सोमवार, 12 अप्रैल 2010

सिर्फ भुट्टो नहीं फातिमा



भारत में जसे नेहरू-गांधी परिवार वैसे ही पाकिस्तान में भुट्टो परिवार। वहां की सियासत और सत्ता के बड़े दावेदार। लेकिन बेनजीर की भतीजी फातिमा परिवार की लीक से अलग हैं। वे सिर्फ भुट्टो नहीं हैं। और न वे भुट्टो होने को कोई खास अहमियत देती हैं। वे वंशवाद के खिलाफ हैं। उनकी लोकप्रियता उनके भुट्टो होने से नहीं, बल्कि एक जहीन लेखिका होने से है। कभी सबसे प्रिय फूफी रहीं बेनजीर से उनकी दूरी बढ़ गई। पुलिस ने उनके पिता मुर्तजा को गोलियों से भून दिया। तीन पुस्तकों की यह सत्ताइस वर्षीया लेखिका अपनी नई पुस्तक में जरदारी पर पिता की मृत्यु का इल्जाम लगाती हैं और बेनजीर पर बतौर प्रधानमंत्री अपराधियों को बचाने का। भारत-पाक संबंधों में घनिष्ठता की पैरोकार फातिमा यूं तो राजनीति से दूर हैं, लेकिन उनकी समझदारी, लोकप्रियता और उनके जुझारू तेवर उन्हें निकट भविष्य में राजनीति की मुख्यधारा में ले आएं तो इस पर ताज्जुब नहीं होना चाहिए।



फातिमा भुट्टो पाकिस्तान की पूर्व प्रधानमंत्री बेनजीर भुट्टो की भतीजी हैं। उनके भाई मुर्तजा भुट्टो की बेटी, जो अपने पिता से बेइंतहां मोहब्बत करती हैं। लेकिन इससे भी अलग भी है उनकी एक पहचान, जो किसी की भतीजी या किसी की बेटी होने की मोहताज नहीं। यह पहचान है उनकी लेखिका के रूप में, जो सिर्फ 27 साल की उम्र में तीन किताबें लिख चुकी हैं और निरंतर विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में कॉलम लेखिका के रूप में सक्रिय हैं। एक ऐसी युवा लेखिका, जो विभिन्न विषयों पर बेबाक राय रखती हैं। वे भारत-पाक के बीच बेहतर रिश्तों की पैरोकार हैं। उन्हें दोनों देश सहोदरों से लगते हैं।

पाकिस्तान के सामाजिक-राजनीतिक हालात वे बेखौफ होकर चर्चा करती हैं, राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी अक्सर उनके निशाने पर होते हैं, लेकिन वे राजनीति से दूरी बनाए रखना चाहती हैं। वे कहती हैं कि यहां हालात रहने लायक नहीं रह गए हैं। यहां रहना किसी खतरे से कम नहीं है, जिसे कराची में रहते हुए वे अक्सर महसूस करती हैं। वे तकरीबन रोज उस रास्ते से गुजरती हैं, जहां उनके पिता को पुलिस ने 1996 में गोलियों से भून डाला था, जब पाकिस्तान की प्रधानमंत्री उनकी बुआ बेनजीर थीं। पिता की हत्या के लिए फातिमा खुलकर बेनजीर और उनके पति आसिफ अली जरदारी को जिम्मेदार ठहराती हैं।

पिता की हत्या के बाद फातिमा बेनजीर से कभी नहीं मिलीं, लेकिन उनकी तुलना अक्सर बुआ से होती रही। फातिमा काफी हद तक वैसी ही दिखती हैं, जसी इस उम्र में बेनजीर दिखती थीं। देश-विदेश में उनकी लोकप्रियता भी बिल्कुल वैसी ही है, जसी बेनजीर की थी। खूबसूरती और ग्लैमर के मामले में भी दोनों काफी करीब दिखती हैं। फातिमा बचपन से ही अपने और बुआ के बीच समानता की ऐसी बातें सुनती आ रही हैं, जो उन्हें कभी पसंद नहीं आई। पिता की हत्या के बाद बेनजीर के लिए मन में नफरत और बढ़ गई, जो दिसंबर, 2007 में उनकी मौत के बाद ही खत्म हुई।

हाल ही में उनकी तीसरी किताब ‘द सांग ऑफ ब्लड एंड सोर्डज् आई है, जिसमें उन्होंने भुट्टो परिवार की चर्चा एक ऐसे सामंती परिवार के रूप में की है, जो ब्रिटिश शासन से आजादी के बाद पाकिस्तान में सत्ता का एक प्रमुख कें्र बन बैठा। लेकिन इस परिवार की चार पीढ़ियों को इसकी बड़ी कीमत चुकानी पड़ी। पिछले चार दशक में तकरीबन हर दशक में इस परिवार ने एक सदस्य को खोया। फातिमा के दादा जुल्फिकार अली भुट्टो जनरल जिया उल हक क शासनकाल में 1979 में फांसी पर लटका दिए गए। जुलाई, 1985 में फातिमा के चाचा शाहनवाज की संदिग्ध पिरिस्थितियों में मौत गई। 20 सितंबर, 1996 को फातिमा के पिता मुर्तजा भुट्टो की पुलिस ने गोली मार कर हत्या कर दी और 27 दिसंबर, 2007 को बेनजीर भी खूनी हिंसा का शिकार हो गईं। इससे पहले ‘व्हिस्पर्स ऑफ डेजर्टज् नाम से उनका एक कविता संग्रह आ चुका है। दूसरी पुस्तक उन्होंने अक्टूबर 2005 में आए भीषण भूकंप पर लिखी है, जिसने इस्लामाबाद से कश्मीर घाटी तक को हिलाकर रख दिया था। पुस्तक का शीर्षक ही उन्होंने ‘8:50ए एम, 8 अक्टूबर 2005ज् दिया है।

इस खूबसूरत युवा लेखिका की आस्था लोकतंत्र में है, लेकिन वे बेनजीर की चुनी हुई सरकार को सैनिक शासन से कम भयावह नहीं मानतीं। वे सवाल करती हैं कि जो सरकार ‘ऑपरेशन क्लीन अपज् के नाम पर तीन हजार लोगों को मरवा दे, वह सैनिक शासन से बेहतर कैसे हो सकती है? वे मीडिया में बेनजीर की तुलना इंदिरा गांधी से किए जाने का भी खंडन करती हैं और साफ कहती हैं कि बेनजीर गांधी नहीं थीं। वे वंशवाद के सख्त खिलाफ हैं और कहती हैं कि उनका नाम किसी भी चीज के लिए उनकी योग्यता को साबित नहीं करता।

बड़ी बेबाकी से वे कहती हैं कि पाकिस्तान में इन दिनों कई तरह की राजनीति चल रही है- सामंती राजनीति, अल्पतंत्र की राजनीति, सैन्य राजनीति और अमेरिकी आदेश पर चलने वाली राजनीति। इसी पर आज पाकिस्तान का शासन चल रहा है और पाकिस्तान की सामाजिक-राजनीतिक दुर्दशा का कारण भी यही है। पाकिस्तान के राजनीतिक संकट का एक बड़ा कारण वे यह भी मानती हैं कि आजादी के बाद से सत्ता वहां कभी सैनिक शासन तो कभी भुट्टो परिवार और फिर नवाज शरीफ के हाथों में घूमती रही, जिसे बदलने की जरूरत है।

पाकिस्तान में हालात सुधारने के लिए वे सबसे पहले ‘राष्ट्रीय मेलमिलाप अध्यादेशज् को समाप्त करना जरूरी बताती हैं, जो भ्रष्ट नेताओं के लिए सत्ता का मार्ग प्रशस्त करती है। यहां भी उनका इशारा सीधे और साफ तौर पर जरदारी की तरफ है। इसी तरह वे हदूद अध्यादेश को भी समाप्त करना जरूरी बताती हैं, जो महिलाओं और अल्पसंख्यकों के खिलाफ कानून का सबसे हिंसक रूप है। साथ ही पाकिस्तान की सामंती अर्थव्यवस्था को समाप्त करते हुए एक बार फिर उसी तरह सही मायने में भू-सुधार लागू करने की वकालत करती हैं, जसा उनके दादा जुल्फिकार अली भुट्टो के कार्यकाल में हुआ था।

उन्नत्तीस मई, 1982 को अफगानिस्तान के काबुल में पैदा हुईं फातिमा का बचपन कई मुल्कों में बीता। उनका जन्म तब हुआ था जब जनरल जिया उल हक के शासन के दौरान पिता को फांसी दिए जाने के बाद मुर्तजा अफगानिस्तान में निर्वासित जीवन बिता रहे थे। वहीं उन्होंने अफगान सरकार के एक अधिकारी की बेटी से निकाह किया था, जिससे फातिमा हुईं। लेकिन दोनों का साथ अधिक दिनों तक नहीं रह सका और उनके बीच तलाक हो गया। पर मुर्तजा को अपनी बेटी से बहुत प्यार था और इसलिए वे उसे लेकर वहां से भाग निकले। इस बीच वे फातिमा को लेकर त्रिपोली, फ्रांस और दमस्कस में छिपकर जीवन बिताते रहे, क्योंकि पाक खुफिया एजेंसी भी उन्हें ढूंढ़ रही थी। सीरिया में उनकी मुलाकात लेबनानी महिला गिनवा इटोई से हुई, जिससे उन्होंने निकाह कर लिया। इस वक्त फातिमा अपनी सौतेली मां गिनवा के साथ ही कराची में रह रही हैं, जिनसे उनके रिश्ते काफी अच्छे रहे हैं।

मुर्तजा 1993 में फातिमा और पत्नी गिनवा को लेकर पाकिस्तान लौटे, जहां से उनकी सेकेंडरी शिक्षा पूरी हुई। इसके बाद उन्होंने कोलंबिया विश्वविद्यालय से मध्य-पूर्व विषयों में बीए की डिग्री ली। लंदन विश्वविद्यालय से उन्होंने दक्षिण एशियाई विषयों में एमए की डिग्री ली। छात्र जीवन से ही वे लेखन में सक्रिय रहीं, जो आज तक जारी है। फातिमा ने भले ही फिलहाल राजनीति में आने से इनकार किया है और लेखन के जरिये ही सक्रिय रहने की बात कही है, लेकिन आने वाले दिनों में वे जरदारी और उनके बेटे बिलावल, जो पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी के मौजूदा अध्यक्ष हैं, के लिए एक बड़ा खतरा बन सकती हैं।

2 टिप्पणियाँ:

बेनामी ने कहा…

aapka prayas sarahniy hai. yuva varg ko yah vishesh roop se pasand aayega.kyoki fatima ek yuva aur jujharoo lekhika hain.

badhai........

kumar vaibhav ने कहा…

shandar n intresting