मंगलवार, 6 अप्रैल 2010

करोड़ों में माया!


मायावती ने एक हजार के नोटों की माला क्या पहन ली, राजनीतिक भूचाल आ गया। उसे ठंडा करने के लिए उन्होंने फिर थोड़ी कम राशि की माला पहन ली। मायावती की कार्यशैली यही है। वे ऐसे कारनामों से विपक्ष-मीडिया और तमाम विरोधियों का दिल जलाकर अपने समर्थकों में खुशी पैदा करती हैं। वे कुछ करें न करें, उनके समर्थक उनके साथ हैं। लोग उन्हें दौलत की बेटी कहें, अभी फिलहाल उन्हें दलित अपनी बेटी ही मानते हैं। माया जसी राजनेता लाखों में नहीं, करोड़ों में एक हैं।

मायावती, उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री। देश की पहली ‘अछूतज् महिला मुख्यमंत्री। दलितों की मसीहा। उनकी बेटी। एक ऐसी बेटी, जो सदियों से उनका दमन व शोषण करने वालों का लगातार मान-मर्दन कर रही है। इससे भले उन्हें कुछ मिले न मिले संतोष जरूर मिलता है। दलितों के बीच यही है उनकी पहचान। यह अलग बात है कि विरोधी उन्हें दलित की नहीं, ‘दौलत की बेटीज् कहते हैं। लेकिन विरोधियों की परवाह उन्हें कब रही है?
माया का हर कदम तो बस अपने दलित वोट बैंक को लुभाने के लिए होता है, क्योंकि माया जब हीरे के जेवरात से लकदक अपना जन्मदिन मनाती हैं, केक काटती हैं तो इन सब से सदियों से वंचित दलित खुद को उनकी जगह महसूस करते हैं। उन्हें संतोष होता है कि चलो, सदियों बाद ही सही, हम सब न सही, माया ही सही, कोई तो है हमारे बीच का जो खुलेआम आज समाज की अगड़ी जातियों को चुनौती दे रहा है; उन्हीं सुविधाओं का उपभोग कर रहा है, जो कुछ साल पहले तक केवल अगड़ी जातियों की बपौती थे और जिनके उपभोग का सपनाभर देखकर वे संतोष कर लेते थे।
माया दलितों में इस संतोष की अनुभूति को बखूबी जनती हैं और इसलिए विरोधी लाख गला फाड़ते रहें, वे उन्हें हर बार ठेंगा दिखाती रहती हैं। पिछले सप्ताह दो-दो बार नोटों की माला पहनकर उन्होंने एकबार फिर ऐसा ही किया। अब माया के खिलाफ संसद में हंगामा होता है तो होता रहे, आयकर विभाग की जांच होती है तो होती रहे, उनका दलित वोट बैंक तो सुरक्षित है। शायद यही वजह रही कि पहली बार हजार-हजार के नोटों की माला पहनने के बाद जब विरोधियों ने हंगामा बरपाया तो उसकी परवाह न करते हुए माया ने दो दिन बाद ही फिर नोटों की माला पहन ली। माया का यह कदम विरोधियों को मानो चुनौती थी, ‘कर लो, जो करना है।ज्
मायावती आजाद भारत में दलित राजनीति की आइकॉन हैं, लेकिन उतनी ही विवादास्पद। कभी उन पर सरकारी पैसे के दुरुपयोग का तो कभी आय से अधिक संपत्ति अर्जित करने का आरोप लगा। ताज कोरिडोर मामले में घोटाले का आरोप भी उन पर लगा। यह भी कहा गया कि ‘यमुना एक्सप्रेस वेज् के लिए उनकी सरकार ने करीब नौ हजार किसानों की भूमि जबरन ली। वे मौका मिलने पर विरोधियों को सबक सिखाने से भी नहीं चूकतीं। सत्ता मिली तो उन्होंने मुलायम सिंह सरकार के कार्यकाल में भर्ती हुए करीब 18 हजार पुलिस कर्मियों को अनियमितता का आरोप लगाकर बर्खास्त कर दिया। अधिकारियों का स्थानांतरण और उनके खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई भी माया खूब करती हैं।
मायावती की राजनीतिक सक्रियता से निश्चय ही दलितों के हौसले बुलंद हुए। उत्तर प्रदेश में उन्हें सत्ता मिलने के बाद दलितों की स्थिति में सुधार की उम्मीद भी की गई, लेकिन जमीनी स्तर पर वे आज भी अपने सामाजिक-आर्थिक उद्धार की बाट जोह रहे हैं। हां, वे विरोधियों से एक बड़ा वोट बैंक जरूर छीन ले गईं। माया का खौफ ही है कि आज कांग्रेस के ‘युवराजज् से लेकर भाजपा अध्यक्ष तक दलितों के घर भोजन करने, उन्हें गले लगाने जब-तब उनके घर पहुंच जाते हैं और दलित बेचारे इसी में खुश।
माया की राजनीति का आधार बाबा साहब भीमराव आम्बेडकर का दलितों के उत्थान के लिए वह फार्मूला है कि राजनीतिक ताकत हासिल किए बगैर वास्तव में समाज के इस शोषित/वंचित वर्ग का कल्याण संभव नहीं है। इसलिए सत्ता के लिए उन्हें न तो ‘मनुवादियोंज् से हाथ मिलाने से परहेज रहा और न ही ‘समाजवादियोंज् से। वे बार-बार दलितों के बीच बाबा साहब के इस फॉर्मूले को दोहराती हैं और उन्हें बताती हैं कि सत्ता हासिल करने के लिए वे जो भी तरीका अपनाती हैं, गलत नहीं है। लेकिन येन-केन-प्रकारेण उनके सत्ता हासिल करने के बाद भी दलितों की सामाजिक-आर्थिक स्थिति पहले से बहुत बेहतर नहीं है। हां, सत्ता हासिल करने के बाद मायावती ने उत्तर प्रदेश में जगह-जगह दलित उद्धारकों के नाम पर करोड़ों की लागत से पार्क और उनकी मूर्तियां जरूर लगवाईं और इन की सुरक्षा के लिए उन्होंने विशेष पुलिस बल का गठन भी किया है। इस कड़ी में उन्होंने खुद को भी नहीं छोड़ा। इस मामले में उन्हें सुप्रीम कोर्ट से नोटिस तक मिल चुका है।
इस सबके बावजूद मायावती अपने समर्थकों में खासी लोकप्रिय हैं। समर्थकों के बीच उनकी लोकप्रियता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि एक कार्यकर्ता ने उन्हें इसी साल जनवरी में उनके जन्मदिन पर चांद पर जमीन उपहारस्वरूप भेंट की। वे अपने समर्थकों से साफ कहती भी हैं कि उन्हें उपहारस्वरूप रुपए, पैसे, जेवरात और कीमती सामान ही दिए जाएं, फूलों का गुलदस्ता या सिर्फ शुभकामनाएं नहीं।
पं्रह जनवरी, 1956 को उत्तर प्रदेश के रामपुर में हिन्दू जाटव (चमार) बिरादरी में पैदा हुईं मायावती एक दिन प्रदेश की मुख्यमंत्री बनेंगी, ऐसा किसी ने नहीं सोचा था। हां, पिता प्रभु दास संचार विभाग में क्लर्क थे, इसलिए एक आम दलित परिवार से उलट बेटी की पढ़ाई-लिखाई को लेकर सचेत जरूर थे। दिल्ली के कालिंदी कॉलेज से कानून और बाद में शिक्षा की डिग्री लेने के बाद मायावती दिल्ली के एक स्कूल में प्राध्यापिका बन गईं। हालांकि इस बीच वे प्रशासनिक सेवा की परीक्षा की तैयारी में भी जुटी रहीं, कलेक्टर बनने के लिए। लेकिन इसी दौरान बसपा सुप्रीमो कांशीराम से उनकी मुलाकात हुई और यही से बदल गई उनके जीवन की दिशा। माया को राजनीति में आने देने के लिए उन्होंने बड़ी मुश्किल से उनके पिता को यह कहकर मनाया कि यह रानी बनेगी, जो कई कलेक्टरों के भाग्य निर्धारित करेगी। सच माया यही कर भी रही हैं। सत्ता में रहते उन्होंने कलेक्टरों को कभी चैन से नहीं रहने दिया। स्थानांतरण और अनुशासनात्मक कार्रवाई की तलवार हमेशा उन पर लटकाए रखी।
कांशीराम ने पहली बार माया को 1984 में मुजफ्फरनगर जिले की कैराना लोकसभा सीट से मैदान में उतारा, हालांकि वे चुनाव हार गईं। 1989 में वे पहली बार बिजनौर से लोकसभा चुनाव जीतीं। 1995 में वे पहली बार समाजवादी पार्टी के सहयोग से उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री बनीं। 1997 में दूसरी बार और 2002-03 में तीसरी बार भाजपा के सहयोग से मुख्यमंत्री बनीं। हालांकि उनका तीनों कार्यकाल काफी छोटा रहा। लेकिन 2007 के विधानसभा चुनाव में मायावती एक नया सामाजिक फार्मूला अपनाते हुए दलितों के साथ-साथ ब्राह्मणों व अगड़ी जाति के लोगों को भी लेकर चुनाव मैदान में उतरीं और भारी बहुमत से जीतकर सत्ता में आईं। सत्ता प्राप्ति के बाद उन्होंने उत्तर प्रदेश को ‘उत्तम प्रदेशज् बनाने की बात कही। लेकिन यह भी सच है कि प्रदेश रुपयों को विकास कार्यो पर खर्च करने से उत्तम बनेगा, न कि माया द्वारा उनकी माला पहनने से।

2 टिप्पणियाँ:

abhinaw ने कहा…

badhai.......achchha laga

श्रीश पाठक 'प्रखर' ने कहा…

आलेख प्रशंसनीय है..यकीनन..!