बुधवार, 17 अगस्त 2011

सिंहासन खाली करो कि जनता आती है

भ्रष्टाचार के खिलाफ अन्ना हजारे का आन्दोलन बरबस ही रामधारी सिंह दिनकर की इस कविता की याद दिलाता है.


सदियों की ठंढी-बुझी राख सुगबुगा उठी, 
मिट्टी सोने का ताज पहन इठलाती है;
दो राह,समय के रथ का घर्घर-नाद सुनो,
सिंहासन खाली करो कि जनता आती है।

जनता?हां,मिट्टी की अबोध मूरतें वही,
जाडे-पाले की कसक सदा सहनेवाली,
जब अंग-अंग में लगे सांप हो चुस रहे
तब भी न कभी मुंह खोल दर्द कहनेवाली।

जनता?हां,लंबी - बडी जीभ की वही कसम,
"जनता,सचमुच ही, बडी वेदना सहती है।"
"सो ठीक,मगर,आखिर,इस पर जनमत क्या है?"
'है प्रश्न गूढ़ जनता इस पर क्या कहती है?"

मानो,जनता ही फूल जिसे अहसास नहीं,
जब चाहो तभी उतार सजा लो दोनों में;
अथवा कोई दूधमुंही जिसे बहलाने के
जन्तर-मन्तर सीमित हों चार खिलौनों में।

लेकिन होता भूडोल, बवंडर उठते हैं,
जनता जब कोपाकुल हो भृकुटि चढाती है;
दो राह, समय के रथ का घर्घर-नाद सुनो,
सिंहासन खाली करो कि जनता आती है।

हुंकारों से महलों की नींव उखड़ जाती,
सांसों के बल से ताज हवा में उड़ता है,
जनता की रोके राह,समय में ताव कहां?
वह जिधर चाहती,काल उधर ही मुड़ता है।

अब्दों, शताब्दियों, सहस्त्राब्द का अंधकार
बीता;गवाक्ष अंबर के दहके जाते हैं;
यह और नहीं कोई,जनता के स्वप्न अजय
चीरते तिमिर का वक्ष उमड़ते जाते हैं।

सब से विराट जनतंत्र जगत का आ पहुंचा,
तैंतीस कोटि-हित सिंहासन तय करो
अभिषेक आज राजा का नहीं,प्रजा का है,
तैंतीस कोटि जनता के सिर पर मुकुट धरो।

आरती लिये तू किसे ढूंढता है मूरख,
मन्दिरों, राजप्रासादों में, तहखानों में?
देवता कहीं सड़कों पर गिट्टी तोड़ रहे,
देवता मिलेंगे खेतों में, खलिहानों में।

फावड़े और हल राजदण्ड बनने को हैं,
धूसरता सोने से श्रृंगार सजाती है;
दो राह,समय के रथ का घर्घर-नाद सुनो,
सिंहासन खाली करो कि जनता आती है।

गुरुवार, 17 फ़रवरी 2011

आर्थिक मंच पर मजबूती से उभरा भारत

हाल ही में अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा भारत यात्रा पर आए। उनके हाव-भाव और बेबाक अंदाज ने लोगों को आकर्षित किया। चाहे स्कूली बच्चों के साथ बॉलीवुड की फिल्मी धुनों पर थिरकने का मामला हो या सेंट स्टीफेंस के छात्रों से मुखातिब होने का या फिर संसद में दिया गया ओबामा का भाषण, मिस्टर एंड मिसेज ओबामा की हर अदा पर लोग वाह-वाह कर उठे। इन सबके बीच भारत और अमेरिका के आपसी संबंधों की बात भी उठती रही। इस पर मैंने बात की वरिष्ठ स्तंभकार महें्र वेद से। पेश हैं बातचीत के प्रमुख अंश :


शीत युद्ध के समय को छोड़ दिया जाए तो भारत और अमेरिका के संबंध पहले से ही अच्छे रहे हैं। जब भारत ब्रिटिश उपनिवेश का हिस्सा था, तब भी अमेरिका हमारी आजादी का हिमायती था। अमेरिकी राष्ट्रपति रूजवेल्ट ने कई बार ब्रिटिश प्रधानमंत्री चर्चिल से भारत को आजादी देने की बात कही थी। लेकिन द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद परिस्थितियां कुछ ऐसी बनीं कि भारत का झुकाव न चाहते हुए भी सोवियत संघ की ओर हो गया और अमेरिका से हमारे संबंध बहुत मधुर नहीं रह गए। हालांकि तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने द्विध्रुवीय विश्व में किसी एक तरफ होने के बजाय, गुटनिरपेक्षता की नीति अपनाई, जिसकी विश्वभर में प्रशंसा हुई। कुछ ही साल पहले आजाद हुए भारत के इस फैसले से दुनियाभर में उसकी प्रतिष्ठा बढ़ी। लेकिन गुटनिरपेक्षता की नीति अपनाने के बावजूद व्यवहार में सोवियत संघ से करीबी का परिणाम अमेरिका से दूरी के रूप में सामने आया। आजादी के करीब डेढ़ दशक बाद 1962 में चीन से हुए युद्ध के दौरान भारत को अमेरिका से मदद भी मिली थी। लेकिन 1971 में बांग्लादेश युद्ध के दौरान अमेरिकी मदद पाकिस्तान को मिली। 1980 के दशक तक भारत अमेरिका के लिए बहुत महत्वपूर्ण नहीं था। हालांकि 1974 में पहला परमाणु परीक्षण कर भारत ने दुनिया को अपनी परमाणु ताकत का एहसास करा दिया था, लेकिन तब उससे प्रभावित होने और उसे परमाणु शक्ति संपन्न देशों की सूची में शामिल करने के बजाय अमेरिका ने भारत पर कई प्रतिबंध लगा दिए थे। लेकिन सोवियत संघ के विघटन के बाद एकबार फिर परिस्थितियां बदलीं। उदारीकरण और वैश्वीकरण विश्व अर्थव्यवस्था का एक अहम हिस्सा हो चला था। भारत ने भी 1990-91 में इस आर्थिक नीति को अपनाया और आज उसकी गिनती विश्व की एक सशक्त अर्थव्यवस्था के रूप में होती है। एक दशक में ही भारत ने वैश्विक अर्थव्यवस्था में एक अहम मुकाम हासिल कर लिया। यही वह दौर था, जब दुनिया का सबसे शक्तिशाली समझा जाने वाला देश भारतीय अर्थव्यवस्था से प्रभावित हुआ। उसे अपने उत्पादों के लिए भारत एक बेहतर बाजार नजर आने लगा। यही वजह है कि वर्ष 2000 से एक के बाद एक तीन अमेरिकी राष्ट्रपतियों ने भारत का रुख किया। बिल क्लिंटन के बाद जॉर्ज बुश और अब ओबामा। यानी पिछले एक दशक में तीन अमेरिकी राष्ट्रपति भारत आए, जबकि आजादी के बाद से 1978 तक यानी करीब तीन दशक में तीन अमेरिकी राष्ट्रपतियों ने भारत का रुख किया था। 1978 में जिमी कार्टर के बाद करीब दो दशक उपरांत वर्ष 2000 में बिल क्लिंटन भारत आए थे। फिर 2006 में जॉर्ज बुश और अब ओबामा ने भारत यात्रा को अहम समझा। साफ है कि अमेरिका वैश्विक अर्थव्यवस्था में भारत की ताकत को पहचानने लगा है। अपनी इस यात्रा के दौरान ओबामा ने सारा जोर दोनों देशों के बीच व्यापार पर दिया। उनके साथ अमेरिकी उद्योगपतियों का एक प्रतिनिधिमंडल भी भारत आया। मुंबई में उन्होंने दोनों देशों के बिजनेस डेलीगेट मीट में शिरकत की। दोनों देशों के बीच 10 अरब डॉलर का सौदा भी हुआ। भारत यात्रा से पहले ही उन्होंने साफ कर दिया था कि वे इस बार सिर्फ देने ही नहीं, बल्कि भारत से कुछ लेने भी जा रहे हैं। अमेरिका में मंदी के दौरान बेरोजगार हुए लोगों के लिए नए रोजगार के लिए ओबामा की उम्मीदें भारत से हैं, जिसे उन्होंने बार-बार जाहिर किया। यानी भारत आज सिर्फ मांगने या लेने की स्थिति में नहीं है, बल्कि देने की क्षमता भी उसमें है और वह भी अमेरिका जसे शक्तिशाली देश को। इसलिए व्यवसायिक दृष्टि से अमेरिका और भारत के संबंध पिछले दो दशक में बेहतर हुए हैं।
जहां तक भारत यात्रा के दौरान अमेरिकी राष्ट्रपति का पाकिस्तान न जाने का फैसला है, तो भारत के पक्ष में है। दिल्ली में भारत उनसे पाकिस्तानी आतंकवादी संगठन लश्कर-ए-तैयबा और अन्य संगठनों के खिलाफ बयान दिलवाने में कामयाब रहा, लेकिन फिलहाल यह कहना मुश्किल है कि अगले साल जब वह पाकिस्तान की यात्रा पर जाएंगे, जसा कि उन्होंने कहा है, तो उनके तेवर किस तरह के रहेंगे। क्योंकि पाकिस्तान भी अमेरिका के लिए उतना ही अहम है, जितना भारत। अमेरिका दक्षिण एशिया में अपनी प्रभावपूर्ण उपस्थिति चाहता है और इसमें पाकिस्तान उसके लिए काफी मददगार है। पाकिस्तान में अमेरिका का एक बड़ा युद्ध बाजार है। फिर अफगानिस्तान में उसकी उपस्थिति के लिए भी पाकिस्तान का सहयोग जरूरी है। अमेरिका वहां रसद या युद्ध सामग्री कराची के रास्ते ही भेज सकता है। भारत भी वहां आधारभूत संरचना के विकास कार्य में लगा है, लेकिन उसके लिए भी पाकिस्तान के रास्ते ही वहां जाया जा सकता है, क्योंकि भारतीय सीमा सीधे अफगानिस्तान से नहीं मिलती। अमेरिका बार-बार अफगानिस्तान छोड़ने की बात कह रहा है, क्योंकि वहां बड़ी संख्या में उसके सैनिक हताहत हो रहे हैं। लेकिन यह उसके लिए आसान नहीं होगा, क्योंकि अफागानिस्तान से अमेरिका के जाते ही वहां पहले जसे हालात हो जाएंगे। इससे दक्षिण एशिया में सामरिक रूप से अमेरिका की स्थिति कमजोर होगी। यही वजह है कि आतंकवादी गतिविधियों के लिए पाकिस्तान की धरती के इस्तेमाल की बात जानते-बूझते हुए भी वह पाकिस्तान से बिल्कुल किनारा नहीं कर सकता। इस बीच अमेरिका अफगानिस्तान से कुछ हासिल नहीं कर पाया है। आतंकवादियों की आशंका में उसके ड्रोन हमले का शिकार आम लोग हो रहे हैं। बम लोगों के घर और मस्जिदों में गिर रहे हैं, जिससे उनमें रोष पनप रहा है। यानी अमेरका के लिए वहां बने रहना भी मुश्किल है और हटना भी।
कश्मीर पर अमेरिकी प्रशासन औपचारिक ढंग से बार-बार कहता है कि यह दोनों देशों का आपसी मसला है और दोनों इसे बातचीत से हल करें, लेकिन अनौपचारिक ढंग से अमेरिका आज भी इसे विवादित क्षेत्र मानता है। अमेरिका ने भारत को संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में स्थाई सीट के लिए समर्थन देने की बात कही है, लेकिन यह भी सच है कि जब तक कश्मीर का मसला सुलझ नहीं जाता तब तक उसे सुरक्षा परिषद की स्थाई सदस्यता नहीं मिल सकती। फिर इस दौड़ में जर्मनी, जापान और ब्राजील जसे देश भी हैं। इसके अलावा, पाकिस्तन कभी नहीं चाहेगा कि भारत को सुरक्षा परिषद में स्थाई सदस्यता मिले और इसमें चीन उसकी मदद करेगा। इसलिए सुरक्षा परिषद के की स्थाई सदस्यता के लिए अमेरिका का समर्थन भारत को लॉलीपॉप पकड़ा देने जसा है। उसका असली मकसद भारत से अपने व्यापारिक हित साधना है। ओबामा बार-बार भारत के साथ व्यापक आर्थिक सहयोग समझौते (सीईसीए) पर जोर दे रहे हैं, जिससे दोनों देनों के निजी क्षेत्रों में निर्बाध व्यापार हो सके। हालांकि इससे सार्वजनिक क्षेत्र को कोई फायदा नहीं होगा। भारत ने अब तक यह संधि सिर्फ सिंगापुर से की है और मलेशिया से इसके लिए बातचीत जारी है, जिसे जल्द ही अंजाम दे देने की संभावना है। व्यवसायिक दृष्टि से अमेरिका से करीबी का फायदा भारतीय बाजार को भी है, लेकिन यह भी सच है कि अमेरिका के साथ हमारी नजदीकी ने हमें भी उसके दुश्मनों के निशाने पर कर दिया है। आने वाले दिनों में भारत अलकायदा और इससे संबद्ध संगठनों का निशाना बन सकता है।

नई नहीं है गठबंधन राजनीति की अवधारणा

(वरिष्ठ पत्रकार देवदत्त से बातचीत पर आधारित.)

गठबंधन की राजनीति इन दिनों भारतीय राजनीतिक व्यवस्था का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बन चुकी है। यूं तो भारतीय राजनीति में बहुदलीय व्यवस्था का प्रावधान है, लेकिन आजादी के बाद से 1980 के दशक तक यहां की राजनीति पर कमोबेश कांग्रेस का प्रभुत्व रहा। लेकिन उसके बाद गठबंधन राजनीति का दौर शुरू हुआ। कोई भी पार्टी अपने बलबूते सरकार बनाने की स्थिति में नहीं रही। उसे सहयोगियों की जरूरत पड़ने लगी। गठबंधन राजनीति पर मैंने बात की वरिष्ठ पत्रकार व चिंतक देवदत्त से। पेश हैं बातचीत का सारांश :


भारतीय राजनीति में गठबंधन राजनीति कोई नई चीज नहीं है। जब से चुनावी राजनीति शुरू हुई, गठबंधन राजनीति भी अस्तित्व में है। इसके माध्यम से सत्ता में विभिन्न दलों की भागीदारी सुनिश्चित करने का प्रयास किया जाता है। भारत में इसका सार आजादी के पहले से ही मौजूद है। 1937 का भारत सरकार अधिनियम भी इसका उदाहरण है, जब प्रांतीय स्वायत्तता के माध्यम से सत्ता व शक्ति में विभिन्न प्रांतों की भागीदारी सुनिश्चित की गई। गठबंधन सरकारों में आज वही भागीदारी विभिन्न राजनीतिक दलों को मिल रही है। सीधी सी बात है, यह भागीदारी का मामला है। जनआंदोलनों में भी भागीदारी के इस फॉर्मूले को खूब तरजीह दी गई। चाहे वह आजादी के लिए चलाया गया आंदोलन हो या कोई अन्य आंदोलन, हर जगह इस बात की पुष्टि होती है कि लोगों की भागीदारी के बगैर कोई आंदोलन सफल नहीं हुआ। विभिन्न आंदोलनों में लोगों की भागीदारी अपने अधिकारों को लेकर उनकी जागरुकता का ही परिणाम रहा। आज वही जागरुकता राजनीतिक दलों में है। विभिन्न राज्यों में लोग अपने अधिकारों को लेकर जागरूक व मुखर हो रहे हैं। आजादी के बाद से लंबे अरसे तक सत्तासीन कांग्रेस से जब उनकी उम्मीदें पूरी नहीं हुईं तो लोगों ने नई पार्टियां भी बनाईं। दो दशक पहले तक इन दलों का प्रदर्शन राज्यों तक ही सीमित था। विधानसभा चुनाव में ही उन्हें अपनी ताकत दिखाने का मौका मिलता था। लेकिन विगत दो दशक में इन दलों का प्रभाव लोकसभा चुनाव में भी बढ़ा है। संसदीय चुनाव में अधिक सीटें जीतकर ये पार्टियां अब कें्र की सत्ता में भी भागीदारी कर रही हैं, क्योंकि कांग्रेस हो या भाजपा, कोई भी अपने दम पर बहुमत लेकर सरकार बनाने की स्थिति में नहीं आ पा रही। ऐसे में जाहिर तौर पर उनकी राजनीतिक स्वायत्तता बढ़ी है और वे कें्र से पहले की तुलना में अधिक वित्तीय अनुदान या अन्य मदद लेने की स्थिति में हैं।
जहां तक भारत में गठबंधन सरकारों की बात है तो यहां सबसे पहली गठबंधन सरकार आजादी के ठीक बाद 1947 में बनी थी, जब सत्ता का हस्तांतरण हुआ था और देश में अंतरिम सरकार गठित हुई थी। उसके बाद देश में शुरू हुई चुनावी राजनीति में विभिन्न दलों की भागीदारी कहीं पीछे छूट गई। चाहे संसदीय चुनाव हो या विधानसभा चुनाव हर जगह कांग्रेस ने अपने दम पर बहुमत हासिल कर सरकार बनाई। आजादी के बाद यह 1960 के दशक का उत्तरार्ध था, जब कांग्रेस के खिलाफ बगावत के सुर निकलने लगे। इसी का परिणाम रहा कि 1967 में कई राज्यों में गैर-कांग्रेसी सरकार बनी, जो संविद सरकारें थीं। यानी विभिन्न दलों को मिलाकर बनीं सरकारें। कें्र में 1977 में जनता पार्टी के नेतृत्व में भी गैर-कांग्रेसी सरकार बनी, लेकिन वह गठबंधन सरकार नहीं थी, क्योंकि सभी दलों ने अपनी पहचान खोकर उसे जनता पार्टी में समाहित कर दिया था। आजादी के वक्त की अंतरिम सरकार के बाद वास्तविक गठबंधन सरकार दिसंबर, 1989 में विश्व प्रताप सिंह के नेतृत्व में बनी सरकार थी, जो कई दलों को मिलाकर बनी संयुक्त मोर्चे की सरकार थी। इसमें किसी भी दल ने अपनी पहचान से समझौता नहीं किया। इसके बाद से ही देश में गठबंधन सरकारों का दौर शुरू हो गया। कांग्रेस हो या भाजपा, किसी को संसदीय चुनावों में बहुमत नहीं मिला और सरकार गठन के लिए मजबूरन इन दलों को क्षेत्रीय दलों का समर्थन लेना पड़ा। हालांकि आज भी देश के दो बड़े दल गठबंधन राजनीति को मानसिक रूप से स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं हैं। राजनीतिक मजबूरी में ही उन्होंने इसे अपनाया। खासकर, कांग्रेस अब भी इस सच को स्वीकार करने के लिए मानसिक तौर पर तैयार नहीं दिखती। इसकी वजह शायद लंबे समय तक कांग्रेस का अपने बलबूते सत्ता पर काबिज रहना है।
गठबंधन राजनीति ने निश्चत रूप से क्षेत्रीय दलों की राजनीतिक मोलतोल की ताकत बढ़ा दी है। वे अपने अधिकारों को लेकर अधिक सजग हैं और कें्र से उसकी मांग भी हकपूर्वक करते हैं। कई मामलों में राज्यों की स्वायत्तता बढ़ी है। वहीं, क्षेत्रीय दलों के बढ़ते प्रभाव ने कें्र की नैतिक सत्ता को कमजोर किया है। लेकिन यह काफी हद तक कें्रीय नेतृत्व पर भी निर्भर करता है। संभव है कि किसी बड़े राजनीतिक कद का नेतृत्व कें्र की खोई नैतिक सत्ता को लौटा लाए। वरना यह भी हो सकता है कि छोटे राजनीतिक कद का नेतृत्व उसे और कमजोर कर दे। बहरहाल, विदेश नीति, वित्तीय संसाधन, सुरक्षा और सैन्य मामलों पर अब भी कें्र मजबूत स्थिति में है। राष्ट्र राज्य की ताकत कहीं से भी कम नहीं हुई है। कुल मिलाकर, क्षेत्रीय दलों के बढ़ते प्रभाव ने संघवाद को बढ़ाया है।

गठबंधन राजनीति में तोलमोल

गठबंधन राजनीति ने निश्चित रूप से क्षेत्रीय दलों की स्थिति मजबूत की है। वे कें्र से अपना हक अधिक अधिकारपूर्वक ले रहे हैं। समर्थन देने के नाम पर कें्र से वित्तीय संसाधन या विभिन्न मामलों में अधिक स्वायत्तता हासिल करना उनके लिए आसान हो गया है। गठबंधन सरकार चाहे भाजपा के नेतृत्व में रही हो या कांग्रेस के नेतृत्व में, यह स्थिति कमोबेश हर सरकार में रही है। 2जी स्पेक्ट्रम मामले में पूर्व संचार मंत्री ए राजा पर सरकार की चुप्पी गठबंधन राजनीति का ही नतीजा है। सरकार अपने एक महत्वपूर्ण घटक दल ्रविड़ मुनेत्र कषगम (्रमुक) को नाराज नहीं करना चाहती थी। शायद यही वजह रही कि लंबे अरसे तक सरकार इस पर मौन रही। न तो कैग की रिपोर्ट को गंभीरता से लिया और न ही जनता पार्टी के अध्यक्ष सुब्रमण्यम स्वामी की उस शिकायत पर कोई जवाब दिया, जिसमें राजा के खिलाफ कार्रवाई के लिए प्रधानमंत्री से अनुमति मांगी गई थी। अब संसद में हंगामा हो रहा है। कामकाज ठप है। सुप्रीम कोर्ट ने भी जब इस बारे में सवाल किया तो सरकार बचाव की म्रुा में है। वहीं, कांग्रेस अपने बचाव में हमलावर हो गई है। वह स्पेक्ट्रम आवंटन की 1998 से जांच कराने की मांग कर रही है, जब भाजपा की सरकार थी।
इस बीच, प्रधानमंत्री कैग को नसीहत दे रहे हैं कि वह जानबूझकर और भूलवश हुई गलती में फर्क करना सीखे। विपक्ष मामले की जांच संयुक्त संसदीय समिति से कराने की मांग पर अड़ा है तो सरकार सीबीआई को मामला सौंपकर अपनी जिम्मेदारी पूरी करने का दावा कर रही है। राजा प्रकरण पर हंगामा पहले भी हो चुका है। पिछले दो साल से 2जी स्पेक्ट्रम घोटाले की खबर सुर्खियों में है, लेकिन राजा की कुर्सी पर आंच नहीं आई। शायद इसलिए, क्योंकि वे यूपीए के एक अहम घटक दल ्रमुक का प्रतिनिधित्व करते थे और पार्टी सुप्रीमो के खास भी हैं। लेकिन जब बात बढ़ी तो सरकार को यह कड़ा फैसला लेना पड़ा। लेकिन इससे पहले सरकार को ्रमुक प्रमुख करुणानिधि से ‘अनुमतिज् लेना पड़ा। यही वजह रही कि इस्तीफे से 24 घंटे पहले राजा का एक पैर दिल्ली में तो एक चेन्नई में रहा। गृह मंत्री पी चिम्बरम और वित्त मंत्री प्रणव मुखर्जी फोन पर लगातार करुणानिधि के संपर्क में रहे। साफ है कि सरकार राजा को विदा करने से पहले अपनी स्थिरता सुनिश्चित कर लेना चाहती थी। राजा पर कार्रवाई को लेकर सरकार की स्थिरता का सवाल इस रूप में भी सामने आता है कि ऐसी अटकलों के तुरंत बाद तमिलनाडु की विपक्षी पार्टी अन्ना्रमुक ने ्रमुक का समर्थन न रहने की स्थिति में अपना समर्थन देने की पेशकश कर डाली। यह अलग बात है कि यूपीए को फिलहाल अन्ना्रमुक के समर्थन की जरूरत नहीं पड़ी। अगर ऐसा होता तो जाहिर तौर पर यूपीए को यह समर्थन अन्ना्रमुक की शर्तो पर ही मिलता।
सरकार को समर्थन दे रहे क्षेत्रीय दलों की मोलतोल की यह ताकत पिछले दो दशक में बढ़ी है, जब किसी एक पार्टी को चुनाव में समर्थन नहीं मिलने के कारण गठबंधन सरकारों का दौर शुरू हुआ। गठबंधन राजनीति की जो मजबूरी आज यूपीए की है, वही भाजपा नीत राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन सरकार की भी रही। राजग सरकार को भी ऐसी ही स्थिति का सामना तेलुगू देशम पार्टी, तृणमूल कांग्रेस और अन्ना्रमुक जसी बड़ी पार्टियों की वजह से करना पड़ा। तृणमूल प्रमुख ममता बनर्जी रेल मंत्रालय की मांग पर अड़ी रहीं तो चं्रबाबू नायडू की टीडीपी लोकसभा अध्यक्ष की कुर्सी से कम पर नहीं मानीं। अन्ना्रमुक ने भी कें्र पर दबाव डालकर राज्य की राजनीति को प्रभावित करने वाले कई फैसले करवाए। तब एक मामले में डीएमके प्रमुख करुणानिधि की उनके घर से आधी रात को हुई गिरफ्तारी एक बड़ा मुद्दा बना था। इसे अन्ना्रमुक प्रमुख जयललिता के दबाव में कें्र के इशारे पर उठाया गया कदम बताया गया। साफ है, क्षेत्रीय दलों ने कें्र में अपनी भागीदारी का फायदा खूब उठाया। उन्हें राज्य की राजनीति के अनुकूल जब जिसके साथ की जरूरत हुई, उन्होंने उनका दामन थामा और अधिक संसदीय सीटें जीतने की अपनी राजनीतिक शक्ति का भरपूर दोहन किया। ममता बनर्जी फिलहाल यूपीए सरकार में हैं, जो कभी राजग का हिस्सा थीं। पश्चिम बंगाल में अपने राजनीतिक नफे-नुकसान को देखते हुए वे यूपीए से भी खूब मोल तोल कर रही हैं। सीमित राज्यों में प्रभाव रखने वाली वामपंथी पार्टियां, जो यूपीए के पहले कार्यकाल में उसका हिस्सा थीं, आज अलग रुख रखती हैं। टीडीपी राजग का साथ छोड़कर तीसरे मोर्चे का एक अहम घटक हो गया है। यानी गठबंधन की राजनीति में सरकार का नेतृत्व चाहे कांग्रेस करे या भाजपा, क्षेत्रीय दलों का कदम अपने राज्यीय हितों को ध्यान में रखते हुए ही उठता है।

अपने ही नुमाइंदों से परेशान यूपीए

यूपीए सरकार के एक प्रमुख सहयोगी डीएमके के सांसद ए राजा की वजह से यूपीए सरकार को हाल के दिनों में काफी फजीहत ङोलनी पड़ी। वह सरकार में संचार मंत्री थे। 2जी स्पेक्ट्रम मामले में हंगामा इस कदर बरपा कि उन्हें अपने पद से इस्तीफा देना पड़ा। लेकिन इस्तीफे के बाद भी शोर थमने का नाम नहीं ले रहा। पेश है एक रिपोर्ट।

इन दिनों यूपीए सरकार अपने ही नुमाइंदों के भ्रष्ट कारनामों से घिरी है। कें्र की मनमोहन सिंह सरकार को गठबंधन के एक महत्वपूर्ण सहयोगी ्रमुक के नेता ए राजा ने पसोपेश में डाल रखा है। प्रधानमंत्री को न तो विपक्ष के सवालों का जवाब मिल रहा है और न ही सुप्रीम कोर्ट के सवाल का जवाब। राजा पर संचार मंत्री रहते हुए 2जी स्पेक्ट्रम का लाइसेंस निजी मोबाइल कंपनियों को औने-पौने दाम में देने का आरोप है, जिससे सरकार को करोड़ों का चूना लगा। इस पर हंगामा हुआ तो उन्हें अपने पद से इस्तीफा भी देना पड़ा, लेकिन वे बार-बार यही दोहरा रहे हैं कि उन्होंने कुछ भी कानून से परे हटकर नहीं किया। वे अब भी खुद को इस मामले में निर्दोष बता रहे हैं और सभी आरोपों को सिरे से खारिज करते हैं।
अंदिमुथु राजा, जो ए राजा के नाम से जाने जाते हैं, के खिलाफ 2जी स्पेक्ट्रम मामले में हंगामा पहली बार नहीं हुआ है। यूपीए सरकार के एक साल पूरे होने पर भी विपक्ष ने इसे लेकर हंगामा किया था। तब भी नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (कैग) ने इसमें राजा की भूमिका पर सवाल उठाए थे। विपक्ष ने इसे मुद्दा बनाकर संसद नहीं चलने दी थी। पर तब उनकी कुर्सी नहीं गई। तब उनमें जबरदस्त आत्मविश्वास भी देखने को मिलता था। शायद इसलिए कि वे यूपीए के एक अहम सहयोगी ्रमुक के सदस्य ही नहीं, बल्कि पार्टी सुप्रीमो करुणानिधि के करीबी भी हैं। राजा के बचाव में करुणानिधि ने यहां तक कह दिया था कि वे दलित हैं, इसलिए उनका विरोध हो रहा है। लेकिन अब जब कें्र के दबाव में करुणानिधि ने भी राजा के सिर से हाथ हटा लिया तो उन्हें कुर्सी छोड़नी पड़ी। यह अलग बात है कि करुणानिधि ने यह फैसला कें्र के दबाव में लिया, जिस पर कई बार अपने पक्ष में फैसलों के लिए उनकी पार्टी दबाव बना चुकी है।
संसद के शीतकालीन सत्र में पेश अपनी रिपोर्ट में कैग ने साफ कहा है कि राजा के फैसलों से सरकारी खजाने को 1.76 लाख करोड़ रुपए से अधिक का नुकसान हुआ। 2जी स्पेक्ट्रम नीति मामले में राजा के फैसले से यूनिटेक, डाटाकॉम (अब वीडियोकॉन), एस-टेल, स्वान और लूप टेलिकॉम को अनुचित फायदा हुआ। इन्हें जनवरी, 2008 में लाइसेंस दिए गए थे। कैग ने यह भी कहा है कि यूनिफाइड एक्सेस सर्विस लाइसेंस (यूएएसएल) के आवंटन में पारदर्शिता नहीं बरती गई। पूरी प्रक्रिया मनमाने, अनुचित और सभी को समान अवसर मुहैया कराए बगैर पूरी की गई। इसमें वित्तीय पात्रता, नियमों और प्रक्रियाओं को पूरी तरह नजरअंदाज किया गया। 77 पेज की अपनी रिपोर्ट में कैग ने कहा है कि कंपनियों की सही हैसियत का आकलन भी नहीं किया गया। दूरसंचार विभाग ने 2008 में 2जी स्पेक्ट्रम के लिए जो 122 नए लाइसेंस जारी किए थे, उनमें से 85 आवेदक इसके पात्र नहीं थे। लाइसेंस 2001 के मूल्य पर ही जारी किए गए, जिससे सरकार को आर्थिक नुकसान हुआ। इस बारे में दूरसंचार नियामक प्राधिकरण (ट्राई) की सिफारिशों की भी अनदेखी की गई। विभाग ने अपने ही तय मानदंड ‘पहले आओ, पहले पाओज् का भी अनुसरण नहीं किया।
संसंद के शीतकालीन सत्र में पेश कैग की इस रिपोर्ट पर एक बार फिर खूब हंगामा हुआ। कामकाज ठप रहा। विपक्ष मामले की जांच संयुक्त संसदीय समिति से कराने की मांग पर अड़ा है तो सरकार सीबीआई द्वारा जांच किए जाने की बात कहती है। अब इस मामले पर सुप्रीम कोर्ट ने भी प्रधानमंत्री कार्यालय से सवाल किया है, जिसका जवाब उसे ढूंढ़े नहीं मिल रहा।  जनता पार्टी के अध्यक्ष सुब्रमण्यम स्वामी की जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए अदालत ने सरकार से पूछा है कि आखिर उनकी शिकायत पर कार्रवाई होने में देरी क्यों हुई? स्वामी ने राजा के खिलाफ 2जी स्पेक्ट्रम मामले में धांधली की शिकायत नंवबर, 2008 में ही सीबीआई से की थी, जिस पर जांच एजेंसी ने ग्यारह माह बाद अक्टूबर, 2009 में मामला दर्ज किया, वह भी अज्ञात लोगों के खिलाफ। आरोप है कि प्रधानमंत्री कार्यालय ने इस मामले पर 16 माह तक चुप्पी साधे रखी। पीएमओ ने न तो ना कहा और न ही हां, जबकि कोर्ट ने इजाजत संबंधी फैसले पर अधिकतम तीन माह की समय सीमा निर्धारित कर रखी है। जब इस बारे में स्वामी ने पीएमओ से जानना चाहा तो उन्हें मार्च, 2010 में जवाब मिला कि मामले की जांच अभी सीबीआई कर रही है। फिर राजा के खिलाफ मामला दर्ज करने को लेकर यह उतावलापन क्यों? अदालत को पीएमओ की इस भाषा पर भी आपत्ति है।
जाहिर तौर पर पिछले दो साल से सरकार राजा के खिलाफ कार्रवाई को लेकर बचती रही। शायद गठबंधन धर्म की मजबूरी के कारण, क्योंकि डीएमके यूपीए का एक अहम घटक है। सरकार राजा के खिलाफ कार्रवाई कर पार्टी सुप्रीमो करुणानिधि को नाराज कर अपनी स्थिरता को प्रभावित नहीं करना चाहती थी। राजा के बचाव में करुणानिधि ने यहां तक कह दिया था कि चूंकि वे दलित हैं, इसलिए उन्हें निशाना बनाया जा रहा है। इस बीच प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने भी लेखा परीक्षा करने वाली लोकतंत्र की इस महत्वपूर्ण निगरानी संस्था को नसीहत दे डाली कि वह जानबूझकर और भूलवश हुई गलती के बीच फर्क करे। दोनों गलतियों को एक ही पैमाने से नहीं मापा जाना चाहिए। 2जी स्पेक्ट्रम मामले के ठीक बाद कैग को दी गई प्रधानमंत्री की यह नसीहत कई मायने में महत्वपूर्ण है। यह पूरे प्रकरण में उनकी नाराजगी को भी दर्शाता है।
बहरहाल, अब भूतपूर्व संचार मंत्री हो चुके राजा की बात की जाए तो वे दक्षिण के राज्यों में उसी दलित राजनीति का हिस्सा हैं, जिसका उदय पेरियार के नेतृत्व में हुआ और जिसके बाद ऊंची जातियों की राजनीति वहां हाशिये पर चली गई। लेकिन घोटाले के आरोप से घिरा यह मंत्री दलितों के कम ‘दलित राजनीतिज् के अधिक करीब लगता है। राजा तमिलनाडु में नीलगिरि संसदीय क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करते हैं। वे तीसरी बार सांसद निर्वाचित हुए हैं। यूपीए के पहले कार्यकाल में भी वे संचार मंत्री थे। हालांकि यह बात राजा के पक्ष में जाती है कि संचार मंत्री रहते हुए उन्होंने जनता को सस्ती दरों पर टेलीफोन सुविधा मुहैया कराने का जो वादा किया था, उसे काफी हद तक पूरा किया। लेकिन स्पेक्ट्रम घोटाले ने उनकी तमाम उपलब्धियों पर ग्रहण लगा दिया।
वैसे यह पहला मौका नहीं है, जब राजा पर भ्रष्टाचार का आरोप लगा। इससे पहले उन पर म्रास उच्च न्यायालय के न्यायाधीश को प्रभावित करने का आरोप भी लग चुका है। कहा गया कि उन्होंने एक डॉक्टर की अग्रिम जमानत को लेकर उच्च न्यायालय के न्यायाधीश को प्रभावित करने का प्रयास किया, जिनके खिलाफ आपराधिक मामले दर्ज थे। तब भी राजा ने अपने स्वाभानुसार बार-बार पूछे जाने पर भी केवल इतना कहा, ‘मैं सभी आरोपों से इनकार करता हूं। इस बारे में मैं कुछ नहीं जानता।ज्
राजा तब भी सुर्खियों में आए थे, जब वर्ष 2008 में श्रीलंका ने तमिल व्रिोहियों के खिलाफ सैन्य कार्रवाई शुरू की थी। कार्रवाई में तमिल नागरिकों के प्रभावित होने की बात कह ्रमुक के नेताओं ने कें्र पर इस बात के लिए दबाव बनाना शुरू कर दिया कि वह श्रीलंका सरकार से तमिल नागरिकों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए कहे। दबाव की इस रणनीति के तहत पार्टी के 14 सांसदों ने इस्तीफा दे दिया, जिसमें राजा भी शामिल थे। लेकिन यह इस्तीफा राजनीतिक खेल का एक हिस्सा था। सांसदों ने इस्तीफा अपने पार्टी सुप्रीमो को सौंपा था और इसमें तिथि भी बाद की लिखी थी।

जय बजरंग बली


एशियाड में नौकायन में सोना जीतने वाले बजरंग लाल ताखड़ का कारनामा जहां गर्वोन्नत करता है, वहीं उनकी कहानी दु:खी करती है। कहानी वही पुरानी उपेक्षा की है। खेल संघ भले उनकी कामयाबी पर अपनी पीठ थपथपाए, पर ताखड़ की कामयाबी शुद्ध उनकी है। मेहनत, अभ्यास और लगन से इसे उन्होंने अर्जित किया है। ऐसे ही दूसरे खिलाड़ियों की तरह उन्हें भी बुनियादी सुविधाएं मयस्सर नहीं थीं। हमारा सौभाग्य यह है कि इस आपराधिक किस्म की लापरवाही के बावजूद बजरंग लाल, बिजेंदर, सुशील, साइना जसे खिलाड़ी अपनी जिद और अपने दम पर विजेता बनने और बाज वक्त पदक भी जीत लाते हैं।

राष्ट्रमंडल खेलों के बाद बड़ी बेसब्री से सभी को एशियाड का इंतजार था। देशभर की नजर चीन के ग्वांगझू शहर पर टिकी थी। राष्ट्रमंडल खेलों में खिलाड़ियों के शानदार प्रदर्शन ने देशवासियों को गदगद कर दिया तो एशियाड में अपेक्षाकृत कमजोर प्रदर्शन ने लोगों में निराशा पैदा की। लेकिन इस खेल के दौरान भी अब तक दो ऐसे मौके आए, जब वहां तिरंगा लहराया। यह मौका पहली बार पंकज आडवाणी ने बिलियर्डस में सोना जीतकर दिलाया तो दूसरी बार यह कामयाबी सूबेदार बजरंग लाल ताखड़ के नाम रही। ताखड़ ने देश को न केवल सोना दिलाया, बल्कि नौकायन में यह उपलब्धि पाकर उन्होंने इतिहास रच दिया है। एशियाड के इतिहास में यह पहला मौका है, जब देश को नौकायन में सोना मिला है।
बजरंग की कामयाबी ने एक बार फिर यह साबित किया है कि हौसला बुलंद हो तो मुश्किलें सफलता की राह में अड़चन नहीं बनतीं। राजस्थान के सीकर जिले के एक दूर-दराज के गांव मगनपुरा में जन्मे और पले-बढ़े बजरंग की सफलता की कहानी किसी किंवदंती से कम नहीं लगती। एक ऐसा गांव, जहां की परिस्थितियां नौकायन के लिए बिल्कुल भी अनुकूल नहीं। राजस्थान के कई दूसरे गांवों की तरह यह भी पानी की समस्या से जूझ रहा है। लेकिन बजरंग ने सोना जीता भी तो नौकायन में। वह भी पुरानी और उधार की नाव लेकर, क्योंकि 30 सदस्यीय नौकायन दल के लिए सरकार ने जो नौकाएं मंगाई थीं, वे एशियाड जाने तक उन्हें नहीं मिल पाई थीं। ऐसे में उन्हें 2002 एशियाड में इस्तेमाल हुई नौकाओं का ही इस्तेमाल करना पड़ा और कुछ नौकाएं सेना से भी उधार लेनी पड़ी।
निश्चत रूप से बजरंग ने यह कामयाबी अपने आत्मविश्वास, अभ्यास और समर्पण भाव से ही पाई है। वरना टिन से ढके एक छोटे से कमरे में मूलभूत सुविधाओं से वंचित चालीस लोगों के साथ रहकर तो इस कामयाबी की बस कल्पना की जा सकती है। तमाम खेल प्राधिकरण, जो बजरंग की कामयाबी पर आज अपनी पीठ थपथपा रहे हैं, ने कभी खिलाड़ियों की सुविधाओं को बहुत गंभीरता से नहीं लिया। राष्ट्रमंडल खेलों में भी कई ऐसे खिलाड़ी थे, जिन्होंने सरकारी सुविधाओं से वंचित रहकर भी अपने जीवट के बल पर सफलता पाई। बजरंग भी उन्हीं में से एक हैं। हैदराबाद में जहां से बजरंग ने नौकायन का प्रशिक्षण पाया, वहां 40 और लोग भी थे और सभी को एक छोटे से हॉल में एक ही छत के नीचे दिन और रात बितानी पड़ती थी। कमरे का छत टिन से बना है, जो गर्मियों में बुरी तरह तपता है। ऊपर से हैदराबाद की गर्मी। खेल प्राधिकरण से रेफ्रिजरेटर, वाशिंग मशीन और रूम कूलर जसी सुविधाओं की उम्मीद नहीं थी, इसलिए सबने उन पैसों से अपने लिए ये सुविधाएं जुटाईं, जो उन्होंने अब तक छोटी-बड़ी प्रतियोगिताएं जीतकर पाई थीं। अभ्यास के लिए जिन नौकाओं का इस्तेमाल किया, वे भी आठ साल पुरानी थीं। अभ्यास के लिए जिस पानी में वे उतरते थे, वह भी बेहद प्रदूषित था। बजरंग को इसका मलाल भी है। वे साफ कहते हैं कि अगर खिलाड़ियों को बेहतर सुविधाएं मिली होतीं तो वे और अच्छा प्रदर्शन कर सकते थे। उन्हें इस बात का भी अफसोस है कि नौकायन के लिए देश में एक भी कृत्रिम झील नहीं है, जहां बेहतर प्रबंधन के बीच खिलाड़ी तन्मयता से अभ्यास कर सकें, जबकि चीन में ऐसी 14 कृत्रिम झीलें हैं। प्रबंधन भी उम्दा है, खिलाड़ियों को तमाम सुविधाएं भी मिल रही हैं। ऐसे में जाहिर तौर पर उनका प्रदर्शन बेहतर होगा ही।
सचिन तेंदुलकर को अपना रोल मॉडल मानने वाले बजरंग राजपूताना रायफल्स में नायक सूबेदार हैं। वर्ष 2001 में वे सेना में शामिल हुए थे। अपनी सफलता का श्रेय वे सेना को देते हैं। नौकायन से पहले वे बास्केट बॉल और हैंडबॉल में हाथ आजमा चुके हैं। लेकिन ब्रिगेडियर केपी सिंह देव (सेवानिवृत्त) ने उनके जीवन की दिशा ही बदल दी, जब उन्होंने उनसे नौकायन में हाथ आजमाने के लिए कहा। यह उनके जीवन का टर्निग प्वाइंट साबित हुआ। एशियाई खेलों में उन्होंने 2006 में पहली बार शिरकत की, जो दोहा में हुआ था। पहले एशियाई खेल में ही उन्होंने नौकायन में रजत पदक जीत लिया। लेकिन सोना न जीत पाने की कसक मन में रह गई। तभी उन्होंने तय कर लिया था कि अगले एशियाई खेलों में इसे पूरा करके ही दम लेंगे। इसके लिए उन्होंने चार साल कड़ी मेहनत की। मेहनत रंग लाई और आखिर उन्होंने सोना जीत लिया। उनकी जीत ने तिरंगे की शान भी बढ़ा दी। मेडल लेते वक्त चीन में तिरंगा ऊपर जाते हुए देखना सचमुच अद्भुत था। बकौल बजरंग, उनके जीवन का सबसे बड़ा क्षण। अब उनकी नजर ओलंपिक पर है। पिछले बीजिंग ओलंपिक में वे क्वार्टर फाइनल तक पहुंचे थे। इस प्रदर्शन को वे सुधारना चाहते हैं। बजरंग को हमेशा यह बात प्रेरित करती रही कि कामयाबी पाने की कोई उम्र नहीं होती। अगर सचिन 37 साल की उम्र में भी इतना बेहतर प्रदर्शन कर सकते हैं तो 29 वर्ष की उम्र में वे क्यों नहीं?
उम्र को वे पढ़ाई से भी जोड़कर नहीं देखते। शायद यही वजह है कि इस उम्र में भी वे पढ़ाई जारी रखे हुए हैं और राजनीति विज्ञान से स्नातक कर रहे हैं। इसकी वजह उनके परिवार की शैक्षणिक पृष्ठभूमि भी हो सकती है, क्योंकि पिता दौलाराम शिक्षक हैं। वैवाहिक बजरंग के दो बच्चे भी हैं। उनकी इस कामयाबी से पत्नी और बच्चों की खुशी का ठिकाना नहीं। पिता फूले नहीं समा रहे तो मां की आंखें भर आती हैं। बजरंग के गांव में भी इन दिनों जश्न का माहौल है। लोग नाच-गा रहे हैं, मिठाइयां बांट रहे हैं और एक-दूसरे को बधाई दे रहे हैं।

माशअल्ला मिशेल

 
ओबामा तीन दिन भारत में रहे और छाये रहे। अखबारों-चैनलों में ओबामा ही ओबामा थे। क्या कहेंगे! यह कहेंगे कि नहीं! यह तो कहना ही चाहिए! यह क्यों कहा! क्या देंगे! क्या ले जाएंगे! आदि-इत्यादि कयास और खबरें! पर इस कूटनीतिक कसरत-कवायद के बीच मिशेल ओबामा की उपस्थिति भी बेहद खबर-दार रही। यह उपस्थिति अत्यंत सहज, स्फूर्तिदायक और भरोसेमंद सी थी। उन्होंने बच्चों से लेकर बड़ों तक सबको अपना दिलदादा बनाया। बोलना भी उनका सीधा-स्पष्ट और आत्मीय था। वे खूब नाचीं, खूब घूमीं और खूब चर्चा में रहीं। स्वागत आदि कार्यक्रमों में जहां साथ में बराक भी थे, वहां मिशेला ओबामा हावी दिखीं। उनकी भाव-भंगिमाओं से लेकर उनके परिधानों पर भी टीवी पर रस ले-लेकर चर्चाएं होती रहीं।

मिशेल ओबामा को दुनिया अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा की पत्नी के नाते प्रथम अमेरिकी महिला के रूप में जानती है। लेकिन वे इससे कहीं अधिक हैं। बहुत से लोगों के लिए वे उम्मीद की एक किरण हैं और आगे बढ़ने की प्रेरणा भी, महिलाओं के लिए खासतौर पर। दुनिया के उन तमाम लोगों के लिए वे प्रेरणास्रोत हैं, जो सामाजिक लड़ाई में कहीं पीछे छूट गए, लेकिन अपना हक पाने के लिए जो आज भी शांतिपूर्ण लड़ाई लड़ रहे हैं। वे महिलाओं को अपनी स्थिति मजबूत करने की प्रेरणा भी देती हैं। यहां तक कि अपने पति बराक ओबामा के लिए भी वे किसी प्रेरणा से कम नहीं हैं। वे हर तरह से उनकी आत्मनिर्भरता की समर्थक हैं, लेकिन परिवार को भूलने के लिए कभी नहीं कहतीं। कॅरियर और परिवार के बीच बेहतर सामंजस्य को ही वे आदर्श मानती हैं और ऐसा करने में महिलाओं की मदद भी करती हैं।
प्रथम अमेरिकी महिला के रूप में उनकी भूमिका बेहद महत्वपूर्ण है और दुनिया उन्हें इसी रूप में जानती है। लेकिन बकौल मिशेल, वे पहले दो प्यारी बच्चियों की मां हैं। पर इससे भी पहले वे पिता फ्रेजर और मां मारियन रॉबिन्सन की बेटी हैं। इसके बाद ही पत्नी, वकील या कुछ और। बेहिचक-बेझिझक अपने माता-पिता को कर्मचारी वर्ग का बताते हुए वे उन्हें अपना आदर्श बताती हैं। उन्हें लोगों को यह बताने में भी गुरेज नहीं है कि उनका बचपन बड़े अभाव में बीता। दक्षिणी शिकागो के एक छोटे से मकान में उनका और भाई बचपन बीता। पिता शिकागो के जल विभाग में पंप ऑपरेटर थे। युवावस्था से ही वे मल्टिपल स्क्लेरोसिस नामक बीमारी से पीड़ित थे, लेकिन इतने पैसे नहीं थे कि उसका इलाज करवा सकें। पर इस अवस्था में भी उन्होंने काम नहीं छोड़ा, क्योंकि परिवार की मौलिक जरूरतें पूरी करने के लिए भी पैसे की जरूरत थी। मां मारियन घर में ही रुकती थीं, ताकि मिशेल और उनके बड़े भाई क्रेग की देखभाल कर सकें। रॉबिन्सन दंपति भले अपने बच्चों की बहुत सारी जरूरतें पूरी नहीं कर सके, लेकिन घर में उन्हें भरपूर प्यार दिया। जीवन से जुड़े कई अहम नैतिक मूल्य भी उन्हें माता-पिता से मिले, जिनका जिक्र आज भी मिशेल करती हैं। इन्हें आत्मसात करके ही मिशेल और क्रेग जिंदगी में आगे बढ़ते गए और आज सारी दुनिया उनका लोहा मानती है।
मिशेल को स्पष्टवादी और दृढ़ निश्चयी महिला के रूप में जाना जाता है। उन्होंने हमेशा वही काम किया, जिसकी अनुमति उनके दिल ने दी। वे हमेशा से सैनिक परिवारों के समर्थन में रही हैं। कामकाजी महिलाओं को उन्होंने परिवार और कॅरियर के बीच संतुलन स्थापित करने में मदद दी। पूरे देश में उन्होंने राष्ट्रीय सेवाओं, कला और स्वास्थ्यप्रद भोजन को तरजीह दी। वे बेहद सहज एवं स्वाभाविक महिला हैं। भारत दौरे के दौरान मुंबई हो या दिल्ली हर जगह उनकी सहजता दिखी, जो आमतौर पर राजनीतिक व कूटनीतिक महिलाओं में देखने को नहीं मिलता। मुंबई में वे बॉलीवुड की फिल्मी धुन पर जमकर थिरकीं, तो मराठी संस्कृति को दर्शाते लोकनृत्य में भी उन्होंने ताल से ताल मिलाया। बच्चों के प्रदर्शन से आह्लादित मिशेल ने उन्हें गले लगाया तो बच्चे भी बेहद सहजता से उनसे मिले। लेकिन जब यही मिशेल मुंबई के सेंट जेवियर में युवा छात्रों से मिलती हैं तो बेहद गंभीरता से उन्हें अभाव में बीते अपने बचपन के बारे में बताती हैं। लेकिन तमाम मुश्किलों के बावजूद छात्रों को सपने देखने के लिए भी प्रोत्साहित करती हैं, ताकि उन्हें पूरा कर जीवन में आगे बढ़ा जा सके। छात्रों को यह कहकर वे ओबामा पर चुटकी लेने से भी नहीं चूकतीं कि उनसे छात्र कड़े सवाल पूछें। ओबामा जो पहले से ही मिशेल की प्रतिभा के कायल हैं, छात्रों को बताते हैं कि वे उनसे बेहतर वक्ता हैं।
वहीं, दिल्ली में उन्होंने जमकर खरीदारी की तो अपने परिधानों के लिए भी वाहवाही पाई। मीडिया मिशेल की हर अदा पर मानो फिदा हो। मिशेल ने अपनी वक्तृत्व क्षमता का लोहा अमेरिका में राष्ट्रपति चुनाव के दौरान ही मनवा लिया था, जब राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार के रूप में ओबामा के पक्ष में उन्होंने जगह-जगह प्रचार अभियान चलाया। लेकिन इस क्रम में वे अपने परिवार को नहीं भूलीं। उन्हें बेहतर पता था कि बच्चियों को भी उनकी जरूरत है। उन्हें अपनी प्राथमिकताएं मालूम हैं और यह सब शायद उन्होंने अपने अभिभावकों से सीखा। मिशेल दुनिया की उन लाखों-करोड़ों कामकाजी महिलाओं के लिए आदर्श हैं, जो परिवार और कॅरियर के बीच सामंजस्य बिठाकर चलने में यकीन करती हैं।
मिशेल का जन्म सत्रह जनवरी, 1964 को रॉबिन्सन दंपति की दूसरी संतान के रूप में हुआ। रॉबिन्सन दंपति, जिनकी आय सीमित थी, कभी स्कूल नहीं गए। लेकिन कम आमदनी में भी उन्होंने अपने बच्चों की पढ़ाई से समझौता नहीं किया। जीवन में आगे बढ़ने के लिए शिक्षा की अहमियत को समझते हुए उन्होंने बच्चों की पढ़ाई को तरजीह दी। शिकागो पब्लिक स्कूल से शुरुआती शिक्षा ग्रहण करने के बाद मिशेल ने प्रिंसटन यूनिवर्सिटी से सोशियोलॉजी एंड अफ्रीकन-अमेरिकन स्टडीज में आगे की पढ़ाई की। फिर हावर्ड लॉ स्कूल से उन्होंने कानून में स्नातक किया और इसके बाद 1988 में शिकागो में ही सिडल एंड ऑस्टिन लॉ फर्म से जुड़ गईं। यहीं उनकी मुलाकात बराक ओबामा से हुई। कंपनी ने उन्हें ओबामा के सलाहकार की जिम्मेदारी सौंपी, जिसे उन्होंने बखूबी निभाया। दोनों बीच का यह व्यवसायिक संबंध कब व्यक्तिगत प्रेम संबंध के रूप में बदल गया, उन्हें जानकारी भी नहीं हुई। जब आपसी संबंधों का एहसास हुआ तो दोनों ने शादी का फैसला लिया और 1992 में एक-दूसरे से विवाह बंधन में बंध गए।
इससे सालभर पहले मल्टिपल स्क्लेरोसिस बीमारी से मिशेल के पिता के पिता का निधन हो चुका था। पिता के निधन के बाद मिशेल ने अपनी जिंदगी का पुनर्मूल्यांकन किया। उन्होंने कॉरपोरेट लॉ फर्म छोड़ने और सार्वजनिक क्षेत्र से जुड़ने का फैसला किया। उन्होंने सबसे पहले शिकागो मेयर के साथ सहायक के रूप में जुड़ी। फिर प्लानिंग एंड डेवेलपमेंट डिपार्टमेंट की कमिश्नर भी बनीं। 1993 में उन्होंने पब्लिक एलायज शिकागो की स्थापना की, जो युवाओं को सार्वजनिक क्षेत्र की सेवाओं के लिए प्रशिक्षण देता था। 1996 में उन्होंने शिकागो विश्वविद्यालय में डीन ऑफ स्टूडेंट सर्विसेज के रूप में अपनी सेवा दी। यहां उन्होंने कम्युनिटी सर्विस कार्यक्रम भी शुरू किया। मई, 2005 में उन्हें शिकागो विश्वविद्यालय के कम्युनिटी एंड एक्सटर्नल अफेयर का उपाध्यक्ष बनाया गया। इससे पहले नवंबर, 2004 में ओबामा सीनेट के लिए चुने जा चुके थे। उनका अधिकतर कामकाज वाशिंगटन में होता था। इसलिए ओबामा कभी शिकागो तो कभी वाशिंगटन में होते थे। लेकिन मिशेल ने तब भी शिकागो में रहना ही तय किया था। यह कॅरियर के प्रति उनके समर्पण को दर्शाता है। राष्ट्रपति चुनाव के लिए ओबामा की उम्मीदवारी की घोषणा के बाद उन्होंने एकबार फिर अपने समय का मूल्यांकन किया और परिवार की जरूरतों को देखते हुए कामकाज व परिवार के बीच बेहतर सामंजस्य बिठाया। चुनाव अभियान के दौरान उन्होंने ओबामा के लिए खूब प्रचार किया, वह भी प्रभावशाली ढंग से। आज ओबामा अमेरिका के राष्ट्रपति हैं तो निश्चित रूप से इसमें मिशेल की अहम भूमिका है, जिसे ओबामा भी स्वीकार करते हैं।

बुधवार, 16 फ़रवरी 2011

हमारी हेली


बॉबी जिंदल के बाद निक्की हेली। भारतीय मूल के दो लोग इतिहास रचकर अमेरिकी राज्यों में गवर्नर बने। इस मध्यावधि चुनाव में निक्की उसी भूकंप में जन्मी हैं। इन चुनावों के नतीजों को सारा पालिन ने राजनीतिक भूकंप कहा था, जिसमें राष्ट्रपति ओबामा की डेमोक्रेटिक पार्टी बुरी तरह पराजित हुई। साउथ कैरोलिना में रिपब्लिकन निक्की जीतीं। मूलत: वे अमृतसर की हैं, जहां से उनके माता-पिता काफी पहले अमेरिका जाकर बस गए थे। शादी के बाद हेली भी ईसाई हो गईं। वे हिम्मती और जुझारू हैं। उनकी मुख्य लड़ाई मंदी के शिकार लोगों और बेरोजगारों के लिए हैं। वे जीतकर भी विनम्र और शालीन हैं। अभी तो अध्याय लिखा जा रहा है, जो आगे इतिहास में शुमार होगा।



दुनियाभर में भारतीयों की एक बड़ी तादाद है, जिन्होंने अपनी मेहनत और लगन से कामयाबी की बुलंदियों को छुआ। उन्हें में से एक है निक्की हेली। अमेरिकी राज्य साउथ कैरालिना की गवर्नर बनकर भारतीय मूल की निक्की ने इतिहास रच दिया, लेकिन बेहद विनम्रता से वे कहती हैं कि अभी तो बस अध्याय लिखा जा रहा है, इतिहास तो लक्ष्य पूरा होने पर बनेगा। यह दूसरा मौका है जब भारतीय मूल का कोई व्यक्ति अमेरिका में गवर्नर बना हो। इससे पहले बॉबी जिंदल यह उपलब्धि हासिल कर चुके हैं। वहीं, अमेरिका में गवर्नर पद पर पहुंचने वाली निक्की भारतीय मूल की पहली महिला हैं। रिपब्लिकन निक्की ने अपने डेमोक्रेट प्रतिद्वंद्वी विसेंट शीहान को हराया। निक्की को 52 प्रतिशत तो शाहीन को 46 प्रतिशत वोट मिले।

जीत के बाद अपने भाषण में निक्की ने बड़ी विनम्रता और आत्मविश्वास से कहा कि अगले दिन सुबह बहुत से समाचार होंगे। बहुत से पर्यवेक्षक कहेंगे कि हमने इतिहास बनाया है। मैं कहना चाहती हूं कि हम एक नया अध्याय लिख रहे हैं, इतिहास लक्ष्य पूरा होने पर बनेगा। यानी बहुत कुछ है जो किए जाने की जरूरत है और साउथ कैरोलिना की नई गवर्नर उसे लेकर आश्वस्त भी हैं। जीत के तुरंत बाद अपनी नीति का खुलासा करते हुए बेरोजगारी व मंदी से जूझ रहे अमेरिका में साउथ कैरोलिना के लोगों के लिए रोजगार सृजन और राज्य को आर्थिक मजबूती देने की बात कहकर उन्होंने लेागों में उम्मीद की एक नई किरण जगाई। वहीं, विभिन्न मुद्दों पर ओबामा प्रशासन से अपना विरोध भी साफ कर दिया। खासतौर पर स्वास्थ्य कानूनों को लेकर उन्होंने अपना विरोध जाहिर कर दिया है। उन्होंने अमेरिका की संघीय सरकार से किसी भी तरह की वित्तीय मदद लेने से इनकार किया है। रिपब्लिकन पार्टी का कहना है कि इसके जरिये कुछ विशेष समूहों और फार्मास्यूटिकल कंपनियों को फायदा पहुंचाने की कोशिश की गई है, जनता का खयाल नहीं रखा गया है। पार्टी के किसी भी सांसद ने इस विधेयक के पक्ष में अमेरिकी कांग्रेस में मतदान नहीं किया था।

साउथ कैरोलिना के गवर्नर पद के लिए चुनाव के दौरान उन पर कई आरोप लगे। पति के साथ धोखा करने और समय पर कर अदा न करने का आरोप भी लगा। राजनीतिक प्रचारक लैरी मर्चेट ने आरोप लगाया कि हेली ने 2008 में साल्ट लेक सिटी में एक सम्मेलन के दौरान एक रात उनके साथ गुजारी थी। उन पर दूसरा आरोप यह लगा कि उन्होंने 2007 में विश्लेषक विल फॉक्स के साथ शारीरिक संबंध बनाए थे। लेकिन निक्की ने लगातार इन आरोपों का खंडन किया। इन आरोपों को उन्होंने राजनीतिक साजिश करार दिया और कहा कि उनकी जीत की संभावना को देखते हुए इस तरह की बातें कही जा रही हैं, ताकि लोगों को उनके खिलाफ भड़काया जा सके। इस साल जून में राज्य के रिपब्लिकन जेके नॉट्स ने उनके खिलाफ नस्ली टिप्पणी भी की। नॉट्स ने पब पॉलिटिक्स नाम के एक इंटरनेट राजनीतिक शो में उन्हें ‘रैगहेडज् कहा था। ऐसा संभवत: उनकी सिख समुदाय की पृष्ठभूमि के कारण किया गया था। इस शब्द का इस्तेमाल आम तौर पर अरबों या जातीय समूहों के खिलाफ किया जाता है, जो सिर पर पगड़ी या कोई कपड़ा बांधते हैं। नॉट्स ने कहा था कि व्हाइट हाउस में पहले से ही एक रैगहेड है, हमें गवर्नर कार्यालय में भी एक रैगहेड नहीं चाहिए। लेकिन निक्की के लिए अच्छी बात यह रही कि इन आरोपों और टिप्पणियों के बावजूद पार्टी के कई दिग्गजों का उन्हें समर्थन मिला। सारा पालिन और मिट रोमनी जसे रिपब्लिकन दिग्गजों ने उनके पक्ष में प्रचार किया, जिससे उनका दावा और मजबूत हुआ। निक्की की जीत न केवल अमेरिका में बड़ी संख्या में रह रहे भारतीय लोगों के लिए काफी महत्वपूर्ण है, बल्कि महिलाओं के लिए भी यह बहुत मायने रखती है। चुनाव में उन्हें भारतीय समुदाय का समर्थन भी मिला और महिलाओं का भी।

अड़तीस वर्षीया निक्की ने अमेरिका के ‘टी पार्टीज् आंदोलन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। यह आंदोलन ओबामा प्रशासन की कई नीतियों के खिलाफ 2009 में चलाया गया था। इमरजेंसी इकोनोमिक स्टैबलाइजेशन एक्ट 2008, अमेरिकन रिकवरी एंड रीइंवेस्टमेंट एक्ट 2009 और सीरीज ऑफ हेल्थकेयर रिफॉर्म बिल विरोध के कें्र में था। 20 जनवरी, 1972 को साउथ कैरोलिना के बैम्बर्ग में पंजाबी मूल के माता-पिता के घर जन्मी निक्की ने तेरह साल की उम्र में ही अपने परिवार के कपड़ा व्यवसाय में बुक कीपिंग का काम कर माता-पिता का हाथ बंटाना शुरू कर दिया था। बाद में उन्होंने क्लेमसन यूनिवर्सिटी से अकाउंट्स की पढ़ाई की और फिर एफसीआर कापरेरेशन में कुछ समय नौकरी करने के बाद अपनी मां के एग्जॉटिका इंटरनेशनल के नाम से चल रहे व्यवसाय को संभाला। निक्की का परिवार बहुत पहले पंजाब के अमृतसर से अमेरिका आ गया था। 1996 में उन्होंने माइकल हेली से शादी की। चूंकि माइकल ईसाई समुदाय से आते हैं, इसलिए निक्की ने विवाह से पहले धर्म परिवर्तन कर लिया। हालांकि उनकी शादी चर्च के साथ-साथ सिख गुरुद्वारा में भी हुई। उनके पति माइकल सेना में एक बड़े अधिकारी हैं। उनके दो बच्चे भी हैं, रेना और नलिन। 1998 में वे ऑरेंजबर्ग काउंटी चेम्बर्स ऑफ कॉमर्स के बोर्ड ऑफ डायरेक्टर्स में शामिल हुईं। इसी साल नेशनल एसोसिएशन ऑफ वुमन बिजनेस ओनर्स में उन्हें ट्रेजरर बनाया गया और फिर 2004 में वे इसकी अध्यक्ष बनीं। वे साउथ कैरोलिना में नेशनल एसोसिएशन ऑफ वुमन बिजनेस ओनर्स की अध्यक्ष भी हैं।





अतीत के साए में पीजे थॉमस का वर्तमान

2जी स्पेक्ट्रम मामला मीडिया में छाया रहा। इस सिलसिले में कई नाम सामने आए। कई लोगों को इसकी कीमत भी चुकानी पड़ी तो कुछ फिलहाल कठघड़े में हैं। इन्हीं में से एक नाम है पीजे थॉमस का। सतर्कता विभाग के आयुक्त के रूप में न केवल उनका कार्यकाल, बल्कि उनकी नियुक्ति भी काफी चर्चित और विवादास्पद रही। लेकिन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह सहित यूपीए के सभी नुमाइंदे उनके बचाव में मुस्तैदी से खड़े रहे।

वे पहले संचार विभाग में सचिव रह चुके हैं और इसलिए जब 2जी स्पेक्ट्रम का मामला सामने आया तो आशंका भी उठी कि सतर्कता विभाग के आयुक्त के रूप में वे कहीं इसकी जांच को प्रभावित न करें। हालांकि उन्होंने बार-बार पूरे मामले से खुद को अलग किया और घोटालों के आरोपों को खारिज करते हुए पूरे मामले में निष्पक्षता बरतने का दावा किया। तमाम आरोपों से इनकार करते हुए उन्होंने खुद को नैतिक रूप से पाक साफ बताया। अपने बचाव में वे कहते हैं कि यह बहुत पुराना मामला है और उनके कार्यकाल में हुआ भी नहीं। इसलिए नैतिक रूप से भी इस्तीफे का सवाल ही पैदा नहीं होता। लेकिन विपक्ष उनकी एक सुनने को तैयार नहीं है। विपक्ष को न तो उन पर भरोसा है और न ही उनके दावों पर। इस बीच सुप्रीम कोर्ट का रवैया भी इस मामले में बेहद तल्ख हो गया है।

अदालत का साफ कहना है कि एक ऐसा व्यक्ति, जिसके खिलाफ खुद आपराधिक मामला लंबित हो, वह सीबीआई जांच की निगरानी कैसे कर सकता है? विपक्ष इसी सवाल को लेकर लगतार थॉमस का विरोध करता रहा है और सुप्रीम कोर्ट की इस तल्खी के बाद निश्चित रूप से उसका पक्ष मजबूत हुआ है। वहीं, सरकार को फजीहत का सामना करना पड़ा है। ऐसे में अब तक थॉमस के बचाव में खड़ी सरकार भी विपक्ष, सुप्रीम कोर्ट और मीडिया के दबाव के आगे झुकती नजर आ रही है। सरकार इस मामले में और अधिक शर्मनाक स्थिति का सामना करने से बचना चाहती है और इसलिए संभव है कि आगे हो सकने वाली फजीहत से सरकार को बचाने के लिए थॉमस अगले एक-दो दिन में इस्तीफा दे दें। हालांकि अब तक पूरे मामले में उनके तेवर व्रिोही से बने रहे और वे बार कहते रहे कि अपने पद से इस्तीफा नहीं देंगे।

गौरतलब है कि थॉमस पर 1991 में केरल में खाद्य एवं नागरिक आपूर्ति मंत्रालय के सचिव के रूप में अपने कार्यकाल के दौरान बाजार मूल्य से अधिक कीमत पर पाम ऑयल का आयात करने का आरोप है, जिससे सरकार को करोड़ों रुपए का चूना लगा। इस मामले में उन पर आपराधिक मामला भी चल रहा है और कोर्ट का भी यही कहना है कि जिस व्यक्ति के खिलाफ आपराधिक मामला लंबित हो, वह सीवीसी के रूप में कैसे काम कर सकता है? उन पर संचार सचिव रहते हुए भी 2जी स्पेक्ट्रम मामले को दबाने का आरोप है। कोर्ट ने इस पर भी सवाल उठाए हैं कि 2जी स्पेक्ट्रम धांधली के वक्त भी जब वे संबंधित विभाग में एक महत्वपूर्ण पद पर थे तो अब सीवीसी के रूप में इसी मामले की सीबीआई जांच की निगरानी वे कैसे कर सकते हैं?

बहरहाल, विपक्ष सीवीसी के रूप में उनकी नियुक्ति से भी सहमत नहीं था। सीवीसी के रूप में उनकी नियुक्ति इसी साल सितंबर में हुई थी। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की अध्यक्षता में गृह मंत्री पी चिदंबरम और विपक्ष की नेता सुषमा स्वराज के तीन सदस्यीय पैनल ने सीवीसी के रूप में संचार विभाग के पूर्व सचिव पीजे थॉमस को चुना था। हालांकि सुषमा स्वराज उनके चयन को लेकर सहमत नहीं थीं, लेकिन प्रधानमंत्री और गृह मंत्री ने थॉमस के नाम पर ही मुहर लगाई। चयन के लिए तीन सदस्यीय पैनल के सामने भी तीन नाम थे, जिसमें एक के मुकाबले दो मत से फैसला थॉमस के हक में हुआ। विपक्ष सीवीसी के रूप में थॉमस को स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं था। पाम ऑयल घोटाले का हवाला देकर उसने किसी ऐसे व्यक्ति को इस पद पर बिठाने का विरोध किया था, जिसके दामन पर भ्रष्टाचार के छींटे हों। यही वजह रही कि विपक्ष ने 14वें सीवीसी के रूप में राष्ट्रपति भवन में आयोजित थॉमस के शपथ ग्रहण समारोह का बहिष्कार किया। विपक्ष का कोई भी सदस्य समारोह में नहीं पहुंचा। लेकिन तब प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने थॉमस का पुरजोर समर्थन करते हुए कहा था, ‘हमने बिल्कुल सही किया। तीन लोगों की सूची में से हमने सर्वश्रेष्ठ का चयन किया।ज्

साठ वर्षीय थॉमस 1973 बैच के केरल कैडर के आईएएस अधिकारी हैं। केरल में उन्हें सचिव के रूप में वित्त, उद्योग, कृषि, काूनन एवं न्याय और मानव संसाधान विकास विभाग में महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां सौंपी गई। कोझिकोड में भारतीय प्रबंधन संस्थान की आधारशिला रखने में भी उनका अहम योगदान था। तब उन्होंने संस्थान के निदेशक के रूप में भी अपनी सेवा दी थी। 2007 में वे केरल सरकार के मुख्य सचिव बने। करीब दो साल तक उन्होंने इस पद पर अपनी सेवा दी। जनवरी, 2009 में उन्होंने कें्र का रुख किया और संसदीय कार्य मंत्रालय में सचिव की जिम्मेदारी संभाली। बाद में वे संचार सचिव भी बने। लेकिन एक साल बाद ही कें्र ने उन्हें सतर्कता विभाग के आयुक्त की जिम्मेदारी सौंप दी।







नीरा राडिया और मीडिया

नीरा राडिया टेप प्रकरण ने औद्योगिक घरानों व राजनीति केसाथ मीडिया के साठगांठ की पोल खोलकर रख दी है। पूरे प्रकरण ने मीडिया की नैतिकता पर भी सवाल खड़े किए हैं। वैश्नवी कॉपरेरेट कंसल्टिंग के नाम से पीआर एजेंसी चला रही नीरा राडिया के साथ पूर्व दूर संचार मंत्री ए राजा से लेकर पत्रकारिता जगत के कई दिग्गज पत्रकारों की बातचीत इस टेप में रिकॉर्ड हैं, जिससे मालूम होता है कि कैसे 2जी स्पेक्ट्रम मामले में राजा को बचाने की कोशिश की गई और औद्योगिक घरानों के हितों को साधने का प्रयास किया गया।

राडिया के साथ बातचीत में जिन दिग्गज पत्रकारों के नाम सामने आए हैं, उनमें हिन्दुस्तान टाइम्स के संपादकीय सलाहकार वीर संघवी, एनडीटीवी की समूह संपादक बरखा दत्त, इंडिया टूडे के संपादक प्रभु चावला, इंडिया टूडे के ही पूर्व प्रबंध संपादक शंकर अय्यर और इकोनोमिक टाइम्स के तत्कालीन प्रधान संपादक एमके वेणु शामिल हैं। उनकी बातचीत से साफ है कि अपने लेखों के माध्यम से उन्होंने ए राजा के पक्ष में माहौल बनाया और टाटा, अंबानी जसे उद्योपतियों को फायदा पहुंचाया।

जाहिर तौर पर पूरे प्रकरण को लेकर उन लोगों के बीच तीखी प्रतिक्रिया हुई, जो पत्रकारिता को लोकतंत्र के चौथे स्तंभ के रूप में देखते हैं। जनता, जो आंख बंद कर मीडिया रिपोर्ट और बड़े-बड़े पत्रकारों के लेखों पर भरोसा करती है, भी पूरे मामले में ठगा हुआ महसूस कर रही है। मीडिया जगत में भी पूरे प्रकरण पर कड़ी प्रतिक्रिया हुई है, जबकि कुछ लोग इसे सामान्य मानकर चल रहे हैं। इस बीच, टेप में नाम आने वाले पत्रकार अपने बचाव में जुट गए हैं। उनके मुताबिक टेप से छेड़छाड़ की गई है और बातचीत के अंश बीच से गायब कर दिए गए हैं, जिससे अर्थ का अनर्थ निकाला जा रहा है।

पूरे प्रकरण में कुछ लोगों का टीवी पर कोर्ट मार्शल भी हुआ। एनडीटीवी पर बरखा दत्ता से तो हेडलाइंस टूडे पर प्रभु चावला और वीर संघवी से द हिन्दू के एन राम, इंडिया टूडे के एमजे अकबर, ओपन मैगजीन के हरतोष सिंह बल और परफेक्ट रिलेशंस के दिलीप चेरियन ने पूछताछ की। सबने अपने बचाव में तर्क दिए। कुछ पैनल के गले उतरा तो कुछ सवालों के जवाब वे सही ढंग से नहीं दे पाए, जिससे पूरे मामले में उनकी संलिप्तता के दावे और मजबूत हुए। एन राम ने प्रभु चावला को तो क्लीन चिट दे दी, लेकिन बरखा दत्त और संघवी के बारे में उनका साफ कहना है कि उन्होंने पत्रकारिता की लाइन से हटकर काम किया। टीवी पर बरखा का रवैया बेहद चिंताजनक था। वे रूखे और आक्रामक तरीके से सवालों का जवाब दे रही थीं। कुल मिलाकर, उन्हें अपने किए का कोई पछताछा नहीं था। वहीं संघवी ने अपने बचाव में जो कुछ भी कहा, वह संतोषप्रद नहीं है। दिलीप चेरियन ने पूरे प्रकरण में उद्योग जगत के लिए भी एक संहिता लागू करने की मांग की है।

वहीं, संतोष देसाई जसे पर्यवेक्षक पूरे मामले में मीडया को कठघड़े में शामिल करते हैं। उनके अनुसार, चैनलों ने पूरे प्रकरण में जानबूझकर चुप्पी साध रखी है। कोई और मामला होता तो अब तक न जाने कितने लोगों पर गाज गिर चुकी होती। लेकिन चूंकि मामला पत्रकारों से जुड़ा है, इसलिए एक नियोजित खामोशी है। चैनलों ने लोगों तक संबंधित मामले की जानकारी तो पहुंचाई, लेकिन इसे किसी मुकाम तक नहीं पहुंचाया। वहीं, सेवंती नैनन का कहना है कि इस मामले में भले कोई प्रतिदान नहीं हुआ हो, लेकिन इससे पावर ब्रोकिंग (सत्ता में दलाली) की बात तो पुष्ट होती ही है।

स्टेट्समेन और इंडियन एक्सप्रेस के संपादक रहे एस निहाल सिंह का कहना है कि नीरा राडिया की कोई गलती नहीं। वे अपने क्लाइंट के लिए काम कर रही थीं। पर निश्चित ही पत्रकारों के लिए समय आ गया है कि वे अपने पेशेवर दायित्वों और कॉपरेरेट प्रभुओं के साथ खाने-पीने की ललक के बीच लक्ष्मण रेखा खींचें। ये टेप विशेषकर इस बात को रेखांकित करते हैं कि किस तरह कुछ पत्रकार अपने को किंगमेकर के रूप में देखते हैं और उच्च स्तरीय राजनीतिक घटनाक्रम में उलझते जाते हैं। लेकिन हिन्दुस्तान टाइम्स के पूर्व संपादक बीजी वर्गीज जसे लोग भी हैं, जिनके अनुसार खबरों के संदर्भ में पीआर का काम देख रहे लोगों से पत्रकारों की बातचीत आम है और इसमें कुछ भी अनुचित नहीं है। बहरहाल, पूरे मामले को लेकर मीडिया में बहस छिड़ी है। विवादास्पद टेप अब सुप्रीम कोर्ट में है और सबको मामले के पूरे खुलासे का इंतजार है।







बुधवार, 29 दिसंबर 2010

मन मसोसते मोहन

ऐसा नहीं कि यूपीए-एक के दौरान प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह पर आफतें नहीं आईं, लेकिन अंत-अंत में उन्होंने अपने को मजबूत प्रधानमंत्री साबित किया। खासतौर पर परमाणु करार के मुद्दे पर। स्वभाव के विपरीत वे विपक्ष पर आक्रमक भी हुए। जनता ने भी उन्हें सिर-आंखों पर लिया, जिसकी बदौलत आज वे फिर प्रधानमंत्री हैं। लेकिन दूसरे कार्यकाल का डेढ़ साल हाय-हाय करते ही बीता। घोटाले पर घोटाला और महंगाई समेत कई मुसीबतें उनकी सरकार को घेरे हुए हैं। हद तो यह हो गई है कि उन्हें छोड़ते हुए उनकी सरकार को जो विपक्ष पूरे दम से कोसता रहा है अब वह सीधे उनसे ही इस्तीफा मांग रहा हैं।



प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह इन दिनों विपक्ष के निशाने पर हैं। 2जी स्पेक्ट्रम सहित अन्य घोटालों और घपलों पर विपक्ष उनसे इस्तीफा मांग रहा है। अब तक प्रधानमंत्री को विवादों से परे रखने वाला विपक्ष अचानक आक्रामक हो गया है। वह उन्हें ही भ्रष्टाचार की जड़ मान रहा है और बतौर प्रधानमंत्री यूपीए सरकार के कार्यकाल में हुए सभी घोटालों के लिए जिम्मेदार भी। लेकिन हमेशा की तरह पार्टी उनके साथ मजबूती से खड़ी है। कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी प्रधानमंत्री पर होने वाले हर हमले का जवाब देती हैं। राहुल गांधी भी मनमोहन के कार्यकलापों का बखान करने से नहीं चूकते। यह हैरत की बात है कि डेढ़ साल पहले आम चुनाव के वक्त भाजपा उन्हें कमजोर और मजबूर प्रधानमंत्री बताते हुए उनके पीछे पड़ी थी, लेकिन जनता ने उन्हें फिर प्रधानमंत्री बनाया। पर डेढ़ साल में ही वे फजीहत में हैं।

बेदाग और साफ-सुथरी छवि के मनमोहन सिंह को लेकर अब तक विपक्ष के तेवर कभी इतने कड़े नहीं हुए थे। वह यूपीए पर तो हमला करता रहा। सोनिया भी उसके निशाने पर रहीं। लेकिन प्रधानमंत्री को व्यक्तिगत तौर पर वह ईमानदार बताता रहा। लेकिन 2जी स्पेक्ट्रम मामले में जनता पार्टी के अध्यक्ष सुब्रमण्यम स्वामी की याचिका पर सुप्रीम कोर्ट के रुख के बाद विपक्ष अधिक हमलावर हो गया। अब उसके निशाने पर सीधे प्रधानमंत्री हैं। पूरे मामले में उनकी चुप्पी का हवाला देते हुए विपक्षी दल के नेता अब इसके लिए उन्हें जिम्मेदार ठहराते हुए उनसे इस्तीफे की मांग रहे हैं।

भारतीय राजनीति में मनमोहन सिंह की गिनती एक ऐसे नेता के रूप में की जाती है, जो राजनीतिज्ञ कम और आर्थिक जानकार अधिक हैं। 2004 में जब सोनिया गांधी ने उन्हें यूपीए सरकार के नेतृत्व की जिम्मेदारी सौंपी तो विपक्ष ने यही कहकर आलोचना की थी कि उनकी राजनीतिक अनुभवहीनता सरकार के कामकाज को प्रभावित करेगी। लेकिन पांच साल के पहले कार्यकाल में उन्होंने सरकार के कामकाज से विपक्ष को उसकी आलोचनाओं का जवाब दे दिया। विपक्ष अक्सर यह कहकर भी उनकी खिल्ली उड़ाता रहा है कि वे कोई लोकसभा चुनाव नहीं जीत सकते। वे फिलहाल असम से राज्यसभा के सदस्य हैं। 1999 में वे पहली बार लोकसभा चुनाव मैदान में उतरे थे। लेकिन उन्हें हार का मुंह देखना पड़ा था।

2009 के लोकसभा चुनाव से पहले भाजपा अक्सर उन्हें ‘कमजोर प्रधानमंत्रीज् बताती रही। लोकसभा चुनाव से पहले विपक्ष के नेता लालकृष्ण आडवाणी ने उन्हें टेलीविजन पर सीधी बहस के लिए चुनौती दी थी। लेकिन मनमोहन सिंह ने खामोश रहकर विपक्ष की इन चुनौतियों और आलोचनाओं का करारा जवाब दिया। वे हमेशा कहते रहे, चुनाव में उनका काम बोलेगा। हुआ भी यही। 2009 के लोकसभा चुनाव में भाजपानीत राजग की उम्मीदों पर पानी फेरते हुए यूपीए एकबार फिर सत्ता में आई। जनता ने फिर मनमोहन के नेतृत्व में आस्था जताई।

यूपीए सरकार में मनमोहन सिंह का यह दूसरा कार्यकाल है। इससे पहले 1991 में नरसिम्हा राव के नेतृत्व में बनी सरकार में वे वित्त मंत्री रह चुके हैं। भारत में आर्थिक सुधारों की प्रक्रिया उन्होंने ही शुरू की और बतौर प्रधानमंत्री इसे आगे बढ़ाया। 2004 में जब सोनिया गांधी ने उन्हें एक नाटकीय घटनाक्रम में यह जिम्मेदारी सौंपी तो अटकलें लगाई जा रही थीं कि वे शायद ही गांधी परिवार की छाया से मुक्त सरकार देने में सक्षम हो पाएं, लेकिन अपने कामकाज से उन्होंने न केवल ऐसी अटकलों को निराधार साबित किया, बल्कि अपनी एक स्वतंत्र पहचान भी बनाई।

बतौर प्रधानमंत्री, राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना, सूचना का अधिकार कानून उनकी सरकार की अहम उपलब्धियों में है। दूसरे कार्यकाल में शिक्षा का अधिकार कानून एक अन्य महत्वपूर्ण उपलब्धि है। हालांकि महंगाई के मोर्चे पर सरकार शुरू से ही लड़ती रही। यूपीए के पहले कार्यकाल में भी जनता महंगाई की मार से जूझती रही। दूसरे कार्यकाल में भी यही हाल है। खाने-पीने की चीजों के दाम आसमान छू रहे हैं। लोगों को राहत मिलती नहीं दिख रही और यहां आर्थिक विशेषज्ञ प्रधानमंत्री विफल साबित हो रहे हैं। लेकिन विदेश नीति के मार्चे पर सरकार सफल नजर आती है। मनमोहन सिंह के कार्यकाल में दुनिया के सबसे सशक्त देश अमेरिका से हमारी नजदीकियां बढ़ी है। भारत का परमाणु वनवास लगभग समाप्त हो गया और अमेरिका सहित कई देशों से नागरिक परमाणु समझौता मुकाम तक पहुंचा। वैश्विक मंच पर देश एक आर्थिक शक्ति के रूप में उभरा है। पूर्ववर्ती सरकारों की भांति मनमोहन सरकार ने भी पड़ोसी देशों, खासकर पाकिस्तान से संबंध सुधारने को तवज्जो दी और इस दिशा में कई प्रयास किए।

नक्सलवाद को देश की आंतरिक सुरक्षा के लिए सबसे बड़ा खतरा बताने वाले मनमोहन सिंह अब आतंकवाद को भी इस दृष्टि से कम खतरनाक नहीं मानते। लेकिन आतंकवाद निरोधक कानून (पोटा) को हटाने के लिए वे अब भी विपक्ष के निशाने पर हैं। मुंबई में 2008 के आतंकवादी हमलों का हवाला देकर विपक्ष मनमोहन सरकार के इस फैसले पर लगातार सवाल उठा रहा है।

छब्बीस सितंबर, 1932 को पंजाब के गाह में गुरुमुख ¨सह और अमृत कौर की संतान के रूप में जन्मे मनमोहन सिंह की परवरिश उनकी दादी ने की, क्योंकि मां का निधन उनकी बहुत छोटी उम्र में हो गया था। यही वजह रही कि वे दादी के काफी करीब रहे। बंटवारे के बाद गाह पाकिस्तान के हिस्से में पड़ा और मनमोहन सिंह का परिवार अमृतसर चला आया। यहां के हिन्दू कॉलेज से उन्होंने शुरुआती शिक्षा पाई। पंजाब यूनिवर्सिटी से 1952 और 1954 में उन्होंने अर्थशास्त्र में क्रमश: स्नातक तथा एमए किया। आगे की पढ़ाई उन्होंने कैम्ब्रिज और ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी से की। पढ़ाई पूरी करने के बाद वे संयुक्त राष्ट्र के व्यापार एवं विकास कार्यक्रम से जुड़ गए। इसके बाद 1970 के दशक में उन्होंने दिल्ली विश्वविद्यालय में अध्यापन कार्य भी किया। 1982 में वे रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया के गवर्नर बने और पांच साल तक इस पद पर रहे। 1985-87 के बीच वे योजना आयोग के उपाध्यक्ष रहे। 1991 में वे पहली बार सरकार से जुड़े और नरसिम्हा राव सरकार में बतौर वित्त मंत्री भारत में उदारीकरण की प्रक्रिया शुरू की।









गुरुवार, 2 दिसंबर 2010

मेरी मुक्का.कॉम

चार सौ मीटर दौड़ और भाला फेंकने में महारत रखने वाली मेरी कॉम को आज दुनिया मुक्केबाज के रूप में जानती-पहचानती है। उनकी सफलता गरीबी, अभाव, वर्जनाओं पर समर्पण, लगन और अदम्य इच्छाशक्ति की विजय की महागाथा है। विश्व महिला मुक्केबाजी चैम्पियनशिप जीतकर उन्होंने इतिहास रच दिया.


यूं तो कोई भी क्षेत्र महिलाओं की सफलता से अछूता नहीं है, लेकिन सफलता यूं ही नहीं मिल जाती। जीतोड़ मेहनत और कुछ कर गुजरने का जज्बा ही उन्हें आगे ले जाता है। लेकिन कुछ अलग करने की कोशिश में कई बार अपने नाराज होते हैं तो राह में मुश्किलें भी कम नहीं आतीं। मेरी कॉम ऐसी ही शख्सियत हैं, जिन्होंने अपने जज्बे से दुनिया जीत ली और उनके दिल भी जो मुक्केबाजी के रिंग में उतरने के उनके फैसले से नाराज थे। आज वे युवा खिलाड़ियों के लिए एक उम्मीद हैं, प्रेरणा हैं और देश की गौरव तो हैं ही।



अठारह साल की उम्र में उन्होंने रिंग में उतरने का फैसला किया था। तब महिलाओं के लिए यह क्षेत्र लगभग वर्जित था। परिवार के लोग भी नहीं चाहते थे कि वे ऐसा कुछ करें। पिता इस कदर नाराज थे कि उन्होंने यहां तक कह दिया कि अब उन्हें अपने विवाह के बारे में भूल जाना चाहिए, क्योंकि कोई उनसे विवाह नहीं करेगा। लेकिन पिता और परिवार के कड़े रुख के बावजूद मुक्केबाजी को लेकर उनका समर्पण कम नहीं हुआ। अपने जज्बे और मेहनत से उन्होंने मुक्केबाजी के क्षेत्र में जो कुछ भी हासिल किया है, उससे न केवल उनके पिता खुश हैं, देश भी गौरवान्वित महसूस कर रहा है। युवतियों व अन्य उभरते खिलाड़ियों के लिए तो वे प्रेरणास्रोत हो गई हैं।



यह भी दिलचस्प है कि एक मुक्केबाज के रूप में जानी और पहचानी जाने से पहले वे एक एथलीट थीं। चार सौ मीटर दौड़ और भाला फेंकने में उन्हें महारत हासिल थी। लेकिन 1998 के एशियाई खेलों में डिंगको सिंह की कामयाबी ने मेरी कॉम को एथलीट से मुक्केबाज बना दिया। डिंगको सिंह बैंकॉक से मुक्केबाजी में सोना लेकर लौटे थे। तब मेरी को भी लगा कि उन्हें मुक्केबाजी में किस्मत आजमाना चाहिए। अगले दो साल यानी वर्ष 2000 में उन्होंने मुक्केबाजी शुरू कर दी। सिर्फ दो सप्ताह में वे मुक्केबाजी के शुरुआती गुर सीख गईं। कुछ ही दिनों में उन्होंने अपनी क्षमता भी पहचान ली और समझ गईं कि ईश्वर ने उन्हें जो प्रतिभा दी है, वह मुक्केबाजी के लिए ही है। तब शायद ही उन्होंने सोचा था कि महिला मुक्केबाजी के क्षेत्र में एक दिन वे विश्व स्तर पर सफलता के परचम लहराएंगी। लेकिन उसी साल राज्य स्तरीय महिला मुक्केबाजी चैम्पियनशिप में जीत हासिल कर उन्होंने इस दिशा में कदम बढ़ा दिए। अखबारों में छपी उनकी फोटो और जीत की खबरों ने पिता का गुस्सा भी शांत कर दिया। मेरी कॉम की प्रतिभा अब सबके सामने थी और पिता को बेटी पर फख्र होने लगा था।



राज्य स्तरीय महिला मुक्केबाजी चैम्पियनशिप में जीत के बाद मेरी कॉम ने पीछे मु़ड़कर नहीं देखा। वर्ष 2000 से 2005 के बीच उन्होंने ईस्ट इंडिया बॉक्सिंग चैम्पियनशिप के अतिरिक्त पांच राष्ट्रीय चैम्पियनशिप लगातार जीते। उन्होंने अंतर्राष्ट्रीय स्तर की कई प्रतियोगिताओं में भी शिरकत की और वहां भी अपनी सफलता के परचम लहराए। विश्व महिला मुक्केबाजी चैम्पियनशिप वे पांच बार जीत चुकी हैं, जिसमें चार बार उन्होंने स्वर्ण हासिल किया। दो बार वे एशियाई महिला मुक्केबाजी चैम्पियनशिप जीत चुकी हैं, जबकि एकबार उप विजेता रहीं। अब उनका सपना 2010 के लंदन ओलम्पिक में स्वर्ण जीतना है। वे इसके लिए हर संभव कोशिश कर रही हैं कि ओलम्पिक में महिला मुक्केबाजी को भी शामिल कर लिया जाए।



सत्ताइस वर्षीय इस महिला मुक्केबाज का बचपन गरीबी व अभाव में बीता। परिवार की सीमित आय होने के कारण उनके भाई-बहन बहुत पढ़ाई नहीं कर पाए। लेकिन मेरी कॉम की शिक्षा-दीक्षा क्रिश्चयन स्कूल से हुई। स्कूल के दिनों में ही उन्होंने एथलीट बनने की दिशा में कदम बढ़ा दिए थे। लेकिन तब इसकी वजह खेल को लेकर उत्साह से अधिक परिवार की जरूरतें पूरी करना था। परिवार की आय में हाथ बंटाने के लिए ही उन्होंने खेलकूद की विभिन्न प्रतियोगिताओं में हिस्सा लेना शुरू कर दिया था। लेकिन आगे चलकर यह उनका शौक बन गया और आज उनके जीवन का मकसद। आज वे ऐसे बच्चों के लिए प्रशिक्षण एकेडमी चला रही हैं, जिनकी प्रतिभाएं उचित सुविधाओं के अभाव में सामने नहीं आ पाती और समय से पहले ही दम तोड़ देती हैं। उनकी एकेडमी में करीब 15 लड़के-लड़कियां प्रशिक्षण प्राप्त कर रहे हैं, जिन्हें आवास व भोजन के साथ-साथ वे तमाम संसाधन भी मुहैया कराए जा रहे हैं, जो मुक्केबाजी के लिए जरूरी हैं। वे सभी मेरी कॉम की तरह बनना चाहती हैं।



मुक्केबाजी से हुई आय से उन्होंने नया घर खरीदा और माता-पिता के लिए जमीन भी। छोटे भाई-बहन, जो गरीबी के कारण पढ़ नहीं पाए, के भविष्य को ध्यान में रखते हुए उन्होंने उनके लिए भी पैसे जमा कर दिए। उनकी बस यही कोशिश है कि जो अभाव उन्होंने ङोला, वह उनके भाई-बहनों या अन्य प्रतिभावान लड़के-लड़कियों की न हो।



मेरी कॉम आज दो बच्चों की मां हैं और करीब दो साल बाद मुक्केबाजी के रिंग में उतरने के बावजूद उन्होंने किसी को निराश नहीं किया। इसकी वजह वे अपनी फिटनेस और लगातार अभ्यास को बताती हैं। वे रोजाना दिन में पांच से छह घंटे अभ्यास करती हैं। अपनी लंबाई (पांच फुट) को लेकर उन्हें थोड़ी परेशानी जरूर है, लेकिन खुद को फिट रखकर और मुक्केबाजी के तमाम गुर अपनाकर वे विरोधियों पर भारी पड़ती हैं। सफलता के लिए वे न केवल अपनी मुट्ठियों पर भरोसा करती हैं, बल्कि दिमाग का भी बखूबी इस्तेमाल करती हैं। उनका साफ कहना है कि एक सफल मुक्केबाज बनने के लिए शारीरिक फिटनेस के अलावा दिल का मजबूत होना भी जरूरी है और उसे लेकर उत्साह व भावना भी। मुक्केबाजी के क्षेत्र में उल्लेखनीय उपलब्धियों के लिए सरकार उन्हें अर्जुन अवार्ड से सम्मानित कर चुकी है। यह सम्मान पाने वाली वह देश की पहली महिला हैं। उन्हें पद्मश्री भी मिल चुका है और राजीव गांधी खेल रत्न पुरस्कार भी। लेकिन उन्हें इस बात की शिकायत है कि देश में महिला मुक्केबाजों को आर्थिक संरक्षण नहीं मिलता, जबकि टेनिस और क्रिकेट के साथ स्थिति बिल्कुल भिन्न है। उनका सवाल बिल्कुल जायज दीख पड़ता है कि क्या इस देश में टेनिस और क्रिकेट के अलावा कोई अन्य खेल नहीं है?











मंगलवार, 14 सितंबर 2010

एक संत की याद

हर साल ग्यारह सितंबर की तारीख अब 9/11 के रूप में याद की जाने लगी है, जब 2001 में अमेरिका के वर्ल्ड ट्रेड सेंटर और सुरक्षा कार्यालय पेंटागन को आतंकवादियों ने निशाना बनाया था। लेकिन हमारे लिए इसका एक और महत्व है, जिसकी स्मृति लगभग क्षीण होती जा रही है। यह आचार्य विनोबा भावे की जयंती का भी दिन है। भारतीय समाज, राजनीति में उनका व्यक्तित्व और कृतित्व विलक्षण रहा है। 9/11 के संदर्भ में भी देखें तो उनकी दृष्टि सत्य, प्रेम, करुणा की थी। वे हृदय परिवर्तन करके बदलाव लाना चाहते थे। आज भी जमीन की समस्या देश की बड़ी समस्या है और उसके लिए बड़ी लड़ाइयां लड़ी जा रही हैं। बाबा ने इसका हल भी भूदान आंदोलन में ढूंढा था और दान के जरिए लाखों एकड़ भूमि प्राप्त की थी। आज न विनोबा हैं, न भूदान और न सर्वोदय। समस्याएं जहां की तहां हैं। विनोबा-विचार की प्रासंगिकता पर मैंने बात की गांधी शांति प्रतिष्ठान से जुड़े एसएन सुब्बाराव से, जो आज भी देशभर में गांधी के विचारों के प्रसार में जुटे हैं और युवाओं को जागरूक बनाने के लिए तरह-तरह के कार्यक्रम आयोजित कर रहे हैं। उनके विचारों की प्रासंगिकता पर मैंने वरिष्ठ पत्रकार देवदत्त से भी बातचीत की। यहां उनके विचारों पर आधारित दो लेख प्रस्तुत हैं।



आज भी उपयोगी यह विचार




(गांधी शांति प्रतिष्ठान से जुड़े एसएन सुब्बाराव से बातचीत पर आधारित)


किसी भी आंदोलन की सफलता के लिए जरूरी है कि उसे समाज और व्यवस्था का साथ मिले, सर्वोदय आंदोलन के साथ यह नहीं हो सका।



विनोबा मूलत: आध्यात्मिक व्यक्ति थे और इसी रूप में वे सभी समस्याओं का समाधान तलाशते थे। नेता बनने की इच्छा उनमें नहीं थी। वे सभी को समान रूप से देखते थे और एक आध्यात्मिक जीवन बिताना चाहते थे। यह भी सच है कि वे घर से मुक्ति की तलाश में निकले थे, लेकिन गांधी से मिलने के बाद उनके जीवन की दिशा बदल गई। वे उनके विचारों से इस कदर प्रभावित हुए कि उन्होंने आध्यात्मिक मुक्ति का मार्ग छोड़ दिया और सामाजिक जीवन में उतर आए। फिर आजादी के आंदोलन से लेकर एक नए समाज की रचना तक के गांधी के कार्यक्रम में वे हर जगह उनके साथ रहे। लेकिन 30 जनवरी, 1948 को गांधी की हत्या के बाद हालात बदल गए। एकाएक हुई इस वारदात ने लोगों को सकते में डाल दिया। सब किंकर्तव्यविमूढ़ की स्थिति में आ गए। किसी को समझ नहीं आ रहा था कि अब उन सपनों को कैसे पूरा किया जाएगा, जो गांधी जी ने आजाद भारत की जनता के लिए देखे थे। कैसे एक नए समाज की रचना हो, जिसमें हर व्यक्ति का कल्याण हो। ऐसे में सबको विनोबा में उम्मीद की किरण दिखी। गांधी के रूप में देश का जो नेतृत्व एकाएक खो गया, वह विनोबा के रूप में दिखा। लोग उनके निर्देश की प्रतीक्षा करने लगे। विनोबा ने भी महसूस किया कि सर्वजन के हित में जिस समाज की संकल्पना गांधी ने की थी, उसे आगे बढ़ाने की जरूरत है। यूं हाथ पर हाथ धरे रहने से बात नहीं बनेगी। उन्होंने गांधी के सपने को साकार करने के लिए लोगों का आह्वान किया और कहा कि देश ने आजादी तो हासिल कर ली, अब हमारा लक्ष्य एक ऐसे समाज की रचना करना होना चाहिए, जिसमें सबका कल्याण सुनिश्चित हो सके।

गांधी ने ऐसे ही कार्यो के लिए सेवा ग्राम आश्रम की स्थापना की थी और आजादी के बाद फरवरी, 1948 में शीर्ष नेतृत्व को इस पर विचार-विमर्श करने व कार्यक्रम की रूपरेखा तैयार करने के लिए आश्रम बुलाया कि सर्वोदय यानी सबका उदय, सबका कल्याण कैसे हो? लेकिन इससे पहले ही उनकी हत्या हो गई और देश के सामने एक बड़ा शून्य आ गया। बहरहाल, तत्कालीन नेतृत्व ने मार्च में यह बैठक बुलाई। गांधी के सपनों को साकार करने के लिए सर्व सेवा संघ का गठन किया गया, जिसका उद्देश्य समाज में सभी की सेवा करना था। अब तक विनोबा के मन में भू-आंदोलन जसी कोई संकल्पना नहीं थी। लेकिन देशभर का भ्रमण करने के बाद उन्हें इस बात का भान हो चला था कि समाज दो भागों में बंटा है, एक भूमिहीन लोगों का तबका और एक भू-स्वामियों का वर्ग। भूमिहीन लोगों की एक बड़ी संख्या है, जबकि मुट्ठीभर लोगों के पास अवश्यकता से अधिक भूमि है।

अपनी पदयात्रा के दौरान जब वे आंध्र प्रदेश के तेलंगाना पहुंचे तो वहां जमीन के टुकड़े के लिए लोगों को लड़ते देखा। भूमिहीन भू-स्वामियों से जमीन छीनने के लिए छापामार युद्ध चला रहे थे तो उन्हें काबू में करने की जिम्मेदारी पुलिस को दी गई थी। भूमिहीनों से उन्होंने हिंसा छोड़ने की अपील की तो उन्होंने अपने लिए जमीन की मांग की। खुद विनोबा को भी उस वक्त नहीं पता था कि वे इनकी समस्याओं का समाधान कैसे करेंगे? इसी उधेड़बुन के बीच उन्होंने ग्रामीणों की सभा बुलाई और लोगों के सामने उनकी समस्याएं रखी। तब स्वयं विनोबा को भी उम्मीद नहीं थी कि कोई उनकी समस्याओं के समाधान के लिए इस तरह आगे आएगा। सभा में से एक व्यक्ति ने सौ एकड़ जमीन देने की पेशकश की। यहीं से विनोबा को मिल गया भूमिहीनों की समस्या का समाधान। देशभर में पदयात्रा कर वे और उनके अनुयायी भू-स्वामियों को भूमिहीनों के लिए जमीन का एक टुकड़ा देने के लिए प्रेरित करते रहे। स्वयं विनोबा ने खराब स्वास्थ्य के बावजूद देशभर में लगभग छह हजार किलोमीटर तक पदयात्रा की। उनके प्रयास से देशभर में भू-स्वामियों द्वारा दान की गई लाखों एकड़ जमीन एकत्र की गई और इन्हें भूमिहीनों के बीच बांटा गया।

हां, यह सच है कि जमा की गई भूमि एक हिस्सा भूमिहीनों के बीच बंट नहीं पाया। लेकिन इसके लिए विनोबा और उनके अनुयायियों को दोष देना ठीक नहीं है। इसके लिए काफी हद तक सरकार भी जिम्मेदार है, जो जमीन का सही वितरण सुनिश्चित नहीं कर पाई। जहां तक सर्वोदय आंदोलन की प्रासंगिकता की बात है तो सिर्फ इस आधार पर इसे अप्रासंगिक नहीं कहा जा सकता कि विनोबा द्वारा चलाई गई यह मुहिम आगे चलकर विफल हो गई। किसी भी आंदोलन की सफलता के लिए जरूरी है कि उसे समाज और व्यवस्था का साथ मिले। सर्वोदय आंदोलन के साथ ऐसा नहीं हो पाया। वरना इसके विचार और अवधारणा आज भी प्रासंगिक है। आवश्यकता है तो उसे सही तरीके से समझने और उस दिशा में प्रयास करने की।

आज भी देश में भूमिहीनों की एक बड़ी तादाद है। नक्सल समस्या इसकी एक बड़ी वजह है। कभी विनोबा ने कहा था कि हर बेरोजगार हाथ बंदूक पाने का हकदार है। अगर उन्हें रोजगार मिले तो वे भला बंदूक क्यों उठाएंगे? आज सरकार नक्सल समस्या से निपटने के लिए तरह-तरह की कार्य योजनाएं बना रही और उस पर करोड़ों रुपए खर्च कर रही है। लेकिन यह समस्या ही न हो, इसके लिए कोई कार्य योजना नहीं बना रही। अगर योजना बन भी रही है तो उन्हें क्रियान्वित नहीं किया जा रहा। विकास कार्य के लिए भूमि अधिग्रहण जसी समस्या का समाधान भी विनोबा के सिद्धांतों में ढूंढा जा सकता है। विशेष आर्थिक क्षेत्र या अन्य विकासात्मक कार्यो के मद्देनजर अगर किसानों को स्वेच्छा से जमीन देने के लिए प्रेरित किया जाए तो देशभर में जमीनों के अधिग्रहण के लिए हो रहा विरोध रोका जा सकता है।

सर्वोदय नहीं, भूदान विफल

(वरिष्ठ पत्रकार देवदत्त से बातचीत पर आधारित)

बाबा ने जो भूदान यज्ञ शुरू किया वह गांधी के सर्वोदय का एक हिस्साभर था, पूरा सर्वोदय नहीं।

सर्वोदय को लेकर विनोबा भावे के योगदान को जानने से पहले यह समझ लेना जरूरी है कि उन्होंने जिस सर्वोदय आंदोलन को 1950 व 1960 के दशक में आगे बढ़ाया, वह महात्मा गांधी के सर्वोदय के सिद्धांत की सोच से प्रेरित था। गांधी एक नए समाज की रचना करना चाहते थे, जिसमें वे सभी व्यक्ति का उत्थान एवं कल्याण चाहते थे। इसके लिए उन्होंने कई साधन सुझाए थे। भू-दान व ग्राम-दान उन्हीं में से एक था, जिसे लेकर विनोबा ने समाज को सुधारने की कवायद शुरू की। लेकिन 1950-60 के दशक के बाद इस आंदोलन का कोई नामलेवा नहीं रह गया। इसकी कई वजह थी। पहली तो यह कि जिस आंदोलन की शुरुआत विनोबा ने की, उससे आगे चलकर उन्होंने स्वयं ही अपने आप को अलग कर लिया। आंदोलन की विफलता का दूसरा महत्वपूर्ण कारण यह रहा कि विनोबा ने जिस भू-दान या ग्राम-दान योजना की शुरुआत की, वह गांधी के सर्वोदय का एक हिस्सामात्र था, पूरा सर्वोदय नहीं।

यहां यह जान लेना भी जरूरी है कि विनोबा अपने घर से ‘मुक्तिज् की तलाश में निकले थे, न कि किसी सामाजिक आंदोलन की मुहिम के तहत। इसी बीच, 1915-16 में वे गांधी के संपर्क में आए और उनके विचारों से प्रभावित होकर उन्होंने ‘मुक्तिज् का मार्ग छोड़ दिया। वे सार्वजनिक जीवन में उतर आए। गांधी की हत्या के बाद उन्होंने उनके विचारों को आगे बढ़ाने का प्रयास किया। लेकिन 1960 के दशक में भू-दान आंदोलन के सिलसिले में कोलकाता जाने के बाद उनका आध्यात्मिक मन एकबार फिर जागृत हुआ और उन्होंने गांधी से माफी मांगते हुए सार्वजनिक जीवन से किनारा कर लिया।

बहरहाल, विनोबा ने भू-दान व ग्राम-दान का जो आंदोलन चलाया, भूमि सुधार के संदर्भ में आज भी उसकी प्रासंगिकता है। जमीन की समस्या वास्तव में हिन्दुस्तान की समस्या है, जिसका दूसरा नाम कृषि है। 1947 में आजादी से लेकर अब तक किसी सरकार या राजनीतिक दल ने नहीं कहा कि देश कृषि प्रधान नहीं है। कृषि को यहां जीवन शैली माना गया और सरकारों की यह जिम्मेदारी तय की गई कि वह इसे सुरक्षित रखे। विनोबा के भू-दान आंदोलन ने भी इसी मुद्दे को उठाया। आगे चलकर यह योजना ग्राम-दान के रूप में तब्दील हुई। गांव को एक इकाई के रूप में देखा गया और कहा गया कि कृषि से संबंधित जो भी समस्या हो या इसके विकास की बात हो, पूरे गांव के संदर्भ में हो। आज की कृषि समस्या के संदर्भ में भी यह पूरी तरह प्रासंगिक है। इस सिद्धांत या रणनीति के तहत गांवों की रचना से देश की कई समस्याओं का समाधान हो सकता है। गांवों को एक इकाई मानकर सामाजिक सुधार की दृष्टि से भी यह फॉर्मूला प्रासंगिक है।

जहां तक मौजूदा समाज की समस्याओं की बात है तो इसके लिए सरकार जिम्मेदार है, जिसने नीतियां तो बहुत बनाई, लेकिन उन्हें क्रियान्वित नहीं किया। कृषि व भूमि की समस्या भी उन्हीं में से एक है। सरकार ने भूमि सुधार को लेकर भी नीतियां बनाई, लेकिन उन्हें क्रियान्वित नहीं किया। आज औद्योगिक विकास के लिए भूमि अधिग्रहण और देशभर में उसका विरोध इसी का परिणाम है। इसलिए यह कहना गलत है कि सर्वोदय के सिद्धांतों की आज उपयोगिता या प्रासंगिकता नहीं रह गई है। यह आज भी उतना ही प्रासंगिक है, जितना 1950-60 के दशक में था। जरूरत है तो उन्हें सही तरीके से अमल में लाने की।

इसके लिए बेहतर वातावरण पंचायती व्यवस्था में हो सकता है। लेकिन मौजूदा पंचायती व्यवस्था में नहीं। बल्कि उस पंचायती व्यवस्था में, जहां शक्तियां नीचे से ऊपर तक जाती हों, न कि ऊपर से नीचे आती हों। मौजूदा व्यवस्था में पंचायतों को जो भी शक्तियां मिली हुई हैं, उनका स्रोत कें्र है। यानी कें्र से राज्य सरकारों को और फिर राज्य सरकारों से पंचायतों को शक्तियां मिलती हैं। ऐसे में पंचायतों के कार्य व निर्णय लेने की क्षमता प्रभावित होती है और सत्ता के समुचित विकें्रीकरण का जो सपना महात्मा गांधी ने देखा था, वह पूरा नहीं हो पाता।

अब अगर विनोबा द्वारा शुरू किए सर्वोदय आंदोलन की विफलता की बात की जाए तो सबसे पहले यह स्पष्ट कर देना जरूरी है कि विनोबा द्वारा शुरू किया आंदोलन वास्तव में सर्वोदय आंदोलन था ही नहीं। यह भूमि सुधार आंदोलन था, जो भू-दान आंदोलन के नाम से प्रचलित हुआ। यह सर्वोदय का एक हिस्सामात्र था, पूरा सर्वोदय नहीं। फिर गांधी ने जिस सर्वोदय का विचार दिया था, वह समाज सुधार की बात नहीं करता, बल्कि इसके समानांतर एक नए समाज के निर्माण की बात करता है; जबकि विनोबा ने सर्वोदय के लिए आवश्यक एक सिद्धांत को अमल में लाकर सामाजिक सुधार की कवायद शुरू की थी। इसलिए यहां गांधी के सर्वोदय का सिद्धांत विफल नहीं हुआ, बल्कि भू-दान आंदोलन विफल हो गया। आंदोलन की विफलता का एक अहम कारण यह भी है कि विनोबा ने आगे चलकर इससे खुद को अलग कर लिया और इसमें सरकार को शामिल कर लिया। भूमि सुधार को लेकर कानून बनाने की जिम्मेदारी सरकार को सौंपकर आंदोलनकारियों ने सरकार के समक्ष लगभग घुटने टेक दिए।

विनोबा ने ‘सभय भूमि गोपाल कीज् का नारा दिया था। उन्होंने जमीन पर लोगों के मालिकाना हक को स्वीकार किया, लेकिन इसका इस्तेमाल समाज द्वारा करने की बात कही। पूंजीवादी एवं समाजवादी व्यवस्था से अलग उन्होंने ट्रस्टीशिप व्यवस्था में यकीन जताया और हृदय परिवर्तन के माध्यम से भूमि सुधार लागू करने की कवायद शुरू की। लेकिन आंदोलनकारियों द्वारा सरकार के समक्ष घुटने टेकने के बाद सब वहीं समाप्त हो गया। हालांकि आज भी भूमि सुधार की बात उठती है। राजनीतिक दलों से लेकर विभिन्न संगठनों के कार्यकर्ता भी किसान हितैषी होने की बात करते हैं। औद्योगिक विकास के लिए अगर कहीं जमीन का अधिग्रहण हो रहा है और किसान उसका विरोध कर रहे हैं तो उनके साथ खड़े होने के लिए राजनीतिक दलों से लेकर तमाम संगठनों के कार्यकर्ता भी आ जाते हैं। लेकिन वास्तव में वे किसानों के हितैषी नहीं, बल्कि प्रबंधात्म लोग हैं।







अब पैमाना योग्यता नहीं

शिक्षा में आई गिरावट और शिक्षक एवं छात्रों के बीच मौजूदा दौर में सम्बन्ध पर दिल्ली विश्वविद्द्यालय के सेवानिवृत प्रोफ़ेसर मुरली मनोहर प्रसाद सिंह से बातचीत पर आधारित आलेख.

शिक्षक दिवस सिर्फ भारत में नहीं मनाया जाता, बल्कि दुनियाभर में मनाया जाता है। हां, दुनिया के विभिन्न देशों में इसकी तिथि अलग-अलग जरूर है। हमारे यहां हर साल यह पांच सितंबर को मनाया जाता है। देश के पहले उप राष्ट्रपति व दूसरे राष्ट्रपति डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन के जन्मदिन पर इसे मनाने की परंपरा है, जिनकी गिनती महान दार्शनिक व शिक्षाविदों में होती है। समाज निर्माण में शिक्षकों की अहम भूमिका अतीत काल से है। आज भी शिक्षकों की भूमिका का महत्व कम नहीं हुआ है। हां, परिस्थितियां और हालात कुछ ऐसे हो गए हैं, जिसके कारण गुरु-शिष्य संबंध परंपरागत नहीं रह गए हैं। उसमें काफी बदलाव आया है।

यह सच है कि शिक्षकों और छात्रों का संबंध पहले जसा नहीं रह गया है। छात्रों के मन में शिक्षकों के लिए पहले जसा सम्मान नहीं रह गया है और न ही अब शिक्षक छात्र हितों की बात करते हैं। शिक्षक हों या छात्र, अपने-अपने हितों की बात ही उठाते हैं। इसकी बहुत बड़ी वजह यह है कि शिक्षकों की जो भर्ती हो रही है, उसका एकमात्र पैमाना योग्यता नहीं रह गया है। शिक्षकों की नियुक्ति अब जोड़तोड़ और तिकड़मों से होने लगी है। हालांकि सभी नियुक्तियों का आधार यही नहीं होता, लेकिन ज्यादातर भर्तियां इसी तरीके से होती हैं। ऐसे में वे लोग, जिनके पास सिर्फ योग्यता है, कहीं पीछे छूट जाते हैं। इसका असर स्कूल-कॉलेजों में पढ़ाई और शिक्षक-छात्र संबंध पर भी होता है। जाहिर है, जब शिक्षक ही योग्य नहीं होंगे तो वे छात्रों को कैसे उचित शिक्षा दे पाएंगे? इससे शिक्षा का स्तर तो गिरेगा ही। और अगर शिक्षक उचित शिक्षा नहीं दे रहे, तो छात्र उनका सम्मान क्यों करने लगे?

ऐसे में अगर छात्र अपनी राह और शिक्षक अपनी राह चल रहे हैं, तो इसमें आश्चर्यजनक कुछ भी नहीं। हां, योग्य शिक्षकों और छात्रों के बीच संबंध आज भी बेहतर होते हैं। लेकिन विडंबना यह है कि योग्य युवा शिक्षा के क्षेत्र में आना ही नहीं चाहते। इसका बड़ा कारण शिक्षकों का वेतन कम होना है। वैश्वीकरण और उदारीकरण के युग में जहां बहुराष्ट्रीय कंपनियां प्रोफेशनल्स को मोटा वेतन दे रहे हैं, वहां भला कौन युवा कम वेतन लेकर शिक्षा को अपने कॅरियर के रूप में अपनाना चाहेगा?

शिक्षा के गिरते स्तर के लिए सरकारी नीतियां भी कम जिम्मेदार नहीं हैं। सरकार साक्षरता दर बढ़ाने पर जोर दे रही है, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा पर नहीं। ब्रेन ड्रेन को रोकने के लिए सरकार कोई कदम नहीं उठा रही। युवाओं का एक बड़ा वर्ग देश में शिक्षा प्राप्त करके नौकरी के लिए विदेशों का रुख कर लेता है, क्योंकि वहां उन्हें वेतन और अन्य सुविधाएं यहां से बेहतर मिलती हैं। आखिर यही चीजें उन्हें यहां क्यों नहीं दी जा सकती? मैनेजमेंट गुरू और कुकुरमुत्ते की तरह उग आए संस्थानों और इसके शिक्षकों के संबंध में केवल इतना कहा जा सकता है कि ये दुकानें हैं, वास्तविक गुरु नहीं। गुरु-शिष्य परंपरा से इनका कोई लेना-देना नहीं है।

जहां तक आज छात्राओं द्वारा शिक्षकों पर लगाए जाने वाले यौन शोषण के आरोप की बात है तो यह निश्चित रूप से चिंताजनक है। ऐसे आरोप शोधार्थी छात्राओं के संदर्भ में अधिक प्रासंगिक हैं और निश्चित रूप से गुरु-शिष्य संबंध को लज्जित करते हैं। कई बार इसके लिए दोनों पक्ष जिम्मेदार होते हैं। बहुत से मामले ऐसे भी होते हैं, जहां छात्राएं नैतिकता को परे रखकर अपने कॅरियर को ध्यान में रखते हुए शिक्षकों के आगे समर्पण कर देती हैं। लेकिन मूल रूप से इसके लिए वे नियम जिम्मेदार हैं, जिसकी वजह से शिक्षकों को ऐसा अधिकार मिल जाता है कि वे छात्राओं को अपने इशारे पर नचा सकें। अगर छात्राओं को यह भरोसा हो जाए कि शिक्षक उनका कुछ नहीं बिगाड़ सकते तो वे कभी उनके आगे समर्पण नहीं करेंगी। इस संबंध में नियम व नीतियां बदलने की जरूरत है।

हरेराम जयराम

पहले किसी उद्योग लगाने के लिए पर्यावरण मंत्रालय की स्वीकृति लेना महज औपचारिकता हुआ करती थी। लेकिन अब ऐसा नहीं है। वेदांता जसी कंपनी को उड़ीसा में बॉक्साइट खनन की अनुमति देने से पर्यावरण मंत्रालय ने मना कर दिया। इस हिसाब से देखें तो शेषन के पहले तक जो चुनाव आयोग की हैसियत हुआ करती थी, वही पर्यावरण मंत्रालय की जयराम रमेश के मंत्री बनने से पहले थी। माना जाता है कि रमेश को इस प्रकार के बड़े फैसले लेने की ताकत ऊपर से मिली है। राहुल गांधी के वे करीबी हैं, यह कोई दबी-छिपी बात नहीं है। रमेश की खास बात और भी है। वे काफी पढ़े-लिखे जहीन व्यक्ति हैं। अपनी बात खुलकर कहते हैं। इससे कई बार पार्टी और सरकार को भी बगलें झांकने पर मजबूर कर देते हैं। अपनी ही सरकार के दूसरे मंत्रालयों को भी पर्यावरण के मानकों पर कसते रहते हैं। फिर भी सबसे खास यही है कि वे एक ऐसे पर्यावरण मंत्री हैं, जिनके फैसलों से पर्यावरणवादी और प्रेमी गदगद हैं।



पर्यावरण मंत्रालय की छवि वैसी पहले कभी नहीं थी, जसी आज है। औद्योगिक इकाइयों को किसी परियोजना के लिए पर्यावरण मंत्रालय से स्वीकृति लेने में कभी कोई खास दिक्कत पेश नहीं आई। लेकिन हाल के दिनों में हालात बदले हैं। पर्यावरण मंत्रालय पहले की तुलना में अधिक सक्रिय नजर आता है और यह सब संभव हुआ है पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश के कारण। हालांकि उनकी गिनती नव पूंजीवाद और उदारीकरण की नीति के समर्थकों में होती रही है। लेकिन हाल के दिनों में उन्होंने कुछ ऐसे फैसले लिए हैं, जो उनकी आर्थिक विचारधारा के ठीक उलट है; चाहे वह बीटी बैंगन को कृषि जगत में नहीं उतारने का फैसला हो या निजी कंपनी वेदांता को उड़ीसा में बॉक्साइट खनन की अनुमति नहीं देने का फैसला। इन फैसलों से उन्होंने भले ही औद्योगिक घरानों को नाराज किया हो और लोग उन्हें विकास विरोधी कह रहे हों, लेकिन पर्यावरण प्रेमी उनके इन निर्णयों पर वाह-वाह कर रहे हैं।

वेदांता, जो उड़ीस के लांजीगढ़ में बड़े पैमाने पर बॉक्साइट खनन करना चाहती थी, को इसकी अनुमति न देने का आधार वन संरक्षण अधिनियम, 1980 और वन अधिकार अधिनियम, 2006 को बनाया गया। पर्यावरण मंत्री ने दो टूक कहा कि सरकार अधिनियम की शर्तो का उल्लंघन बिल्कुल बर्दाश्त नहीं करेगी और न ही विकास के लिए आदिवासियों के हितों से समझौता किया जाएगा। उल्लेखनीय है कि इलाके की डोंगरिया कोंड जनजाति ने वेदांता की परियोजना के संदर्भ में अपने हितों को लेकर सवाल उठाए थे। जयराम रमेश के इस फैसले को कांग्रेस महासचिव राहुल गांधी का भी समर्थन मिला, जब उन्होंने उड़ीसा के कालाहांडी में आदिवासियों के बीच जाकर उनके हितों की बात उठाई और कहा कि वे दिल्ली में उनके सिपाही हैं उनकी बातें उठाने के लिए। उनके कुछ अन्य फैसलों को भी राहुल गांधी का समर्थन मिल चुका है, जिनमें नदियों को जोड़ने की महत्वाकांक्षी परियोजना का विरोध भी शामिल है, जिसका समर्थन स्वयं देश के तकनीक प्रेमी राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम और सुप्रीम कोर्ट ने भी किया था। राहुल गांधी के समर्थन से खासतौर पर कांग्रेसी खेमे में उनका पक्ष अक्सर मजबूत हुआ और उन पर उंगली उठाने वाले शांत हो गए।

लेकिन यह भी सच है कि अपने विवादास्पद बयानों से उन्होंने कई बार पार्टी और सरकार के लिए मुश्किल खड़ी की। कुछ माह पहले चीन को लेकर दिए गए उनके बयान ने भी सरकार के लिए सिरदर्दी पैदा की। उन्होंने देश के गृह व रक्षा मंत्रालय को चीन के लिए डरावना बताया और यहां तक कह दिया कि भारतीय क्षेत्र में चीनी व्यवसायियों को सरकार अक्सर संदेह की नजर से देखती है। उनके इस बयान से सरकार की खूब किरकिरी हुई। विपक्ष ने उन्हें चीन का एजेंट तक कह दिया और कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी इस कदर नाराज हुईं कि उन्होंने जयराम से मिलने तक से इनकार कर दिया। एक अन्य समारोह में देश के शहरों को दुनिया के सबसे गंदे शहरों में शुमार करते हुए उन्होंने कहा कि यदि गंदगी के लिए नोबल पुरस्कार दिया जाए तो यह भारत को ही मिलेगा। भोपाल में यूनियन कार्बाइड कंपनी से हुए गैस रिसाव के पीड़ितों को उन्होंने कंपनी परिसर में पहुंचकर और वहां से हाथ में मिट्टी उठाकर यह कहते हुए नाराज कर दिया कि देखिये, यह मेरे हाथ में है, फिर भी मैं जिंदा हूं। भोपाल में ही इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ फॉरेस्ट मैनेजमेंट के दीक्षांत समारोह में गाउन को उपनिवेशवाद का प्रतीक बताते हुए उन्होंने इसे उतार फेंका और सादे लिबास में डिग्री लेने और देने की वकालत की। उनका यह बयान भी सुर्खियों में रहा। खासकर छात्रों की तालियां उन्हें खूब मिली।

कोपेनहेगन में जयवायु परिवर्तन पर सम्मेलन के दौरान उनके इस बयान ने प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह तक को नाराज कर दिया कि भारत चीन के बराबर कार्बन उत्सर्जन कम करेगा। हालांकि बाद में उन्होंने यह कहकर सरकार और विपक्ष की नाराजगी कम करने का प्रयास किया कि भारत कार्बन उत्सर्जन पर किसी कानूनी बाध्यता को नहीं मानेगा। इससे पहले यूपीए सरकार के पहले कार्यकाल में प्रधानमंत्री के ब्राजील दौरे से ठीक पहले उन्होंने यह कहकर विदेश मंत्रालय के लिए मुश्किल खड़ी कर दी कि आखिर ऐसे देश से व्यापार समझौते की क्या उपयोगिता है, जो हमसे काफी दूर है। उन्होंने यह कहकर नर्मदा नदी पर महेश्वर बांध के निर्माण के लिए चल रहा काम भी रोक दिया कि विस्थापित परिवारों का पुनर्वास नहीं हुआ है। फिर, सड़क एवं परिवहन मंत्री कमलनाथ के साथ उनके विरोध जगजाहिर रहे हैं। कमलनाथ अक्सर उन पर पर्यावरण क्लीयरेंस को आधार बनाकर सड़क परियोजनाओं में अड़ंगा डालने का आरोप लगाते रहे हैं। इसी तरह, कभी कोका कोला कंपनी के पर्यावरण संबंधी सलाहकार बोर्ड में शामिल रहे रमेश ने यह जानने के बाद अपने पद से इस्तीफा दे दिया कि यह पर्यावरण के लिए खतरनाक है और इससे पानी की समस्या पैदा हो सकती है।

कुल मिलाकार, उनकी कार्यशैली अक्सर मंत्रियों की तरह न होकर कार्यकर्ताओं और संगठनों की तरह रही है। यही वजह है कि मैगसाय साय पुरस्कार विजेता संदीप पांडे उनके बारे में कहते हैं कि देश को पहली बार स्वतंत्र सोच वाला पर्यावरण मंत्री मिला है या यूं कह लें कि पहली बार कोई पर्यावरणवादी मंत्री बना है। बीटी बैंगन को कृषि जगत में उतारने का फैसला लेने से पहले उन्होंने दफ्तर में बैठकर अधिकारियों से मंत्रणा करने से बेहतर देशभर का भ्रमण करना और किसानों, कृषि वैज्ञानिकों व पर्यावरणविदों की राय लेना समझा। परंपरा से हटकर सात शहरों- कोलकाता, भुवनेश्वर, अहमदाबाद, हैदराबाद, बेंगलुरु, नागपुर, चंडीगढ़- का भ्रमण करने और वहां जनसभाओं के माध्यम से लोगों का मत जानने के बाद उन्होंने फौरी तौर पर इसे कृषि जगत में उतारने पर रोक लगा दी। हालांकि कभी इसका विरोध करने वालों को उन्होंने ‘मानसिक इलाजज् की सलाह तक दे डाली थी। पर्यावरण चिंताओं का हवाला देकर उन्होंने महाराष्ट्र के नवी मुंबई में बन रहे राज्य के दूसरे हवाई अड्डे पर भी सवाल उठाए थे और कहा था कि इससे चार सौ एकड़ में फैले वन क्षेत्र व मैंग्रोव पर असर पड़ेगा, जो मुंबई के सम्रु तटों की रक्षा करते हैं। यह रमेश की आपत्ति ही थी कि नागरिक उड्डयन मंत्री प्रफुल्ल पटेल ने कहा कि हवाई अड्डे के निर्माणर में पर्यावरण सुरक्षा का पूरा खयाल रखा जाएगा। अब प्रस्तावित हवाई अड्डे का दायरा कम करने से लेकर इसे दूसरी जगह स्थानांतरित करने तक पर विचार किया जा रहा है।

कर्नाटक के चिकमगलूर में नौ अप्रैल, 1954 को जन्मे रमेश तकनीक व आधुनिकीकरण के हिमायती हैं। इसकी वजह शायद उनकी शिक्षा-दीक्षा और पारिवारिक पृष्ठभूमि रही है। उनके पिता प्रो. सीके रमेश आईआईटी, बॉम्बे के सिविल इंजीनियरिंग डिपार्टमेंट के विभागाध्यक्ष थे। तीसरी से पांचवीं की स्कूली शिक्षा उन्होंने रांची के सेंट जेवियर स्कूल से पूरी की। 1970 में उन्होंने आईआईटी, बॉम्बे में दाखिला लिया और वहां से मैकेनिकल इंजीनियरिंग में बीटेक किया। 1975-77 में उन्होंने अमेरिका के कार्नेगी यूनिवर्सिटी से प्रबंधन और लोक नीति में मास्टर डिग्री ली। पढ़ाई खत्म करने के बाद वे विश्व बैंक से जुड़े। दिसंबर, 1979 में वे भारत लौटे और यहां योजना आयोग सहित कें्र सरकार के उद्योग व आर्थिक विभाग से संबंधित विभिन्न संस्थाओं में महत्वपूर्ण जिम्मेदारी निभाई। वे 1991 में पीवी नरसिम्हा राव सरकार में वित्त मंत्री मनमोहन सिंह के सलाहकार भी रहे। वे राजीव गांधी के भी करीबी रहे। 1989 में जब कांग्रेस चुनाव हार हार गई थी, तो कांग्रेस के पुनर्जीवन के लिए उन्होंने राजीव गांधी के सलाहकार की भूमिका निभाई थी। आज उसी भूमिका में वे सोनिया गांधी के साथ हैं। रमेश आंध्र प्रदेश से राज्य सभा के सदस्य हैं। उनकी मातृभाषा तेलुगू है। कर्नाटक संगीत और भरतनाट्यम में उन्हें खासी दिलचस्पी है। वे चीन के साथ भारत के अच्छे संबंधों के पैरोकार रहे हैं।

पर्यावरण से उन्हें नौ साल की उम्र से ही प्यार है, जब उन्होंने ब्रिटिश लेखक एडवर्ड प्रिचार्ड गी की पुस्तक ‘द वाइल्ड लाइफ ऑफ इंडियाज् पढ़ी। पर्यावरण से इस विशेष लगाव की वजह से ही शायद यूपीए सरकार के दूसरे कार्यकाल में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और यूपीए अध्यक्ष सोनिया गांधी ने वन एवं पर्यावरण मंत्रालय की जिम्मेदारी के लिए उन्हें चुना। वे राष्ट्रीय सलाहकार परिषद के सदस्य भी हैं। इससे पहले की यूपीए सरकार में वे वाणिज्य व उद्योग मंत्रालय में राज्य मंत्री रह चुके हैं।