे नेता के रूप में जो अपने हितों को लेकर बहुत सजग है और कश्मीर पर कोई भी समझौता करने को तैयार नहीं है। पाकिस्तान में कुरैशी की छवि एक मंङो हुए राजनेता के रूप में है। अपनी पार्टी पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी (पीपीपी) में भी वे धाक रखते हैं। भुट्टो परिवार के बेहद करीबी माने जाते हैं। इतने कि दिसंबर, 2007 में बम हमले में पार्टी की नेता बेनजीर भुट्टो की मौत के बाद वे पीपीपी की ओर से प्रधानमंत्री पद के स्वाभाविक व मजबूत दावेदार माने जा रहे थे। हालांकि यहां बाजी मार गए युसुफ रजा गिलानी।
54 वर्षीय कुरैशी पाकिस्तान में सामंती व खानदानी परिवार से ताल्लुक रखते हैं। उनके पिता मकदूम सज्जाद हुसैन कुरैशी मुल्तान के प्रभावशाली सामंती परिवार से आते थे। 1980 के दशक में जनरल जिया-उल-हक के शासन के दौरान वे पंजाब के गवर्नर थे। हालांकि सामंती परिवार में पैदाइश व परवरिश के बावजूद कुरैशी प्रगतिशील सोच के लिए जाने जाते हैं। 22 जून, 1956 को कुरैशी का जन्म मुरी में हुआ था, जो रावलपिंडी जिले के अंतर्गत सब-डिविजन है। पाकिस्तान में मुरी की गिनती आज प्रसिद्ध हिल स्टेशन के रूप में होती है, जहां बड़ी संख्या में पर्यटक आते हैं। यह कभी कश्मीर के महाराजा की ग्रीष्मकालीन राजधानी हुआ करती थी। शुरुआती शिक्षा के बाद आगे की पढ़ाई के लिए कुरैशी लाहौर चले गए और वहां के एचेन्सन कॉलेज में दाखिला लिया। इसके बाद उन्होंने कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय से 1983 में कानून की डिग्री ली। लेकिन एक वकील के रूप में प्रैक्टिस करने के बजाय उन्होंने राजनीति का रुख किया। पारिवारिक पृष्ठभूमि यहां काम आई। 1985 में पहली बार वे पीपीपी के उम्मीदवार के रूप में पंजाब प्रांत की एसेम्बली के लिए चुने गए। 1993 तक वे पंजाब एसेम्बली के सदस्य रहे। इस बीच उन्हें पार्टी से नेशनल एसेम्बली के लिए टिकट मिला और वे जीत भी गए। हालांकि 1997 में वे नेशनल एसेम्बली का चुनाव पाकिस्तान मुस्लिम लीग (नवाज) के उम्मीदवार से हार गए। लेकिन नेशनल एसेम्बली के चुनाव में यह उनकी एकमात्र हार है। इसके अलावा उन्होंने नेशनल एसेम्बली का कोई चुनाव नहीं हारा और वे लगातार सदन के सदस्य हैं।
लेबल:
एमएम कृष्णा,
कारगिल,
पाकिस्तान,
पीपीपी,
शाह महमूद कुरैशी
सोमवार, 12 जुलाई 2010
उमर की कठिन डगर
कश्मीर के कई हिस्सों में हिंसक प्रदर्शन हुए। कई जगह कर्फ्यू लगा। सैनिक बलों की कार्रवाई में ग्यारह लोगों की जान गई। इनमें बच्चे भी हैं। दरअसल, बच्चे की मौत पर ही लोगों का गुस्सा सुरक्षा बलों पर फूटा। कश्मीर और कें्र दोनों ने इस सबके पीछे लश्कर-ए-तैयबा का हाथ बताया। कश्मीर कई दशकों से अशांत है। पिछले कुछ समय से वहां शांति का कमोबेश माहौल बना। चुनाव हुए और उमर अब्दुल्ला ने गद्दी संभाली। लेकिन उनके लिए यह कांटों का ताज ही साबित हो रहा है। लगातार वे मुसीबतों में घिरते रहे। ताजा संकट ज्यादा गंभीर है, क्योंकि उसमें आतंकवाद की छाया दिख रही है। संकटों ने छोटे अब्दुल्ला को अनुभवी बनाया है और संवेदनशीलता, शालीनता व गंभीरता जसे चारित्रिक गुण उनके मददगार रहे हैं।
जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री हैं उमर अब्दुल्ला। युवा और संयत व समझदार। संवेदनशील और जज्बाती भी। उनकी ये विशेषताएं नुमायां होती रहती हैं। ये कुछ ऐसे गुण हैं, जो सामान्यत: राजनीति में इस समय दुर्लभ हो रहे हैं। बड़े से बड़े संकट में भी उनका रवैया उतावलेपन का न होकर धीरता व गंभीरता होता है। इस मामले में अपने पिता से भी वे उलट हैं। फारूख अब्दुल्ला की छवि जहां बेफिक्र और बिंदास नेता की है, वहीं उमर कामकाजी और जिम्मेदार हैं। इस मामले में बहुत थोड़े युवा नेता भी उनकी तरह हैं। कश्मीर इन दिनों फिर अशांत है, लेकिन सारी उथल-पुथल के बावजूद उमर अपने इन्हीं विशेषताओं से उनसे निपट रहे हैं। न कोई अधीरता, न ही असंयत बयानबाजी। वे मौकों पर चुप्पी साधने की महत्ता भी जानते हैं।
इस संकटकाल में भी उन्होंने अभिभावकों से भावुक अपील की कि वे अपने बच्चों को प्रदर्शन में हिस्सा लेने से रोकें और उन्हें सुरक्षा बलों से उलझने न दें। लेकिन शांति प्रक्रिया बहाल करने और हिंसा भड़काने वालों के खिलाफ कार्रवाई की बात आई तो उनके सख्त तेवर भी देखने को मिले। उन्होंने दो टूक कहा कि जहां भी कर्फ्यू लागू किया गया है, उसका सख्ती से पालन किया जाएगा। इसमें किसी तरह की ढिलाई नहीं होगी।
घाटी में हिंसा भड़काने वालों को उन्होंने ‘राष्ट्र विरोधी ताकतेंज् कहा और वहां शांति प्रक्रिया बहाल करने की प्रतिबद्धता जताई। उन्होंने इसके पीछे लश्कर का हाथ होने की बात भी कही। कश्मीर के उबलते हालात को देखते हुए उन्होंने कें्र से मदद मांगी, लेकिन विपक्ष के इस आरोप से इनकार कर दिया कि उनकी सरकार कानून-व्यवस्था के मोर्चे पर विफल रही है। उल्टा विपक्षी दल पीडीपी पर घाटी में हिंसा भड़काने का आरोप लगाया। लेकिन कें्र सरकार और खास तौर पर गृह मंत्री पी चिदंबरम ने इस मौके पर कश्मीर सरकार के पीछे खड़े नजर आए और उन्होंने मुख्यमंत्री की बातों की ताईद भी की।
बीते साल जनवरी में उन्होंने राज्य में मुख्यमंत्री की कुर्सी संभाली थी। अड़तीस साल की उम्र में उन्हें सबसे युवा मुख्यमंत्री होने का गौरव तो मिला, लेकिन साथ में चुनौतियां भी कम नहीं थीं। राज्य में कानून-व्यवस्था की स्थिति कमोवेश सभी सरकारों के लिए चिंता का विषय रही है। फिर शिक्षा, स्वास्थ्य, सड़क जसी बुनियादी सुविधाओं तक लोगों की पहुंच सुनिश्चित करना भी एक महत्वपूर्ण काम था। इसमें वे काफी हद तक सफल रहे तो कानून-व्यवस्था के मोर्चे पर स्थिति में कोई खास सुधार देखने को नहीं मिला।
अभी राज्य की सत्ता संभाले उमर को छह माह ही हुए थे कि सेना पर तीन महिलाओं के साथ बलात्कार व उनकी हत्या सहित 15 लोगों की हत्या का आरोप लगा। कहा गया कि नई दिल्ली के दबाव में उन्होंने इस कुकृत्य पर पर्दा डालने की कोशिश की। इसी बीच उन पर 2006 के सेक्स स्कैंडल में शामिल होने का भी आरोप लगा। विपक्ष ने कहा कि नौकरी देने के नाम पर जिन मंत्रियों, नेताओं, वरिष्ठ अधिकारियों और सैनिकों ने लड़कियों का इस्तेमाल किया, उनमें उमर अब्दुल्ला और उनके पिता फारूख अब्दुल्ला भी शामिल थे। तब भी संवेदनशील और जज्बाती उमर देखने को मिले थे। विपक्ष के इस आरोप भर से राज्यपाल को इस्तीफा सौंपकर उन्होंने सबको सकते में डाल दिया था। यह अलग बात है कि राज्यपाल एनएन वोहरा ने उनका इस्तीफा स्वीकार नहीं किया और वे अपने पद पर बने रहे। लेकिन इससे भी खास था इस्तीफे की पेशकश के वक्त उनका दिया गया बयान। जहां ऐसे मामलों में फंसते वक्त दूसरे नेता दोष साबित हो जाने तक स्वयं को निर्दोष बताते हैं, वहीं उमर ने विपक्ष के इस आरोप को अपने चरित्र पर धब्बा बताते हुए तब तक स्वयं को गुनाहगार बताया, जब तक वे बेगुनाह साबित नहीं हो जाते।
कुछ इसी तरह का भावुक, पर अनुभवी राजनीतिज्ञ के रूप में उनका व्यक्तित्व वर्ष 2008 में भी देखने को मिला था, जब अमेरिका के साथ परमाणु करार को लेकर उन्होंने यूपीए सरकार को समर्थन देकर कांग्रेस की निकटता हासिल कर ली। इसका फायदा उन्हें राज्य विधानसभा के चुनाव में मिला। उस वक्त लोकसभा में दिया गया उनका बयान खासतौर पर उल्लेखनीय है। ऐसे में जबकि सपा सहित अन्य दल इस करार को मुसलमानों के लिए खतरनाक बता रहे थे, उमर ने यह कहकर तमाम आशंकाओं पर विराम लगा दिया, ‘मैं एक मुसलमान हूं और भारतीय भी। मैं इन दोनों में कोई फर्क नहीं देखता। मैं नहीं जानता कि हमें परमाणु करार से क्यों डरना चाहिए.. भारतीय मुसलमानों का दुश्मन अमेरिका या इस तरह का कोई करार नहीं, बल्कि गरीबी, भूख, विकास का अभाव और इन सबके लिए आवाज नहीं उठाना है..ज्
जम्मू-कश्मीर को लेकर शुरू से ही उमर का अलग रुख रहा है। भारत-पाकिस्तान के बीच जम्मू-कश्मीर को वे महत्वपूर्ण मुद्दा मानते हैं और उन्हें समस्या का एकमात्र समाधान बातचीत में नजर आता है। वे कहते हैं कि जम्मू-कश्मीर की समस्या राजनीतिक है और इसका समाधान भी राजनीतिक ही हो सकता है। हाल में जम्मू के उबलते हालात के बीच उन्होंने एकबार फिर यह बात दोहराई। इससे पहले कश्मीर समस्या के समाधान को लेकर 2006 में वे कें्र के विरोध के बावजूद पाकिस्तान के तत्कालीन राष्ट्रपति परवेज मुशर्रफ से मिलने इस्लामाबाद जा पहुंचे थे।
दस मार्च, 1970 को फारूख अब्दुल्ला और ब्रिटिश मां की संतान के रूप में जन्मे उमर को राजनीति विरासत में मिली। लेकिन राजनीतिक सफर आसान नहीं रहा। श्रीनगर के बर्न हॉल स्कूल से उन्होंने शुरुआती शिक्षा पूरी की। इसके बाद मुंबई के प्रतिष्ठित सिदेनाम कॉलेज से उन्होंने बीकॉम और स्कॉटलैंड की यूनीवर्सिटी ऑफ स्ट्रैथक्लाइड से एमबीए किया। 1998 में उन्होंने राजनीति में कदम रखा। उसी साल वे 12वीं लोकसभा के लिए चुने गए। तब कें्र में राजग की सरकार थी। उनकी पार्टी नेशनल कांफ्रेंस राजग सरकार का हिस्सा बनी। 1999 के लोकसभा चुनाव में भी उन्होंने जीत हासिल की। 2001 में वे विदेश राज्य मंत्री बने। तब भी वे सबसे युवा कें्रीय मंत्री थे। लेकिन भाजपा से संग-साथ का खामियाजा उन्हें 2002 के विधानसभा चुनाव में चुकाना पड़ा। उनकी पार्टी हार गई। हार के कारणों का विश्लेषण किया गया, तो पता चला जनता इसलिए उनके साथ नहीं आई, क्योंकि गुजरात दंगों के बाद भी उनकी पार्टी भाजपा से जुड़ी रही। लेकिन इसके बाद भाजपा से अलग होने में उन्होंने कोई देरी नहीं की। इस बीच वे लगातार अपनी राजनीतिक जमीन को बेहतर बनाने के लिए काम करते रहे। 2008 में उन्हें इसका फायदा भी मिला, जब उनकी पार्टी सबसे बड़े दल के रूप में उभरी और कांग्रेस के सहयोग से उन्होंने सरकार बनाई।
जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री हैं उमर अब्दुल्ला। युवा और संयत व समझदार। संवेदनशील और जज्बाती भी। उनकी ये विशेषताएं नुमायां होती रहती हैं। ये कुछ ऐसे गुण हैं, जो सामान्यत: राजनीति में इस समय दुर्लभ हो रहे हैं। बड़े से बड़े संकट में भी उनका रवैया उतावलेपन का न होकर धीरता व गंभीरता होता है। इस मामले में अपने पिता से भी वे उलट हैं। फारूख अब्दुल्ला की छवि जहां बेफिक्र और बिंदास नेता की है, वहीं उमर कामकाजी और जिम्मेदार हैं। इस मामले में बहुत थोड़े युवा नेता भी उनकी तरह हैं। कश्मीर इन दिनों फिर अशांत है, लेकिन सारी उथल-पुथल के बावजूद उमर अपने इन्हीं विशेषताओं से उनसे निपट रहे हैं। न कोई अधीरता, न ही असंयत बयानबाजी। वे मौकों पर चुप्पी साधने की महत्ता भी जानते हैं।
इस संकटकाल में भी उन्होंने अभिभावकों से भावुक अपील की कि वे अपने बच्चों को प्रदर्शन में हिस्सा लेने से रोकें और उन्हें सुरक्षा बलों से उलझने न दें। लेकिन शांति प्रक्रिया बहाल करने और हिंसा भड़काने वालों के खिलाफ कार्रवाई की बात आई तो उनके सख्त तेवर भी देखने को मिले। उन्होंने दो टूक कहा कि जहां भी कर्फ्यू लागू किया गया है, उसका सख्ती से पालन किया जाएगा। इसमें किसी तरह की ढिलाई नहीं होगी।
घाटी में हिंसा भड़काने वालों को उन्होंने ‘राष्ट्र विरोधी ताकतेंज् कहा और वहां शांति प्रक्रिया बहाल करने की प्रतिबद्धता जताई। उन्होंने इसके पीछे लश्कर का हाथ होने की बात भी कही। कश्मीर के उबलते हालात को देखते हुए उन्होंने कें्र से मदद मांगी, लेकिन विपक्ष के इस आरोप से इनकार कर दिया कि उनकी सरकार कानून-व्यवस्था के मोर्चे पर विफल रही है। उल्टा विपक्षी दल पीडीपी पर घाटी में हिंसा भड़काने का आरोप लगाया। लेकिन कें्र सरकार और खास तौर पर गृह मंत्री पी चिदंबरम ने इस मौके पर कश्मीर सरकार के पीछे खड़े नजर आए और उन्होंने मुख्यमंत्री की बातों की ताईद भी की।
बीते साल जनवरी में उन्होंने राज्य में मुख्यमंत्री की कुर्सी संभाली थी। अड़तीस साल की उम्र में उन्हें सबसे युवा मुख्यमंत्री होने का गौरव तो मिला, लेकिन साथ में चुनौतियां भी कम नहीं थीं। राज्य में कानून-व्यवस्था की स्थिति कमोवेश सभी सरकारों के लिए चिंता का विषय रही है। फिर शिक्षा, स्वास्थ्य, सड़क जसी बुनियादी सुविधाओं तक लोगों की पहुंच सुनिश्चित करना भी एक महत्वपूर्ण काम था। इसमें वे काफी हद तक सफल रहे तो कानून-व्यवस्था के मोर्चे पर स्थिति में कोई खास सुधार देखने को नहीं मिला।
अभी राज्य की सत्ता संभाले उमर को छह माह ही हुए थे कि सेना पर तीन महिलाओं के साथ बलात्कार व उनकी हत्या सहित 15 लोगों की हत्या का आरोप लगा। कहा गया कि नई दिल्ली के दबाव में उन्होंने इस कुकृत्य पर पर्दा डालने की कोशिश की। इसी बीच उन पर 2006 के सेक्स स्कैंडल में शामिल होने का भी आरोप लगा। विपक्ष ने कहा कि नौकरी देने के नाम पर जिन मंत्रियों, नेताओं, वरिष्ठ अधिकारियों और सैनिकों ने लड़कियों का इस्तेमाल किया, उनमें उमर अब्दुल्ला और उनके पिता फारूख अब्दुल्ला भी शामिल थे। तब भी संवेदनशील और जज्बाती उमर देखने को मिले थे। विपक्ष के इस आरोप भर से राज्यपाल को इस्तीफा सौंपकर उन्होंने सबको सकते में डाल दिया था। यह अलग बात है कि राज्यपाल एनएन वोहरा ने उनका इस्तीफा स्वीकार नहीं किया और वे अपने पद पर बने रहे। लेकिन इससे भी खास था इस्तीफे की पेशकश के वक्त उनका दिया गया बयान। जहां ऐसे मामलों में फंसते वक्त दूसरे नेता दोष साबित हो जाने तक स्वयं को निर्दोष बताते हैं, वहीं उमर ने विपक्ष के इस आरोप को अपने चरित्र पर धब्बा बताते हुए तब तक स्वयं को गुनाहगार बताया, जब तक वे बेगुनाह साबित नहीं हो जाते।
कुछ इसी तरह का भावुक, पर अनुभवी राजनीतिज्ञ के रूप में उनका व्यक्तित्व वर्ष 2008 में भी देखने को मिला था, जब अमेरिका के साथ परमाणु करार को लेकर उन्होंने यूपीए सरकार को समर्थन देकर कांग्रेस की निकटता हासिल कर ली। इसका फायदा उन्हें राज्य विधानसभा के चुनाव में मिला। उस वक्त लोकसभा में दिया गया उनका बयान खासतौर पर उल्लेखनीय है। ऐसे में जबकि सपा सहित अन्य दल इस करार को मुसलमानों के लिए खतरनाक बता रहे थे, उमर ने यह कहकर तमाम आशंकाओं पर विराम लगा दिया, ‘मैं एक मुसलमान हूं और भारतीय भी। मैं इन दोनों में कोई फर्क नहीं देखता। मैं नहीं जानता कि हमें परमाणु करार से क्यों डरना चाहिए.. भारतीय मुसलमानों का दुश्मन अमेरिका या इस तरह का कोई करार नहीं, बल्कि गरीबी, भूख, विकास का अभाव और इन सबके लिए आवाज नहीं उठाना है..ज्
जम्मू-कश्मीर को लेकर शुरू से ही उमर का अलग रुख रहा है। भारत-पाकिस्तान के बीच जम्मू-कश्मीर को वे महत्वपूर्ण मुद्दा मानते हैं और उन्हें समस्या का एकमात्र समाधान बातचीत में नजर आता है। वे कहते हैं कि जम्मू-कश्मीर की समस्या राजनीतिक है और इसका समाधान भी राजनीतिक ही हो सकता है। हाल में जम्मू के उबलते हालात के बीच उन्होंने एकबार फिर यह बात दोहराई। इससे पहले कश्मीर समस्या के समाधान को लेकर 2006 में वे कें्र के विरोध के बावजूद पाकिस्तान के तत्कालीन राष्ट्रपति परवेज मुशर्रफ से मिलने इस्लामाबाद जा पहुंचे थे।
दस मार्च, 1970 को फारूख अब्दुल्ला और ब्रिटिश मां की संतान के रूप में जन्मे उमर को राजनीति विरासत में मिली। लेकिन राजनीतिक सफर आसान नहीं रहा। श्रीनगर के बर्न हॉल स्कूल से उन्होंने शुरुआती शिक्षा पूरी की। इसके बाद मुंबई के प्रतिष्ठित सिदेनाम कॉलेज से उन्होंने बीकॉम और स्कॉटलैंड की यूनीवर्सिटी ऑफ स्ट्रैथक्लाइड से एमबीए किया। 1998 में उन्होंने राजनीति में कदम रखा। उसी साल वे 12वीं लोकसभा के लिए चुने गए। तब कें्र में राजग की सरकार थी। उनकी पार्टी नेशनल कांफ्रेंस राजग सरकार का हिस्सा बनी। 1999 के लोकसभा चुनाव में भी उन्होंने जीत हासिल की। 2001 में वे विदेश राज्य मंत्री बने। तब भी वे सबसे युवा कें्रीय मंत्री थे। लेकिन भाजपा से संग-साथ का खामियाजा उन्हें 2002 के विधानसभा चुनाव में चुकाना पड़ा। उनकी पार्टी हार गई। हार के कारणों का विश्लेषण किया गया, तो पता चला जनता इसलिए उनके साथ नहीं आई, क्योंकि गुजरात दंगों के बाद भी उनकी पार्टी भाजपा से जुड़ी रही। लेकिन इसके बाद भाजपा से अलग होने में उन्होंने कोई देरी नहीं की। इस बीच वे लगातार अपनी राजनीतिक जमीन को बेहतर बनाने के लिए काम करते रहे। 2008 में उन्हें इसका फायदा भी मिला, जब उनकी पार्टी सबसे बड़े दल के रूप में उभरी और कांग्रेस के सहयोग से उन्होंने सरकार बनाई।
लेबल:
उमर अब्दुल्ला,
जम्मू-कश्मीर,
प्रदर्शन,
फारूख अब्दुल्ला
धोनी की धन्नो
एक जमाना था जब क्रिकेट के सितारों की शादी फिल्मी तारिकाओं से होती थी। सबमें बड़ा नाम नवाब पटौदी और शर्मिला टैगोर का है। सितारों का सितारों से ही मिलन होता था। ताजा मिसाल शोएब और सानिया की है। लेकिन इधर क्रिकेट की हस्तियां बेहद घरेलू और पारिवारिक जान-पहचान वालों से ब्याह करती रही हैं। चाहे सचिन हों, ्रविड़ हों या कुंबले। भारतीय क्रिकेट टीम के कप्तान महें्र सिंह धोनी ने भी यही किया। अपने जीवनसाथी के तौर पर उन्होंने पुरानी जान-पहचान और बचपन की दोस्त साक्षी रावत को चुना। धोनी के रोमांस के कई किस्से चले। उनकी शादी को लेकर तरह-तरह कयास लगते रहे। लेकिन उन्होंने साक्षी को चुनकर एकाएक सबको चौंका दिया। घरेलू और अपनी पढ़ाई-लिखाई करनेवाली ग्लैमर की दुनिया से दूर रहने वाली साक्षी अचानक मीडिया का फोकस बन गईं।
लाखों दिलों की धड़कन भारतीय क्रिकेट टीम के कप्तान महें्र सिंह धोनी साक्षी रावत की खूबसूरती के आगे बोल्ड हो गए। हिमालय की खूबसूरती ने उन्हें अपने मोहपाश में इस कदर बांधा कि वे फिर इससे निकल नहीं पाए। सबको उस वक्त आश्चर्य हुआ जब उन्हें धोनी की सगाई और एक दिन बाद ही शादी की खबर मिली। खासकर उन लड़कियों के लिए यह किसी सदमे से कम नहीं था, जो अब तक धोनी को अपने सपनों का राजकुमार माने बैठे थीं। कइयों के दिल टूटे। लेकिन यह राजकुमार तो अपनी ही दुनिया में मस्त था। खुश था अपने सपनों की राजकुमारी को पाकर।
धोनी के दिल की धड़कन निकलीं साक्षी रावत। इस बीच, चर्चाओं का बाजार गर्म रहा। कभी दीपिका पादुकोण के साथ तो कभी किसी और अदाकारा के साथ जुड़ते रहे धोनी के नाम। लेकिन चोरी-चोरी चुपके-चुपके हुई दोनों की सगाई और फिर शादी के बाद सच सामने आया तो कुछ और। अब तक जाने कितनी लड़कियों ने धोनी के आगे प्रणय निवेदन किया। लेकिन उन सबमें शायद वह नहीं रहा होगा, जो धोनी का दिल जीत सके। यहां साक्षी उन सब पर भारी पड़ीं और चुरा लिया धोनी का दिल। महाराष्ट्र के औरंगाबाद से होटल मैनेजमेंट की पढ़ाई करने वाली साक्षी ने शायद अलग-अलग तरह की रेसिपी से जीता होगा धोनी का दिल।
धोनी के बचपन की दोस्त हैं साक्षी। दोनों परिवारों में भी घनिष्ठता है। दोनों के पिता रांची में साथ-साथ काम चुके हैं। दोनों का परिवार मूलत: उत्तराखंड से ही ताल्लुक रखता है। लेकिन सेवानिवृत्ति के बाद जहां रावत परिवार उत्तराखंड लौट गया, वहीं धोनी के परिवार ने रांची में ही रहना तय किया। रांची के डीएवी स्कूल, शामली में धोनी और साक्षी साथ-साथ पढ़ते थे। हालांकि यह संभव है कि स्कूल में साक्षी धोनी की जूनियर रही हों, क्योंकि दोनों की उम्र में अच्छा खासा फासला है। धोनी जहां 29 साल के हो गए हैं, वहीं साक्षी की उम्र 21 साल है। स्कूल का यह साथ आगे चलकर प्यार और फिर शादी में तब्दील होगा, तब शायद धोनी और साक्षी को भी इसका खयाल नहीं आया होगा। लेकिन बढ़ती उम्र ने दोनों बीच नजदीकियां भी बढ़ा दी।
बिपाशा बसु अभिनीत ‘रेसज् फिल्म की पार्टी के दौरान एकबार फिर दोनों की मुलाकात हुई। पार्टी में साक्षी को बुलाया था फिल्म अभिनेता जॉन अब्राहम ने, जो बिपाशा के घनिष्ठ मित्र हैं। धोनी की शादी में जिन गिने-चुने लोगों को बुलाया गया था, उनमें जॉन भी शामिल थे। साक्षी व धोनी के साथ जॉन की घनिष्ठता इससे भी मालूम होती है। पार्टी से शुरू हुआ मुलाकातों का यह सिलसिला लगातार चलता रहा। दोनों के बीच नजदीकियां करीब दो साल पहले आई। दोनों कई बार औरंगाबाद में साथ-साथ देखे गए। कहा तो यहां तक जा रहा है कि साक्षी के कहने पर ही धोनी ने अपने लंबे बाल कटवा दिए, क्योंकि साक्षी को छोटे बाल पसंद हैं, जबकि गौरतलब है कि कई साल पहले पाकिस्तान गई भारतीय क्रिकेट टीम से मुलाकात करते हुए जनरल मुशर्रफ ने माही के हेयर स्टाइल की तारीफ करते हुए उसे बनाए रखने के लिए कहा था। साक्षी धोनी के लुक को लेकर कितनी गंभीर थीं, इसका अंदाजा इस बात से भी लगाया जा सकता कि जब-जब धोनी ने बाल कटवाए, साक्षी उनके साथ मौजूद रहीं। पिछले साल 19 नवंबर को साक्षी के जन्मदिन पर भी धोनी उनके साथ थे। हाल के दिनों में धोनी का देहरादून आना-जाना भी बढ़ गया था। पिछले साल दोनों ने मसूरी और देहरादून में छुट्टियां भी साथ-साथ बिताई थीं।
रावत परिवार के रांची से देहरादून आ जाने के बाद साक्षी की बाकी पढ़ाई देहरादून के प्रसिद्ध वेलहाम गर्ल्स स्कूल से हुई। बाद में उन्होंने होटल मैनेजमेंट की पढ़ाई करना तय किया और इसके लिए महाराष्ट्र के औरंगाबाद स्थित इंस्टीट्यूट ऑफ होटल मैनेजमेंट को चुना। होटल मैनेजमेंट में स्नातक की डिग्री लेने के बाद साक्षी इन दिनों कोलकाता में ताज बंगाल के साथ काम कर रही हैं। साक्षी के दादा वन विभाग में डिविजनल अधिकारी रह चुके हैं। साक्षी खान-पान की खास तौर पर शौकीन हैं, जो उनकी पेशेगत रुचियों के भी अनुकूल है। संगीत भी उन्हें पसंद है। फिल्में उन्हें हॉलीवुड की पसंद हैं। कुछ खास फिल्मों की बात की जाए तो उनमें डेसपेरेट हाउस वाइव्स, एक्रॉस द यूनीवर्स, परफ्यूम, द इल्यूजनिस्ट, अ वाक टू रिमेम्बर, ट्रांसफॉर्मर्स, एक्स-मेन जसी फिल्मों के नाम लिए जा सकते हैं। इसी तरह टीवी शो की बात की जाए तो अमेरिकन आइडोल, वन ट्री हिल, फ्रेंड्स, अमेरिकाज नेक्स्ट टॉप मॉडल, ऑर्फन उन्हें खास तौर पर पसंद हैं।
कुल मिलाकर, धोनी की जिंदगी में साक्षी ने कई रंग भर दिए हैं। अब तक क्रिकेट को पहला प्यार बताने वाले भारतीय क्रिकेट टीम के कप्तान की जिंदगी में अब दूसरा प्यार भी आ गया है। संभव है कि क्रिकेट को साक्षी से कड़ी टक्कर मिले। लेकिन सामंजस्य तो धोनी को ही बिठाना है। फिलहाल हर तरफ से धोनी को सुखी वैवाहिक जीवन के लिए बधाइयां मिल रही हैं। हमारी ओर से भी धोनी-साक्षी को लख-लख बधाइयां!
लाखों दिलों की धड़कन भारतीय क्रिकेट टीम के कप्तान महें्र सिंह धोनी साक्षी रावत की खूबसूरती के आगे बोल्ड हो गए। हिमालय की खूबसूरती ने उन्हें अपने मोहपाश में इस कदर बांधा कि वे फिर इससे निकल नहीं पाए। सबको उस वक्त आश्चर्य हुआ जब उन्हें धोनी की सगाई और एक दिन बाद ही शादी की खबर मिली। खासकर उन लड़कियों के लिए यह किसी सदमे से कम नहीं था, जो अब तक धोनी को अपने सपनों का राजकुमार माने बैठे थीं। कइयों के दिल टूटे। लेकिन यह राजकुमार तो अपनी ही दुनिया में मस्त था। खुश था अपने सपनों की राजकुमारी को पाकर।
धोनी के दिल की धड़कन निकलीं साक्षी रावत। इस बीच, चर्चाओं का बाजार गर्म रहा। कभी दीपिका पादुकोण के साथ तो कभी किसी और अदाकारा के साथ जुड़ते रहे धोनी के नाम। लेकिन चोरी-चोरी चुपके-चुपके हुई दोनों की सगाई और फिर शादी के बाद सच सामने आया तो कुछ और। अब तक जाने कितनी लड़कियों ने धोनी के आगे प्रणय निवेदन किया। लेकिन उन सबमें शायद वह नहीं रहा होगा, जो धोनी का दिल जीत सके। यहां साक्षी उन सब पर भारी पड़ीं और चुरा लिया धोनी का दिल। महाराष्ट्र के औरंगाबाद से होटल मैनेजमेंट की पढ़ाई करने वाली साक्षी ने शायद अलग-अलग तरह की रेसिपी से जीता होगा धोनी का दिल।
धोनी के बचपन की दोस्त हैं साक्षी। दोनों परिवारों में भी घनिष्ठता है। दोनों के पिता रांची में साथ-साथ काम चुके हैं। दोनों का परिवार मूलत: उत्तराखंड से ही ताल्लुक रखता है। लेकिन सेवानिवृत्ति के बाद जहां रावत परिवार उत्तराखंड लौट गया, वहीं धोनी के परिवार ने रांची में ही रहना तय किया। रांची के डीएवी स्कूल, शामली में धोनी और साक्षी साथ-साथ पढ़ते थे। हालांकि यह संभव है कि स्कूल में साक्षी धोनी की जूनियर रही हों, क्योंकि दोनों की उम्र में अच्छा खासा फासला है। धोनी जहां 29 साल के हो गए हैं, वहीं साक्षी की उम्र 21 साल है। स्कूल का यह साथ आगे चलकर प्यार और फिर शादी में तब्दील होगा, तब शायद धोनी और साक्षी को भी इसका खयाल नहीं आया होगा। लेकिन बढ़ती उम्र ने दोनों बीच नजदीकियां भी बढ़ा दी।
बिपाशा बसु अभिनीत ‘रेसज् फिल्म की पार्टी के दौरान एकबार फिर दोनों की मुलाकात हुई। पार्टी में साक्षी को बुलाया था फिल्म अभिनेता जॉन अब्राहम ने, जो बिपाशा के घनिष्ठ मित्र हैं। धोनी की शादी में जिन गिने-चुने लोगों को बुलाया गया था, उनमें जॉन भी शामिल थे। साक्षी व धोनी के साथ जॉन की घनिष्ठता इससे भी मालूम होती है। पार्टी से शुरू हुआ मुलाकातों का यह सिलसिला लगातार चलता रहा। दोनों के बीच नजदीकियां करीब दो साल पहले आई। दोनों कई बार औरंगाबाद में साथ-साथ देखे गए। कहा तो यहां तक जा रहा है कि साक्षी के कहने पर ही धोनी ने अपने लंबे बाल कटवा दिए, क्योंकि साक्षी को छोटे बाल पसंद हैं, जबकि गौरतलब है कि कई साल पहले पाकिस्तान गई भारतीय क्रिकेट टीम से मुलाकात करते हुए जनरल मुशर्रफ ने माही के हेयर स्टाइल की तारीफ करते हुए उसे बनाए रखने के लिए कहा था। साक्षी धोनी के लुक को लेकर कितनी गंभीर थीं, इसका अंदाजा इस बात से भी लगाया जा सकता कि जब-जब धोनी ने बाल कटवाए, साक्षी उनके साथ मौजूद रहीं। पिछले साल 19 नवंबर को साक्षी के जन्मदिन पर भी धोनी उनके साथ थे। हाल के दिनों में धोनी का देहरादून आना-जाना भी बढ़ गया था। पिछले साल दोनों ने मसूरी और देहरादून में छुट्टियां भी साथ-साथ बिताई थीं।
रावत परिवार के रांची से देहरादून आ जाने के बाद साक्षी की बाकी पढ़ाई देहरादून के प्रसिद्ध वेलहाम गर्ल्स स्कूल से हुई। बाद में उन्होंने होटल मैनेजमेंट की पढ़ाई करना तय किया और इसके लिए महाराष्ट्र के औरंगाबाद स्थित इंस्टीट्यूट ऑफ होटल मैनेजमेंट को चुना। होटल मैनेजमेंट में स्नातक की डिग्री लेने के बाद साक्षी इन दिनों कोलकाता में ताज बंगाल के साथ काम कर रही हैं। साक्षी के दादा वन विभाग में डिविजनल अधिकारी रह चुके हैं। साक्षी खान-पान की खास तौर पर शौकीन हैं, जो उनकी पेशेगत रुचियों के भी अनुकूल है। संगीत भी उन्हें पसंद है। फिल्में उन्हें हॉलीवुड की पसंद हैं। कुछ खास फिल्मों की बात की जाए तो उनमें डेसपेरेट हाउस वाइव्स, एक्रॉस द यूनीवर्स, परफ्यूम, द इल्यूजनिस्ट, अ वाक टू रिमेम्बर, ट्रांसफॉर्मर्स, एक्स-मेन जसी फिल्मों के नाम लिए जा सकते हैं। इसी तरह टीवी शो की बात की जाए तो अमेरिकन आइडोल, वन ट्री हिल, फ्रेंड्स, अमेरिकाज नेक्स्ट टॉप मॉडल, ऑर्फन उन्हें खास तौर पर पसंद हैं।
कुल मिलाकर, धोनी की जिंदगी में साक्षी ने कई रंग भर दिए हैं। अब तक क्रिकेट को पहला प्यार बताने वाले भारतीय क्रिकेट टीम के कप्तान की जिंदगी में अब दूसरा प्यार भी आ गया है। संभव है कि क्रिकेट को साक्षी से कड़ी टक्कर मिले। लेकिन सामंजस्य तो धोनी को ही बिठाना है। फिलहाल हर तरफ से धोनी को सुखी वैवाहिक जीवन के लिए बधाइयां मिल रही हैं। हमारी ओर से भी धोनी-साक्षी को लख-लख बधाइयां!
सेना समाधान नहीं
वरिष्ठ पत्रकार रामबहादुर राय से बातचीत पर आधारित
कश्मीर समस्या राज्य सरकार की नासमझी का नतीजा है। कें्र सरकार भी स्थिति की संवेदनशीलता नहीं समझ पाई। मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला जो भी आरोप लगा रहे हैं, वे गले नहीं उतरते। दरअसल, सरकार के गलत फैसलों ने ही स्थिति को बिगड़ने दिया। सेना को बुलाना भी ऐसा ही एक गलत फैसला है।
सरकार की ढुलमुल नीति का परिणाम है कश्मीर समस्या। इसे अब तक न तो कें्र सरकार समझ पाई है और न ही वहां की निर्वाचित सरकार। सतही लक्षणों से ही सरकार फैसले ले रही है। कश्मीर में सेना बुलाने का फैसला भी ऐसा ही है, जो घबराहट और जल्दबाजी में लिया गया। मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला सत्ता में आने के बाद से लगातार सशस्त्र सेना विशेषाधिकार कानून को हटाने की मांग करते रहे हैं, लेकिन घाटी में हालात काबू से निकलता देख तुरंत सेना बुला ली। साफ है कि अपने करीब डेढ़ साल के कार्यकाल के दौरान उन्होंने राज्य पुलिस को इतना सशक्त नहीं बनाया कि वह उप्रवी तत्वों से निपट सके।
उमर का यह आरोप भी गले नहीं उतरता कि पीडीपी प्रदर्शनकारियों को भड़का रही है, क्योंकि जिन क्षेत्रों में प्रदर्शन और पथराव हो रहे हैं, वे नेशनल कांफ्रेंस के प्रभाव वाले क्षेत्र ही हैं। हां, अनंतनाग में पीडीपी की स्थिति बेहतर जरूर है, लेकिन वहां घटना की शुरुआत नहीं हुई, बल्कि केवल प्रतिक्रिया हुई। अमरनाथ यात्रा से ठीक पहले ऐसी घटना का होना यह भी दर्शाता है कि सरकार सचेत नहीं थी और न ही उसने दो साल पहले 2008 में अमरनाथ यात्रा के दौरान हुए संघर्ष का सही आकलन किया। राज्य सरकार ने बड़ी संख्या में पुलिस बल अमरनाथ यात्रियों की सुरक्षा में तैनात कर दी, जिससे घाटी में स्थिति और बिगड़ गई। अब आनन-फानन में सेना बुलाई गई है। उम्मीद की जा रही है कि इससे हालात पर काबू पाया जा सकेगा। लेकिन यह समस्या का समाधान नहीं हो सकता। ऐसी कोशिशें राहतभर होती हैं।
कश्मीर के संदर्भ में सबसे बड़ी समस्या बाहरी हस्तक्षेप की है, जो बेहद प्रभावशाली है। इसे समाप्त करना तो दूर कम करने में भी हमारी क्षमता जवाब दे जाती है। बाहरी हस्तक्षेप के रूप में सिर्फ पाकिस्तान, आईएसआई, तालिबान और अफगान लड़ाके नहीं हैं, बल्कि अमेरिका भी है। फिर इनका रूपरंग बड़ी तेजी से बदलता है, जबकि सरकार उतनी तेजी से उसका जवाब नहीं दे पाती। यह बात सिर्फ मनमोहन सिंह या उमर अब्दुल्ला सरकार पर लागू नहीं होती, बल्कि नेहरू से लेकर अब तक की कमोबेश हर सरकार का इस मामले में यही हाल रहा है। सभी प्रधानमंत्रियों की कोशिश खुद को एक ऐसे नेता के रूप में स्थापित करने की रही है, पाकिस्तान के साथ संबंध सुधारना चाहता है। ऐसी कोशिश में कोई बुराई नहीं है। लेकिन हमें यह बात नहीं भूलनी चाहिए कि जमीनी हकीकत को दरकिनार कर जब भी ऐसी कोशिश हुई, उसका खामियाजा उसी रूप में सामने आया जसा आज कश्मीर में हो रहा है।
अब गृह मंत्रालय की एक रिपोर्ट पर गौर करें तो 2009 में जम्मू-कश्मीर में 15 लोग पुलिस की गोलीबारी में मारे गए थे, जबकि दूसरे राज्यों में यह संख्या कहीं अधिक थी। इसी तरह 2008 में अमरनाथ यात्रा के दौरान पैदा हुए संघर्ष के दौरान पुलिस ने 380 बार गोली चलाई थी, जिसमें 43 लोग मारे गए थे और 317 घायल हुए थे। इससे पहले 2006 में जब गुलाम नबी आजाद राज्य के मुख्यमंत्री थे, तब भी राज्य में पुलिस की गोलीबारी में 47 लोग मारे गए थे। 2003 में जब राज्य में मुफ्ती मोहम्मद सईद की सरकार थी, तब भी पुलिस को प्रदर्शन व उप्रव शांत करने के लिए 123 बार गोली चलानी पड़ी थी। लेकिन किसी भी सरकार ने सेना नहीं बुलाई। पर मौजूदा उप्रव से उमर के हाथ-पांव फूल गए और उन्होंने कें्र से सेना बुलाने की मांग कर डाली। साफ है कि राज्य में कानून-व्यवस्था के मोर्चे पर उमर सरकार पूरी तरह विफल रही।
कश्मीर समस्या राज्य सरकार की नासमझी का नतीजा है। कें्र सरकार भी स्थिति की संवेदनशीलता नहीं समझ पाई। मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला जो भी आरोप लगा रहे हैं, वे गले नहीं उतरते। दरअसल, सरकार के गलत फैसलों ने ही स्थिति को बिगड़ने दिया। सेना को बुलाना भी ऐसा ही एक गलत फैसला है।
सरकार की ढुलमुल नीति का परिणाम है कश्मीर समस्या। इसे अब तक न तो कें्र सरकार समझ पाई है और न ही वहां की निर्वाचित सरकार। सतही लक्षणों से ही सरकार फैसले ले रही है। कश्मीर में सेना बुलाने का फैसला भी ऐसा ही है, जो घबराहट और जल्दबाजी में लिया गया। मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला सत्ता में आने के बाद से लगातार सशस्त्र सेना विशेषाधिकार कानून को हटाने की मांग करते रहे हैं, लेकिन घाटी में हालात काबू से निकलता देख तुरंत सेना बुला ली। साफ है कि अपने करीब डेढ़ साल के कार्यकाल के दौरान उन्होंने राज्य पुलिस को इतना सशक्त नहीं बनाया कि वह उप्रवी तत्वों से निपट सके।
उमर का यह आरोप भी गले नहीं उतरता कि पीडीपी प्रदर्शनकारियों को भड़का रही है, क्योंकि जिन क्षेत्रों में प्रदर्शन और पथराव हो रहे हैं, वे नेशनल कांफ्रेंस के प्रभाव वाले क्षेत्र ही हैं। हां, अनंतनाग में पीडीपी की स्थिति बेहतर जरूर है, लेकिन वहां घटना की शुरुआत नहीं हुई, बल्कि केवल प्रतिक्रिया हुई। अमरनाथ यात्रा से ठीक पहले ऐसी घटना का होना यह भी दर्शाता है कि सरकार सचेत नहीं थी और न ही उसने दो साल पहले 2008 में अमरनाथ यात्रा के दौरान हुए संघर्ष का सही आकलन किया। राज्य सरकार ने बड़ी संख्या में पुलिस बल अमरनाथ यात्रियों की सुरक्षा में तैनात कर दी, जिससे घाटी में स्थिति और बिगड़ गई। अब आनन-फानन में सेना बुलाई गई है। उम्मीद की जा रही है कि इससे हालात पर काबू पाया जा सकेगा। लेकिन यह समस्या का समाधान नहीं हो सकता। ऐसी कोशिशें राहतभर होती हैं।
कश्मीर के संदर्भ में सबसे बड़ी समस्या बाहरी हस्तक्षेप की है, जो बेहद प्रभावशाली है। इसे समाप्त करना तो दूर कम करने में भी हमारी क्षमता जवाब दे जाती है। बाहरी हस्तक्षेप के रूप में सिर्फ पाकिस्तान, आईएसआई, तालिबान और अफगान लड़ाके नहीं हैं, बल्कि अमेरिका भी है। फिर इनका रूपरंग बड़ी तेजी से बदलता है, जबकि सरकार उतनी तेजी से उसका जवाब नहीं दे पाती। यह बात सिर्फ मनमोहन सिंह या उमर अब्दुल्ला सरकार पर लागू नहीं होती, बल्कि नेहरू से लेकर अब तक की कमोबेश हर सरकार का इस मामले में यही हाल रहा है। सभी प्रधानमंत्रियों की कोशिश खुद को एक ऐसे नेता के रूप में स्थापित करने की रही है, पाकिस्तान के साथ संबंध सुधारना चाहता है। ऐसी कोशिश में कोई बुराई नहीं है। लेकिन हमें यह बात नहीं भूलनी चाहिए कि जमीनी हकीकत को दरकिनार कर जब भी ऐसी कोशिश हुई, उसका खामियाजा उसी रूप में सामने आया जसा आज कश्मीर में हो रहा है।
अब गृह मंत्रालय की एक रिपोर्ट पर गौर करें तो 2009 में जम्मू-कश्मीर में 15 लोग पुलिस की गोलीबारी में मारे गए थे, जबकि दूसरे राज्यों में यह संख्या कहीं अधिक थी। इसी तरह 2008 में अमरनाथ यात्रा के दौरान पैदा हुए संघर्ष के दौरान पुलिस ने 380 बार गोली चलाई थी, जिसमें 43 लोग मारे गए थे और 317 घायल हुए थे। इससे पहले 2006 में जब गुलाम नबी आजाद राज्य के मुख्यमंत्री थे, तब भी राज्य में पुलिस की गोलीबारी में 47 लोग मारे गए थे। 2003 में जब राज्य में मुफ्ती मोहम्मद सईद की सरकार थी, तब भी पुलिस को प्रदर्शन व उप्रव शांत करने के लिए 123 बार गोली चलानी पड़ी थी। लेकिन किसी भी सरकार ने सेना नहीं बुलाई। पर मौजूदा उप्रव से उमर के हाथ-पांव फूल गए और उन्होंने कें्र से सेना बुलाने की मांग कर डाली। साफ है कि राज्य में कानून-व्यवस्था के मोर्चे पर उमर सरकार पूरी तरह विफल रही।
बल नहीं, संबल
वरिष्ठ पत्रकार व विश्लेषक देवदत्त से बातचीत पर आधारित
कश्मीर कुछ समय की शांति के बाद फिर उद्वेलित है। सुरक्षा बलों के खिलाफ जबर्दस्त आक्रोश है। स्थिति लगातार असामान्य होती जा रही है। जनता का राज्य और कें्र सरकार से मोहभंग है। आजादी के बाद से कश्मीर एक गुत्थी के रूप में ही रहा है। इसे सुलझाने की सारी कोशिशें मामले को उलझाती ही गई हैं। दरअसल इस पूरे मामले को नए नजरिये से देखने की जरूरत है। कश्मीर तभी शांत होगा, जब वहां लोगों को सही मायने में लोकतंत्र हासिल होगा। जरूरत वहां के लोगों से लड़ने की नहीं, उनका विश्वास जीतने की है।
कश्मीर समस्या आज की नहीं है। आजादी के समय से लेकर आज तक यह हिन्दुस्तान और पाकिस्तान के बीच संबंधों में एक महत्वपूर्ण कड़ी बनी हुई है। ऐसा नहीं है कि इसे सुलझाने के प्रयास नहीं हुए। लेकिन समस्या सुलझने के बजाय दिनों दिन उलझती गई। आज स्थिति और भी बदतर हो चुकी है। समस्या का समाधान तो दूर उसके तरीके भी उलझकर रह गए हैं और उसमें अधिक जटिलता आ गई है।
समस्या वहां के लोगों की है, जो अपनी पहचान को लेकर उद्वेलित हैं। आयरलैंड, फ्रांस सहित यूरोप के अन्य हिस्सों और अफ्रीका में भी जातीय पहचान को लेकर स्वर मुखर हो रहे हैं, जिससे कश्मीर के लोगों को नई ऊर्जा व प्रेरणा मिलती है। इसलिए इसे अनदेखा नहीं किया जा सकता। कश्मीर में आए दिन होने वाले प्रदर्शन, पत्थरबाजी समस्या के लक्षण मात्र हैं, पूरी समस्या नहीं। पुलिस या सेना की ओर से जवाबी कार्रवाई के जरिये इन लक्षणों को ही फौरी तौर पर शांत किया जा सकता है, समस्या का समाधान नहीं। लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि कश्मीर को हिन्दुस्तान से अलग कर दिया जाए। वास्तव में, कश्मीर को हिन्दुस्तान से अलग करके भी नहीं देखा जा सकता, क्योंकि यह सीधे तौर पर देश की एकता, अखंडता और धर्मनिरपेक्षता से जुड़ा है। कश्मीर के बगैर भारत की एकता की कल्पना भी नहीं की जा सकती। फिर इससे राज्य विरोधी ताकतों को भी बल मिलेगा।
उधर, पाकिस्तान की अपनी मजबूरी है। वह हिन्दुस्तान से समझौता नहीं कर सकता। वहां लोकतंत्र आया है, लेकिन महत्वपूर्ण राजनीतिक फैसलों पर वहां अब भी सेना और खुफिया एजेंसी आईएसआई का असर है। यह भी सच है कि कश्मीर में पथराव, प्रदर्शन या हिंसक हालात को हवा देने में पाकिस्तानी तत्वों का काफी योगदान होता है। लेकिन पाकिस्तान सरकार की कमजोरी के बावजूद इसके लिए सीधे तौर पर सेना या आईएसआई से बात नहीं की जा सकती, क्योंकि यहां प्रोटोकॉल आड़े आता है। फिर पाकिस्तान की सरकार राजनीतिक रूप से भी कमजोर है, क्योंकि पश्तून उनकी बात नहीं सुनते। इस तरह हिन्दुस्तान की निर्वाचित सरकार पाकिस्तान से जो भी बात करती है, वहां की सरकार उस पर सेना और आईएसआई से विचार-विमर्श करती है और उसके बाद ही कोई फैसला करती है। इससे समस्या सुलझने की बजाय और उलझती जाती है।
ऐसे में जरूरत है तो कश्मीर के लोगों को साथ लेकर चलने की, खासकर युवाओं को। लेकिन कश्मीर के अब तक के इतिहास पर नजर डालें तो मालूम होता है कि वहां की अवाम को आजादी के तकरीबन छह दशक बाद भी सही मायने में लोकतंत्र नहीं मिला और न ही नेतृत्व। आजादी से अब तक एक लंबे समय के लिए वहां राजनीतिक नेतृत्व अब्दुल्ला परिवार के हाथों में रहा। मुफ्ती मोहम्मद सईद के नेतृत्व में पीडीपी की सरकार आने के बाद कश्मीर में सही मायने में लोकतांत्रिक प्रक्रिया और वहां के लोगों को राजनीतिक नेतृत्व मिलने की उम्मीद जगी थी, लेकिन आगे चलकर यह उम्मीद भी मुफ्ती परिवार तक सिमटकर रह गई, जब पार्टी की बागडोर सईद की बेटी महबूबा मुफ्ती के हाथों में चली गई। फिर पुलिस की ओर से गोलीबारी या सेना का फ्लैगमार्च कश्मीरी अवाम के गुस्से को और भड़काता है। इसलिए यहां जरूरत है फ्रांस में 1968 के आंदोलन के समय सरकार द्वारा अपनाए गए तौर तरीके से सीख लेने की। जब युवाओं ने पूरे फ्रांस में सरकार का चक्का जाम कर दिया था, तब प्रसिद्ध चिंतक ज्यां पाल सात्र्र ने कहा था कि उनसे लड़ने की नहीं, बल्कि उनका विश्वास जीतने की जरूरत है। आज वही नीति कश्मीर के संदर्भ में भी अपनाने की जरूरत है।
दअसल, कश्मीर समस्या आज भारतीय विदेश नीति के सामने एक महत्वपूर्ण चुनौती बन गई है। 1980 के दशक तक समस्या अधिक जटिल नहीं थी। लेकिन आज समस्या को हल करने के तरीके भी जटिल हो गए हैं। वहां नई ताकतें आ गई हैं। पाकिस्तान तो था ही, अब तालिबान और अफगानिस्तान की उपस्थिति भी हो गई है। फिर अमेरिका की रुचि भी दक्षिण एशिया में बढ़ गई है और कश्मीर के जरिये वह अपने हित साधने की जुगत में है। हिन्दुस्तान की कमजोरी यह भी है कि यहां आज उस तरह का राष्ट्रीय नेतृत्व नहीं है, जसा 1950 के दशक तक था। वह ऐसा वक्त था जब राजनीतिक नेतृत्व अगर कोई फैसला करता था तो उस पर किसी तरह की बहस नहीं होती थी। राष्ट्रमंडल में शामिल होने का फैसला बतौर प्रधानमंत्री नेहरू ने किया था और बाद में संसद ने बिना किसी बहस के उसे पारित कर दिया। लेकिन आज वह स्थिति नहीं है और न ही उस तरह का राजनीतिक नेतृत्व। फिर यहां नौकरशाही भी हावी है, जो ऐसी समस्या का समाधान नहीं कर सकती। कुल मिलाकर स्थिति दिनोंदिन और पेचीदी होती जा रही है।
लेकिन ऐसा भी नहीं है कि समस्या के समाधान के सारे दरवाजे बंद हो गए हैं। सरकार की कोशिशें भले कामयाब होती नहीं दिख रही हों, लेकिन समस्या के समाधान को लेकर कई बुद्धिजीवी, राजनेता, अधिकारी, कार्यकर्ता आदि अनौपचारिक बातचीत कर रहे हैं, जिससे काफी उम्मीदें हैं। लंदन में उनकी कई बैठकें हो चुकी हैं और लगातार हो रही हैं। ये ऐसे लोग हैं, जो निष्पक्ष भाव रखते हैं और सामान्य तौर पर कश्मीरियों के मित्र के रूप में जाने जाते हैं। इसे ‘बैकरूम डिप्लोमेसीज् का नाम दिया जाता है। उधर, अमेरिका भी ऐसी की कोशिश में जुटा है। यानी अनौपचारिक रूप से वह भी समस्या के समाधान के लिए लगातार विचार-विमर्श कर रहा है। अब ऐसे में संशय इस बात को लेकर है कि कहीं सरकार कश्मीर समस्या के समाधान के लिए अमेरिकी फॉर्मूले को तरजीह न दे डाले, क्योंकि मौजूदा यूपीए सरकार का झुकाव भी अमेरिका की तरफ नजर आता है और विपक्ष भी एकजुट नहीं है। अमेरिकी फॉर्मूले में बुराई सिर्फ इतनी है कि चाहे वह जितना भी निष्पक्ष दिखे, उसमें अमेरिका अपने हितों का खयाल जरूर रखेगा। इसलिए समस्या को नए सिरे से समझने की जरूरत है। राजनीतिक दलों को भी चाहिए कि वे कश्मीर को एक मुद्दे की तरह इस्तेमाल न करें। देश की जनता को कश्मीर समस्या को नए परिप्रेक्ष्य में देखना होगा। पुराने मापदंडों के अनुसार न तो कश्मीर को देखना चाहिए और न ही सरकार को। कुल मिलाकर, फिलहाल समस्या के समाधान के बारे में नहीं, बल्कि उसके लिए माहौल तैयार करने की जरूरत है।
कश्मीर कुछ समय की शांति के बाद फिर उद्वेलित है। सुरक्षा बलों के खिलाफ जबर्दस्त आक्रोश है। स्थिति लगातार असामान्य होती जा रही है। जनता का राज्य और कें्र सरकार से मोहभंग है। आजादी के बाद से कश्मीर एक गुत्थी के रूप में ही रहा है। इसे सुलझाने की सारी कोशिशें मामले को उलझाती ही गई हैं। दरअसल इस पूरे मामले को नए नजरिये से देखने की जरूरत है। कश्मीर तभी शांत होगा, जब वहां लोगों को सही मायने में लोकतंत्र हासिल होगा। जरूरत वहां के लोगों से लड़ने की नहीं, उनका विश्वास जीतने की है।
कश्मीर समस्या आज की नहीं है। आजादी के समय से लेकर आज तक यह हिन्दुस्तान और पाकिस्तान के बीच संबंधों में एक महत्वपूर्ण कड़ी बनी हुई है। ऐसा नहीं है कि इसे सुलझाने के प्रयास नहीं हुए। लेकिन समस्या सुलझने के बजाय दिनों दिन उलझती गई। आज स्थिति और भी बदतर हो चुकी है। समस्या का समाधान तो दूर उसके तरीके भी उलझकर रह गए हैं और उसमें अधिक जटिलता आ गई है।
समस्या वहां के लोगों की है, जो अपनी पहचान को लेकर उद्वेलित हैं। आयरलैंड, फ्रांस सहित यूरोप के अन्य हिस्सों और अफ्रीका में भी जातीय पहचान को लेकर स्वर मुखर हो रहे हैं, जिससे कश्मीर के लोगों को नई ऊर्जा व प्रेरणा मिलती है। इसलिए इसे अनदेखा नहीं किया जा सकता। कश्मीर में आए दिन होने वाले प्रदर्शन, पत्थरबाजी समस्या के लक्षण मात्र हैं, पूरी समस्या नहीं। पुलिस या सेना की ओर से जवाबी कार्रवाई के जरिये इन लक्षणों को ही फौरी तौर पर शांत किया जा सकता है, समस्या का समाधान नहीं। लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि कश्मीर को हिन्दुस्तान से अलग कर दिया जाए। वास्तव में, कश्मीर को हिन्दुस्तान से अलग करके भी नहीं देखा जा सकता, क्योंकि यह सीधे तौर पर देश की एकता, अखंडता और धर्मनिरपेक्षता से जुड़ा है। कश्मीर के बगैर भारत की एकता की कल्पना भी नहीं की जा सकती। फिर इससे राज्य विरोधी ताकतों को भी बल मिलेगा।
उधर, पाकिस्तान की अपनी मजबूरी है। वह हिन्दुस्तान से समझौता नहीं कर सकता। वहां लोकतंत्र आया है, लेकिन महत्वपूर्ण राजनीतिक फैसलों पर वहां अब भी सेना और खुफिया एजेंसी आईएसआई का असर है। यह भी सच है कि कश्मीर में पथराव, प्रदर्शन या हिंसक हालात को हवा देने में पाकिस्तानी तत्वों का काफी योगदान होता है। लेकिन पाकिस्तान सरकार की कमजोरी के बावजूद इसके लिए सीधे तौर पर सेना या आईएसआई से बात नहीं की जा सकती, क्योंकि यहां प्रोटोकॉल आड़े आता है। फिर पाकिस्तान की सरकार राजनीतिक रूप से भी कमजोर है, क्योंकि पश्तून उनकी बात नहीं सुनते। इस तरह हिन्दुस्तान की निर्वाचित सरकार पाकिस्तान से जो भी बात करती है, वहां की सरकार उस पर सेना और आईएसआई से विचार-विमर्श करती है और उसके बाद ही कोई फैसला करती है। इससे समस्या सुलझने की बजाय और उलझती जाती है।
ऐसे में जरूरत है तो कश्मीर के लोगों को साथ लेकर चलने की, खासकर युवाओं को। लेकिन कश्मीर के अब तक के इतिहास पर नजर डालें तो मालूम होता है कि वहां की अवाम को आजादी के तकरीबन छह दशक बाद भी सही मायने में लोकतंत्र नहीं मिला और न ही नेतृत्व। आजादी से अब तक एक लंबे समय के लिए वहां राजनीतिक नेतृत्व अब्दुल्ला परिवार के हाथों में रहा। मुफ्ती मोहम्मद सईद के नेतृत्व में पीडीपी की सरकार आने के बाद कश्मीर में सही मायने में लोकतांत्रिक प्रक्रिया और वहां के लोगों को राजनीतिक नेतृत्व मिलने की उम्मीद जगी थी, लेकिन आगे चलकर यह उम्मीद भी मुफ्ती परिवार तक सिमटकर रह गई, जब पार्टी की बागडोर सईद की बेटी महबूबा मुफ्ती के हाथों में चली गई। फिर पुलिस की ओर से गोलीबारी या सेना का फ्लैगमार्च कश्मीरी अवाम के गुस्से को और भड़काता है। इसलिए यहां जरूरत है फ्रांस में 1968 के आंदोलन के समय सरकार द्वारा अपनाए गए तौर तरीके से सीख लेने की। जब युवाओं ने पूरे फ्रांस में सरकार का चक्का जाम कर दिया था, तब प्रसिद्ध चिंतक ज्यां पाल सात्र्र ने कहा था कि उनसे लड़ने की नहीं, बल्कि उनका विश्वास जीतने की जरूरत है। आज वही नीति कश्मीर के संदर्भ में भी अपनाने की जरूरत है।
दअसल, कश्मीर समस्या आज भारतीय विदेश नीति के सामने एक महत्वपूर्ण चुनौती बन गई है। 1980 के दशक तक समस्या अधिक जटिल नहीं थी। लेकिन आज समस्या को हल करने के तरीके भी जटिल हो गए हैं। वहां नई ताकतें आ गई हैं। पाकिस्तान तो था ही, अब तालिबान और अफगानिस्तान की उपस्थिति भी हो गई है। फिर अमेरिका की रुचि भी दक्षिण एशिया में बढ़ गई है और कश्मीर के जरिये वह अपने हित साधने की जुगत में है। हिन्दुस्तान की कमजोरी यह भी है कि यहां आज उस तरह का राष्ट्रीय नेतृत्व नहीं है, जसा 1950 के दशक तक था। वह ऐसा वक्त था जब राजनीतिक नेतृत्व अगर कोई फैसला करता था तो उस पर किसी तरह की बहस नहीं होती थी। राष्ट्रमंडल में शामिल होने का फैसला बतौर प्रधानमंत्री नेहरू ने किया था और बाद में संसद ने बिना किसी बहस के उसे पारित कर दिया। लेकिन आज वह स्थिति नहीं है और न ही उस तरह का राजनीतिक नेतृत्व। फिर यहां नौकरशाही भी हावी है, जो ऐसी समस्या का समाधान नहीं कर सकती। कुल मिलाकर स्थिति दिनोंदिन और पेचीदी होती जा रही है।
लेकिन ऐसा भी नहीं है कि समस्या के समाधान के सारे दरवाजे बंद हो गए हैं। सरकार की कोशिशें भले कामयाब होती नहीं दिख रही हों, लेकिन समस्या के समाधान को लेकर कई बुद्धिजीवी, राजनेता, अधिकारी, कार्यकर्ता आदि अनौपचारिक बातचीत कर रहे हैं, जिससे काफी उम्मीदें हैं। लंदन में उनकी कई बैठकें हो चुकी हैं और लगातार हो रही हैं। ये ऐसे लोग हैं, जो निष्पक्ष भाव रखते हैं और सामान्य तौर पर कश्मीरियों के मित्र के रूप में जाने जाते हैं। इसे ‘बैकरूम डिप्लोमेसीज् का नाम दिया जाता है। उधर, अमेरिका भी ऐसी की कोशिश में जुटा है। यानी अनौपचारिक रूप से वह भी समस्या के समाधान के लिए लगातार विचार-विमर्श कर रहा है। अब ऐसे में संशय इस बात को लेकर है कि कहीं सरकार कश्मीर समस्या के समाधान के लिए अमेरिकी फॉर्मूले को तरजीह न दे डाले, क्योंकि मौजूदा यूपीए सरकार का झुकाव भी अमेरिका की तरफ नजर आता है और विपक्ष भी एकजुट नहीं है। अमेरिकी फॉर्मूले में बुराई सिर्फ इतनी है कि चाहे वह जितना भी निष्पक्ष दिखे, उसमें अमेरिका अपने हितों का खयाल जरूर रखेगा। इसलिए समस्या को नए सिरे से समझने की जरूरत है। राजनीतिक दलों को भी चाहिए कि वे कश्मीर को एक मुद्दे की तरह इस्तेमाल न करें। देश की जनता को कश्मीर समस्या को नए परिप्रेक्ष्य में देखना होगा। पुराने मापदंडों के अनुसार न तो कश्मीर को देखना चाहिए और न ही सरकार को। कुल मिलाकर, फिलहाल समस्या के समाधान के बारे में नहीं, बल्कि उसके लिए माहौल तैयार करने की जरूरत है।
लेबल:
अब्दुल्ला,
कश्मीर,
पाकिस्तान,
बैकरूम डिप्लोमेसी
मंगलवार, 29 जून 2010
नीति-नीतीश
नीतीश कुमार के मन में ठीक-ठीक क्या चल रहा है, कोई नहीं जानता। भाजपा के साथ गठबंधन की सरकार सफलता से चलाई, पर अब कुछ और सोचते लगते हैं। गहरी उधेड़बुन में हैं। अभी मौका मिला तो तेवर दिखा दिया। लेकिन मामला तो गड़बड़ लोकसभा चुनाव से ही लग रहा था। नरें्र मोदी और वरुण की आड़ में मुसलमानों को रिझाने में लगे हैं। लेकिन इस तरह कि सांप भी मरे, लाठी भी न टूटे। भाजपा भी उनके हाथों में एक ऐसे उपकरण की तरह है, जिसे बजाकर वे अपनी पार्टी में भी धाक जमाते-बढ़ाते रहते हैं। नीतीश कुमार की नीति की अंतिम व्याख्या तभी संभव है जब वे उसका खुद खुलासा करें। यह चुनाव के पहले, दौरान या बाद में कभी भी हो सकता है।
बिहार के मुख्यमंत्री हैं नीतीश कुमार। हाल में कोसी राहत कोष के तहत गुजरात के मुख्यमंत्री नरें्र मोदी द्वारा दिए गए पांच करोड़ रुपए का चेक उन्हें लौटाकर चर्चा में आए हैं। हालांकि यह बात बहुत से सीधी-सपाट सोच रखने वाले लोगों के लिए समझ से परे है कि जब चेक लौटाना ही था तो लिया क्यों? लेकिन राजनीति की थोड़ी-बहुत समझ रखने वाले भी अच्छी तरह जानते हैं कि यह सब वोट बैंक की राजनीति का हिस्सा है।
नीतीश कुमार जोर-शोर से राज्य विधानसभा चुनाव की तैयारियों में जुटे हैं और यह कतई नहीं चाहेंगे कि भाजपा, खासकर नरें्र मोदी की वजह से मुसलमान वोट उनसे बिदक जाए। हालांकि मुसलमानों का बहुत समर्थन उन्हें अब भी प्राप्त नहीं है। इसकी एक बड़ी वजह राज्य में भाजपा का उनके साथ होना है। लेकिन चुनाव से ठीक पहले नीतीश कुछ ऐसा खेल करना चाहते थे, जिससे भाजपा और खासकर नरें्र मोदी के प्रति उनका नापसंदगी सामने आए। ऐसा करके वे मुसलमानों को अपनी ओर खींचने की कोशिश करना चाहते थे। इसी कोशिश के तहत उन्होंने गुजरात के मुख्यमंत्री नरें्र मोदी द्वारा दिया गया चेक लौटा दिया और पटना में भाजपा की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक के दौरान पार्टी नेताओं को भोज का निमंत्रण देने के बाद भी उसे रद्द कर दिया। इतने अपमान पर भाजपा का नाराज होना स्वाभाविक था। वह हुई भी, पर इतनी नहीं कि जद (यू) से अलग हो जाए। उसे भी इस जमीनी हकीकत का अंदाजा है कि बिहार में सत्ता का स्वाद उसे जद (यू) के साथ ही मिल सकता है, उसके बगैर नहीं। इसलिए अपमान पर वह तिलमिलाई नहीं, सिर्फ कसमसाकर रह गई और थोड़े ना-नुकुर के बाद फिर मिला लिया हाथ। उप मुख्यमंत्री सुशील मोदी ने पहले तो नीतीश की विश्वास यात्रा का बहिष्कार कर दिया, लेकिन फिर आ गए साथ।
इस पूरे प्रकरण में नीतीश कुमार एक मंङो हुए राजनेता के रूप में सामने आए। लेकिन इसका जो फायदा वे लेना चाहते थे, वह फिलहाल मिलता दिखाई नहीं दे रहा। बहरहाल, बतौर मुख्यमंत्री नीतीश कुमार का यह दूसरा कार्यकाल है। पहला कार्यकाल केवल सात दिन का था। पहली बार वर्ष 2000 में 03 मार्च को उन्होंने मुख्यमंत्री का कार्यभार संभाला था, लेकिन बहुमत साबित नहीं कर पाने की स्थिति में 10 मार्च को ही उन्होंने इस्तीफा दे दिया। इस बीच वे कें्र में मंत्री भी बने और कृषि व रेल मंत्रालय संभाला। इससे पहले भी वे कें्र में विभिन्न मंत्रालयों की जिम्मेदारी संभाल चुके थे। लेकिन वर्ष 2005 के बिहार विधानसभा चुनाव में उनकी पार्टी सबसे बड़े दल के रूप में उभरी और भाजपा के सहयोग से उन्हें राज्य में सरकार बनाने का मौका मिला। नवंबर, 2005 में वे राज्य के मुख्यमंत्री बने। इस बार बहुमत की समस्या आड़े नहीं आई।
अपने दूसरे कार्यकाल में नीतीश ने बिहार की जनता को भाजपा के साथ मिलकर स्थाई सरकार दी। पिछले 15 साल से लालू-राबड़ी के शासन से निराश लोगों को बहुत सी उम्मीदें थी इस सरकार से। बतौर मुख्यमंत्री नीतीश कई उम्मीदों पर खरे भी उतरे। पिछले करीब साढ़े चार साल के शासन के दौरान नीतीश सरकार ने सड़कों व फ्लाईओवर का खूब निर्माण कराया। लेकिन राजधानी पटना सहित कुछ अन्य प्रमुख शहरों को छोड़ दिया जाए तो सड़कों की हालत अब भी बहुत बेहतर नहीं है। बिजली बिहार में एक स्थाई समस्या बनी हुई है। हां, अपराध पर थोड़ा अंकुश जरूर लगा है। शिक्षा को बढ़ावा देने के लिए भी सरकार ने कई कदम उठाए हैं। सबसे बढ़कर उन्होंने राज्य के लोगों को सकरात्मक बदलाव की उम्मीद दी, जिसे वे पिछले 15 साल के लालू-राबड़ी शासन के दौरान खो चुके थे।
अपने इस कार्यकाल के दौरान नीतीश ने काम तो किया ही, उसका प्रचार भी जमकर किया। इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि वर्ष 2005 में नीतीश के मुख्यमंत्री बनने के बाद विज्ञापन पर होने वाला राज्य सरकार का खर्च पहले के मुकाबले पांच गुना बढ़ गया। विज्ञापन नीति में भी साफ कहा गया है कि नकारात्मक खबरें राज्य के हित में नहीं हैं, इसलिए सिर्फ सकारात्मक खबरें आनी चाहिए। बिहार के अखबारों और पत्रिकाओं में छपने वाली खबरों को देखें तो नकारात्मक खबरें लगभग गायब हैं। मीडिया राज्य की साफ-सुथरी छवि पेश कर रही है तो मुख्यमंत्री को ‘विकास पुरुषज् के रूप में। विज्ञापनों के जरिये उन्हें ठीक उसी तरह बिहार का पर्याय बनाने की कोशिश की जा रही है, जसे गुजरात में नरें्र मोदी बन गए हैं।
पिछले करीब साढ़े चार साल के दौरान नीतीश सरकार विवादों में भी आई, जिनमें सबसे बड़ा विवाद भू-सुधार योजना को लेकर है। देवब्रत बंदोपाध्याय समिति की सिफारिशें लागू करने के अंदेशा भर से विधानसभा के 18 सीटों पर हुए उप चुनाव में भाजपा-जद (यू) को केवल छह सीटों पर संतोष करना पड़ा। उप चुनाव के दौरान नीतीश के धुर राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी लालू व रामविलास पासवान ने जम कर इस योजना के बारे में प्रचार किया और कहा कि इसके लागू होने के बाद भू-स्वामी जमीन पर अपना मालिकाना हक खो देंगे और यह उस पर खेती करने वाले को मिल जाएगा। इसे लेकर जद (यू) से असंतुष्ट चल रहे वरिष्ठ नेता दिग्विजय सिंह ने पटना में किसानों की महापंचायत बुलाई थी, जिसमें राज्यभर से करीब एक लाख किसान शामिल हुए थे। चुनाव परिणाम और किसानों की महापंचायत ने नीतीश को इस बात का आभास करवा दिया कि भू-सुधार की इस योजना को लागू करना कांटों पर चलने जसा है। इसलिए फौरन उन्होंने जनता को आश्वस्त किया कि कोई भी अपनी जमीन का मालिकाना हक नहीं खोएगा। यह योजना फिलहाल ठंडे बस्ते में डाल दी गई है।
नीतीश का जन्म एक मार्च, 1951 को बख्तियारपुर में कविराज राम लखन सिंह और परमेश्वरी देवी की संतान के रूप में हुआ। पिता स्वतंत्रता सेनानी थे। इसलिए राजनीतिक जीवन से बचपन से ही रू-ब-रू होते रहे। बिहार कॉलेज ऑफ इंजीनियरिंग से उन्होंने इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग की डिग्री ली। लेकिन 1974-75 में बिहार के छात्र आंदोलन ने उनका रुख इंजीनियरिंग से अलग राजनीति की ओर कर दिया। जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में उन्होंने छात्र आंदोलन में बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया। तब लालू भी उनके साथ थे। दोनों की गिनती कभी घनिष्ठ मित्रों में होती थी, लेकिन राजनीतिक दांव-पेंच ने आज दोनों को एक-दूसरे का प्रतिद्वंद्वी बना दिया है। छात्र आंदोलन ने नीतीश के जीवन की दिशा तय कर दी और फिर वे कभी राजनीति से अलग नहीं हो पाए। पहली बार 1977 में जनता पार्टी के टिकट पर बिहार विधानसभा का चुनाव लड़े, लेकिन जीत 1985 के चुनाव में मिली। फिर 1989 में पहली बार लोकसभा के लिए चुने गए। इसके बाद कई सरकारों में वे मंत्री भी रहे। अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व वाली राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन सरकार में रेल मंत्री के रूप में उनका कार्यकाल काफी चर्चित रहा। इस दौरान गैसल रेल दुर्घटना के बाद इस्तीफा देकर उन्होंने मिसाल कायम की थी।
बिहार के मुख्यमंत्री हैं नीतीश कुमार। हाल में कोसी राहत कोष के तहत गुजरात के मुख्यमंत्री नरें्र मोदी द्वारा दिए गए पांच करोड़ रुपए का चेक उन्हें लौटाकर चर्चा में आए हैं। हालांकि यह बात बहुत से सीधी-सपाट सोच रखने वाले लोगों के लिए समझ से परे है कि जब चेक लौटाना ही था तो लिया क्यों? लेकिन राजनीति की थोड़ी-बहुत समझ रखने वाले भी अच्छी तरह जानते हैं कि यह सब वोट बैंक की राजनीति का हिस्सा है।
नीतीश कुमार जोर-शोर से राज्य विधानसभा चुनाव की तैयारियों में जुटे हैं और यह कतई नहीं चाहेंगे कि भाजपा, खासकर नरें्र मोदी की वजह से मुसलमान वोट उनसे बिदक जाए। हालांकि मुसलमानों का बहुत समर्थन उन्हें अब भी प्राप्त नहीं है। इसकी एक बड़ी वजह राज्य में भाजपा का उनके साथ होना है। लेकिन चुनाव से ठीक पहले नीतीश कुछ ऐसा खेल करना चाहते थे, जिससे भाजपा और खासकर नरें्र मोदी के प्रति उनका नापसंदगी सामने आए। ऐसा करके वे मुसलमानों को अपनी ओर खींचने की कोशिश करना चाहते थे। इसी कोशिश के तहत उन्होंने गुजरात के मुख्यमंत्री नरें्र मोदी द्वारा दिया गया चेक लौटा दिया और पटना में भाजपा की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक के दौरान पार्टी नेताओं को भोज का निमंत्रण देने के बाद भी उसे रद्द कर दिया। इतने अपमान पर भाजपा का नाराज होना स्वाभाविक था। वह हुई भी, पर इतनी नहीं कि जद (यू) से अलग हो जाए। उसे भी इस जमीनी हकीकत का अंदाजा है कि बिहार में सत्ता का स्वाद उसे जद (यू) के साथ ही मिल सकता है, उसके बगैर नहीं। इसलिए अपमान पर वह तिलमिलाई नहीं, सिर्फ कसमसाकर रह गई और थोड़े ना-नुकुर के बाद फिर मिला लिया हाथ। उप मुख्यमंत्री सुशील मोदी ने पहले तो नीतीश की विश्वास यात्रा का बहिष्कार कर दिया, लेकिन फिर आ गए साथ।
इस पूरे प्रकरण में नीतीश कुमार एक मंङो हुए राजनेता के रूप में सामने आए। लेकिन इसका जो फायदा वे लेना चाहते थे, वह फिलहाल मिलता दिखाई नहीं दे रहा। बहरहाल, बतौर मुख्यमंत्री नीतीश कुमार का यह दूसरा कार्यकाल है। पहला कार्यकाल केवल सात दिन का था। पहली बार वर्ष 2000 में 03 मार्च को उन्होंने मुख्यमंत्री का कार्यभार संभाला था, लेकिन बहुमत साबित नहीं कर पाने की स्थिति में 10 मार्च को ही उन्होंने इस्तीफा दे दिया। इस बीच वे कें्र में मंत्री भी बने और कृषि व रेल मंत्रालय संभाला। इससे पहले भी वे कें्र में विभिन्न मंत्रालयों की जिम्मेदारी संभाल चुके थे। लेकिन वर्ष 2005 के बिहार विधानसभा चुनाव में उनकी पार्टी सबसे बड़े दल के रूप में उभरी और भाजपा के सहयोग से उन्हें राज्य में सरकार बनाने का मौका मिला। नवंबर, 2005 में वे राज्य के मुख्यमंत्री बने। इस बार बहुमत की समस्या आड़े नहीं आई।
अपने दूसरे कार्यकाल में नीतीश ने बिहार की जनता को भाजपा के साथ मिलकर स्थाई सरकार दी। पिछले 15 साल से लालू-राबड़ी के शासन से निराश लोगों को बहुत सी उम्मीदें थी इस सरकार से। बतौर मुख्यमंत्री नीतीश कई उम्मीदों पर खरे भी उतरे। पिछले करीब साढ़े चार साल के शासन के दौरान नीतीश सरकार ने सड़कों व फ्लाईओवर का खूब निर्माण कराया। लेकिन राजधानी पटना सहित कुछ अन्य प्रमुख शहरों को छोड़ दिया जाए तो सड़कों की हालत अब भी बहुत बेहतर नहीं है। बिजली बिहार में एक स्थाई समस्या बनी हुई है। हां, अपराध पर थोड़ा अंकुश जरूर लगा है। शिक्षा को बढ़ावा देने के लिए भी सरकार ने कई कदम उठाए हैं। सबसे बढ़कर उन्होंने राज्य के लोगों को सकरात्मक बदलाव की उम्मीद दी, जिसे वे पिछले 15 साल के लालू-राबड़ी शासन के दौरान खो चुके थे।
अपने इस कार्यकाल के दौरान नीतीश ने काम तो किया ही, उसका प्रचार भी जमकर किया। इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि वर्ष 2005 में नीतीश के मुख्यमंत्री बनने के बाद विज्ञापन पर होने वाला राज्य सरकार का खर्च पहले के मुकाबले पांच गुना बढ़ गया। विज्ञापन नीति में भी साफ कहा गया है कि नकारात्मक खबरें राज्य के हित में नहीं हैं, इसलिए सिर्फ सकारात्मक खबरें आनी चाहिए। बिहार के अखबारों और पत्रिकाओं में छपने वाली खबरों को देखें तो नकारात्मक खबरें लगभग गायब हैं। मीडिया राज्य की साफ-सुथरी छवि पेश कर रही है तो मुख्यमंत्री को ‘विकास पुरुषज् के रूप में। विज्ञापनों के जरिये उन्हें ठीक उसी तरह बिहार का पर्याय बनाने की कोशिश की जा रही है, जसे गुजरात में नरें्र मोदी बन गए हैं।
पिछले करीब साढ़े चार साल के दौरान नीतीश सरकार विवादों में भी आई, जिनमें सबसे बड़ा विवाद भू-सुधार योजना को लेकर है। देवब्रत बंदोपाध्याय समिति की सिफारिशें लागू करने के अंदेशा भर से विधानसभा के 18 सीटों पर हुए उप चुनाव में भाजपा-जद (यू) को केवल छह सीटों पर संतोष करना पड़ा। उप चुनाव के दौरान नीतीश के धुर राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी लालू व रामविलास पासवान ने जम कर इस योजना के बारे में प्रचार किया और कहा कि इसके लागू होने के बाद भू-स्वामी जमीन पर अपना मालिकाना हक खो देंगे और यह उस पर खेती करने वाले को मिल जाएगा। इसे लेकर जद (यू) से असंतुष्ट चल रहे वरिष्ठ नेता दिग्विजय सिंह ने पटना में किसानों की महापंचायत बुलाई थी, जिसमें राज्यभर से करीब एक लाख किसान शामिल हुए थे। चुनाव परिणाम और किसानों की महापंचायत ने नीतीश को इस बात का आभास करवा दिया कि भू-सुधार की इस योजना को लागू करना कांटों पर चलने जसा है। इसलिए फौरन उन्होंने जनता को आश्वस्त किया कि कोई भी अपनी जमीन का मालिकाना हक नहीं खोएगा। यह योजना फिलहाल ठंडे बस्ते में डाल दी गई है।
नीतीश का जन्म एक मार्च, 1951 को बख्तियारपुर में कविराज राम लखन सिंह और परमेश्वरी देवी की संतान के रूप में हुआ। पिता स्वतंत्रता सेनानी थे। इसलिए राजनीतिक जीवन से बचपन से ही रू-ब-रू होते रहे। बिहार कॉलेज ऑफ इंजीनियरिंग से उन्होंने इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग की डिग्री ली। लेकिन 1974-75 में बिहार के छात्र आंदोलन ने उनका रुख इंजीनियरिंग से अलग राजनीति की ओर कर दिया। जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में उन्होंने छात्र आंदोलन में बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया। तब लालू भी उनके साथ थे। दोनों की गिनती कभी घनिष्ठ मित्रों में होती थी, लेकिन राजनीतिक दांव-पेंच ने आज दोनों को एक-दूसरे का प्रतिद्वंद्वी बना दिया है। छात्र आंदोलन ने नीतीश के जीवन की दिशा तय कर दी और फिर वे कभी राजनीति से अलग नहीं हो पाए। पहली बार 1977 में जनता पार्टी के टिकट पर बिहार विधानसभा का चुनाव लड़े, लेकिन जीत 1985 के चुनाव में मिली। फिर 1989 में पहली बार लोकसभा के लिए चुने गए। इसके बाद कई सरकारों में वे मंत्री भी रहे। अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व वाली राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन सरकार में रेल मंत्री के रूप में उनका कार्यकाल काफी चर्चित रहा। इस दौरान गैसल रेल दुर्घटना के बाद इस्तीफा देकर उन्होंने मिसाल कायम की थी।
लेबल:
जद (यू),
नरें्र मोदी,
नीतीश कुमार,
भाजपा,
विधानसभा चुनाव
विवादों का अर्जुन
पच्चीस साल पुराना है जख्म, लेकिन अब भी हरा। दर्द और तकलीफ कहीं से भी कम होती नहीं दिखती। कहते हैं, वक्त हर घाव भर देता है; लेकिन यहां यह बात भी लागू नहीं हुई। जिंदगी वक्त के साथ आगे बढ़ती रही। दूसरी व्यस्तताओं और कामकाज ने कई बार जख्म से ध्यान हटा दिया, लेकिन टीस बरकरार रही। इन पच्चीस सालों में कई बार उठी टीस ने जख्म के हरे होने का एहसास कराया। पीड़ित न्याय की गुहार लगाते रहे। न्याय मिला भी उन्हें। पर पच्चीस साल बाद और वह भी आंशिक।
भोपाल की एक अदालत ने दो और तीन दिसंबर, 1984 की रात यूनियन कार्बाइड कंपनी के कारखाने से निकली जानलेवा गैस के मामले में कंपनी के तत्कालीन प्रमुख वारेन एंडरसन को दोषी ठहराते हुए दो साल की सजा सुनाई। निश्चय ही पिछले पच्चीस साल से इंसाफ की बाट जोह रहे पीड़ितों के लिए यह सजा तरह राहत देने वाली नहीं थी। लेकिन इस मामले में मध्य प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री अर्जुन सिंह और कांग्रेस की भूमिका पर उठे सवाल ने पीड़ितों का गुस्सा और भड़का दिया। आरोप है कि बतौर मुख्यमंत्री अर्जुन सिंह ने एंडरसन को विदेश भगाया। तब न केवल राज्य में, बल्कि कें्र में भी कांग्रेस की सरकार थी और राजीव गांधी प्रधानमंत्री थे। पूरे प्रकरण में अर्जुन सिंह की भूमिका संदेह के घेरे में है। कांग्रेस बचाव की म्रुा में है तो भाजपा सहित अन्य विपक्षी दल आक्रामक। अर्जुन सिंह से जवाब सभी मांग रहे हैं। लेकिन वे कहते हैं, उनके पास कहने के लिए कुछ है ही नहीं।
अस्सी वर्षीय कांग्रेस के वरिष्ठ नेता अपने अब तक के लंबे राजनीतिक कॅरियर में बस कुछ दिनों के लिए पार्टी से अलग हुए। वे नेहरू-गांधी परिवार के करीबी रहे हैं, पर सोनिया गांधी के करीब नहीं रह पाए। कई मौके आए जब परिवार के प्रति वफादारी के बदले उन्हें बेहतर ईनाम की उम्मीद रही, लेकिन हुआ ठीक उल्टा। उन्हें और उनकी पत्नी सरोज देवी को इसका मलाल भी है। ‘अर्जुन सिंह : एक सहयात्री इतिहास काज् नाम से उनकी राजनीतिक जीवनी लिखने वाले वरिष्ठ पत्रकार राम शरण जोशी ने वर्ष 2007 में अर्जुन सिंह को राष्ट्रपति नहीं बनाने के मुद्दे पर सरोज देवी को बड़ी बेबाकी से यह कहते हुए उद्धृत किया है, ‘अगर मैडम (सोनिया गांधी) उन्हें राष्ट्रपति बना देतीं, तो उनका क्या चला जाता?ज्
अर्जुन सिंह को इस बात का भी मलाल है कि राजीव गांधी की हत्या के बाद सोनिया गांधी को सार्वजनिक जीवन में सक्रिय करने में अहम भूमिका निभाने के बावजूद संप्रग अध्यक्ष ने कभी उनकी सेवाओं को वह सम्मान नहीं दिया, जिसके वे हकदार थे। प्रधानमंत्री, राष्ट्रपति की कुर्सी से तो उन्हें दूर रखा ही गया; पार्टी में उनके बाद शीर्ष के दूसरे ताकतवर नेता का दर्जा भी नहीं दिया गया। लेकिन इन शिकायतों के बावजूद पार्टी व नेहरू-गांधी परिवार के लिए उनकी वफादारी कम नहीं हुई। उन्होंने राहुल गांधी को भविष्य के युवा प्रधानमंत्री ने पेश किया। तब इसे उनकी चाटुकारिता कहा गया, लेकिन आज वही राग मौजूदा प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और कांग्रेस के दूसरे नेता भी अलाप रहे हैं।
संप्रग सरकार के पहले कार्यकाल के दौरान अर्जुन सिंह को मानव संसाधन विकास मंत्रालय की जिम्मेदारी सौंपी गई थी और तब उन्होंने लोगों को एकबार फिर मंडल कमीशन की सिफारिशों की याद दिला दी, जिसे लागू कर सरकारी नौकरियों में पिछड़ी जाति के उम्मीदवारों के लिए आरक्षण का प्रावधान किया गया था और जिसके बाद पूरा देश सुलग उठा था। एकबार फिर उसी राह पर चलते हुए अर्जुन सिंह ने सरकारी व मान्यता प्राप्त विश्वविद्यालयों में पिछड़ी जाति के छात्रों के लिए नामांकन में भी आरक्षण का प्रावधान किया। इस निर्णय के बाद एकबार फिर छात्र सड़कों पर उतर आए, लेकिन अर्जुन सिंह अपने फैसले से पीछे नहीं हटे। इसे कांग्रेस के लिए वोट बैंक बनाने और खुद को पिछड़ों का मसीहा बनाने की अर्जुन ¨सह की कोशिश के रूप में देखा गया।
एक राजनीतिज्ञ के रूप में अर्जुन सिंह के साथ विवाद अक्सर जुड़े रहे। मध्य प्रदेश के रेवा जिले के चुरहट से ताल्लुक रखने वाले अर्जुन सिंह के पिता राव शिव बहादुर सिंह भी राजनीति से जुड़े थे। 1980 के दशक में मध्य प्रदेश का मुख्यमंत्री रहते हुए उन पर चुरहट लॉटरी मामले में भी संलिप्तता के आरोप लगे। कहा गया कि उन्होंने नकली लॉटरी की व्यवस्था करने वालों की मदद की। उन पर उत्तर प्रदेश सरकार ने दहेज उत्पीड़न का मामला भी दर्ज किया है, जिसमें अभियोग उनकी प्रपौत्री के पिता ने लगाया है। पीवी नरसिम्हा राव सरकार में भी वे मंत्री थे, लेकिन बाबरी मस्जिद विध्वंस के बाद उन्होंने इस्तीफा दे दिया। उन्होंने राव पर हिंदू विचारधारा की ओर झुकाव का आरोप भी लगाया। राव सरकार से इस्तीफे के बाद उन्होंने कांग्रेस भी छोड़ दिया और उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री नारायण दत्त तिवारी के साथ मिलकर ऑल इंडिया इंदिरा कांग्रेस (तिवारी) का गठन किया। लेकिन पार्टी 1996 में लोकसभा चुनाव हार गई। उधर, कांग्रेस को भी हार का सामना करना पड़ा और वह सत्ता से बाहर हो गई। इसके बाद अर्जुन ¨सह और नारायण दत्त तिवारी दोनों कांग्रेस में लौट आए। उन पर संप्रग सरकार के पहले कार्यकाल में मानव संसाधन विकास मंत्री रहते हुए घाटे में चल रही शिक्षण संस्थाओं को भी मान्यता प्राप्त विश्वविद्यालय का दर्जा देने का आरोप है। वे तीन बार मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री रह चुके हैं और एकबार पंजाब के राज्यपाल। हालांकि पंजाब के राज्यपाल के रूप में उनका कार्यकाल काफी छोटा था, लेकिन इस बीच उन्होंने पंजाब में शांति बहाल करने के लिए राजीव-लौंगवाल समझौता पर सराहनीय कार्य किया। उन्हें वर्ष 2000 में सर्वश्रेष्ठ सांसद का अवार्ड भी मिला।
भोपाल की एक अदालत ने दो और तीन दिसंबर, 1984 की रात यूनियन कार्बाइड कंपनी के कारखाने से निकली जानलेवा गैस के मामले में कंपनी के तत्कालीन प्रमुख वारेन एंडरसन को दोषी ठहराते हुए दो साल की सजा सुनाई। निश्चय ही पिछले पच्चीस साल से इंसाफ की बाट जोह रहे पीड़ितों के लिए यह सजा तरह राहत देने वाली नहीं थी। लेकिन इस मामले में मध्य प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री अर्जुन सिंह और कांग्रेस की भूमिका पर उठे सवाल ने पीड़ितों का गुस्सा और भड़का दिया। आरोप है कि बतौर मुख्यमंत्री अर्जुन सिंह ने एंडरसन को विदेश भगाया। तब न केवल राज्य में, बल्कि कें्र में भी कांग्रेस की सरकार थी और राजीव गांधी प्रधानमंत्री थे। पूरे प्रकरण में अर्जुन सिंह की भूमिका संदेह के घेरे में है। कांग्रेस बचाव की म्रुा में है तो भाजपा सहित अन्य विपक्षी दल आक्रामक। अर्जुन सिंह से जवाब सभी मांग रहे हैं। लेकिन वे कहते हैं, उनके पास कहने के लिए कुछ है ही नहीं।
अस्सी वर्षीय कांग्रेस के वरिष्ठ नेता अपने अब तक के लंबे राजनीतिक कॅरियर में बस कुछ दिनों के लिए पार्टी से अलग हुए। वे नेहरू-गांधी परिवार के करीबी रहे हैं, पर सोनिया गांधी के करीब नहीं रह पाए। कई मौके आए जब परिवार के प्रति वफादारी के बदले उन्हें बेहतर ईनाम की उम्मीद रही, लेकिन हुआ ठीक उल्टा। उन्हें और उनकी पत्नी सरोज देवी को इसका मलाल भी है। ‘अर्जुन सिंह : एक सहयात्री इतिहास काज् नाम से उनकी राजनीतिक जीवनी लिखने वाले वरिष्ठ पत्रकार राम शरण जोशी ने वर्ष 2007 में अर्जुन सिंह को राष्ट्रपति नहीं बनाने के मुद्दे पर सरोज देवी को बड़ी बेबाकी से यह कहते हुए उद्धृत किया है, ‘अगर मैडम (सोनिया गांधी) उन्हें राष्ट्रपति बना देतीं, तो उनका क्या चला जाता?ज्इससे पहले वर्ष 2004 में भी जब सोनिया ने प्रधानमंत्री पद पर अपनी दावेदारी छोड़ते हुए मनमोहन सिंह को आगे किया था, तब भी अर्जुन ¨सह आहत हुए थे। और तब, मंच पर सार्वजनिक रूप से उनकी आंखों से आंसू छलक आए थे, जब पिछले साल लोकसभा चुनाव के दौरान कांग्रेस हाईकमान ने उनकी बेटी वीणा सिंह को सीधी और बेटे अजय सिंह को सतना संसदीय क्षेत्र से टिकट देने से मना कर दिया। लेकिन इसके बावजूद पार्टी के एक अनुशासित कार्यकर्ता के रूप में उन्होंने चुनाव के दौरान कांग्रेस के लिए प्रचार करने की बात कही।
संप्रग सरकार के पहले कार्यकाल के दौरान अर्जुन सिंह को मानव संसाधन विकास मंत्रालय की जिम्मेदारी सौंपी गई थी और तब उन्होंने लोगों को एकबार फिर मंडल कमीशन की सिफारिशों की याद दिला दी, जिसे लागू कर सरकारी नौकरियों में पिछड़ी जाति के उम्मीदवारों के लिए आरक्षण का प्रावधान किया गया था और जिसके बाद पूरा देश सुलग उठा था। एकबार फिर उसी राह पर चलते हुए अर्जुन सिंह ने सरकारी व मान्यता प्राप्त विश्वविद्यालयों में पिछड़ी जाति के छात्रों के लिए नामांकन में भी आरक्षण का प्रावधान किया। इस निर्णय के बाद एकबार फिर छात्र सड़कों पर उतर आए, लेकिन अर्जुन सिंह अपने फैसले से पीछे नहीं हटे। इसे कांग्रेस के लिए वोट बैंक बनाने और खुद को पिछड़ों का मसीहा बनाने की अर्जुन ¨सह की कोशिश के रूप में देखा गया।
एक राजनीतिज्ञ के रूप में अर्जुन सिंह के साथ विवाद अक्सर जुड़े रहे। मध्य प्रदेश के रेवा जिले के चुरहट से ताल्लुक रखने वाले अर्जुन सिंह के पिता राव शिव बहादुर सिंह भी राजनीति से जुड़े थे। 1980 के दशक में मध्य प्रदेश का मुख्यमंत्री रहते हुए उन पर चुरहट लॉटरी मामले में भी संलिप्तता के आरोप लगे। कहा गया कि उन्होंने नकली लॉटरी की व्यवस्था करने वालों की मदद की। उन पर उत्तर प्रदेश सरकार ने दहेज उत्पीड़न का मामला भी दर्ज किया है, जिसमें अभियोग उनकी प्रपौत्री के पिता ने लगाया है। पीवी नरसिम्हा राव सरकार में भी वे मंत्री थे, लेकिन बाबरी मस्जिद विध्वंस के बाद उन्होंने इस्तीफा दे दिया। उन्होंने राव पर हिंदू विचारधारा की ओर झुकाव का आरोप भी लगाया। राव सरकार से इस्तीफे के बाद उन्होंने कांग्रेस भी छोड़ दिया और उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री नारायण दत्त तिवारी के साथ मिलकर ऑल इंडिया इंदिरा कांग्रेस (तिवारी) का गठन किया। लेकिन पार्टी 1996 में लोकसभा चुनाव हार गई। उधर, कांग्रेस को भी हार का सामना करना पड़ा और वह सत्ता से बाहर हो गई। इसके बाद अर्जुन ¨सह और नारायण दत्त तिवारी दोनों कांग्रेस में लौट आए। उन पर संप्रग सरकार के पहले कार्यकाल में मानव संसाधन विकास मंत्री रहते हुए घाटे में चल रही शिक्षण संस्थाओं को भी मान्यता प्राप्त विश्वविद्यालय का दर्जा देने का आरोप है। वे तीन बार मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री रह चुके हैं और एकबार पंजाब के राज्यपाल। हालांकि पंजाब के राज्यपाल के रूप में उनका कार्यकाल काफी छोटा था, लेकिन इस बीच उन्होंने पंजाब में शांति बहाल करने के लिए राजीव-लौंगवाल समझौता पर सराहनीय कार्य किया। उन्हें वर्ष 2000 में सर्वश्रेष्ठ सांसद का अवार्ड भी मिला।
लेबल:
अर्जुन सिंह,
एंडरसन,
भोपाल,
यूनियन कार्बाइड कंपनी
उम्र छोटी, उपलब्धि बड़ी
उम्र सिर्फचौदह साल, लेकिन उपलब्धियां कईगुना अधिक।आंखोंमेंसपने हैंऔर उन्हेंपूरा करने का माद्दा भी। कई सपने पूरे हुए हैं, तो कुछ बाकी हैं। यह कोई और नहीं, आईआईटी-जेईई की प्रवेश परीक्षा में दिल्ली जोन का टॉपर और पूरे देश में 33वां स्थान हासिल करने वाला सहल कौशिक है। आंखों पर चश्मा लगाए चौदह साल का सहल पहली नजर में अपनी उम्र के दूसरे बच्चों सा ही दिखता है, लेकिन थोड़ा गौर से देखो तो यह ‘भीड़ से अलगज् और इसकी दुनिया दूसरे बच्चों से अलग दिखती है। उसे करीब से देखने व समझने वाला शायद ही कह सकता है कि उसका दिमाग कभी खाली रहता है। मानो कुछ न कुछ इसमें चल रहा है। शायद कोई कैल्कुलेशन या शोध।
सहल ने दस साल तक घर में पढ़ाई की, क्योंकि मां को लगा कि यदि इसे स्कूल भेजा जाता है तो यह आगे बढ़ने की बजाए और पीछे चला जाएगा। निश्चय ही यह फैसला बेहद हिम्मतभरा था, खासकर ऐसे समय में, जबकि हर मां-बाप अपने बच्चे को अच्छे से अच्छे स्कूल में दाखिला दिलाने की कोशिश में लगे रहते हैं। सहल की मां का यह फैसला जाहिर तौर पर बेटे की प्रतिभा में उनके अटूट शिस को दर्शाता है। उन्होंने बेटे के लिए अपने कॅरियर को भी दां पर लगाने से परहेज नहीं किया और डॉक्टर की प्रैक्टिस छोड़ दी। हालांकि तब उनके फैसले पर साल उठानेोले और उन्हें यह कहनेोले बहुत थे कि अपनी पढ़ाई-लिखाई को े बेकार कर रही हैं, लेकिन अब सब चुप हैं। सहल ने सबको जाब दे दिया है। उसकी प्रतिभा पर संदेह करनेोलों को भी और मां के फैसले पर साल उठानेोलों को भी। मां भी खुश हैं और उन्हें लगता है कि उनकी पढ़ाई कहीं बेकार नहीं गई, बल्कि यह तो उन्होंने अपने बेटे तक पहुंचाई और बेटे ने उसे सार्थक कर दिखाया।
मां ने बेटे की प्रतिभा तभी पहचान ली थी, जब ह महज दो-ढाई साल का था। इस छोटी सी उम्र में ह गणित के कई साल चुटकियों में हल कर लेता था। अंग्रेजी के लंबे-लंबे शब्द उसे याद थे और कतिाएं भी। चार साल की उम्र तक उसने सौ तक के टेबल भी याद कर लिए थे और छह साल में एचजी ेल्स की पुस्तक ‘टाइम मशीनज् पढ़ डाली थी। बेटे को घर में पढ़ाने का निश्चय करनेोली रुचि कौशिक ने उसके लिए लाखों की लागत से घर में ही लाइब्रेरी बनाई, जिसमें दो हजार से अधिक पुस्तकें हैं।
दस साल तक बेटे को घर में पढ़ानेोली रुचि शयद ही कभी उसे स्कूल भेजतीं, अगर आईआईटी के लिए 12ीं पास होना जरूरी नहीं होता। दस साल की उम्र में 2006 में उन्होंने बेटे का दाखिला नौीं में कराया। साल 2008 में उसने दसीं की परीक्षा पास की और 2010 में बारहीं की। हालांकि अंक दोनों ही कक्षाओं में औसत से बस थोड़ा बेहतर आया। दसीं में सहल को 76 प्रतिशत तो बारहीं में 73 प्रतिशत अंक मिले। यह अंक आईआईटी की तैयारी करनेोले किसी छात्र या उसके अभिभाकों के लिए निराशाभरा हो सकता है, लेकिन इससे न तो सहल निराश हुआ और न ही उसकी मां रुचि। रुचि को पूरा यकीन था कि भले ही यह अंक दिल्ली श्ििद्यालय के किसी अच्छे कॉलेज में दाखिले के लिए पर्याप्त नहीं है, लेकिन इससे उनके बेटे के आईआईटी निकालने पर कोई असर नहीं होगा और हुआ भी यही।
सहल के शिक्षक उदय प्रताप सिंह, जो रुचि कौशिक के बाद उसकी प्रतिभा को पहचाननेोले दूसरे शख्स हैं, कहते हैं कि दसीं और बारहीं का अंक किसी छात्र की प्रतिभा का मानक नहीं है। आईआईटी सहित किसी भी परीक्षा की तैयारी के लिए छात्रों को रटने के बजाय षिय को समझने पर जोर देना चाहिए। सहल ने ही किया और नतीजा सबके सामने है। हालांकि े यह भी कहते हैं कि निश्चय ही सहल जसा दिमाग सबके पास नहीं होता। लेकिन उसने षिय को समझने का जो तरीका अपनाया, उससे तो सीख ली ही जा सकती है। सहल की कामयाबी आईआईटी की तैयारी करनेोले दूसरे बच्चों के लिए एक संदेश भी है कि े रट्टूमल न बनें, बल्कि षिय को समझने पर जोर दें।
सहल ने इस मिथक को भी तोड़ा कि आईआईटी की प्रेश परीक्षा में सफल होने के लिए 12 से 15 घंटे पढ़ाई करने की जरूरत है। कोचिंग में छह घंटे की पढ़ाई के अलाा घर में बस एक से दो घंटे का क्त पढ़ाई पर दिया। उसमें भी ऐसा नहीं कि सिर्फ ज्ञिान और गणित की पुस्तकें पढ़ते रहे, बल्कि साथ-साथ कहानियों और इतिहास की किताबें भी पढ़ते रहे। दरअसल, कहानियों, उपन्यासों और इतिहास की किताबों से यह लगा आज से नहीं, बल्कि तब से है, जब से मां ने सहल को घर में ही पढ़ाने का फैसला किया। रुचि बताती हैं कि घर में उन्होंने सहल के लिए किसी षिेष शिक्षा की व्यस्था नहीं की, बल्कि सामान्य ज्ञान आधारित मिली-जुली शिक्षा पर जोर दिया। यही जह रही कि अब तक ह इतिहास कहानियों की कई किताबें, उपन्यास आदि पढ़ चुका है। हैरी पॉटर श्रंखला की सभी किताबें भी ह पढ़ चुका है।
बेहद संकोची स्भा का दिखनेोला सहल क्याोस्त में ऐसा ही है? जाब में उसकी मां रुचि कहती हैं, नहीं। सहल घुलता-मिलता है, लेकिन उन्हीं लोगों से जिन्हें वह चाहता है। इस छोटी सी उम्र में अंतर्राष्ट्रीय स्तर की कई प्रतियोगिताएं जीत चुके सहल को देश के बाहर अपनी उम्र के बच्चों के साथ घुलने-मिलने में कोई दिक्कत नहीं हुई। कोचिंग में भी सहल को ऐसी कोई दिक्कत नहीं हुई। हां, जब कोई अपरिचित व्यक्ति या खासकर मीडियाोले कुछ साल करते हैं तो जाब देने से पहले ह सोचता है या फिर मां की ओर देखता है। शायद इसलिए, क्योंकि मां उसे संबल, साहस, हौसला और आत्मशिस देती है।
चौदह साल का सहल सबके बीच में रहते हुए भी कभी-कभी हां से अलग दिखता है। उसे देखो तो लगता नहीं कि ह सबके बीच में बैठकर उनकी बातें सुन रहा है, बल्कि ह गणित के किसी साल को हल करने या भौतिकी के किसी पहलू के बारे में सोचता दिखता है। आईआईटी करनेोले हजारों बच्चों से अलग सहल की इच्छा इंजीनियर बनने की नहीं, बल्कि खुद को एक शोधकर्ता के रूप में देखने की है। ह भौतिकी में शोध करना चाहता है। इसलिए उसने आईआईटी कानपुर से पांच साल के इंटिग्रेटेड कोर्स में दाखिला लेना तय किया है। मैक्सेल, आइंसटीन और न्यूटन उसके हीरो हैं और ह उन्हीं की तरह बनना चाहता है।
सबसे कम उम्र में आईआईटी निकालनेोले सहल की उपलब्धियां यहीं तक नहीं हैं। एक साल पहले यानी 2009 में ह एशियन फिजिक्स ओलंपियाड में सिल्र मेडल जीत चुका है। इस साल हुई इसी प्रतियोगिता में उसने कांस्य पदक हासिल किया। किशोर ैज्ञानिक प्रोत्साहन योजना की स्कॉलरशिप भी उसकी उपलब्धियों के खाते में है। 2009 में जापान में हुए एशिया स्कूल कैंप का भी ह सदस्य रह चुका है। पढ़ाई से इतर सहल के शौक की बात की जाए, तो यहां भी ह दूसरे बच्चों से अलग दिखता है। आजकल के बच्चों को जहां आधुनिक संगीत आकर्षित करता है, हीं सहल को पुराने संगीत खासे पसंद हैं, खासकर किशोर कुमार के गाए गीत। घर में मां के हाथ का बना खाना खूब भाता है तो बाहर चाइनीज और मेक्सिन खाने भी पसंद हैं। खाली क्त में बैडमिंटन खेलना, तैराकी, घुड़सारी, ताइक्वांडो और र्पतारोहण भी पसंद है। इन सबका मौका खासतौर पर तब मिलता है, जब छुट्टियां बिताने ह पिता टीके कौशिक के पास असम पहुंचता है, जो सेना के अधिकारी हैं और फिलहाल असम के तेजपुर में तैनात हैं।
सहल ने दस साल तक घर में पढ़ाई की, क्योंकि मां को लगा कि यदि इसे स्कूल भेजा जाता है तो यह आगे बढ़ने की बजाए और पीछे चला जाएगा। निश्चय ही यह फैसला बेहद हिम्मतभरा था, खासकर ऐसे समय में, जबकि हर मां-बाप अपने बच्चे को अच्छे से अच्छे स्कूल में दाखिला दिलाने की कोशिश में लगे रहते हैं। सहल की मां का यह फैसला जाहिर तौर पर बेटे की प्रतिभा में उनके अटूट शिस को दर्शाता है। उन्होंने बेटे के लिए अपने कॅरियर को भी दां पर लगाने से परहेज नहीं किया और डॉक्टर की प्रैक्टिस छोड़ दी। हालांकि तब उनके फैसले पर साल उठानेोले और उन्हें यह कहनेोले बहुत थे कि अपनी पढ़ाई-लिखाई को े बेकार कर रही हैं, लेकिन अब सब चुप हैं। सहल ने सबको जाब दे दिया है। उसकी प्रतिभा पर संदेह करनेोलों को भी और मां के फैसले पर साल उठानेोलों को भी। मां भी खुश हैं और उन्हें लगता है कि उनकी पढ़ाई कहीं बेकार नहीं गई, बल्कि यह तो उन्होंने अपने बेटे तक पहुंचाई और बेटे ने उसे सार्थक कर दिखाया।
मां ने बेटे की प्रतिभा तभी पहचान ली थी, जब ह महज दो-ढाई साल का था। इस छोटी सी उम्र में ह गणित के कई साल चुटकियों में हल कर लेता था। अंग्रेजी के लंबे-लंबे शब्द उसे याद थे और कतिाएं भी। चार साल की उम्र तक उसने सौ तक के टेबल भी याद कर लिए थे और छह साल में एचजी ेल्स की पुस्तक ‘टाइम मशीनज् पढ़ डाली थी। बेटे को घर में पढ़ाने का निश्चय करनेोली रुचि कौशिक ने उसके लिए लाखों की लागत से घर में ही लाइब्रेरी बनाई, जिसमें दो हजार से अधिक पुस्तकें हैं।
दस साल तक बेटे को घर में पढ़ानेोली रुचि शयद ही कभी उसे स्कूल भेजतीं, अगर आईआईटी के लिए 12ीं पास होना जरूरी नहीं होता। दस साल की उम्र में 2006 में उन्होंने बेटे का दाखिला नौीं में कराया। साल 2008 में उसने दसीं की परीक्षा पास की और 2010 में बारहीं की। हालांकि अंक दोनों ही कक्षाओं में औसत से बस थोड़ा बेहतर आया। दसीं में सहल को 76 प्रतिशत तो बारहीं में 73 प्रतिशत अंक मिले। यह अंक आईआईटी की तैयारी करनेोले किसी छात्र या उसके अभिभाकों के लिए निराशाभरा हो सकता है, लेकिन इससे न तो सहल निराश हुआ और न ही उसकी मां रुचि। रुचि को पूरा यकीन था कि भले ही यह अंक दिल्ली श्ििद्यालय के किसी अच्छे कॉलेज में दाखिले के लिए पर्याप्त नहीं है, लेकिन इससे उनके बेटे के आईआईटी निकालने पर कोई असर नहीं होगा और हुआ भी यही।
सहल के शिक्षक उदय प्रताप सिंह, जो रुचि कौशिक के बाद उसकी प्रतिभा को पहचाननेोले दूसरे शख्स हैं, कहते हैं कि दसीं और बारहीं का अंक किसी छात्र की प्रतिभा का मानक नहीं है। आईआईटी सहित किसी भी परीक्षा की तैयारी के लिए छात्रों को रटने के बजाय षिय को समझने पर जोर देना चाहिए। सहल ने ही किया और नतीजा सबके सामने है। हालांकि े यह भी कहते हैं कि निश्चय ही सहल जसा दिमाग सबके पास नहीं होता। लेकिन उसने षिय को समझने का जो तरीका अपनाया, उससे तो सीख ली ही जा सकती है। सहल की कामयाबी आईआईटी की तैयारी करनेोले दूसरे बच्चों के लिए एक संदेश भी है कि े रट्टूमल न बनें, बल्कि षिय को समझने पर जोर दें।
सहल ने इस मिथक को भी तोड़ा कि आईआईटी की प्रेश परीक्षा में सफल होने के लिए 12 से 15 घंटे पढ़ाई करने की जरूरत है। कोचिंग में छह घंटे की पढ़ाई के अलाा घर में बस एक से दो घंटे का क्त पढ़ाई पर दिया। उसमें भी ऐसा नहीं कि सिर्फ ज्ञिान और गणित की पुस्तकें पढ़ते रहे, बल्कि साथ-साथ कहानियों और इतिहास की किताबें भी पढ़ते रहे। दरअसल, कहानियों, उपन्यासों और इतिहास की किताबों से यह लगा आज से नहीं, बल्कि तब से है, जब से मां ने सहल को घर में ही पढ़ाने का फैसला किया। रुचि बताती हैं कि घर में उन्होंने सहल के लिए किसी षिेष शिक्षा की व्यस्था नहीं की, बल्कि सामान्य ज्ञान आधारित मिली-जुली शिक्षा पर जोर दिया। यही जह रही कि अब तक ह इतिहास कहानियों की कई किताबें, उपन्यास आदि पढ़ चुका है। हैरी पॉटर श्रंखला की सभी किताबें भी ह पढ़ चुका है।
बेहद संकोची स्भा का दिखनेोला सहल क्याोस्त में ऐसा ही है? जाब में उसकी मां रुचि कहती हैं, नहीं। सहल घुलता-मिलता है, लेकिन उन्हीं लोगों से जिन्हें वह चाहता है। इस छोटी सी उम्र में अंतर्राष्ट्रीय स्तर की कई प्रतियोगिताएं जीत चुके सहल को देश के बाहर अपनी उम्र के बच्चों के साथ घुलने-मिलने में कोई दिक्कत नहीं हुई। कोचिंग में भी सहल को ऐसी कोई दिक्कत नहीं हुई। हां, जब कोई अपरिचित व्यक्ति या खासकर मीडियाोले कुछ साल करते हैं तो जाब देने से पहले ह सोचता है या फिर मां की ओर देखता है। शायद इसलिए, क्योंकि मां उसे संबल, साहस, हौसला और आत्मशिस देती है।
चौदह साल का सहल सबके बीच में रहते हुए भी कभी-कभी हां से अलग दिखता है। उसे देखो तो लगता नहीं कि ह सबके बीच में बैठकर उनकी बातें सुन रहा है, बल्कि ह गणित के किसी साल को हल करने या भौतिकी के किसी पहलू के बारे में सोचता दिखता है। आईआईटी करनेोले हजारों बच्चों से अलग सहल की इच्छा इंजीनियर बनने की नहीं, बल्कि खुद को एक शोधकर्ता के रूप में देखने की है। ह भौतिकी में शोध करना चाहता है। इसलिए उसने आईआईटी कानपुर से पांच साल के इंटिग्रेटेड कोर्स में दाखिला लेना तय किया है। मैक्सेल, आइंसटीन और न्यूटन उसके हीरो हैं और ह उन्हीं की तरह बनना चाहता है।
सबसे कम उम्र में आईआईटी निकालनेोले सहल की उपलब्धियां यहीं तक नहीं हैं। एक साल पहले यानी 2009 में ह एशियन फिजिक्स ओलंपियाड में सिल्र मेडल जीत चुका है। इस साल हुई इसी प्रतियोगिता में उसने कांस्य पदक हासिल किया। किशोर ैज्ञानिक प्रोत्साहन योजना की स्कॉलरशिप भी उसकी उपलब्धियों के खाते में है। 2009 में जापान में हुए एशिया स्कूल कैंप का भी ह सदस्य रह चुका है। पढ़ाई से इतर सहल के शौक की बात की जाए, तो यहां भी ह दूसरे बच्चों से अलग दिखता है। आजकल के बच्चों को जहां आधुनिक संगीत आकर्षित करता है, हीं सहल को पुराने संगीत खासे पसंद हैं, खासकर किशोर कुमार के गाए गीत। घर में मां के हाथ का बना खाना खूब भाता है तो बाहर चाइनीज और मेक्सिन खाने भी पसंद हैं। खाली क्त में बैडमिंटन खेलना, तैराकी, घुड़सारी, ताइक्वांडो और र्पतारोहण भी पसंद है। इन सबका मौका खासतौर पर तब मिलता है, जब छुट्टियां बिताने ह पिता टीके कौशिक के पास असम पहुंचता है, जो सेना के अधिकारी हैं और फिलहाल असम के तेजपुर में तैनात हैं।
सदस्यता लें
संदेश (Atom)

































