मंगलवार, 27 अप्रैल 2010

मुखर मनोहर

शशांक मनोहर की खास बात यह है कि वे मितभाषी हैं, पर दो टूक बोलने में नहीं हिचकते। क्रिकेट की दुनिया में उनकी तरक्की का ग्राफ शरद पवार के दबदबे के साथ बढ़ता गया। राजनीतिक मोर्चे पर पवार के सिपहसालार प्रफुल्ल पटेल हैं तो क्रिकेट में शशांक। लेकिन कुछ अदद आरोपों और बीसीसीआई के कुछेक अहम फैसलों के अलावा बोर्ड के मौजूदा अध्यक्ष का अपना कोई व्यक्तित्व उभर कर नहीं आया था। वो तो ललित मोदी का कारनामा जब रंग लाया और आईपीएल के पिटारे से अजीबोगरीब प्रेत निकलने शुरू हुए तो शशांक मनोहर का कद भी बढ़ने लगा। मोदी का जवाब फौरी तौर मनोहर दिख रहे हैं। वे अब मुखर हैं। मोदी को तुर्की-ब-तुर्की जवाब देने में लगे हैं। अंतत: किसका सवाल पिटेगा और किसका जवाब हिट होगा, यह देखना दिलचस्प रहेगा।



भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड (बीसीसीआई) के अध्यक्ष हैं शशांक मनोहर। कम, पर स्पष्ट व असरदार बोलने के लिए जाने जाते हैं। आईपीएल विवाद सामने आया तो बीसीसीआई भी हरकत में आई और इसके अध्यक्ष के स्वर भी मुखर हुए। उन्होंने इंडियन प्रीमियर लीग (आईपीएल) के कमिश्नर ललित मोदी पर ‘गोपनीयताज् के नियम का उल्लंघन करने आरोप लगाया। कहा कि ट्विटर के जरिये शेयरधारकों के नाम सार्वजनिक कर मोदी ने बोर्ड और फ्रेंचाइजी में हुए समझौते का उल्लंघन किया, जिसके कारण बोर्ड कानूनी झमेले में पड़ सकता है।

मोदी और मनोहर दोनों बीसीसीआई के पूर्व अध्यक्ष शरद पवार के करीबी हैं, लेकिन आईपीएल विवाद गहराया तो दोनों आमने-सामने आ गए। मनोहर ने मोदी को ‘खेल माफियाज् तक कह दिया। इस बीच चर्चा यह भी आई कि मोदी की जिम्मेदारी मनोहर को सौंपी जा सकती है। वे आईपीएल कमिश्नर का कार्यभार संभाल सकते हैं। लेकिन आईपीएल कमिश्नर के रूप में उनकी पारी बेहद चुनौतीपूर्ण होगी, क्योंकि आईपीएल की विभिन्न टीम के मालिकों की पसंद आज भी मोदी हैं। उन्हें संशय है कि शशांक शायद ही उस जिम्मेदारी को बखूबी निबाह सकें, जिसे पिछले तीन साल से मोदी निबाह रहे हैं। हालांकि फिलहाल मोदी के बाद आईपीएल कमिश्नर के रूप में रवि शास्त्री और राजीव शुक्ला का नाम भी सामने आ रहा है। बहरहाल, इस बारे में अंतिम फैसला सोमवार को आईपीएल की गवर्निग काउंसिल की बैठक में होगा।

शशांक मनोहर पवार की उस टीम का हिस्सा रहे हैं, जिसके माध्यम से उन्होंने बीसीसीआई के पूर्व अध्यक्ष जगमोहन डालमिया को किनारे करने की रणनीति अपनाई, जो 2006 में पवार के बीसीसीआई अध्यक्ष बनने के बाद भी काफी प्रभावी थे। ललित मोदी के बड़बोलेपन से अलग शशांक मनोहर बेहद कम, पर स्पष्ट बोलने के लिए जाने जाते हैं। 2008 में पवार के बाद बीसीसीआई के अध्यक्ष की कुर्सी संभालने के बाद उन्होंने खिलाड़ियों से लेकर चयन समिति तक के मामले में कई महत्वपूर्ण फैसले लिए। वर्ष 2007 में जब भारतीय क्रिकेट टीम वर्ल्ड कप हार गई तो उन्होंने खिलाड़ियों को प्रदर्शन के आधार पर मेहनताना देने का सुझाव दिया। उनका यह सुझाव सुर्खियों में रहा। चयन समिति के संदर्भ में भी उन्होंने कहा था कि इसमें केवल उन्हीं खिलाड़ियों को शामिल किया जाए, जिन्होंने नियुक्ति से 10 साल पहले अपना आखिरी अंतर्राष्ट्रीय मैच खेला हो। वे इस बात में यकीन करते हैं कि भारत में क्रिकेट को बेचने के लिए किसी विशेष बाजार की जरूरत नहीं है, बल्कि यह खुद-ब-खुद अपना बाजार तैयार कर लेता है। मनोहर का चुनाव भी बेहद दिलचस्प रहा। सितंबर 2007 में जब उनका चुनाव हुआ तो सामने प्रतिद्वंद्वी के रूप में कोई नहीं था। सेंट्रल जोन से वे एक मात्र उम्मीदवार थे।

मनोहर मूलत: महाराष्ट्र के नागपुर से संबंध रखते हैं। उन्नतीस सितंबर, 1957 को वहीं वीआर मनोहर के घर उनका जन्म हुआ। पिता पेशे से वकील थे। शरद पवार से उनके परिवार का शुरू से ही काफी करीबी रिश्ता रहा है। महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री के रूप में पवार के कार्यकाल के दौरान शशांक मनोहर के पिता वीआर मनोहर राज्य के महाधिवक्ता थे। पिता के पदचिह्नें पर चलते हुए शशांक ने भी कानून की पढ़ाई की और बतौर अधिवक्ता प्रैक्टिस भी शुरू की, लेकिन अंतत: वे क्रिकेट प्रशासक के रूप में उभरे। 1996 में वे विदर्भ क्रिकेट एसोसिएशन के अध्यक्ष बने और इसके बाद लगातार उनका कॅरियर इस दिशा में आगे बढ़ता रहा। 2006 में जब शरद पवार बीसीसीआई के अध्यक्ष बने तो शशांक मनोहर उसके उपाध्यक्ष चुने गए। शशांक बीसीसीआई के उन पांच उपाध्यक्षों में से हैं, जिन्होंने पवार के बीसीसीआई अध्यक्ष के कार्यकाल के दौरान काम किया। और फिर, 2008 में पवार के बाद वे बीसीसीआई अध्यक्ष बने।

लेकिन बीसीसीआई के अध्यक्ष जसा हाई-प्रोफाइल रुतबा होने के बावजूद वे सादगी पसंद हैं। वे आज भी मोबाइल फोन लेकर नहीं चलते। 2007 से पहले उनके पास पासपोर्ट भी नहीं था। उनका पहला विदेशी दौरा 2008 में हुआ, जब वे आईसीसी की बैठक में भाग लेने दुबई गए थे। उन्हें करीब से जानने वालों का कहना है कि वे आसानी से किसी पर भरोसा कर लेते हैं। लेकिन जब उन्हें धोखा मिलता है, तो सामने वाले के लिए फिर वे बेहद कड़ा रुख अपनाते हैं। क्रिकेट प्रशासक के रूप में अपने विवेक को तरजीह देते हैं, तो निजी जीवन में भी इससे अलग फैसला नहीं लेते।

इन सबसे अलग शशांक मनोहर से जुड़े विवादों की भी कमी नहीं है। आरोप है कि उनके परिवार का दाऊद गैंग से करीबी रिश्ता है और कई मौकों पर उनके परिवार के सदस्यों ने दाऊद गैंग का बचाव किया। इसी तरह, 26 नवंबर, 1995 को विदर्भ क्रिकेट एसोसिएशन के मैदान पर भारत और न्यूजीलैंड के बीच खेले जा रहे एक दिवसीय मैच के दौरान वहां की एक दीवार गिर गई थी, जिसमें 13 लोग मारे गए थे, जबकि 70 से अधिक घायल हो गए थे। क्रिकेट के इतिहास में मैदान पर हुई इतनी बड़ी त्रासदी के लिए भी शशांक मनोहर और उनके पिता को जिम्मेदार ठहराया जाता है, यह कहकर कि उन्होंने दीवार के निर्माण का ठेका अपने किसी करीबी रिश्तेदार को दिलवाया था। आरोपों के मुताबिक यह कहना भी गलत है कि शशांक मनोहर बीसीसीआई से एक भी पैसा नहीं लेते, बल्कि अपनी यात्राओं का खर्च भी वे स्वयं उठाते हैं। तथ्य इससे उलट है। उन्होंने विदर्भ क्रिकेट एसोसिएशन के खजाने से पैसे लेकर स्कूली बच्चों की एक टीम को आर्थिक मदद दी और उसे तीन माह के लिए इंगलैंड भेजा, क्योंकि इसमें उनका बेटा भी था। बहरहाल, ये सभी आरोप हैं। इनमें सच्चाई कितनी है, कहना फिलहाल मुश्किल है। पर इतना स्पष्ट है कि शशांक मनोहर आज की तारीख में बीसीसीआई के प्रभावी व्यक्तियों में से एक हैं।

शनिवार, 17 अप्रैल 2010

चंदा और सुनंदा

सुनंदा पुष्कर को अभी कुछ दिन पहले तक कोई नहीं जानता था। अब सभी की जुबान पर उनका नाम है। विदेश राज्य मंत्री शशि थरूर की दोस्त सुनंदा के कारण राजनीति में भूचाल आया हुआ है। कोच्चि टीम के शेयर धारकों में उनका क्या आया, गोया एक तूफान ही आ गया। थरूर की कुर्सी डगमगा गई। सुनंदा तो बयान देकर चुप हो गईं, पर विपक्ष शशि के पीछे पड़ा हुआ है। इस बार शशि-ग्रहण के पीछे है यह दोस्ती।



सुनंदा पुष्कर की पहचान फिलहाल विदेश राज्य मंत्री शशि थरूर की गहरी दोस्त के रूप में है। आईपीएल की नई टीम कोच्चि के शेयर धारकों को लेकर छिड़े विवाद में उनका जिक्र आया और फिर खुलती गई परत दर परत थरूर से उनके रिश्ते की बात। आईपीएल कमिश्नर ललित मोदी ने खुलासा किया कि कोच्चि टीम में उनकी भी हिस्सेदारी है, जो करीब 70 करोड़ की है। अब तक उन्होंने यह बात इसलिए नहीं जाहिर की थी, क्योंकि थरूर ने उन पर सुनंदा का नाम नहीं बताने के लिए दबाव बनाया था।

लेकिन जाने फिर क्या हुआ कि मोदी उस ‘दबावज् से उबर गए और उन्होंने गोपनीयता के नियम को दरकिनार करते हुए कोच्चि टीम के शेयर धारकों के नाम बता दिए। सारी कवायद में एक बात कहीं पीछे छूट गई कि सुनंदा एक सफल व्यवसायी भी हैं और कोच्चि टीम में उनकी हिस्सेदारी केवल थरूर की ‘मेहरबानीज् नहीं है। सुनंदा को इसी बात का मलाल है कि मीडिया ने उनके और थरूर के रिश्तों की तो खूब चर्चा की, लेकिन एक कामयाब महिला व्यवसायी के रूप में उनके व्यक्तित्व को नजरअंदाज किया।

सुनंदा मूलत: जम्मू-कश्मीर की रहने वाली हैं और फिलहाल दुबई में स्पा चलाती हैं। वहां स्पा का उनका लंबा-चौड़ा कारोबार है। साथ ही वे सऊदी अरब सरकार द्वारा संचालित एक इंफ्रास्ट्रक्चर कंपनी में कार्यकारी के पद पर भी कार्यरत हैं। इससे पहले उन्होंने वहां विज्ञापन कंपनियों और ट्रेवल एजेंसी के साथ भी काम किया। दुबई की एक रियल इस्टेट कंपनी में भी उन्होंने निदेशक के पद पर काम किया। कनाडा के टोरंटो शहर में भी उन्होंने आईटी फर्म में काम किया। वे सेल्स व मार्केटिंग की विशेषज्ञ मानी जाती हैं। पिछले कुछ दिनों में सुनंदा और थरूर कई मौकों पर साथ-साथ देखे गए। दो माह पहले कें्रीय मंत्री जितिन प्रसाद के विवाह समारोह में भी दोनों साथ गए थे। चर्चा तो यह भी है कि सुनंदा और थरूर ने कई कैबिनेट डिनर भी साथ-साथ लिए। तब विभिन्न मौकों पर सुनंदा का परिचय ‘थरूर की कनाडा की मित्रज् के रूप में कराया गया। दोनों के रिश्तों को लेकर चर्चा तो तभी से थी। थरूर ने भी बड़ी साफगोई से कहा कि वे सुनंदा को बहुत अच्छी तरह जानते हैं।

करीब एक माह पहले भी दिल्ली में विदेश मंत्रालय और फिक्की के बीच खेले गए एक दोस्ताना मैच के दौरान दोनों साथ-साथ देखे गए थे, जिससे उनके ‘गहरे रिश्तेज् को और बल मिला। मैच से इतर थरूर को जब भी फुर्सत मिली, उन्होंने सुनंदा के साथ ही वक्त बिताया। खबर के पिपासुओं ने ब्रेक के दौरान थरूर को सुनंदा के लिए चाय बनाते भी देखा। अब एक बार फिर आईपीएल की कोच्चि टीम के शेयर धारकों को लेकर छिड़े विवाद में सुनंदा का जिक्र बार-बार आया और थरूर से उनके रिश्तों की बात को भी खूब हवा मिली।

अड़तालीस वर्षीया सुनंदा मूलत: कश्मीर घाटी की रहने वाली हैं। उनका पैतृक घर सोपियां जिले के बोमई गांव में हैं। पिता पोष्कर नाथ दास सेना में कर्नल रह चुके हैं। 1983 में वे लेफ्टिनेंट कर्नल के पद से सेवानिवृत्त हुए। बारामूला के सनिक स्कूल से उन्होंने स्कूली शिक्षा पूरी की। श्रीनगर के सरकारी महिला कॉलेज से सुनंदा ने बीए की डिग्री ली। बाद में उन्होंने होटल मैनेजमेंट में डिप्लोमा भी किया। इस बीच 1989 में घाटी में शुरू हुए आतंकवाद का असर कर्नल दास के परिवार पर भी पड़ा। आंतकवादियों ने उनके घर जला दिए, जिसके बाद उनका पूरा परिवार जम्मू चला गया। उनके दो भाई भी हैं, जिनमें से एक बैंक में कार्यरत हैं तो दूसरे सेना में।

सुनंदा की दो शादी हो चुकी है। उनके पहले पति संजय रैना कश्मीर के ही रहने वाले थे, जो दिल्ली में एक होटल में काम करते थे। लेकिन यह शादी अधिक दिनों तक चल नहीं पाई और दोनों का तलाक हो गया। सुनंदा को जानने वाले उन्हें एक आधुनिक लड़की बताते हैं, जो तलाक के वक्त आम लड़कियों की तरह रोना-धोना नहीं, बल्कि सेलिब्रेशन कर रही थीं। तलाक के बाद सुनंदा दुबई चली गईं, जहां उन्होंने सुजीत मेनन से विवाह किया। मेनन मूलत: केरल के रहने वाले थे। वे अग्निशमन उपकरणों के बहुत बड़े डीलर थे और इवेंट मैनेजर भी। लेकिन दिल्ली में एक सड़क हादसे में उनकी मौत हो गई। उनका एक पं्रह साल का बेटा भी है। अब थरूर से उनके ‘गहरे रिश्तोंज् के आधार पर उनकी शादी की बात कही जा रही है। यदि थरूर और उनके रिश्ते शादी तक पहुंचते हैं तो यह उनकी तीसरी शादी होगी। उधर, थरूर की भी यह तीसरी शादी होगी। थरूर की पहली पत्नी तिलोत्तमा मुखर्जी कोलकता की रहने वाली थीं, जिनसे उनका तलाक हो गया। उनकी दूसरी पत्नी क्रिस्टा गिल्स कनाडा की रहने वाली हैं, जिनसे उनका तलाक होने वाला है। तलाक की प्रक्रिया पूरी होने के बाद थरूर और सुनंदा की शादी की बात कही जा रही है।

सुनंदा परंपराओं से हटकर काम करने के लिए भी जानी जाती हैं। पंडितों की सालों पुरानी परंपरा को तोड़ते हुए उन्होंने अपने पिता का पहला नाम अपने सरनेम के रूप में इस्तेमाल किया, हालांकि इसमें उन्होंने थोड़ी फेरबदल की। उन्होंने अपने पिता के पहले नाम पोष्कर को थोड़े फेरबदल के साथ पुष्कर किया और उसे अपने सरनेम के रूप में इस्तेमाल किया। इस तरह सुनंदा दास सुनंदा पुष्कर हो गईं।

किया-धरा ललित

आईपीएल हिट हुआ तो बदौलत ललित मोदी के और उन्हीं के कारण इस समय पिट रहा है आईपीएल। मोदी वाकई ललित हैं। उन्हीं की रंगीनियत बीसीसीआई के इस महाआयोजन की हर चीज पर नुमायां है। मुनाफ उनका गोया नशा है। क्रिकेट कमाऊ तो थी ही, मोदी ने उसे कामधेनु बना दिया। वे आईपीएल के सर्वेसर्वा हैं। नियम-कानून सब उनके। यही कारण है कि इसे सफल बनाने पर उनकी वाहवाही हुई तो सारे विवादों का ठीकरा भी उनके ही सिर है। इसमें सारा लेना-देना उन्हीं का है। ललित मोदी का लड़ाकू तेवर, बड़बोलापन, अहमन्यता और सब कुछ से बेपरवाही का अंदाज बड़े-बड़ों को हैरत में डाले हुए है।



एक तेज-तर्रार व मंङो हुए व्यवसायी का नाम है ललित मोदी, जिन्होंने क्रिकेट को एक नई शक्ल ही नहीं दी, बल्कि उसकी काया ही बदल दी। उन्होंने उसे शुद्ध व्यावसायिक शक्ल दे दी। अपनी व्यावसायिक महत्वाकांक्षा को पूरा करने के लिए इस शख्स ने क्रिकेट में हाथ आजमाया और कामयाबी के झंडे गाड़े। आईपीएल के कमिश्नर के रूप में उन्होंने तीन घंटे का बीसमबीस क्रिकेट शुरू किया, जो टेलीविजन के दर्शकों को खूब भाया। 20 ओवरों का सीमित मैच मानो उनके लिए क्रिकेट मैच न होकर कोई सिनेमा थी। खिलाड़ियों की भी बल्ले-बल्ले रही। उन पर तो उन्होंने धन की वर्षा ही करा दी। आईपीएल मैच में चीयर लीडर्स भी मोदी की परिकल्पना ही थी, दर्शकों के साथ-साथ खिलाड़ियों के भी मनोरंजन के लिए।

मोदी की इस परिकल्पना ने निश्चय ही क्रिकेट को व्यावसायिक मुनाफा दिया, जिससे आईपीएल को एक दिन में करीब छह करोड़ रुपए की आय होती है। लेकिन इसमें टेस्ट क्रिकेट या कहें परंपरागत शालीन क्रिकेट जसी चीज काफी पीछे छूट गई, जिसके चाहने वाले आज भी उसकी कसमें खाते हैं। यही वजह है कि क्रिकेट को मुनाफा देने के लिए व्यावसायिक स्तर पर उनकी तरीफ होती है तो क्रिकेट की शक्ल बिगाड़ने के लिए उन्हें आड़े हाथों भी लिया जाता है। लेकिन इन सबसे से परे मोदी जुटे हैं क्रिकेट के इस व्यवसाय को निरंतर आगे बढ़ाने में। उनकी मुनाफाखोर महत्वाकांक्षा इस कदर तुंद है कि अगर सरकार ने पिछले साल लोकसभा चुनाव के कारण सुरक्षा मुहैया कराने में असमर्थता जाहिर की तो पूरे खेल को लेकर वे दक्षिण अफ्रीका चले गए। उनका दावा है कि अगले चार साल में आईपीएल का आकार मौजूदा आकार से चार से छह गुना अधिक होगा। अगले साल से ही टीमें आठ से दस और मैचों की संख्या 60 से बढ़कर 90 हो जाएगी।

ऐसा नहीं है कि क्रिकेट को यह व्यावसायिक शक्ल देने में मोदी को यकायक कामयाबी मिल गई। काफी कोशिशों के बाद उन्होंने भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड (बीसीसीआई) को इसके लिए तैयार किया। 1990 के शुरुआती दशक में ही उन्होंने बीसीसीआई के सामने इसका प्रस्ताव रखा था, जिसे तब बीसीसीआई ने नकार दिया था। इसके बाद मोदी किसी भी तरह बीसीसीआई से जुड़ने की कवायद में जुट गए, क्योंकि उन्हें यकीन हो चला था कि यदि व्यवस्था बदलनी है तो उसका हिस्सा बनना पड़ेगा। सबसे पहले उन्होंने राजस्थान क्रिकेट एसोसिएशन की सदस्यता ली। बाद में वे इसके अध्यक्ष भी बने, जिससे उन्हें बीसीसीआई में एक सीट मिल गई।

इस बीच 2005 में बीसीसीआई के अध्यक्ष पद के लिए हुए चुनाव में शरद पवार की जीत हुई, जिसमें मोदी की भूमिका को काफी महत्वपूर्ण माना गया। उसी साल मोदी बीसीसीआई के उपाध्यक्ष बन गए। वे बीसीसीआई के अब तक के सबसे युवा उपाध्यक्ष थे। बीसीसीआई में रहते हुए उन्होंने इसके व्यावसायिक स्तर पर काम करना शुरू कर दिया। मोदी की कोशिशों का ही नतीजा रहा कि 2005 से 2008 के बीच बोर्ड के राजस्व में करीब सात गुनी वृद्धि हुई। अंतत: 2008 में उन्हें सीमित ओवर के फटाफट क्रिकेट को साकार रूप में देने में कामयाबी मिली, जब उन्होंने ट्वेंटी-ट्वेंटी के इंडियन प्रीमियर लीग (आईपीएल) की शुरुआत की।

इस बीच उन पर कई आरोप भी लगे। मामले अदालतों में घसीटे गए। उन पर स्वयं को राजस्थान का निवासी बताने के लिए गलत दस्तावेजों के आधार पर राजस्थान में जमीन खरीदने का आरोप है, क्योंकि नियमों के मुताबिक राजस्थान क्रिकेट एसोसिएशन के अध्यक्ष पद का चुनाव वहां का स्थाई निवासी ही लड़ सकता है। जयपुर पुलिस इसकी जांच कर रही है। वहीं सुप्रीम कोर्ट में उनके राजस्थान क्रिकेट बोर्ड के अध्यक्ष बनने को इस आधार पर चुनौती दी गई है कि वे अमेरिका में पढ़ाई के दौरान एक आपराधिक मामले में दोषी करार दिए जा चुके हैं और एसोसिएशन के नियमों के अनुसार आपराधिक मामले में दोषी करार दिए गए किसी व्यक्ति को इसका पदाधिकारी नहीं बनाया जा सकता। इसी आधार पर मुंबई हाईकोर्ट में भी एक जनहित याचिका दायर की गई है, जिसमें उनके बीसीसीआई के उपाध्यक्ष पद पर चुनाव को चुनौती दी गई है। 2009 में उन्हें एक और झटका मिला, जब वे राजस्थान क्रिकेट एसोसिएशन के अध्यक्ष पद का चुनाव कें्रीय ग्रामीण विकास मंत्री सीपी जोशी के हाथों हार गए।

संपन्न व्यावसायिक घराने से ताल्लुक रखने वाले मोदी राजस्थान की पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे के करीबी माने जाते हैं। मोदी पर 2008 के जयपुर धमाके के पीड़ितों के लिए मुख्यमंत्री सहायता कोष में छह करोड़ रुपए जमा कराने का आश्वासन देने के बावजूद ये रुपए जमा नहीं कराने काआरोप है। यह मामला भी फिलहाल अदालत में है। मोदी हाल में आईपीएल की नई टीम कोच्चि के शेयर धारकों का नाम जाहिर करने से चर्चा में आए हैं। उन्होंने विदेश राज्य मंत्री शशि थरूर का नाम भी लिया और कहा कि उन्होंने टीम की एक प्रमुख शेयर धारक सुनंदा पुष्कर का नाम नहीं बताने के लिए उन पर दबाव बनाया। लेकिन जब बात निकली तो फिर दूर तक गई। आईपीएल के पूरे व्यवसाय में उनके तीन करीबी रिश्तेदारों की हिस्सेदारी सामने आई, जिनमें से एक उनके दामाद गौरव बर्मन भी हैं। इस समय सारा देश कोच्चि विवाद में नए-नए खुलते रहस्यों का पर्दाफाश हैरत से देख रहा है। उनके आलोचक उनके पर काटने का दबाव बना रहे हैं। आईपीएल नखशिख विवाद में है। अपसंस्कृति से लेकर आर्थिक गड़बड़ियों के आरोप हैं। आयकर विभाग उसके मुख्यालय में छापा मार रहा है।

उन्नतीस नवंबर, 1963 को दिल्ली में एक संपन्न व्यावसायिक घराने में पैदा हुए मोदी को स्कूली शिक्षा कभी रास नहीं आई। उनके पिता कृष्ण कुमार मोदी ‘मोदी एंटरप्राइजेजज् के चेयरमैन हैं, जिसका कारोबार करीब 40 मिलियन का बताया जा रहा है। घरवालों ने स्कूली शिक्षा पूरी करने के लिए उन्हें शिमला और नैनीताल भेजा, लेकिन वे अक्सर वहां से भाग निकलते थे। उनकी इच्छा अमेरिका में पढ़ने की थी। इसलिए उन्होंने एसएटी क्वालीफाई किया, जो स्कूली शिक्षा पूरी किए बगैर ही अमेरिकी कॉलेज/विश्वविद्यालय में नामांकन की अर्हता तय करता है। वहां उन्हें नॉर्थ कैरोलिना में डरहाम के ड्यूक विश्वविद्यालय में दाखिला भी मिल गया। इसी दौरान 1985 में डरहाम काउंटी कोर्ट ने उन्हें चार सौ ग्राम कोकीन रखने और अपहरण के मामले में दोषी करार दिया।

1986 में ड्यूक विश्वविद्यालय से स्नातक करने के बाद वे भारत लौट आए। इस बीच 1987-1991 तक वे अंतर्राष्ट्रीय तंबाकू कंपनी के अध्यक्ष भी रहे। 1992 में वे गोडफ्रे फिलिप्स इंडिया के एग्जक्यूटिव डायरेक्टर भी बने। इसी दौरान उन्होंने टेलीविजन चैनलों से क्रिकेट मैच के प्रसारण पर बातचीत शुरू की और बीसीआई के समक्ष फुटबॉल लीग की तर्ज पर सीमित ओवर के मैच का प्रस्ताव रखा, जिसे तब बीसीसीआई ने नकार दिया था।

सोमवार, 12 अप्रैल 2010

सिर्फ भुट्टो नहीं फातिमा



भारत में जसे नेहरू-गांधी परिवार वैसे ही पाकिस्तान में भुट्टो परिवार। वहां की सियासत और सत्ता के बड़े दावेदार। लेकिन बेनजीर की भतीजी फातिमा परिवार की लीक से अलग हैं। वे सिर्फ भुट्टो नहीं हैं। और न वे भुट्टो होने को कोई खास अहमियत देती हैं। वे वंशवाद के खिलाफ हैं। उनकी लोकप्रियता उनके भुट्टो होने से नहीं, बल्कि एक जहीन लेखिका होने से है। कभी सबसे प्रिय फूफी रहीं बेनजीर से उनकी दूरी बढ़ गई। पुलिस ने उनके पिता मुर्तजा को गोलियों से भून दिया। तीन पुस्तकों की यह सत्ताइस वर्षीया लेखिका अपनी नई पुस्तक में जरदारी पर पिता की मृत्यु का इल्जाम लगाती हैं और बेनजीर पर बतौर प्रधानमंत्री अपराधियों को बचाने का। भारत-पाक संबंधों में घनिष्ठता की पैरोकार फातिमा यूं तो राजनीति से दूर हैं, लेकिन उनकी समझदारी, लोकप्रियता और उनके जुझारू तेवर उन्हें निकट भविष्य में राजनीति की मुख्यधारा में ले आएं तो इस पर ताज्जुब नहीं होना चाहिए।



फातिमा भुट्टो पाकिस्तान की पूर्व प्रधानमंत्री बेनजीर भुट्टो की भतीजी हैं। उनके भाई मुर्तजा भुट्टो की बेटी, जो अपने पिता से बेइंतहां मोहब्बत करती हैं। लेकिन इससे भी अलग भी है उनकी एक पहचान, जो किसी की भतीजी या किसी की बेटी होने की मोहताज नहीं। यह पहचान है उनकी लेखिका के रूप में, जो सिर्फ 27 साल की उम्र में तीन किताबें लिख चुकी हैं और निरंतर विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में कॉलम लेखिका के रूप में सक्रिय हैं। एक ऐसी युवा लेखिका, जो विभिन्न विषयों पर बेबाक राय रखती हैं। वे भारत-पाक के बीच बेहतर रिश्तों की पैरोकार हैं। उन्हें दोनों देश सहोदरों से लगते हैं।

पाकिस्तान के सामाजिक-राजनीतिक हालात वे बेखौफ होकर चर्चा करती हैं, राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी अक्सर उनके निशाने पर होते हैं, लेकिन वे राजनीति से दूरी बनाए रखना चाहती हैं। वे कहती हैं कि यहां हालात रहने लायक नहीं रह गए हैं। यहां रहना किसी खतरे से कम नहीं है, जिसे कराची में रहते हुए वे अक्सर महसूस करती हैं। वे तकरीबन रोज उस रास्ते से गुजरती हैं, जहां उनके पिता को पुलिस ने 1996 में गोलियों से भून डाला था, जब पाकिस्तान की प्रधानमंत्री उनकी बुआ बेनजीर थीं। पिता की हत्या के लिए फातिमा खुलकर बेनजीर और उनके पति आसिफ अली जरदारी को जिम्मेदार ठहराती हैं।

पिता की हत्या के बाद फातिमा बेनजीर से कभी नहीं मिलीं, लेकिन उनकी तुलना अक्सर बुआ से होती रही। फातिमा काफी हद तक वैसी ही दिखती हैं, जसी इस उम्र में बेनजीर दिखती थीं। देश-विदेश में उनकी लोकप्रियता भी बिल्कुल वैसी ही है, जसी बेनजीर की थी। खूबसूरती और ग्लैमर के मामले में भी दोनों काफी करीब दिखती हैं। फातिमा बचपन से ही अपने और बुआ के बीच समानता की ऐसी बातें सुनती आ रही हैं, जो उन्हें कभी पसंद नहीं आई। पिता की हत्या के बाद बेनजीर के लिए मन में नफरत और बढ़ गई, जो दिसंबर, 2007 में उनकी मौत के बाद ही खत्म हुई।

हाल ही में उनकी तीसरी किताब ‘द सांग ऑफ ब्लड एंड सोर्डज् आई है, जिसमें उन्होंने भुट्टो परिवार की चर्चा एक ऐसे सामंती परिवार के रूप में की है, जो ब्रिटिश शासन से आजादी के बाद पाकिस्तान में सत्ता का एक प्रमुख कें्र बन बैठा। लेकिन इस परिवार की चार पीढ़ियों को इसकी बड़ी कीमत चुकानी पड़ी। पिछले चार दशक में तकरीबन हर दशक में इस परिवार ने एक सदस्य को खोया। फातिमा के दादा जुल्फिकार अली भुट्टो जनरल जिया उल हक क शासनकाल में 1979 में फांसी पर लटका दिए गए। जुलाई, 1985 में फातिमा के चाचा शाहनवाज की संदिग्ध पिरिस्थितियों में मौत गई। 20 सितंबर, 1996 को फातिमा के पिता मुर्तजा भुट्टो की पुलिस ने गोली मार कर हत्या कर दी और 27 दिसंबर, 2007 को बेनजीर भी खूनी हिंसा का शिकार हो गईं। इससे पहले ‘व्हिस्पर्स ऑफ डेजर्टज् नाम से उनका एक कविता संग्रह आ चुका है। दूसरी पुस्तक उन्होंने अक्टूबर 2005 में आए भीषण भूकंप पर लिखी है, जिसने इस्लामाबाद से कश्मीर घाटी तक को हिलाकर रख दिया था। पुस्तक का शीर्षक ही उन्होंने ‘8:50ए एम, 8 अक्टूबर 2005ज् दिया है।

इस खूबसूरत युवा लेखिका की आस्था लोकतंत्र में है, लेकिन वे बेनजीर की चुनी हुई सरकार को सैनिक शासन से कम भयावह नहीं मानतीं। वे सवाल करती हैं कि जो सरकार ‘ऑपरेशन क्लीन अपज् के नाम पर तीन हजार लोगों को मरवा दे, वह सैनिक शासन से बेहतर कैसे हो सकती है? वे मीडिया में बेनजीर की तुलना इंदिरा गांधी से किए जाने का भी खंडन करती हैं और साफ कहती हैं कि बेनजीर गांधी नहीं थीं। वे वंशवाद के सख्त खिलाफ हैं और कहती हैं कि उनका नाम किसी भी चीज के लिए उनकी योग्यता को साबित नहीं करता।

बड़ी बेबाकी से वे कहती हैं कि पाकिस्तान में इन दिनों कई तरह की राजनीति चल रही है- सामंती राजनीति, अल्पतंत्र की राजनीति, सैन्य राजनीति और अमेरिकी आदेश पर चलने वाली राजनीति। इसी पर आज पाकिस्तान का शासन चल रहा है और पाकिस्तान की सामाजिक-राजनीतिक दुर्दशा का कारण भी यही है। पाकिस्तान के राजनीतिक संकट का एक बड़ा कारण वे यह भी मानती हैं कि आजादी के बाद से सत्ता वहां कभी सैनिक शासन तो कभी भुट्टो परिवार और फिर नवाज शरीफ के हाथों में घूमती रही, जिसे बदलने की जरूरत है।

पाकिस्तान में हालात सुधारने के लिए वे सबसे पहले ‘राष्ट्रीय मेलमिलाप अध्यादेशज् को समाप्त करना जरूरी बताती हैं, जो भ्रष्ट नेताओं के लिए सत्ता का मार्ग प्रशस्त करती है। यहां भी उनका इशारा सीधे और साफ तौर पर जरदारी की तरफ है। इसी तरह वे हदूद अध्यादेश को भी समाप्त करना जरूरी बताती हैं, जो महिलाओं और अल्पसंख्यकों के खिलाफ कानून का सबसे हिंसक रूप है। साथ ही पाकिस्तान की सामंती अर्थव्यवस्था को समाप्त करते हुए एक बार फिर उसी तरह सही मायने में भू-सुधार लागू करने की वकालत करती हैं, जसा उनके दादा जुल्फिकार अली भुट्टो के कार्यकाल में हुआ था।

उन्नत्तीस मई, 1982 को अफगानिस्तान के काबुल में पैदा हुईं फातिमा का बचपन कई मुल्कों में बीता। उनका जन्म तब हुआ था जब जनरल जिया उल हक के शासन के दौरान पिता को फांसी दिए जाने के बाद मुर्तजा अफगानिस्तान में निर्वासित जीवन बिता रहे थे। वहीं उन्होंने अफगान सरकार के एक अधिकारी की बेटी से निकाह किया था, जिससे फातिमा हुईं। लेकिन दोनों का साथ अधिक दिनों तक नहीं रह सका और उनके बीच तलाक हो गया। पर मुर्तजा को अपनी बेटी से बहुत प्यार था और इसलिए वे उसे लेकर वहां से भाग निकले। इस बीच वे फातिमा को लेकर त्रिपोली, फ्रांस और दमस्कस में छिपकर जीवन बिताते रहे, क्योंकि पाक खुफिया एजेंसी भी उन्हें ढूंढ़ रही थी। सीरिया में उनकी मुलाकात लेबनानी महिला गिनवा इटोई से हुई, जिससे उन्होंने निकाह कर लिया। इस वक्त फातिमा अपनी सौतेली मां गिनवा के साथ ही कराची में रह रही हैं, जिनसे उनके रिश्ते काफी अच्छे रहे हैं।

मुर्तजा 1993 में फातिमा और पत्नी गिनवा को लेकर पाकिस्तान लौटे, जहां से उनकी सेकेंडरी शिक्षा पूरी हुई। इसके बाद उन्होंने कोलंबिया विश्वविद्यालय से मध्य-पूर्व विषयों में बीए की डिग्री ली। लंदन विश्वविद्यालय से उन्होंने दक्षिण एशियाई विषयों में एमए की डिग्री ली। छात्र जीवन से ही वे लेखन में सक्रिय रहीं, जो आज तक जारी है। फातिमा ने भले ही फिलहाल राजनीति में आने से इनकार किया है और लेखन के जरिये ही सक्रिय रहने की बात कही है, लेकिन आने वाले दिनों में वे जरदारी और उनके बेटे बिलावल, जो पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी के मौजूदा अध्यक्ष हैं, के लिए एक बड़ा खतरा बन सकती हैं।

लौह बनाम फौलादी



बाबरी मस्जिद विध्वंस मामले में आईपीएस अधिकारी अंजू गुप्ता की गवाही ने आडवाणी सहित कई नेताओं के लिए मुश्किल खड़ी कर दी है, जो अदालत संदेह का लाभ लेकर लगभग बरी हो चुके थे। गुप्ता इस मामले में सीबीआई की नौवीं गवाह थीं। 23 अप्रैल को फिर उन्हें फिर अदालत में पेश होना है, जब सबकी निगाहें उन पर टिकी होंगी। गुप्ता ने पहले भी बतौर पुलिस अधिकारी कई साहसिक कारनामे किए हैं। उनकी बेहतर सेवा को देखते हुए उन्हें पुलिस मेडल से भी सम्मानित किया गया है। बाबरी ध्वंस पर आडवाणी के आह्लाद को उजागर करने वाली अपनी गवाही अंजू गुप्ता रिजवी ने मर्यादा पुरुषोत्तम राम और देश के संविधान के नाम पर शपथ लेकर दी थी।



अंजू गुप्ता, एक निर्भीक व साहसिक महिला पुलिस अधिकारी हैं, जिन्हें डर नहीं कि आने वाले दिनों में यदि सत्ता बदली तो उनके लिए मुश्किलें खड़ी हो सकती हैं। आखिर अधिकारियों के स्थानांतरण से लेकर उनकी पदोन्नति तक में राजनीतिज्ञों की भूमिका किसी से छिपी तो नहीं है। यह उनकी निडरता ही है कि छह दिसंबर, 1992 को बाबरी मस्जिद विध्वंस मामले में उन्होंने अदालत के सामने अपनी बेबाक राय रखी। भाजपा के वरिष्ठ नेता व पूर्व उप प्रधानमंत्री लालकृष्ण आडवाणी से लेकर पार्टी के अन्य नेताओं और विश्व हिन्दू परिषद, बजरंग दल जसे भगवा संगठनों के नेताओं के नाम उन्होंने बेहिचक व बेझिझक लिए।

अदालत में उन्होंने साफ कहा कि आडवाणी या दूसरे नेता जो भी कहते रहें, बाबरी मस्जिद विध्वंस के लिए वे अपनी जिम्मेदारी से बच नहीं सकते। आडवाणी ने विध्वंस से पहले ऐसे भड़काऊ भाषण दिए, जिससे कारसेवक उत्तेजित हुए। साध्वी तंभरा जसी नेताओं ने ‘एक धक्का और दो, मस्जिद तोड़ दोज् जसे नारों से कारसेवकों को भड़काया। इस कड़ी में उन्होंने मुरली मनोहर जोशी, उमा भारती, विनय कटियार, अशोक सिंघल, गिरिराज किशोर, विष्णु हरि डाल्मिया के नाम भी लिए और कहा कि विध्वंस के बाद इन नेताओं ने गले मिलकर एक-दूसरे को बधाई दी और मिठाइयां बांटी।

गुप्ता इस मामले में अभियोजन पक्ष सीबीआई की एक अहम गवाह हैं। जब बाबरी मस्जिद का विध्वंस हुआ, वे फैजाबाद में प्रशिक्षण के अंतर्गत अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक के रूप में तैनात थीं और यह उनकी पहली नियुक्ति थी। उन्हें एक पुलिस अधिकारी के रूप में अपना कार्यभार संभाले कुछ ही महीने हुए थे। इस बीच उन्हें आडवाणी की सुरक्षा की जिम्मेदारी भी सौंपी गई। लेकिन तब शायद आडवाणी या कल्याण सिंह के नेतृत्व में उत्तर प्रदेश की भाजपा सरकार ने भी नहीं सोचा होगा कि यह महिला पुलिस अधिकारी आने वाले दिनों में उनके लिए मुश्किलें खड़ी कर सकती है।

अंजू गुप्ता ने राय बरेली में सीबीआई की विशेष अदालत में मुख्य न्यायिक दंडाधिकारी गुलाब सिंह के सामने अपने बयान में यह कहकर तत्कालीन सरकारी मशीनरी और प्रशासनिक तंत्र को भी कठघरे में खड़ा कर दिया कि कारसेवकों को विवादित ढांचा ढहाने से रोकने की बजाय वे उसमें सहयोग दे रहे थे। वे चाहते तो कारसेवकों को ऐसा करने से रोक सकते थे, लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया।

1990 बैच की 45 वर्षीया यह आईपीएस अधिकारी इन दिनों दिल्ली में रिसर्च एंड एनालिसिस विंग (रॉ) में तैनात है। यह कोई पहला अवसर नहीं है जब गुप्ता ने इस तरह का साहसिक स्टैंड लिया हो। अपने अब तक के कार्यकाल में उन्होंने कई ऐसे कारनामे किए, जो पुलिस महकमे के लिए गर्व की बात होगी। प्रतापगढ़ में अपने कार्यकाल के दौरान उन्होंने बाहुबली (वर्तमान में विधायक) रघुराज प्रताप सिंह उर्फ राजा भैया से भी पंगा लिया। बिना किसी अंजाम की परवाह किए उन्होंने अपराध खत्म करने और अपराधियों को सजा दिलाने की पुलिस की जिम्मेदारी का वहां बखूबी निर्वाह किया। वहां रहते हुए उन्होंने राजा भैया के खिलाफ खिलाफ गैंग चार्ट और हिस्ट्री शीट तैयार की।

उन्होंने उत्तर प्रदेश सतर्कता विभाग और राज्य अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो में भी काम किया। 2000 से 2005 के दौरान वे एशिया और प्रशांत महासागर के देशों के लिए संयुक्त राष्ट्र के आर्थिक एवं सामाजिक आयोग की सलाहकार भी रहीं। 2005 में भारत लौटने पर उन्होंने मेरठ के एसएसपी का कार्यभार संभाला और वहां भी आपराधिक मामलों का खुलासा किया। एक साल बाद यानी 2006 में वे एकबार फिर संयुक्त राष्ट्र की नशा व अपराध शाखा में नियुक्त हुईं, जहां उन्होंने मानव तस्करी पर काम किया। उन्होंने देश में मानव तस्करी की जांच में पुलिस की भूमिका पर ‘स्टैंडर्ड ऑपरेटिंग प्रोसीजर फॉर पुलिस फॉर इंवेस्टिगेटिंग ह्यूमेन ट्रैफिकिंग इन इंडियाज् शीर्षक से एक किताब भी लिखी। 2007-08 के दौरान उन्होंने मेरठ में प्रांतीय सशस्त्र पुलिस बल में पुलिस महानिरीक्षक के रूप में भी अपनी सेवा दी। 2009 में उन्होंने निदेशक के रूप में कैबिनेट सचिवालय का कार्यभार संभाला। उनके बेहतर करियर रिकॉर्ड को देखते हुए 2007 में उन्हें पुलिस मेडल से भी सम्मानित किया गया।

मूलत: उत्तरांचल के षिकेश की रहने वाली अंजू गुप्ता एक व्यावसायिक घराने से ताल्लुक रखती हैं। उन्होंने पार्टीकल फिजिक्स में एमफिल भी किया है। अक्टूबर, 1992 में उन्होंने पहली बार पुलिस अधिकारी के रूप में फैजाबाद में बतौर एएसपी अपना कार्यभार संभाला। इसके बाद उन्होंने लखनऊ, ललितपुर, उधम सिंह नगर और प्रतापगढ़ में बतौर पुलिस अधीक्षक काम किया। परंपरा से अलग शादी उन्होंने एक मुस्लिम से की। उनके पति शफी एहसान रिजवी भी 1989 बैच के आईपीएस अधिकारी हैं और इस वक्त गृह मंत्री पी चिदंबरम के विशेष अधिकारी के रूप में तैनात हैं।

सीबीआई की विशेष अदालत में आडवाणी के खिलाफ उनके बयान की सत्यता को भाजपा नेता और समर्थक अब यह कहकर सवालों के घेरे में खड़े कर रहे हैं कि आखिर इस मामले में उन पर यकीन क्यों कर लिया जाए, जबकि उन्होंने एक मुसलमान से शादी की है? कैसे मान लिया जाए कि राम मंदिर और बाबरी मस्जिद को लेकर उनकी निष्ठा में शादी से बदलाव न हुआ हो? लेकिन सीबीआई की विशेष अदालत में इस महिला पुलिस अधिकारी ने अपना बयान देने से पहले ‘मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान रामज् और देश के संविधान के नाम पर शपथ लेकर अपने विरोधियों को करारा जवाब दिया है। इस मामले में 23 अप्रैल को एक बार फिर सीबीआई की विशेष अदालत में उनकी गवाही होगी, जब बचाव पक्ष के वकील उनसे सवाल-जवाब करेंगे। सबकी उनपर टिकी होंगी।

पढ़ो-लिखो साधिकार


वरिष्ठ पत्रकार देवदत्त से बातचीत पर आधारित
अनिवार्य शिक्षा कानून सही दिशा में बेहतर कदम है। अफसोस यह है कि इसे आने में छह दशक लग गए। वैसे भी क्रांतिकारी कदम उठाने में स्वाभाव से यथास्थितिवादी सरकारें जानबूझकर विलंब करती हैं। फिर प्राथमिक शिक्षा हमारी प्राथमिकताओं में कभी नहीं रही। इस कानून को अमल में लाने में ढेर सारी दिक्कतें हैं। पूरी संरचना खड़ी करने का सवाल है। फिर गरीबी भी आड़े आनी है। फिर भी यह उम्दा बात हुई है, जिसे कारगर होने में समय लगेगा।

इसमें कोई दो राय नहीं कि यह एक बेहतर और सही कदम है। हालांकि यह बहुत पहले हो जाना चाहिए था। लेकिन इसमें देर हुई। फिर भी कहा जा सकता है, ‘देर आयद दुरुस्त आयद।ज् वास्तव में यह देर नीयतन थी। सत्तासीन लोगों ने जानबूझकर इसमें देरी की, क्योंकि कोई भी क्रांतिकारी परिवर्तन उनके हित में नहीं होता। दरअसल यह हमारी राजनीतिक संस्कृति का अंग बन गया है कि यदि कुछ अच्छा काम है और उसके होने से राजनीतिक वर्ग का नुकसान हो सकता है, तो वे उसमें जानबूझकर देरी करते हैं, क्योंकि वे इसे रोक नहीं सकते। देश के ज्यादा से ज्यादा लोग अशिक्षित रहें, यह राजनेताओं के हित में है, ताकि उनका वोटबैंक सुरक्षित रहे।

यह राजनीतिक दलों की कमजोर इच्छाशक्ति और नीयत का ही नतीजा है कि इसे बनने में आजादी के छह दशक से अधिक का समय लग गया। राजनीतिक दलों ने जबानी तौर पर तो हमेशा प्राथमिक शिक्षा को प्राथमिकता देने की बात कही, लेकिन व्यवहार में उन्होंने उच्च शिक्षा पर अधिक ध्यान दिया। कई ऐसे उदाहरण हैं, जब सरकार ने उच्च शिक्षा के लिए प्राथमिक शिक्षा के बजट में कटौती की। छह जुलाई, 2007 को पायनियर अखबार में छपी एक खबर के मुताबिक प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने मानव संसाधन विकास मंत्रालय से देशभर में 16 नए विश्वविद्यालय और पिछड़े वर्ग के लिए 355 कॉलेज खोलने के मकसद से प्राथमिक शिक्षा के अनुदान में कटौती के लिए कहा। प्रधानमंत्री का यह निर्देश प्राथमिक शिक्षा को लेकर सरकारी नजरिये को दर्शाता है। अक्सर कें्र राज्यों को प्राथमिक शिक्षा में अधिक से अधिक निवेश की बात कहकर अपनी जिम्मेदारियों से पल्ला झाड़ लेता है, तो राज्य सरकारें संसाधन नहीं होने की बात कहकर हाथ खड़े कर देती हैं। अगर इस दिशा में सचमुच कुछ किया जाना है तो राजनीतिक वर्ग और सत्तासीन लोगों को अपनी नीयत बदलनी होगी अपना स्वभाव बदलना होगा।

यह कानून तो बना दिया गया है, पर इसके लागू होने में अभी बहुत सी कठिनाइयां सामने आएंगी। पहली मुश्किल तो यह है कि इसे राज्य सरकारों को लागू करना है और अब तक इस दिशा में राज्य सरकारों ने कोई ठोस कदम नहीं उठाए हैं। वे भी उतनी ही आलसी रही हैं, जितनी कें्र की सरकार। फिर, स्कूल व्यवस्था में भी परिवर्तन की जरूरत है। 1998-99 में प्रसिद्ध अर्थशास्त्री अमर्त्य सेन ने देश की स्कूल व्यवस्था को बुरी हालत में बताया था और मुङो नहीं लगता कि दस-बारह साल बाद भी उसमें कोई परिवर्तन आया है। आज भी स्कूलों की वही हालत है।

इसके अलावा बच्चों को स्कूल में रोके रखना और ड्रॉप आऊट पर रोक लगाना बेहद चुनौतीपूर्ण होगा। 2005 के आंकड़ों के अनुसार देश के 18,50,000 बच्चों में से 8,30,000 छह से चौदह आयुवर्ग के हैं। दो-तीन साल पहले तक इस उम्र के करीब 90 प्रतिशत बच्चों का स्कूल में पंजीकरण दिखाया गया। लेकिन कितने बच्चों ने पंजीकरण के बाद स्कूल छोड़ दिया, इसका रिकॉर्ड नहीं है। माध्यमिक शिक्षा तक पहुंचते-पहुंचते स्कूल में रहने वाले बच्चों की संख्या करीब 59 फीसदी रह जाती है। यानी बच्चों को स्कूल में रोके रखना एक बड़ा काम है। दरअसल, बच्चे हमारी गृहस्थ अर्थव्यवस्था, घरेलू अर्थव्यवस्था, देहाती अर्थव्यवस्था का एक अहम हिस्सा हैं। अपने घरों में, खेतों पर या अपने पैतृक व्यवसाय के लिए छोटा-मोटा काम करते वक्त वे बाल मजदूर नहीं कहलाते, लेकिन इससे उनकी पढ़ाई तो बाधित होती ही है।

शिक्षा चाहे किसी भी स्तर की हो, उसमें अध्यापकों का महत्वपूर्ण योगदान होता है। उच्च शिक्षा में अध्यापकों की स्थिति बेहतर है, लेकिन प्राथमिक शिक्षकों की स्थिति बेहद दयनीय है। वेतन से लेकर अन्य मामलों में भी उनके साथ दोयम दज्रे का व्यवहार होता है। अक्सर देखा गया है कि अध्यापक पर्याप्त वेतन न मिलने की बात कह अध्यापन कार्य में अपनी अरुचि को तर्कसंगत बताते हैं। कुछ मामलों में तो यह भी देखने को मिला है एक बार प्राथमिक शिक्षक की नौकरी मिल जाने के बाद वह व्यक्ति शहरों में अपने लिए कोई दूसरा काम भी तलाश लेता है और गांवों में अपनी जगह किसी दूसरे व्यक्ति को आधा वेतन देने की बात कहकर बिठा देता है। सब कुछ इतनी अच्छी तरह और आपसी मिलीभगत से होता है कि उनके विरुद्ध कोई कार्रवाई भी नहीं होती। इसलिए अध्यापकों की स्थिति सुधारने की जरूरत है। साथ ही उन्हें भी अध्यापन कार्य को एक सामाजिक जिम्मेदारी के रूप में लेना होगा।

एक अन्य महत्वपूर्ण बात यह कि हमारे यहां कई तरह के स्कूल हैं। सरकारी स्कूल, सरकारी सहायता प्राप्त स्कूल, निजी स्कूल। निजी स्कूलों की फीस इतनी अधिक होती है कि आर्थिक रूप से पिछड़े वर्ग के लिए उसमें अपने बच्चे को पढ़ाना सपने जसा होता है। हालांकि सरकार ने निजी स्कूलों को भी गरीब बच्चों के लिए 25 प्रतिशत सीटें आरक्षित करने के लिए कहा है, लेकिन वे इसके खिलाफ कोर्ट चले गए हैं। उन्हें कैसे इसके लिए तैयार किया जाए, यह एक महत्वपूर्ण चुनौती होगी। अगर गरीबों के बच्चों को वहां दाखिला नहीं मिलता है तो उन्हें फिर सरकारी स्कूलों में दाखिला दिलाना होगा, जहां कक्षाओं और शिक्षकों की दिक्कत आड़े आएगी।

फिर बाल मजदूरी एक महत्वपूर्ण समस्या है। उन्हें काम करने से रोका भी नहीं जा सकता, क्योंकि कई परिवारों की रोजी-रोटी उनके बच्चों की कमाई से ही चलती है। लेकिन अनिवार्य शिक्षा के कानून की सफलता के लिए इस पर रोक लगाना जरूरी है, क्योंकि ढाबों, चाय की दुकानों पर काम करने वाले बच्चे आखिर स्कूल कब जाएंगे? यानी अगर बच्चे को काम करने से रोका जाता है तो उसके परिवार की रोजी-रोटी प्रभावित होती है और न रोका जाए तो यह कानून बेमतलब हो जाता है। इसलिए हमें उन परिस्थतियों को समाप्त करना होगा, जिसके कारण बच्चे बाल मजदूरी के लिए मजबूर होते हैं।

इसके अलावा अभी तक सरकार ने यह तय नहीं किया है कि शिक्षा का कंटेंट क्या हो? बच्चों को पढ़ाया क्या जाए? प्राथमिक शिक्षा का अभी तक का जो कंटेंट है, वह बहुत पिछड़ा है। इसे परिष्कृत करने की जरूरत है। ऐसे कंटेंट विकसित करने की जरूरत है, जिससे बच्चों की सृजनात्मक क्षमता उभरकर सामने आए और पढ़ाई के बाद वे आर्थिक व सामाजिक रूप से स्वावलंबी नागरिक बन सकें। कुल मिलाकर, यह एक अच्छी शुरुआत है, लेकिन इसके कारगर होने में वक्त लगेगा।

मंगलवार, 6 अप्रैल 2010

करोड़ों में माया!


मायावती ने एक हजार के नोटों की माला क्या पहन ली, राजनीतिक भूचाल आ गया। उसे ठंडा करने के लिए उन्होंने फिर थोड़ी कम राशि की माला पहन ली। मायावती की कार्यशैली यही है। वे ऐसे कारनामों से विपक्ष-मीडिया और तमाम विरोधियों का दिल जलाकर अपने समर्थकों में खुशी पैदा करती हैं। वे कुछ करें न करें, उनके समर्थक उनके साथ हैं। लोग उन्हें दौलत की बेटी कहें, अभी फिलहाल उन्हें दलित अपनी बेटी ही मानते हैं। माया जसी राजनेता लाखों में नहीं, करोड़ों में एक हैं।

मायावती, उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री। देश की पहली ‘अछूतज् महिला मुख्यमंत्री। दलितों की मसीहा। उनकी बेटी। एक ऐसी बेटी, जो सदियों से उनका दमन व शोषण करने वालों का लगातार मान-मर्दन कर रही है। इससे भले उन्हें कुछ मिले न मिले संतोष जरूर मिलता है। दलितों के बीच यही है उनकी पहचान। यह अलग बात है कि विरोधी उन्हें दलित की नहीं, ‘दौलत की बेटीज् कहते हैं। लेकिन विरोधियों की परवाह उन्हें कब रही है?
माया का हर कदम तो बस अपने दलित वोट बैंक को लुभाने के लिए होता है, क्योंकि माया जब हीरे के जेवरात से लकदक अपना जन्मदिन मनाती हैं, केक काटती हैं तो इन सब से सदियों से वंचित दलित खुद को उनकी जगह महसूस करते हैं। उन्हें संतोष होता है कि चलो, सदियों बाद ही सही, हम सब न सही, माया ही सही, कोई तो है हमारे बीच का जो खुलेआम आज समाज की अगड़ी जातियों को चुनौती दे रहा है; उन्हीं सुविधाओं का उपभोग कर रहा है, जो कुछ साल पहले तक केवल अगड़ी जातियों की बपौती थे और जिनके उपभोग का सपनाभर देखकर वे संतोष कर लेते थे।
माया दलितों में इस संतोष की अनुभूति को बखूबी जनती हैं और इसलिए विरोधी लाख गला फाड़ते रहें, वे उन्हें हर बार ठेंगा दिखाती रहती हैं। पिछले सप्ताह दो-दो बार नोटों की माला पहनकर उन्होंने एकबार फिर ऐसा ही किया। अब माया के खिलाफ संसद में हंगामा होता है तो होता रहे, आयकर विभाग की जांच होती है तो होती रहे, उनका दलित वोट बैंक तो सुरक्षित है। शायद यही वजह रही कि पहली बार हजार-हजार के नोटों की माला पहनने के बाद जब विरोधियों ने हंगामा बरपाया तो उसकी परवाह न करते हुए माया ने दो दिन बाद ही फिर नोटों की माला पहन ली। माया का यह कदम विरोधियों को मानो चुनौती थी, ‘कर लो, जो करना है।ज्
मायावती आजाद भारत में दलित राजनीति की आइकॉन हैं, लेकिन उतनी ही विवादास्पद। कभी उन पर सरकारी पैसे के दुरुपयोग का तो कभी आय से अधिक संपत्ति अर्जित करने का आरोप लगा। ताज कोरिडोर मामले में घोटाले का आरोप भी उन पर लगा। यह भी कहा गया कि ‘यमुना एक्सप्रेस वेज् के लिए उनकी सरकार ने करीब नौ हजार किसानों की भूमि जबरन ली। वे मौका मिलने पर विरोधियों को सबक सिखाने से भी नहीं चूकतीं। सत्ता मिली तो उन्होंने मुलायम सिंह सरकार के कार्यकाल में भर्ती हुए करीब 18 हजार पुलिस कर्मियों को अनियमितता का आरोप लगाकर बर्खास्त कर दिया। अधिकारियों का स्थानांतरण और उनके खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई भी माया खूब करती हैं।
मायावती की राजनीतिक सक्रियता से निश्चय ही दलितों के हौसले बुलंद हुए। उत्तर प्रदेश में उन्हें सत्ता मिलने के बाद दलितों की स्थिति में सुधार की उम्मीद भी की गई, लेकिन जमीनी स्तर पर वे आज भी अपने सामाजिक-आर्थिक उद्धार की बाट जोह रहे हैं। हां, वे विरोधियों से एक बड़ा वोट बैंक जरूर छीन ले गईं। माया का खौफ ही है कि आज कांग्रेस के ‘युवराजज् से लेकर भाजपा अध्यक्ष तक दलितों के घर भोजन करने, उन्हें गले लगाने जब-तब उनके घर पहुंच जाते हैं और दलित बेचारे इसी में खुश।
माया की राजनीति का आधार बाबा साहब भीमराव आम्बेडकर का दलितों के उत्थान के लिए वह फार्मूला है कि राजनीतिक ताकत हासिल किए बगैर वास्तव में समाज के इस शोषित/वंचित वर्ग का कल्याण संभव नहीं है। इसलिए सत्ता के लिए उन्हें न तो ‘मनुवादियोंज् से हाथ मिलाने से परहेज रहा और न ही ‘समाजवादियोंज् से। वे बार-बार दलितों के बीच बाबा साहब के इस फॉर्मूले को दोहराती हैं और उन्हें बताती हैं कि सत्ता हासिल करने के लिए वे जो भी तरीका अपनाती हैं, गलत नहीं है। लेकिन येन-केन-प्रकारेण उनके सत्ता हासिल करने के बाद भी दलितों की सामाजिक-आर्थिक स्थिति पहले से बहुत बेहतर नहीं है। हां, सत्ता हासिल करने के बाद मायावती ने उत्तर प्रदेश में जगह-जगह दलित उद्धारकों के नाम पर करोड़ों की लागत से पार्क और उनकी मूर्तियां जरूर लगवाईं और इन की सुरक्षा के लिए उन्होंने विशेष पुलिस बल का गठन भी किया है। इस कड़ी में उन्होंने खुद को भी नहीं छोड़ा। इस मामले में उन्हें सुप्रीम कोर्ट से नोटिस तक मिल चुका है।
इस सबके बावजूद मायावती अपने समर्थकों में खासी लोकप्रिय हैं। समर्थकों के बीच उनकी लोकप्रियता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि एक कार्यकर्ता ने उन्हें इसी साल जनवरी में उनके जन्मदिन पर चांद पर जमीन उपहारस्वरूप भेंट की। वे अपने समर्थकों से साफ कहती भी हैं कि उन्हें उपहारस्वरूप रुपए, पैसे, जेवरात और कीमती सामान ही दिए जाएं, फूलों का गुलदस्ता या सिर्फ शुभकामनाएं नहीं।
पं्रह जनवरी, 1956 को उत्तर प्रदेश के रामपुर में हिन्दू जाटव (चमार) बिरादरी में पैदा हुईं मायावती एक दिन प्रदेश की मुख्यमंत्री बनेंगी, ऐसा किसी ने नहीं सोचा था। हां, पिता प्रभु दास संचार विभाग में क्लर्क थे, इसलिए एक आम दलित परिवार से उलट बेटी की पढ़ाई-लिखाई को लेकर सचेत जरूर थे। दिल्ली के कालिंदी कॉलेज से कानून और बाद में शिक्षा की डिग्री लेने के बाद मायावती दिल्ली के एक स्कूल में प्राध्यापिका बन गईं। हालांकि इस बीच वे प्रशासनिक सेवा की परीक्षा की तैयारी में भी जुटी रहीं, कलेक्टर बनने के लिए। लेकिन इसी दौरान बसपा सुप्रीमो कांशीराम से उनकी मुलाकात हुई और यही से बदल गई उनके जीवन की दिशा। माया को राजनीति में आने देने के लिए उन्होंने बड़ी मुश्किल से उनके पिता को यह कहकर मनाया कि यह रानी बनेगी, जो कई कलेक्टरों के भाग्य निर्धारित करेगी। सच माया यही कर भी रही हैं। सत्ता में रहते उन्होंने कलेक्टरों को कभी चैन से नहीं रहने दिया। स्थानांतरण और अनुशासनात्मक कार्रवाई की तलवार हमेशा उन पर लटकाए रखी।
कांशीराम ने पहली बार माया को 1984 में मुजफ्फरनगर जिले की कैराना लोकसभा सीट से मैदान में उतारा, हालांकि वे चुनाव हार गईं। 1989 में वे पहली बार बिजनौर से लोकसभा चुनाव जीतीं। 1995 में वे पहली बार समाजवादी पार्टी के सहयोग से उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री बनीं। 1997 में दूसरी बार और 2002-03 में तीसरी बार भाजपा के सहयोग से मुख्यमंत्री बनीं। हालांकि उनका तीनों कार्यकाल काफी छोटा रहा। लेकिन 2007 के विधानसभा चुनाव में मायावती एक नया सामाजिक फार्मूला अपनाते हुए दलितों के साथ-साथ ब्राह्मणों व अगड़ी जाति के लोगों को भी लेकर चुनाव मैदान में उतरीं और भारी बहुमत से जीतकर सत्ता में आईं। सत्ता प्राप्ति के बाद उन्होंने उत्तर प्रदेश को ‘उत्तम प्रदेशज् बनाने की बात कही। लेकिन यह भी सच है कि प्रदेश रुपयों को विकास कार्यो पर खर्च करने से उत्तम बनेगा, न कि माया द्वारा उनकी माला पहनने से।

सोमवार, 29 मार्च 2010

पानी की करुण कहानी


जल संकट दुनिया भर की समस्या है, लेकिन हमारे यहां यह अभाव है। हर स्तर पर पानी के साथ खिलवाड़ हो रहा है। नदियां सूख गईं या प्रदूषित हैं। तालाब, कुएं गायब हो गए। भूजल नीचे जा रहा है। प्यास बढ़ रही है, पानी खत्म हो रहा है। आजादी के बाद हमने सोचा जरूर, किया कुछ नहीं। दोषपूर्ण सरकारी परियोनाओं ने पानी के स्रोत को बिगाड़ दिया। बढ़ती आबादी के साथ भविष्य के लिए कोई कारगर योजना नहीं बनाई। समाज भी बेखबर और लापरवाह रहा। अपने जीवन के मूल तत्वों से उसकी इस बेरुखी का नतीजा है जल संकट। बल्कि हम जिस पर्यावरण विनाश से जूझ रहे हैं, उसमें भी इसका कम दोष नहीं है। लालच प्रकृति के अथाह खजाने को खाली कर रहा है। आज जल दिवस पर हमें इन खतरों के प्रति सचेत होकर इनसे लड़ने और सबक लेने का संकल्प करना चाहिए। हमारा उद्देश्य देश-समाज को हरा-भरा रखने का होना चाहिए और इसके लिए हरित अभियान छेड़ देना चाहिए।

इन दिनों पूरी दुनिया जल संकट से जूझ रही है। भारत भी इस समस्या से अछूता नहीं है, बल्कि यहां पानी का संकट दूसरे देशों के मुकाबले कहीं अधिक है। भूजल स्तर निरंतर नीचे गिर रहा है। कहीं-कहीं तो भूजल भंडार बिल्कुल खाली हो गया है। नदियों का पानी पीने लायक नहीं बचा। कहीं नदियां सूख गईं तो कहीं बुरी तरह प्रदूषित हैं।
आजादी के पिछले छह दशक में यह संकट कई गुना बढ़ा है। आजादी के समय जहां केवल 232 गांव ऐसे थे, जहां पीने का पानी नहीं था, वहीं अब ऐसे गांवों की संख्या सवा दो लाख हो गई है। गांव, शहर हर जगह लोग पेयजल संकट से जूझ रहे हैं। शहरों में भी विभिन्न स्थानों पर टैंकरों से पानी पहुंचाया जा रहा है। लोग बाल्टियां, डिब्बे आदि लेकर टैंकरों का बेसब्री से इंतजार करते हैं और उसे देखते ही टूट पड़ते हैं। ऐसे में कौन-कब-किस पर गिर पड़े और वहां लड़ाई-झगड़े की स्थिति पैदा हो जाए कोई नहीं कह सकता।
दरअसल, भूजल के भंडारों को पुनजीर्वित करने का काम नदियां करती हैं, लेकिन आज नदियां ही सूख गई हैं। कई जगह नदियां नालों में तब्दील हो गई हैं। नदियों में प्रदूषण का स्तर इतना बढ़ गया है कि भूजल भंडार भी इसकी चपेट में आ गए हैं। इसलिए जल जनित बीमारियों की संख्या भी बढ़ी है। यूएन की एक रिपोर्ट के अनुसार भारत में करीब 21 प्रतिशत बीमारियां जल जनित होती हैं।
पानी के संकट को देखते हुए यदि ऐसा कहा जा रहा है कि तीसरा विश्वयुद्ध पानी के लिए ही होगा तो यह गलत नहीं है। बल्कि मुङो तो लगता है पानी के लिए झगड़े की शुरुआत हो चुकी है। गली-मोहल्लों में पानी के लिए टैंकर के इंतजार में खड़े लोगों में तू-तू मैं-मैं आम चीज है। राजस्थान में पानी की लड़ाई में 15 लोग जान गंवा चुके हैं। ऐसी स्थिति दुनिया के अन्य हिस्सों में भी है।
पानी के इस बढ़ते संकट के तीन प्रमुख कारण हैं। पहला तो यह कि विकास के नाम पर सरकारों ने पानी की जो परियोजनाएं चलाईं, उससे उसका मूल स्रोत बिगड़ा। दूर-दूर से पानी लाकर शहरों को देने और बांध बनाने की जो नीति सरकार के अपनाई, उससे पानी का विकें्िरत प्रबंधन समाप्त हो गया और इसका स्थान कें्रीकृत प्रबंधन ने ले लिया। ऐसा करके सरकार ने एक तरह से समाज को इसकी जिम्मेदारी से मुक्त कर दिया, जबकि पानी का बेहतर प्रबंधन सामुदायिक तरीके से ही हो सकता है। पहले ऐसा होता भी था। तब लोग जल संचयन के जोहड़ों का निर्माण करते थे। लेकिन जबसे सरकार ने इसका प्रबंधन अपने जिम्मे लिया, जोहड़ उपेक्षित रह गए और अंतत: सूख गए।
दूसरा महत्वपूर्ण कारण यह है कि आजादी के बाद हमने पानी के पर्यावरणीय प्रवाह का हिसाब-किताब नहीं रखा। सरकार ने तय तो यह कर रखा है कि लोगों तक पीने का पानी पहुंचाना उसकी प्राथमिकता होगी, लेकिन पानी पहुंचाए जाते हैं उद्योगों को, खेती को। औद्योगिक जरूरतों के साथ-साथ कृषि कार्य के लिए भी भूमिगत जल का ही दोहन होता है।
बढ़ते जल संकट का तीसरा महत्वपूर्ण कारण लोगों द्वारा इसका अनुशासित उपयोग नहीं करना है। अक्सर लोग नलके खुला छोड़ ब्रश करना शुरू कर देते हैं। नहाने-कपड़े धोने के लिए बाल्टियों पानी का इस्तेमाल करते हैं। रास्तों और सार्वजनिक स्थलों पर लोगों के लिए लगाए गए नलके अक्सर खुले पाए जाते हैं। बहुत कम लोग आगे बढ़कर उसे बंद करने की जहमत उठाते हैं।
यदि यही स्थिति जारी रही और यूं ही भूमिगत जल का दोहन होता रहा तो आने वाले दिनों में स्थिति और बिगड़ेगी। इसलिए हमें अभी से इसके संरक्षण के उपाय सोचने होंगे। सबसे पहले तो हमें नदी और सीवर को अलग कर देने की जरूरत है। कई जगह सीवरों को नदियों में मिला दिया गया है, जिससे प्रदूषण का स्तर बढ़ा है। यमुना इसका उदाहरण है। इसके अतिरिक्त हमारे यहां सबसे अधिक भूमिगत जल का दोहन कृषि कार्यो के लिए होता है। इसे नियंत्रित करने की जरूरत है। कृषि एवं उद्योगों के लिए सीवरों के पानी का इस्तेमाल होना चाहिए, न कि भूमिगत जल का। भूमिगत जल का उपयोग केवल पीने के पानी के लिए किया जाना चाहिए।
नदियों के किनारे सीमेंट और कंक्रीट के जंगल बनाने के बजाय हमें ऐसे पेड़-पौधे लगाने चाहिए, जिससे भूमि का कटाव रुके। साथ ही लोगों को पानी के अनुशासनात्मक इस्तेमाल के लिए प्रेरित करना होगा। इसके लिए नियम-कायदे-कानून बनाने की भी जरूरत है। इसके अलावा सरकार ने पानी के प्रबंधन की जो कें्रीकृत नीति शुरू की है, उसे बदलने की जरूरत है। पानी के प्रबंधन के लिए सामुदायिक विकें्रीकरण को बढ़ावा देना होगा और जनमानस को वर्षा जल संचयन से जोड़ना होगा।

(राजें्र सिंह से बातचीत पर आधारित)

बांड बाला बड़ी बात


फ्रीडा पिंटो की अभी फिल्मी उम्र ही क्या है! बस एक मशहूर फिल्म। लेकिन वे अहर्निश चालू रहने वाले अफवाह कारखाने में भरपूर जगह पा गई हैं। पहले देव पटले के साथ रोमांस के चर्चे और अब जेम्स बांड फिल्मों के ऑफर की बात। सब कुछ इस तरह बताया गया कि लोग हैरत खा गए। फीस भी पच्चीस करोड़ रुपए। फिर आया सच कि ऐसा कोई करार नहीं। अखबारों ने भी लिखा, यह काई कम बड़ी बात नहीं कि बांड फिल्म के लिए नाम चला। यह वैसे ही कि आस्कर भले न मिले उसके लिए नामांकित होना ही बड़ी बात। आगे-आगे देखते रहिए फ्रीडा को।

फ्रीडा पिंटो, बॉलीवुड की उभरती अदाकारा। एक ऐसी अभिनेत्री, जिन्होंने अपनी पहली ही फिल्म से अंतर्राष्ट्रीय ख्याति अर्जित की। बहुत कम अभिनेता-अभिनेत्रियों को अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर चर्चित होने का ऐसा मौका मिला। बचपन से ही अभिनेत्री बनने का सपना देखने वाली फ्रीडा ने भी शायद ही अपने करियर की ऐसी शानदार शुरुआत की कल्पना की हो। लेकिन एक बार जब कामयाबी मिली तो फिर अभी उनके पीछे मुड़कर देखने का सवाल ही नहीं है।
हाल ही में फ्रीडा का नाम ‘बांड गर्लज् के रूप में सामने आया। किसी भी अदाकारा का सपना होता है यह किरदार निभाना। चर्चा जोरों पर थी कि फ्रीडा ने इस किरदार के लिए हामी भर दी है। पर्दे पर वे हॉलीवुड के प्रसिद्ध अभिनेता डेनियर क्रेग, जो लाखों हसीनाओं के दिल की धड़कन हैं, के साथ रोमांस करती नजर आएंगी। यह भी कहा गया कि उहोंने इसके लिए करोड़ों रुपए का करार किया है। लेकिन फ्रीडा के प्रवक्ता ने स्पष्ट किया कि उन्होंने ऐसा कोई करार नहीं किया है। वे क्रेग के साथ ‘बांड गर्लज् के रूप में कोई किरदार नहीं करने जा रही हैं। पर साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि ‘बांड गर्लज् के रूप में चर्चा पाना भी किसी कामयाबी से कम नहीं है। वह भी ऐसी अभिनेत्री के लिए जिसकी उम्र महज 26 साल हो और जिसने अपने फिल्मी करियर की अभी-अभी शुरुआत की हो।
सच है, यह कामयाबी सभी अभिनेत्रियों को नहीं मिलती। बॉलीवुड से यह कामयाबी अब तक किसी अभिनेत्री को नहीं मिली है। अगर ‘बांड गर्लज् के रूप में फ्रीडा के होने की चर्चा सच होती तो यह कामयाबी पाने वाली वे बॉलीवुड की पहली अभिनेत्री होतीं। इससे पहले ‘बांड गर्लज् के रूप में पूर्व मिस वर्ल्ड और बॉलीवुड की सफल अभिनेत्री ऐश्वर्य राय का नाम सामने आया था। लेकिन वह भी मात्र अफवाह साबित हुई।
बतौर अभिनेत्री ‘स्लमडॉग मिलिनियरज् फ्रीडा की पहली फिल्म थी, जिसमें उन्होंने झुग्गी में रहने वाले और बाद में एक टीवी शो के जरिये करोड़ों रुपए जीतने वाले जमाल की प्रेमिका लतिका का किरदार निभाया था। यह फिल्म उनके करियर के लिए मील का पत्थर साबित हुई। डेनी बॉयल निर्देशित इस फिल्म ने ऑस्कर, ग्लोडन ग्लोब, बाफ्टा जसे कई अंतर्राष्ट्रीय फिल्म समारोहों में अवार्ड जीते। फ्रीडा हर समारोह में मौजूद रहीं और अपनी प्रभावपूर्ण उपस्थिति दर्ज कराती रहीं।
इस फिल्म में बेहतरीन अदाकारी के लिए उन्हें स्क्रीन एक्टर्स गिल्ड अवार्ड मिला। पाम स्प्रिंग्स इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल में उन्होंने सफल प्रदर्शन का अवार्ड जीता। बाफ्टा अवार्ड के लिए उन्हें सर्वश्रेष्ठ सहायक अभिनेत्री के रूप में नामांकित किया गया। हालांकि वे यह अवार्ड जीत नहीं पाईं, लेकिन शुरुआती फिल्म से ही नामांकन की कामयाबी भी कम करके नहीं आंकी जा सकती। एमटीवी ने भी उन्हें कई श्रेणियों में अवार्ड के लिए नामांकित किया।
एक बार जब कामयाबी मिली उसका सिलसिला आज तक जारी है। आज उनकी झोली में कई फिल्में हैं, जिनमें से ज्यादातर अंतर्राष्ट्रीय स्तर की हैं। हाल ही में उन्होंने हॉलीवुड के ख्याति प्राप्त निर्माता-निर्देशक जूलियन श्नाबेल की फिल्म ‘मिरालज् की शूटिंग पूरी है। वूडी एलन की फिल्म ‘यू विल मीट अ टॉल डार्क स्ट्रेंजरज् में भी वे कई नामचीन हस्तियों के साथ काम कर रही हैं, जिसमें बॉलीवुड के अभिनेता अनुपम खेर भी हैं।
अंतर्राष्ट्रीय स्तर की कई पत्र-पत्रिकाओं ने बॉलीवुड की इस अदाकारा को सबसे खूबसूरत और स्टाइलिस्ट अभिनेत्री बताया है। आस्कमेन डॉट कॉम ने उन्हें पुरुषों की पसंदीदा महिला बताया है, तो डेली टेलीग्राफ के अनुसार इस समय वे बॉलीवुड में सबसे अधिक मेहनताना पाने वाली अभिनेत्री हैं। उनके ड्रेसिंग सेंस की भी खूब तारीफ हुई।
‘स्लमडॉग मिलिनियरज् ने फ्रीडा को व्यावसायिक कामयाबी दी तो उनकी निजी जिंदगी को भी प्रभावित किया। पिंटो ने, जो फिल्म साइन करने से पहले ही अपने बचपन के दोस्त रोहन अंटाओ से सगाई कर चुकी थीं, फिल्म की कामयाबी के बाद करियर का हवाला देकर सगाई तोड़ दी। इस बीच उन्हें कई जगह फिल्म के अभिनेता देव पटेल के साथ देखा गया। चर्चा जोरों पर रही कि देव के साथ उनका रोमांस चल रहा है।
अट्ठारह अक्टूबर, 1984 को मुंबई में एक मंगलोरियन कैथोलिक परिवार में जन्मी फ्रीडा पांच साल की उम्र से ही फिल्म अभिनेत्री बनने का सपना देखा करती थीं, जबकि इस उम्र में बच्चे आम तौर पर खेलकूद में मशरूफ रहते हैं। 1994 में सुष्मिता सेन के मिस यूनीवर्स बनने की घटना ने फ्रीडा के जीवन और सपनों को गहरे ढंग से प्रभावित किया। तब उनकी उम्र केवल दस साल थी। हालांकि घर का माहौल फिल्मी बिल्कुल नहीं था। मां गोरेगांव के एक स्कूल में प्रिंसिपल थीं तो पिता बैंक में मैनेजर और बहन एक प्रसिद्ध समचार चैनल में एसोसिएट प्रोड्यूसर। लेकिन फ्रीडा तो दिन-रात फिल्मों के सपने देखती थी। मलाड के सेंट जोसेफ स्कूल से शुरुआती शिक्षा हासिल करने के बाद उन्होंने मुंबई के सेंट जेवियर्स कॉलेज से अंग्रेजी साहित्य में बीए की डिग्री ली। इस दौरान वे रंगमंच से भी जुड़ी रहीं और कई नाटकों में अभिनय किया। वे बेहतरीन नृत्यांगना भी हैं। खासकर सालसा नृत्य में उन्हें महारत हासिल है।
फ्रीडा ने अपने करियर की शुरुआत मॉडल के रूप में की। कॉलेज खत्म होने के बाद वे प्रसिद्ध मॉडलिंग एजेंसी ‘एलीट मॉडल मैनेजमेंटज् से जुड़ीं और करीब ढाई साल तक उसके लिए मॉडलिंग की। ‘स्लमडॉग मिलिनियरज् साइन करने से पहले उन्होंने टेलीविजन और पिंट्र मीडिया के लिए कई उत्पादों की मॉडलिंग की। उनका मॉडलिंग करियर करीब चार साल का रहा, जिस दौरान उन्होंने कई शो में रैंप पर चहलकदमी की और कई पत्रिकाओं के कवर पेज पर छपीं। बेरी जॉन के अंधेरी स्थित एक्टिंग स्टूडियो से उन्होंने अभिनय की तालीम भी ली, जहां उन्हें स्वयं प्रसिद्ध थिएटर निर्देशक बेरी जॉन ने प्रशिक्षित किया। यह अभिनय की दुनिया में उनके संघर्ष के दिन थे। तभी डेनी बॉयल ने अपनी फिल्म ‘स्लमडॉग मिलेनियरज् के लिए ऑडीशन टेस्ट लेने की घोषणा की। फ्रीडा ने भी किस्मत आजमाई और लगभग छह महीने के ऑडीशन के बाद वे चुन ली गईं, लतिका के किरदार के लिए।

रविवार, 21 मार्च 2010

वही कसक, छह दशक


अल्पसंख्यकों के साथ दलित राजनीति भी हमारी चुनाव रणनीति का अभिन्न हिस्सा। दलितों समेत कमजोर/वंचितों के लिए कई कदम उठाए गए। उनके नेताओं को सत्ता भी मिली, लेकिन संतोष करने लायक कुछ नहीं बदला। दलित आज भी वंचित और दमित हैं।
बाबा साहब भीम राव अम्बेडकर आजाद भारत में दलितों के लिए भी वही स्थान चाहते थे, जो उच्च जाति को बहुत पहले से प्राप्त था। वे जानते थे कि सदियों से पिछड़े व शोषित दलित आजाद भारत में और हाशिये पर जा सकते हैं। उनका यह भी मानना था कि जब तक दलितों को राजनीतिक सत्ता नहीं मिलती, उनका उत्थान संभव नहीं है। इसलिए उन्होंने संविधान में दलितों के लिए आरक्षण का प्रावधान किया। हालांकि पहले यह केवल दस साल के लिए तय किया गया और लक्ष्य रखा गया कि इन दस सालों में दलित राजनीतिक ताकत हासिल कर लेंगे। लेकिन बाबा साहब का यह सपना आजादी के साठ दशक बाद भी पूरा नहीं हुआ और आरक्षण का प्रावधान हर दस साल पर बढ़ता रहा।
हालांकि इस बीच मायावती, राम विलास पासवान जसे कुछ दलित नेता उभरकर सामने आए और उन्होंने सत्ता भी हासिल की, लेकिन दलितों की स्थिति में जिस सुधार की उम्मीद थी, वह नहीं हुई। आजादी के इन साठ सालों में देश के विकास से जितना फायदा समाज की अगड़ी जातियों को हुआ, उतना दलितों को नहीं हुआ। आज भी वे हाशिये पर हैं। संविधान में उनके लिए अनिवार्य व नि:शुल्क शिक्षा का प्रावधान होने के बावजूद उनमें शिक्षा की दर काफी कम है।
दलितों में शिक्षा के स्तर का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि देश में जितने भी अशिक्षित लोग हैं, उनमें 95 प्रतिशत दलित हैं। दलितों में, जिनकी संख्या देश में तकरीबन 25 करोड़ है और जो हमारी कुल आबादी का 24.4 प्रतिशत हैं, पुरुषों की साक्षरता दर 31.48 प्रतिशत और महिलाओं की 10.93 फीसदी है। साफ है कि संविधान में उनके शैक्षणिक उत्थान के लिए जो प्रावधान किए गए हैं, उसका पूरा लाभ उन्हें नहीं मिल रहा। इसकी कई वजह है, जिनमें से एक प्रमुख वजह उनके भीतर घर कर गई सामाजिक असुरक्षा की भावना है। ऊंची जातियों के शोषण से डरा-सहमा समाज का यह तबका आज भी अपने बच्चों को स्कूल भेजते समय एक अनजाने डर से ग्रस्त रहता है। कई इलाकों में दलित महिला कर्मियों ने ऊंची जाति के अपने पुरुष सहकर्मियों के खिलाफ छेड़खानी, शोषण या उन्हें परेशान करने की शिकायत की है। आज भी तकरीबन 80 प्रतिशत दलित देश के दूर-दराज व ग्रामीण इलाकों में रहते हैं, जहां शिक्षा, स्वास्थ्य जसी बुनियादी सुविधाएं भी नहीं हैं। तकरीब 60 प्रतिशत दलित आज भी भूमिहीन हैं, जबकि लगभग 37 प्रतिशत गरीबी रेखा से नीचे जीवन बसर करते हैं। दलित बच्चों में कुपोषण की दर 54 फीसदी तक है, जिनमें से 21 प्रतिशत का वजन स्वास्थ्य के लिए निर्धारित मापदंड से काफी कम है, जबकि कुपोषण के कारण 12 प्रतिशत दलित बच्चों की मौत पांच साल से पहले हो जाती है।
छुआछूत को असंवैधानिक घोषित किए जाने के बावजूद उनके साथ अछूतों का व्यवहार समाप्त नहीं हुआ है। खासकर, ग्रामीण इलाकों में और दक्षिणी राज्यों में इसका प्रभाव आसानी से देखा जा सकता है। आज भी उन्हें स्कूलों व ग्राम सभाओं की बैठक में एकसाथ बैठने की अनुमति नहीं है। मंदिरों, धर्मशालाओं और थानों में उनका प्रवेश वर्जित है। डॉक्टर उन्हें स्वास्थ्य सेवा देने से मना कर देते हैं। डाकिये भी उनके गांवों में डाक पहुंचाने से इनकार कर देते हैं। यहां तक कि मौत के बाद भी उन्हें समानता का हक नहीं मिलता। उन्हें न तो सार्वजनिक रास्तों के इस्तेमाल की अनुमति होती है और न ही सार्वजिक श्मशान के इस्तेमाल की। आंकड़ों के मुताबिक करीब 37.8 प्रतिशत सरकारी स्कूलों में दलित और ऊंची जाति के बच्चे भोजन के समय अलग-अलग बैठते हैं। ये सब आजाद भारत का ऐसा सच है, जिसे शहरों में बैठे नहीं देखा जा सकता, जहां जाति बंधन धीरे-धीरे दम तोड़ने लगा है।
देश के आर्थिक विकास में इस वर्ग का अहम योगदान है। खासकर कृषि क्षेत्र में, जहां ज्यादातर मजदूर दलित ही होते हैं। लेकिन विकास की दौड़ में वे स्वयं काफी पीछे रह गए हैं। भूस्वामियों द्वारा उनका शोषण किसी से छिपा नहीं है। दिनभर खेतों में काम करने के बाजवूद उन्हें नाममात्र का वेतन दिया जाता है। कार्य सहभागिता दर दलित महिलाओं की 25.98 फीसदी तो पुरुषों की 22.25 प्रतिशत है, लेकिन आज भी उनके श्रम का इस्तेमाल आम तौर पर चमड़ा उद्योग, बीड़ी उद्योग जसे असंगठित क्षेत्र के मजदूरों और बुनकर, मेहतर, कारीगर के रूप में ही होता है, जहां उनका जमकर आर्थिक शोषण होता है।
तमाम संवधानिक सुरक्षा के बावजूद दलितों का शोषण और उनके खिलाफ होने वाले अपराधों पर अंकुश नहीं लग रहा। आंकड़ों पर यकीन करें तो प्रतिदिन करीब तीन दलित महिलाएं बलात्कार की शिकार होती हैं, जबकि दो दलितों की हत्या कर दी जाती है और इतने के ही घर जला दिए जाते हैं। करीब ग्यारह दलित प्रतिदिन पीटे जाते हैं। दरअसल, हमारा सामाजिक ताना-बाना ही कुछ इस तरह का है कि संवैधानिक प्रावधान उसके सामने बौने हो जाते हैं। पुलिस-प्रशासन सब जाति-व्यवस्था के आगे बेबस हो जाते हैं। दलितों की स्थिति में यदि वास्तव में सुधार लाना है, तो हमें सबसे पहले इस सामाजिक ताने-बाने को बदलना होगा और दलितों में शिक्षा का स्तर व जागरुकता बढ़ानी होगी, जिसकी बात बाबा साहब भीम राव अम्बेडकर ने भी कही थी। तभी वास्तव में उनका विकास हो पाएगा और आजाद भारत में उन्हें वह स्थान मिलेगा, जिसका सपना बाबा साहब भीम राव अम्बेडकर ने देखा था। हालांकि 1960 के दशक में भू सुधार आंदोलन लागू होने के बाद दलितों की स्थिति में काफी सुधार हुआ है। उनमें अपने अधिकारों को लेकर जागरुकता भी आई है, जिसकी वजह से समाज के कुछ हिस्सों से ही सही छुआछूत जसी कुरीतियां मिटने लगी हैं। दलित अब समाज में अपने हक के लिए आवाज उठाने लगे हैं। लेकिन आज भी उनके उत्थान के लिए बहुत कुछ किया जाना बाकी है।

सोमवार, 8 मार्च 2010

एक मकसद मुइवा


थुइंगलेंग मुइवा नगा जनजातियों के नेता हैं। उन पर लोगों का जबरदस्त भरोसा है। वे प्रतिबंधित नेशनलिस्ट सोशलिस्ट काउंसिल ऑफ नगालिम के इसाक-मुइवा धड़े के महासचिव हैं। कई दशकों से वे वृहत्तर नगालैंड के लिए संघर्ष कर रहे हैं। इससे कम पर वे राजी नहीं। वे गांधी और अहिंसा को आदर्श मानते हैं, लेकिन अपने लक्ष्य की प्राप्ति के लिए उन्होंने हथियार उठाए। उनका यकीन माननवाधिकारों पर है, लेकिन उनके संगठन के हाथों मारे जाने वाले भारतीय फौजियों को वे इसकी परिधि से बाहर रखते हैं। उन्हें संतोष है कि भारत सरकार भी अब उनकी ताकत और उनके जज्बे को भांपकर समझने लगी है कि इस मामले का समाधान सैनिक कार्रवाई से नहीं हो सकता।

थुइंगलेंग मुइवा, प्रतिबंधित संगठन नेशनलिस्ट सोशलिस्ट काउंसिल ऑफ नगालिम (एनएससीएन) के इसाक-मुइवा (आईएम) धड़े के महासचिव हैं। एनएससीएन-आईएम, जो उत्तर-पूर्वी राज्यों में पिछले करीब छह दशक से वृहत्तर नगालैंड की स्वतंत्रता की लड़ाई लड़ रहा है। मुइवा नगा जनजातियों के सर्वाधिक विश्वसनीय नेता हैं। उन पर लोगों को भरोसा है कि वे उनकी संप्रभुता की मांग से कोई समझौता नहीं करेंगे। संप्रभुता भी वृहत्तर नगालैंड की, जिसमें नगालैंड के अलावा आसपास के राज्यों और म्यांमार में रहने वाले नगा जनजाति के लोग भी शामिल होंगे।
मुइवा को नगा स्वतंत्रता और संप्रभुता से कम कुछ भी स्वीकार नहीं। वे न खुद को और न ही नगा लोगों को भारत का हिस्सा मानते हैं। इसलिए उनका विश्वास भारतीय लोकतंत्र में भी नहीं है, हालांकि लोकतांत्रिक प्रक्रिया में उनका यकीन है। नगालैंड में उनकी पीपुल्स रिपब्लिक ऑफ नगालैंड नाम से समानांतर सरकार है, जो नगा जनजातियों के लिए सभी प्रशासनिक कामकाज देखती है। यह सरकार जनता से टैक्स भी वसूलती है और उससे उनके लिए सुविधाएं जुटाती है। वे नगा स्वाधीनता के लिए भारत सरकार अधिनियम, 1935 का हवाला देते हैं, जिसमें नगा हिल्स को ब्रिटिश इंडिया से बाहर रखने की बात कही गई थी।
मुइवा, जो महात्मा गांधी को पढ़ते हुए बड़े हुए और उनके अहिंसा व सविनय अवज्ञा आंदोलन जसे सिद्धांतों को आदर्श बताते हैं, लेकिन नगा समस्या के समाधान के लिए इन्हें कारगर नहीं मानते। यही वजह रही कि उन्होंने हथियार उठा लिया और लोगों को भारतीय सेना के खिलाफ लामबंद किया। उनका कहना है कि नगा स्वभाव से शांति प्रिय लोग हैं, लेकिन भारत सरकार ने नगालैंड में सेना भेजकर जो दमनचक्र चलाया, उसके बाद लोगों के पास हथियार उठाने के अलावा कोई अन्य विकल्प नहीं रह गया। मुइवा आज भी गांधी के उस आश्वासन को याद करते हैं, जो उन्होंने नगा स्वतंत्रता के पक्ष में दिया था और जिससे लोगों को भरोसा हो चला था कि इस समस्या का समाधान शांतिपूर्ण तरीके से निकाला जाएगा। लेकिन उनकी हत्या के बाद प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने शांतिपूर्ण समाधान के सभी रास्ते बंद कर दिए। वहां सेना भेज दी गई, लोगों के घर जला दिए गए, महिलाओं की अस्मत पर हमला हुआ, जिसके बाद लोगों को जंगलों में भागकर जान बचानी पड़ी। ऐसे ही लोगों में मुइवा का परिवार भी था।
यहीं से शुरू हुआ मुइवा का संघर्ष। नगा स्वतंत्रता का संघर्ष, नगा जनजातियों के लिए सम्मान का संघर्ष, आत्म निर्णय का संघर्ष। जब सेना के कहर से उनके परिवार को जंगल का रुख करना पड़ा, मुइवा की उम्र बहुत छोटी थी। लेकिन इस घटनाक्रम ने किशोर मुइवा के मस्तिष्क पर गहरी छाप छोड़ी। अन्य नगा जनजातीय परिवारों की भांति ही उनका परिवार भी गरीबी से जूझ रहा था। माता-पिता अशिक्षित थे, लेकिन ईसाई धर्म में उनकी गहरी आस्था थी, जिससे उन्हें हर संकट से उबर जाने की ताकत मिलती रही। मुइवा माता-पिता से ईसा मसीह की कहानियां सुनकर बड़े हुए। इन कहानियों ने किशोर मुइवा के मन पर अमिट छाप छोड़ी। क्रिश्चनिटी में उनकी आस्था इतनी गहरी हो गई कि ‘नगालिम फॉर क्राइस्टज् और ‘नगालैंड फॉर क्राइस्टज् उनके आंदोलन का नारा बन गया।
इस बीच, उन्होंने गांधी, माओत्से तुंग, मार्क्स, लेनिन सहित दुनिया के कई बड़े नेताओं को पढ़ा। उनके दर्शन को समझा, जिससे सेना के दमन के खिलाफ और नगालैंड की स्वतंत्रता के लिए उनके संघर्ष को बल मिलता रहा। मुइवा आज करीब 68 साल के हो चुके हैं, लेकिन उनका संघर्ष अब भी खत्म नहीं हुआ है। नगालैंड के लिए संघर्ष करते हुए उन्होंने अपने जीवन के 27 साल जंगलों में बिता दिए। पिछले करीब तीन साल से वे भारत से बाहर आम्सटर्डम में थे। लेकिन उन्हें संतोष इस बात है कि पिछले करीब छह दशक का उनका संघर्ष रंग लाया। जो भारत सरकार कभी कहा करती थी कि नगा संघर्ष को कुचलने के लिए सेना को महज कुछ दिन लगेंगे, वह अब मानने लगी है कि नगा समस्या का सैनिक समाधान नहीं हो सकता।
मुइवा की वृहत्तर नगालैंड की अवधारणा माओत्से तुंग की विचारधारा पर आधारित है। वे वृहत्तर नगालैंड में एक ऐसा समाजवाद चाहते हैं, जिसमें सभी के लिए समान आर्थिक विकास हो। लेकिन राज्य का स्वरूप वे धार्मिक रखना चाहते हैं, जो ईसाई आस्था पर आधारित होगा। वृहत्तर नगालैंड की लड़ाई के लिए ही उन्होंने जनवरी 1980 में इशाक कीसी सू के साथ मिलकर एनएससीएन बनाया था, जब नगा स्वाधीनता की लड़ाई लड़ रहे नगा नेशनल काउंसिल (एनएनसी) ने 1975 में भारत के साथ ‘शिलांग समझौताज् कर भारतीय संविधान को स्वीकार कर लिया और अपने हथियार छोड़ दिए। मुइवा ने इसे नगा लोगों के साथ धोखा करार दिया। हालांकि मुइवा के एनएससीएन में भी एकजुटता नहीं रह सकी और एसएस खपलांग के नेतृत्व में एक गुट 1988 में इससे अलग हो गया।
थाइलैंड, म्यांमार, चीन से उनके बेहतर संबंध हैं और उनका कहना है कि यह उनकी राजनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा है। मुइवा नगा समस्या के शांतिपूर्ण समाधान की बात करते हैं, लेकिन एनएनसी की तरह हथियार छोड़ना उन्हें मंजूर नहीं है। उनका साफ कहना है कि नगा समस्या के पूर्ण समाधान तक उनके नेतृत्व में एनएससीएन शस्त्र, स्वतंत्रता और अपनी भूमि कभी नहीं छोड़ेगा। मुइवा नगालैंड की चुनी हुई सरकार को कठपुतली सरकार मानते हैं।
उनका मानवाधिकारों में यकीन है, लेकिन नगा व्रिोहियों द्वारा सेना के जवानों की हत्या को वे मानवाधिकारों की परिधि से बाहर मानते हैं। उनका मानना है कि नगालैंड में भारतीय सेना की उपस्थिति अवैध है और वे स्थानीय लोगों के मानवाधिकारों का हनन करते हैं। लेकिन संघर्ष में सेना के जो जवान मारे जा रहे हैं, वे नगा सेना के हाथों जान गंवा रहे हैं। मतलब यह एक सेना की दूसरी सेना से लड़ाई है। किसी के मानवाधिकारों का हनन नहीं।

क्या इतिहास बनाएगा महिला दिवस!


एक बार फिर महिला आरक्षण विधेयक संसद में पेश होने को तैयार है। तेरह वर्षो से टलते आए इस विधेयक को लेकर सरकार इस बार आशान्वित है। उसे भाजपा और वाम दलों का समर्थन प्राप्त है। महिला दिवस पर यह पेश होगा। अगर यह पारित हो जाता है, तो यह एक ऐतिहासिक और क्रांतिकारी घटना होगी। भारतीय महिलाओं के लंबे संघर्ष की सबसे बड़ी सफलता।

कैबिनेट से मंजूरी मिलने के बाद एक बार फिर महिला आरक्षण विधेयक संसद में पेश होने को तैयार है। बहुमत की दृष्टि से देखा जाए तो इसके पारित होने में कोई परेशानी नजर नहीं आती। कांग्रेस, भाजपा और वाम दलों का समर्थन इसे हासिल है, लेकिन राजद, सपा के साथ-साथ बसपा भी महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत आरक्षण के अंदर दलित व पिछड़े वर्ग की महिलाओं के लिए आरक्षण की मांग करके इसमें अड़ंगा लगाने की तैयारी में है। पिछले करीब डेढ़ दशक से यह विधेयक आम सहमति के अभाव में लटका पड़ा है। सरकार चाहे भाजपा की रही हो या कांग्रेस की, कई विधेयक बहुमत के आधार पर पारित कराए गए, लेकिन यह एक मात्र विधेयक है, जिसे आम सहमति से पारित कराने की बात कहकर लगातार टाला जा रहा है।
इस बार हालांकि इसके पारित हो जाने की संभावना दिखती है। माहौल पूरी तरह इसके पक्ष में है। महंगाई के मुद्दे पर एकजुट हुआ विपक्ष इस मुद्दे पर अलग-थलग नजर आता है। भाजपा और वाम दल इस विधेयक को पारित कराने के मुद्दे पर कांग्रेस के साथ नजर आते हैं, लेकिन संशय अब भी बरकार है। कहीं आम सहमति का जिन्न फिर से न बाहर आ जाए और एक बार फिर यह विधेयक संसद में सिर्फ पेश होकर न रह जाए। दअसल, आजादी के पिछले छह दशक में पुरुष प्रधान समाज में महिलाओं के साथ जिस तरह दोयम दज्रे का व्यवहार होता रहा है, उससे इस संशय को और बल मिलता है।
बेशक आजादी के पिछले छह दशक में देश ने कई क्षेत्रों में प्रगति की। महिला सशक्तिकरण की बात भी जोर-शोर से उठाई गई। कई क्षेत्रों में महिलाओं ने कामयाबी के झंडे गाड़े। इस वक्त राष्ट्रपति से लेकर लोकसभा अध्यक्ष तक महिला हैं और अब विपक्ष की नेता सभी महिलाएं हैं। लेकिन यह महिला सशक्तिकरण के सिक्के का एक ही पहलू है। दूसरा पहलू आज भी महिलाओं दयनीय स्थिति को दर्शाता है। चाहे, स्वास्थ्य का मामला हो या शिक्षा का, महिलाओं को कभी बराबरी का हक नहीं मिला। हालांकि संविधान और कानून समानता की बात करते हैं, लेकिन वास्तविकता के धरातल पर स्थिति बिल्कुल भिन्न है।
महिलाओं का उत्पीड़न रोकने के लिए सरकार ने दहेज निषेध कानून बनाया; सबको समान शिक्षा मिल सके, इसके लिए शिक्षा के अधिकार का अधिनियम भी पारित किया; महिलाओं को घरेलू हिंसा ने निजात दिलाने के लिए भी कानून बनाए गए, लेकिन इनकी समुचित अनुपालना के अभाव में आज भी प्रति दिन औसतन छह नववधुएं दहेज की भेंट चढ़ती हैं, महिलाएं घरेलू हिंसा का शिकार हो रही हैं। समान और नि:शुल्क शिक्षा का प्रावधान होने के बावजूद केवल 39 प्रतिशत महिलाएं प्राथमिक स्कूलों का मुंह देख पाती हैं। माता-पिता उन्हें इसलिए स्कूल नहीं भेजते, क्योंकि उन्हें घर के कामकाज में हाथ बंटाना होता है। अधिकांश क्षेत्रों में महिलाएं आज भी पुरुषों के भोजन करने के बाद ही खाना खाती हैं और अगर भोजन कम पड़ जाए तो पुरुषों के खाने के बाद बचे भोजन से ही उसे अपनी भूख मिटानी होती है। फिर उनके स्वास्थ्य की फिक्र कौन करे? यहां बराबरी का कोई सिद्धांत लागू नहीं होता। देश के कई क्षेत्रों में कन्या भ्रूण की पहचान कर गर्भ में ही उनकी हत्या कर दी जाती है।
महिला आरक्षण विधेयक भी महिलाओं के प्रति पुरुष प्रधान राजनीति के इसी दोयम दज्रे के रुख का शिकार हुआ है। अब तक इस पर सिर्फ राजनीति की जाती रही है, इसे पारित कराने को लेकर किसी भी राजनीतिक दल या सरकार में इच्छाशक्ति नजर नहीं आई। संयुक्त मोर्चा और भाजपा की सरकार ने बारी-बारी से इसे संसद में पेश तो किया, लेकिन आम सहमति का हवाला देकर इसे पारित होने से रोके रखा। 2004 में सत्ता में आने के बाद कांग्रेस नीत यूपीए सरकार ने इसे अपने न्यूनतम साझा कार्यक्रम में शामिल किया। लेकिन यूपीए सरकार इसे संसद में पेश करने में नाकाम रही। दूसरी बार सत्ता हासिल करने के बाद यूपीए सरकार इसे संसद में पेश करने और पारित करने की तैयारी में है। हालांकि इस पर उसे भाजपा और वाम दलों का साथ तो है, लेकिन मुलायम, शरद, लालू के रुख आरक्षण के भीतर आरक्षण की मांग को लेकर बेहद कड़े हैं। विधेयक का हश्र पहले की तरह होगा या इस बार कुछ नया, यह तो आठ मार्च के बाद ही पता चलेगा, जब इसे राज्यसभा में पेश किया जाएगा।


अड़ंगा-दर-अड़ंगा
सबसे पहले सितंबर, 1996 में संयुक्त मोर्चा सरकार के कार्यकाल में विधि मंत्री रमाकांत डी खालप ने इसे लोकसभा में पेश किया। लेकिन मुलायम सिंह यादव और लालू प्रसाद ने आरक्षण के भीतर आरक्षण की मांग कर इसे पारित होने से रोक दिया। जून, 1998 में राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन सरकार के कार्यकाल में भी इसे पेश किया गया, लेकिन बात नहीं बनी। नवंबर, 1999 में राजग सरकार ने इसे एक बार फिर लोकसभा में पेश किया, लेकिन कांग्रेस और वाम दलों के समर्थन के लिखित आश्वासन के बावजूद यह पारित नहीं हो सका। वर्ष 2002 और 2003 में भी इसे लोकसभा में पेश किया गया, लेकिन नतीजा वही ढाक के तीन पात वाला रहा।

बुधवार, 3 मार्च 2010

दर-बदर अब कतर


कैसी विडंबना है! महान चित्रकार मकबूल फिदा हुसैन अब ‘भारतीय मूलज् के रह गए। अब वे कतर के नागरिक हो जाएंगे। कई साल से वे मजबूरी में अपने देश से बाहर रह रहे थे। उस देश से जिसको वे बेहद प्यार करते हैं और जहां पर रहकर और काम करके ही वे और उनकी कला दुनियाभर में मकबूल हुई। लेकिन संस्कृति के ठेकेदार हिंदू कट्टरपंथियों को तब तक चैन नहीं आया जब तक वे देश छोड़कर नहीं चले गए। यहां इन फासीवादी ताकतों ने उन पर हरसंभव हमला किया। ताज्जुब की बात यह है कि धर्मनिरपेक्षता के नाम पर वोट बटोरने वाली सरकार उस कलाकार को सुरक्षा और निर्द्वद्व काम करने का वातावरण देने का ठोस भरोसा नहीं दे सकी। अब जब कतर ने उन्हें खुद अपनी नागरिकता देने का प्रस्ताव किया है तो सरकार फिर कह रही है कि उन्हें सुरक्षा दी जाएगी।

मकबूल फिदा हुसैन, दुनिया के मशहूर पेंटर और सबसे महंगे भी। लेकिन उतने ही विवादास्पद। वे फिल्मकार भी हैं। फिल्मों का उन्हें नशा ही है। ‘गजगामिनीज् और ‘मिनाक्षी: ए टेल ऑफ थ्री सिटीजज् जसी फिल्में उन्होंने बनाईं। लेकिन उनकी डॉक्यूमेंट्री ‘थ्रू द आईज ऑफ अ पेंटरज् को बर्लिन फिल्म फेस्टिवल में गोल्डन बीयर पुरस्कार मिला।
जिस कला ने उन्हें दुनियाभर में चर्चित किया, एक पहचान दी, उसी से वे विवादों में आए। विवाद भी इतने गहरे कि उन पर एक हजार से अधिक आपराधिक मामले दर्ज हो गए। कुछ अतिवादी संगठनों ने उन्हें जान से मारने की धमकी दी, आखें फोड़ डालने और उन हाथों को काट डालने की धमकी दी, जिससे वे कैनवास पर रंग उकरते हैं। विभिन्न मामलों की सुनवाई के दौरान अदालतों ने कई बार उन्हें समन जारी किया, लेकिन वे उपस्थित नहीं हुए। ऐसे में उनके खिलाफ गैर-जमानती वारंट जारी हो गया और गिरफ्तारी से बचने के लिए उन्हें देश छोड़ना पड़ा।
हालांकि निर्वासन का विकल्प उन्होंने खुद चुना, लेकिन ऐसा उन्होंने स्वेच्छा से नहीं, मजबूरन किया। ‘भीड़तंत्रज् के खौफ से देश छोड़ने की टीस उनके मन में हमेशा रही और यह भी कि सरकार ने उनकी सुरक्षा के लिए कुछ विशेष नहीं किया। हालांकि सर्वोच्च न्यायालय ने हाल ही में उनके खिलाफ जारी गिरफ्तारी वारंटों को निलंबित कर दिया था, लेकिन उनका खौफ अब भी बरकरार है, जो कानून अपने हाथ में लेकर घूमते हैं और कला-संस्कृति को अपनी जागीर समझते हैं। शायद यही वजह है कि हुसैन की देश वापसी नामुमकिन-सी हो गई है।
उन्हें चर्चा में रहने का भी कम शौक नहीं है। इस समय वे एक बार फिर चर्चा में हैं, लेकिन इस बार उनकी चर्चा किसी पेंटिंग या फिल्म को लेकर नहीं है, बल्कि उनकी नागरिकता को लेकर है। जहां जन्मे, पले-बढ़े, वहां से उनकी कला को तो पहचान मिली, लेकिन उन्हें सुरक्षा नहीं मिली। अतिवादी संगठनों की धमकियों और कानूनी उलझनों ने उन्हें देश से दूर कर दिया। लेकिन आज जबकि 95 वर्ष की उम्र में कतर उन्हें अपनी नागरिकता से नवाज रहा है और उनके हमेशा के लिए देश से दूर जाने का अंदेशा हो गया है, तो देश में हलचल मची है। सरकार देश वापसी पर उन्हें पूरी सुरक्षा मुहैया कराने को कह रही है, तो कला प्रेमियों में इस बात को लेकर नाराजगी है कि एक कलाकार की सुरक्षा को लेकर इतनी असंवेदनशीलता क्यों? इतनी देर क्यों? सरकार के रवैये पर कला प्रेमी और हुसैन प्रेमी अपनी शर्मिदगी का इजहार कर रहे हैं।
हुसैन अपनी कला की प्रयोगधर्मिता के लिए जाने जाते हैं। पेंटिंग से लेकर फिल्म निर्माण तक में उन्होंने नित-नए प्रयोग किए और सफल भी हुए। यही वजह रही कि किसी ने उन्हें भारत का जीवित किंवदंती कहा, तो अमेरिका की फोर्ब्स मैगजीन ने ‘भारत का पिकासोज्। वे दुनियाभर में कला के क्षेत्र में एक आइकॉन बन चुके हैं। लेकिन अब शायद हम उन्हें गर्व से ‘अपनाज् नहीं कह सकेंगे। उनकी सुरक्षा को लेकर सरकार की उदासीनता और अतिवादियों का खौफ हमारे इस पिकासो और जीवित किंवदंती को हमसे दूर कर रहा है।
हुसैन की पेंटिंग में मानवीय स्थिति का चित्रण होता है और यही उनकी खासियत भी है। अपनी फिल्मों के जरिए भी उन्होंने यही दिखाने की कोशिश की। उन्होंने महाभारत और रामायण से प्रेरणा लेकर सैकड़ों चित्र बनाए, जो देश-विदेश में खूब बिके। लेकिन उनके बनाए हिंदू देवी-देवताओं के प्रयोगधर्मी चित्रों से हिंदू कट्टरपंथी नाराज हो गए। उनके खिलाफ अश्लीलता फैलाने एवं जान-बूझकर लोगों की भावनाएं आहत करने के कई मामले देशभर की अदालतों में दर्ज हो गए और लोगों का रुख भी उन्हें लेकर आक्रामक हो गया। वैसे, यह आज भी समझ से परे है कि जो चित्र उन्होंने 1970 के दशक में बनाए थे, उसे लेकर विवाद 1996 में क्यों हुआ, जब वे चित्र हिन्दी मासिक ‘विचार मीमांसाज् में प्रकाशित हुए? लोग यह भी भूल जाते हैं कि हुसैन ने डॉ. राममनोहर लोहिया के कहने पर रामायण की कथा पर आधारित चित्रों की श्रंखला बनाई थी। कला की प्रयोगधर्मिता और उसे आधुनिक रूप देने की कोशिश उनके लिए काफी महंगी साबित हुई।
सत्रह सितंबर, 1915 को महाराष्ट्र के पंढरपुर में जन्मे हुसैन ने कामयाबी विरासत में नहीं पाई। वे सिर्फ एक साल के थे, जब मां का साया सिर से छिन गया। शुरुआती दिनों में वे फिल्मी होर्डिग्स की पेंटिंग बनाया करते थे, जिसके लिए उन्हें काफी कम पैसे मिलते थे। एक चित्रकार के रूप में हुसैन को पहचान 1947 में मिली, जब बॉम्बे आर्ट सोसाइटी की वार्षिक प्रदर्शनी में उनकी पेंटिंग ‘सुनहरा संसारज् को अवार्ड मिला। इसके बाद उन्होंने पीछे मुड़कर नहीं देखा। 1952 में उनकी पहली एकल चित्र प्रदर्शनी ज्यूरिख में लगी। भारत, अमेरिका, यूरोप सहित दुनियाभर में उनके चित्रों की प्रदर्शनी लगी, जिसमें उन्होंने कई पुरस्कार जीते। इस बीच उन्हें पद्मश्री (1966) पद्म भूषण (1973) और पद्म विभूपषण (1991) जसे नागरिक सम्मानों से नवाजा गया। 1986 में वे राज्यसभा के लिए भी नामित हुए।

मंगलवार, 23 फ़रवरी 2010

अपना दोस्त राम बरन


राम बरन यादव अभी भारत की यात्रा पर आए हुए थे। उनकी भारत यात्रा राजनयिक तो थी ही साथ ही उन्होंने हरिद्वार में चल रहे कुम्भ मेले में भी एक भक्त की हैसियत से भाग लिया। वे चाहते हैं कि भारत और नेपाल के संबंध मधुर बने रहें। वे हरेक क्षेत्र में भारत के साथ मिलकर काम करना चाहते हैं। राष्ट्रपति पद तक पहुंचने के क्रम में उन्हें काफी संघर्ष करना पड़ा है। यह राम बरन यादव की स्पष्टवादिता का ही प्रमाण है कि राष्ट्रपति पद पर रहते हुए भी वे देश की वर्तमान राजनीतिक व्यवस्था से असंतुष्ट हैं और उसको आमूल-चूल बदलने की बात करते हैं।

राम बरन यादव, नेपाल के राष्ट्रपति। एक ऐसे नेता जो लोकतंत्र की स्थापना के लिए न केवल राजतंत्र से लड़ते रहे, बल्कि माओवादियों से भी लड़े और आज भी उनका विरोध ङोल रहे हैं। नेपाल में करीब ढाई सौ साल पुराने राजतंत्र की विदाई और गणतंत्र की स्थापना के बाद वहां पहली बार जनता का कोई प्रतिनिधि राष्ट्रपति बना और यह मौका मिला राम बरन यादव को। निश्चय ही, इस उपलब्धि में लोकतंत्र की स्थापना के लिए उनकी अंतहीन लड़ाई का महत्वपूर्ण योगदान रहा। आखिर, लंबे समय से नेपाल में जड़ें जमाए राजतंत्र की विदाई आसान तो न थी।एक लंबी लड़ाई के बाद वर्ष 2008 में नेपाल में 240 पुराने राजतंत्र का अंत हुआ और वहां संघीय लोकतांत्रिक गणराज्य की स्थापना हुई। उसी साल अप्रैल में वहां संविधानसभा के चुनाव हुए, जिसमें कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ नेपाल (माओवादी) माओवादियों को सबसे अधिक सीटें मिलीं। लेकिन जुलाई में हुए राष्ट्रपति चुनाव में उनका उम्मीदवार हार गया। नेपाली कांग्रेस के उम्मीदवार राम बरन यादव ने सीपीएनएम उम्मीदवार राम राजा प्रसाद सिंह को हराकर जीत हासिल की। इससे पहले उन्होंने अपने गृह जिले धनुषा के ही पांच नंबर कांस्टीच्वेंसी से संविधानसभा का चुनाव जीता था। राष्ट्रपति पद पर जीत के तुरंत बाद उन्होंने कहा था कि यह लोकतंत्र की जीत है और वे आगे भी इसे मजबूत करने के लिए काम करते रहेंगे।चार फरवरी, 1948 को नेपाल के मधेशी क्षेत्र में धनुषा जिले में एक मध्यमवर्गीय किसान परिवार में पैदा हुए राम बरन यादव के लिए राष्ट्रपति पद तक का सफर आसान नहीं रहा और न ही यह कामयाबी उन्हें विरासत में मिली। उन्होंने जो कुछ भी पाया अपनी मेहनत व जुझारूपन से पाया। पिता मध्यमवर्गीय परिवार के किसान थे। परिवार आर्थिक रूप से बहुत संपन्न नहीं था। लेकिन किसान पिता को यह पसंद नहीं था कि बेटा भी खेत-खलिहान में उलझकर रह जाए। इसलिए उन्होंने बेटे को स्कूल भेजा। उनकी शुरुआती शिक्षा-दीक्षा उनके गृह जिले में ही हुई। लेकिन उच्च शिक्षा के लिए वे काठमांडू रवाना हो गए।बाद में उन्होंने भारत का रुख किया और पश्चिम बंगाल के कलकत्ता मेडिकल कॉलेज से एमबीबीएस की पढ़ाई की। इस दौरान वे विभिन्न लोकतांत्रिक संगठनों से जुड़े रहे। वहां छात्र राजनीति में उनकी महत्वपूर्ण भागीदारी रही। एमबीबीएस की डिग्री लेने के बाद उन्होंने चंडीगढ़ के मेडिकल एजुकेशन और शोध संस्थान से एमडी किया। पढ़ाई पूरी करने के बाद वे नेपाल लौट गए। वहां उन्होंने करीब चार साल तक प्रैक्टिस भी की। उन्होंने जनकपुर में एक मेडिकल क्लिनिक भी खोला। एक डॉक्टर के रूप में भी वे कामयाब रहे।लेकिन डॉक्टरी का पेशा शायद उनके लिए नहीं बना था। पहले से ही राजनीति में रुचि रखने वाले डॉ. यादव 1980 के दशक में नेपाल के पूर्व प्रधानमंत्री बीपी कोइराला के आखिरी दिनों में उनके निजी चिकित्सक बने, जो उनके राजनीतिक जीवन का टर्निग प्वाइंट साबित हुआ। बीपी कोइराला की सामाजिक-लोकतांत्रिक विचारधारा ने उन्हें सक्रिय राजनीति में आने के लिए प्रेरित किया। वे नेपाली कांग्रेस से जुड़ गए और पार्टी में विभिन्न पदों पर उन्होंने महत्वपूर्ण जिम्मेदारी निभाई। 1991-1994 के बीच वे गिरिजा प्रसाद कोइराला की सरकार में स्वास्थ्य मंत्री भी बने। वैसे नेपाल में लोकतंत्र की लड़ाई से वे तभी जुड़ गए थे, जब दिसंबर, 1960 में तत्कालीन राजा महें्र ने लोकतांत्रिक ढंग से चुनी हुई प्रधानमंत्री बीपी कोइराला की सरकार गिरा दी और सभी शक्तियां अपने अधीन कर ली। पड़ोसी देश भारत के लिए उनके दिल में स्नेह है और इसलिए वे दोनों देशों के संबंध मधुर बनाना चाहते हैं। पिछले सप्ताह भारत की यात्रा के दौरान उन्होंने इसके स्पष्ट संकेत दिए। राष्ट्रपति चुने जाने के बाद भी उन्होंने साफ कहा था कि वे शिक्षा, स्वास्थ्य और पर्यावरण के क्षेत्र में भारत के साथ मिलकर काम करना चाहते हैं। शायद यही वजह रही कि वर्ष 2008 में राष्ट्रपति का पदभार ग्रहण करने के बाद अपनी पहली औपचारिक विदेश यात्रा के रूप में उन्होंने भारत को चुना। भारत से उनके लगाव की वजह न केवल उनका ऐसे क्षेत्र से होना है, जहां की संस्कृति और रीति-रिवाज काफी हद तक यहां से मिलते-जुलते हैं, बल्कि उनकी शिक्षा-दीक्षा भी हो सकती है, जो उन्होंने भारत में ही पाई।नेपाल में राम बरन यादव की छवि एक ऐसे जुझारू नेता की है, जो जनता के लोकतांत्रिक हितों व अधिकारों के लिए प्रतिबद्ध हैं और देश की एकता व अखंडता के लिए हर झंझावात ङोलने को तैयार हैं। शायद यही वजह है कि नेपाल के मधेश क्षेत्र में मधेशी प्रांत की मांग का वे खुलकर विरोध करते हैं, जबकि वे स्वयं उसी क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करते हैं। उनका सपना नेपाल को आर्थिक रूप से संपन्न और शांतिपूर्ण बनाना है, जो फिलहाल विकास की बाट जोह रहा है। साथ ही वे नेपाल के तराई क्षेत्र में सक्रिय कुछ हथियारबंद समूहों को मुख्यधारा में लाना चाहते हैं। उनका साफ मानना है कि देश में जो मौजूदा राजनीतिक संस्कृति है, उसके कारण विकास अवरुद्ध हो गया है। इसमें आमूल-चूल बदलाव की जरूरत है। एकजुटता और प्राकृतिक संसाधनों के इस्तेमाल से ही नेपाल तरक्की कर सकता है।वे स्पष्टवादिता के लिए भी जाने जाते हैं और इस क्रम में अपनी उम्र भी नहीं छिपाते। राष्ट्रपति चुनाव से पहले इस बारे में पूछे जाने पर बड़ी साफगोई से ठहाके के साथ उन्होंने कहा, ‘यूं तो मैं 64 साल पहले पैदा हुआ था, लेकिन जन्म प्रमाण-पत्रों के अनुसार मेरी उम्र चूंकि 61 साल ही है, इसलिए राष्ट्रपति चुनाव के लिए दाखिल नामांकन-पत्र में भी यही उम्र लिखी गई है।‘

मंगलवार, 16 फ़रवरी 2010

बेगुन का गुनग्राहक


कौन नहीं जानता कि जयराम रमेश नव पूंजीवाद और उदारीकरण के घनघोर समर्थक हैं। लेकिन बीटी बैगन के मामले में उन्होंने पर्यावरण मंत्री के नाते जो फैसला लिया, वह उनकी अपनी आर्थिक विचारधारा के उलट था। उनकी नजर इस बहस के सामाजिक पहलू को नहीं काट पाई और उन्होंने फिलहाल उस पर रोक लगा दी। उनके इस फैसले पर अब वे बीटी बैगन विरोधी भी वाह-वाह कर रहे हैं, जिनके लिए तैश खाकर जयराम रमेश ने कहा था कि उन लोगों को अपने दिमाग का इलाज कराना चाहिए। वैसे भी रमेश तैश में आकर ऐसे बयान देते रहते हैं जो आगे बड़े विवाद बनते हैं।

पर्यावरण से प्यार है उन्हें। आज से नहीं, नौ साल की उम्र से, जब ब्रिटिश लेखक एडवर्ड प्रिचार्ड गी की पुस्तक ‘द वाइल्ड लाइफ ऑफ इंडियाज् हाथ आई। पर्यावरण से इस विशेष लगाव की वजह से ही शायद यूपीए सरकार के दूसरे कार्यकाल में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और यूपीए अध्यक्ष सोनिया गांधी ने वन एवं पर्यावरण मंत्रालय की जिम्मेदारी के लिए उन्हें चुना। ये हैं जयराम रमेश। वे राष्ट्रीय सलाहकार परिषद के सदस्य भी हैं। इससे पहले की यूपीए सरकार में वे वाणिज्य व उद्योग मंत्रालय में राज्य मंत्री रह चुके हैं।
यूपीए सरकार के दूसरे कार्यकाल में पर्यावरण व मंत्री के रूप में जयराम रमेश अक्सर विवादों में रहे। कभी जलवायु परिवर्तन पर उनके बयान ने विपक्ष को नाराज किया तो कभी भोपाल में यूनियन कार्बाइड कंपनी के परिसर स्थल का दौरा करने के बाद दिए गए उनके बयान ने आम लोगों को नाराज कर दिया। इन दिनों वह बीटी बैंगन को लेकर चर्चा में हैं। हालांकि लोगों के भारी विरोध के बाद इसे भारतीय कृषि जगत में उतारने पर रोक लगा दी गई है, लेकिन इसे लेकर उनका आग्रह किसी से छिपा नहीं है। इसका विरोध करने वालों को उन्होंने ‘मानसिक इलाजज् की सलाह तक दे डाली।
रमेश कांग्रेस के उन खास नेताओं में हैं, जिनकी गिनती गांधी-नेहरू परिवार के करीबी नेताओं में होती है। यही वजह रही कि पिछले साल लोकसभा चुनाव अभियान की जिम्मेदारी पार्टी अध्यक्ष सोनिया गांधी ने उन्हें सौंपी। रमेश ने भी उन्हें निराश नहीं किया। पार्टी के एक अनुशासित कार्यकर्ता की तरह उन्होंने तुरंत वाणिज्य व उद्योग राज्य मंत्री के पद से इस्तीफा दिया और जुट गए चुनाव की रणनीति तैयार करने में। चुनाव अभियान को लेकर बनाई गई उनकी रणनीति कामयाब रही और यूपीए पिछली बार की तुलना में अधिक सीटें लेकर एकबार फिर सत्तासीन हुई, जिसमें उन्हें पर्यावरण व वन मंत्रालय का स्वतंत्र कार्यभार सौंपा गया।
लेकिन यूपीए सरकार के अन्य मंत्रियों से अलग उनके कमरे में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह या सोनिया गांधी की तस्वीर नहीं, बल्कि दक्षिण भारत के देवी-देवताओं को दर्शाती तंजौर पेंटिंग और बौद्ध धर्म के कुछ चिह्न् हैं। इसके अलावा कोई तस्वीर है तो वह महात्मा गांधी और जवाहर लाल नेहरू की है, वह भी गंभीर बहस की म्रुा में। हालांकि उनकी आदर्श इंदिरा गांधी हैं। रमेश के मुताबिक, हर क्षेत्र में उन्होंने बेहतर काम किया। पर्यावरण भी इसका अपवाद नहीं है। अगर बतौर प्रधानमंत्री उन्होंने वन संरक्षण की दिशा में जरूरी कदम नहीं उठाए होते, तो आज यह पूरी तरह खत्म हो चुका होता।
कर्नाटक के चिकमगलूर में नौ अप्रैल, 1954 को जन्मे रमेश तकनीक व आधुनिकीकरण के हिमायती हैं। इसकी वजह शायद उनकी शिक्षा-दीक्षा और पारिवारिक पृष्ठभूमि रही है। उनके पिता प्रो. सीके रमेश आईआईटी, बॉम्बे के सिविल इंजीनियरिंग डिपार्टमेंट के विभागाध्यक्ष थे। तीसरी से पांचवीं की स्कूली शिक्षा उन्होंने रांची के सेंट जेवियर स्कूल से पूरी की। 1970 में उन्होंने आईआईटी, बॉम्बे में दाखिला लिया और वहां से मैकेनिकल इंजीनियरिंग में बीटेक किया। 1975-77 में उन्होंने अमेरिका के कार्नेगी यूनिवर्सिटी से प्रबंधन और लोक नीति में मास्टर डिग्री ली।
पढ़ाई खत्म करने के बाद वे विश्व बैंक से जुड़े। दिसंबर, 1979 में वे भारत लौटे और यहां योजना आयोग सहित कें्र सरकार के उद्योग व आर्थिक विभाग से संबंधित विभिन्न संस्थाओं में महत्वपूर्ण जिम्मेदारी निभाई। वे 1991 में पीवी नरसिम्हा राव सरकार में वित्त मंत्री मनमोहन सिंह के सलाहकार भी रहे। वे राजीव गांधी के भी करीबी रहे। 1989 में जब कांग्रेस चुनाव हार हार गई थी, तो कांग्रेस के पुनर्जीवन के लिए उन्होंने राजीव गांधी के सलाहकार की भूमिका निभाई थी। आज उसी भूमिका में वे सोनिया गांधी के साथ हैं।
रमेश आंध्र प्रदेश से राज्य सभा के सदस्य हैं। उनकी मातृभाषा तेलुगू है। कर्नाटक संगीत और भरतनाट्यम में उन्हें खासी दिलचस्पी है। वे चीन के साथ भारत के अच्छे संबंधों के पैरोकार रहे हैं। उनका कहना है कि दोनों देशों के बीच व्यापार, कला, संस्कृति सहित अन्य क्षेत्रों में भी सहयोग की भरपूर गुंजाइश है और इससे दोनों पक्ष लाभान्वित होंगे। उन्होंने भारत-चीन संबंधों पर आधारित ‘मेकिंग सेंस ऑफ चीनींडिया : रिफ्लेक्शन ऑन चाइना एंड इंडियाज् नामक पुस्तक भी लिखी। जयवायु परिवर्तन पर कोपेनहेगन सम्मेलन के दौरान भी उन्होंने ब्राजील, दक्षिण अफ्रीका और चीन के साथ मिलकर प्रभावशाली तरीके से विकासशील देशों का पक्ष रखने की मुहिम चलाई। उन्होंने बिजनेस स्टैंडर्ड, बिजनेस टुडे, द टेलीग्राफ, टाइम्स ऑफ इंडिया और इंडिया टुडे के लिए कॉलम भी लिखा है। साथ ही टेलीविजन पर भी बिजनेस और अर्थ से जुड़े कई कार्यक्रम प्रस्तुत किए।
लेकिन कई बार उनके बयानों ने विवाद पैदा किया, जिस पर खासा हंगामा हुआ। देश के पहले जीन परिवर्धित बीटी बैंगन को व्यावसायिक मंजूरी से पहले उन्होंने लोगों से इस बारे में परामर्श लेना जरूरी समझा। इसके लिए उन्होंने हैदराबाद में लोगों को आमंत्रित कर अनूठी पहल की। वहां देश के सात शहरों से करीब आठ हजार लोग पहुंचे। इस दौरान लोगों ने विरोध प्रदर्शन भी किए, जिसके जवाब में रमेश ने यहां तक कह डाला कि बीटी बैंगन का विरोध करने वालों को ‘मानसिक इलाजज् की जरूरत है। इसी तरह, यूपीए सरकार के पहले कार्यकाल में प्रधानमंत्री के ब्राजील दौरे से ठीक पहले उन्होंने यह कहकर विदेश मंत्रालय के लिए मुश्किल खड़ी कर दी कि आखिर ऐसे देश से व्यापार समझौते की क्या उपयोगिता है, जो हमसे काफी दूर है। भोपाल में यूनियन कार्बाइड कंपनी से हुए गैस रिसाव ने स्थानीय लोगों को जो घाव दिए, वे आज भी नहीं भरे हैं। इसे लेकर आज भी लोगों में रोष है। लेकिन रमेश ने कंपनी परिसर में पहुंचकर और वहां से हाथ में मिट्टी उठाकर यह कहते हुए लोगों को नाराज कर दिया कि देखिये, यह मेरे हाथ में है, फिर भी मैं जिंदा हूं। जलवायु परिवर्तन पर कोपेनहेगन सम्मेलन के दौरान कार्बन उत्सर्जन कम करने को लेकर दिए गए उनके बयान ने भी खासा हंगामा बरपाया।

सोमवार, 8 फ़रवरी 2010

अमर नहीं था प्रेम


अमर सिंह कब खबरों में नहीं रहते। लेकिन इधर खूब थे और वह भी उलट कारणों से। पहले उनका खबरों में होना समाजवादी पार्टी के लिए होता था। इस बार सपा से उनकी बेआबरू विदाई इसका कारण बनी। मुलायम-अमर की जोड़ी टूट गई। दोस्त-दोस्त न रहा। प्यार, प्यार न रहा!

अमर सिंह, भारतीय राजनीति के कॉरपोरेट नुमाइंदे। एक ऐसे कारोबारी नेता, जिसने धुर समाजवादी पार्टी को दिया पूंजीवादी चेहरा। पैसा हाथ बदलते हैं, यह कहावत जानी-मानी। लेकिन वह हाथ ही बदल देता है मनुष्य को भी। गरीब-गुरबों की राजनीति करने वाली पार्टी अचानक हो गई पांच सितारा। कॉरपोरेट और फिल्मी सितारों से लकदक। खांटी समाजवादी हाशिये पर। जनता भी पार्टी से होती गई दूर। तब कहीं ‘नेताजीज् को एहसास हुआ कि पूंजीवाद ने उनके समाजवाद का निकाल दिया दीवाला। यह समझने में लग गए पूरे चौदह साल। फिर भी सबकुछ लुटा के आखिर होश में आ ही गए। अमर सिंह पार्टी से बाहर हो गए, इस आरोप के साथ कि वे समाजवाद की नींव हिलाने की एक साजिश के रूप में पार्टी में शामिल हुए थे। इस तरह, समाजवाद और पूंजीवाद का प्रेम अमर नहीं हो पाया।
करीब चौदह साल पहले 1996 में अमर सिंह समाजवादी पार्टी में शामिल हुए थे। तब सपा का अपना जनाधार था। पार्टी प्रमुख मुलायम सिंह यादव दो बार राज्य के मुख्यमंत्री बन चुके थे। कें्र में जब संयुक्त मोर्चा की सरकार बनी तो वे रक्षा मंत्री बने। ऐसा इसलिए हो सका, क्योंकि गरीब, पिछड़े और अल्पसंख्यक; जिसकी वे राजनीति करते थे, उनके साथ थे। लेकिन अमर सिंह के आने के बाद पार्टी की रीति-नीति बदलने लगी। पूंजीपतियों और उद्योगपतियों की भूमिका बढ़ी। अमर सिंह पार्टी और उनके बीच संपर्क सूत्र का काम करने लगे। रिलायंस अनिल धीरूभाई अंबानी समूह के प्रमुख अनिल अंबानी जसे उद्योगपति और अमिताभ बच्चन, जया बच्चन, जया प्रदा, राजबब्बर, संजय दत्त, मनोज तिवारी जसी फिल्मी हस्तियां पार्टी से जुड़ीं। पार्टी को बड़ी मात्रा में वित्तीय अनुदान मिलने लगा, जिसकी उसे सख्त जरूरत थी।
पैसे की ताकत के अलावा उनके पास वक्तृत्व कला भी थी। शेरो-शायरी से लेकर अंग्रेजी भाषा पर भी उनकी अच्छी पकड़ है, जो सपा के दूसरे नेताओं में नहीं थी। जो गिने-चुने नेता अंग्रेदां थे भी, वे नेताजी के विश्वासपात्र नहीं बन पाए। उनके इन्हीं गुणों और पैसे की धमक ने उन्हें नेताजी के करीब ला दिया। इतने करीब कि नेताजी बहुत से फैसलों के लिए उन पर निर्भर हो गए। जयललिता से बात करनी हो या चं्रबाबू नायडू से, सपा के प्रतिनिधि अमर सिंह ही होते थे। वे सपा प्रमुख की एक बड़ी जरूरत बन गए। नेटवर्क में माहिर अमर सिंह को नेटवर्क नेता के रूप में भी जाना जाता है।
अमर सिंह पार्टी के लिए राजपूत वोट बैंक की दृष्टि से भी फायदेमंद थे। सपा जो केवल पिछड़ों और अल्पसंख्यकों की राजनीति के लिए जानी जाती थी, को राजपूतों का वोट मिलने की उम्मीद भी बंध गई। उनके आने के बाद पार्टी से कई राजपूत नेता जुड़े भी। लेकिन आजम खां जसे पुराने व जनाधार वाले नेता पार्टी से अलग भी हुए।
अमर सिंह के बोलबाले के दौर में पार्टी उस कांग्रेस के करीब जाने लगी, जिसका विरोध ही उसकी राजनीति का आधार था। कल्याण सिंह जसे नेता भी पार्टी में आए, जिसकी वजह से सपा के परंपरागत मुसलमान वोटर नाराज हो गए। एक अरसे से अमर नीति से परेशान सपा के जमीनी कार्यकर्ताओं में विरोध के स्वर मुखर होने लगे। इस बीच अपनी भूमिका कमजोर होती देख अमर सिंह ने पार्टी सुप्रीमो पर दबाव बनाने के लिए इस्तीफे की राजनीति अपनाई। पार्टी के सभी पदों से उन्होंने इस्तीफा दे दिया। पार्टी में रहते हुए ही उन्होंेने स्वयं को राजपूतों का सच्चा प्रतिनिधि बताते हुए लोकमंच का गठन किया। निश्चय ही उनका यह कदम पार्टी के खिलाफ बगावत का बिगुल था।
अमर सिंह का विवादों से हमेशा चोली-दामन का साथ रहा है। ‘वोट के बदले नोटज् कांड ऐसा ही एक मामला है। वर्ष 2008 में अमेरिका के साथ परमाणु समझौते को लेकर जब वामपंथी दलों ने कें्र की संप्रग सरकार से समर्थन वापस ले लिया था, तब अमर सिंह ही सरकार के लिए तारणहार बनकर आए थे। कांग्रेस को समर्थन के लिए उन्होंने सपा प्रमुख को मनाया। कहा तो यहां तक गया कि लोकसभा में नोटों से भरा जो बैग लहराया गया था, वह अमर सिंह ने ही भाजपा सांसदों को संप्रग के पक्ष में मतदान के लिए दिया था। अब सपा के नेता भी दबी जुबान से यह कहने लगे हैं, हालांकि तब उन्होंने इससे इनकार किया था। सपा के इस रवैये ने उसके परंपरागत वोट बैंक मुसलमानों को नाराज कर दिया, क्योंकि वे इस समझौते का विरोध कर रहे थे।
दिल्ली के जामिया नगर में हुए मुठभेड़ की जांच की मांग कर उन्होंने एक नए विवाद को जन्म दिया, जबकि इससे पहले उन्होंने मुठभेड़ में शहीद हुए दिल्ली पुलिस के जवान मोहन चंद शर्मा के परिवार को दस लाख रुपए की सहायता राशि देकर अपनी संवेदना जताई थी। 26/11 के बाद यह बयान देकर उन्होंने पार्टी के लिए मुश्किल खड़ी कर दी कि यदि हमलावर पाकिस्तान के नागरिक नहीं हुए तो सपा कें्र की यूपीए सरकार से समर्थन वापस ले लेगी। ऐसे गंभीर हालात में अमर सिंह के इस बयान ने पार्टी को हंसी का पात्र बना दिया। हाल ही में अमर सिंह की रुचि ‘ब्लॉगिंगज् में भी हो गई है। ‘बड़े भाईज् अमिताभ बच्चन से प्रेरणा लेकर उन्होंने अपना ब्लॉग भी शुरू किया।
अमर सिंह का जन्म सत्ताइस जनवरी, 1956 को उत्तर प्रदेश के आजमगढ़ जिले में हुआ। उनकी शुरुआती शिक्षा जिले के हिंदी माध्यम स्कूलों से ही हुई। लेकिन आगे की पढ़ाई के लिए उन्होंने पश्चिम बंगाल का रुख किया। वहां कोलकाता के सेंट जेवियर कॉलेज से उन्होंने उच्च शिक्षा प्राप्त की। अपने राजनीतिक करियर की शुरुआत उन्होंने कांग्रेस से की। सपा में शामिल होने से पहले वे कोलकाता में कांग्रेस के हार्डकोर नेता थे। 1980 के दशक में कांग्रेस के तत्कालीन नेता माधव राव सिंधिया ने उन्हें ऑल इंडिया कांग्रेस कमेटी के लिए भी नामांकित किया था, क्योंकि कोलकता में भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड के अध्यक्ष के लिए हुए चुनाव में उन्होंने जगमोहन डालमिया को हराने में सिंधिया की मदद की थी। बाद में वे हिंदुस्तान टाइम्स, सहारा इंडिया सहित कई अन्य कंपनियों के निदेशक भी बने। अब सपा से बाहर होने के बाद कहा जा रहा है कि वे घर वापसी यानी कांग्रेस में जाने की सोच रहे हैं। सपा नेताओं का भी आरोप है कि पिछले एक साल में कांग्रेस से उनकी नजदीकियां बढ़ी हैं।