मंगलवार, 4 मई 2010

गुरुजी अपरंपार

कटौती प्रस्ताव पर मतदान सबसे दिलचस्प मामला था शिबू सोरेन का। वे झारखंड में भाजपा के साथ सरकार चला रहे थे। मुख्यमंत्री होते हुए उन्हें खास तौर पर बुलाया गया कि पक्ष में वोट बढ़ेगा, लेकिन उन्होंने वोट दिया यूपीए के पक्ष में। जाहिर तौर पर भाजपा भन्ना गई। गुरुजी ने सतता खिसकते देख गलती मानी। माफी मांगी। लुभावनी पेशकश से भाजपा को ललचा दिया।



एक वोट संसदीय प्रणाली में भूचाल ला सकता है। इसकी वजह से कभी सरकार गिर सकती है, तो कभी उसकी स्थिरता पर संकट छा सकता है। बारह साल पहले सिर्फ एक वोट से प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में कें्र की भाजपा नीत राजग सरकार गिर गई थी। बारह साल बाद ऐसी ही स्थिति फिर सामने आई, जब झारखंड की सरकार की स्थिरता पर संकट के बादल मंडराने लगे। यह भी गजब का इत्तेफाक रहा कि दोनों वोट दो राज्यों के मुख्यमंत्रियों ने दिया, जो राज्य में सत्ता संभालने के बावजूद तब तक लोकसभा के सदस्य थे।

बारह साल पहले यानी 1998 में यह वोट था, उड़ीसा के मुख्यमंत्री गिरिधर गोमांग का और इस बार यह वोट है झारखंड के मुख्यमंत्री शिबू सोरेन का। 1998 में गोमांग ने वाजपेयी सरकार द्वारा लाए गए विश्वास पक्ष के खिलाफ मतदान कर उनकी तेरह दिन पुरानी सरकार गिरा दी थी, तो इस बार बीस अप्रैल, 2010 को सोरेन ने विपक्ष द्वारा लाए गए कटौती प्रस्ताव पर यूपीए सरकार के खिलाफ मतदान न कर उसके पक्ष में कर दिया। जाहिर तौर पर सोरेन के इस कदम ने भाजपा को आहत किया और उसने इसे गठबंधन धर्म का उल्लंघन बताते हुए ‘विश्वासघातज् करार दिया। भाजपा ने, जो झारखंड में सोरेन की सरकार को समर्थन दे रही थी, तत्काल समर्थन वापसी का फैसला किया। लेकिन समर्थकों में ‘गुरुजीज् के नाम से मशहूर राजनीति के इस चतुर खिलाड़ी ने तुरंत माफी मांग ली। कहा, गलती से डाल दिया सरकार के पक्ष में वोट। पार्टी नेताओं ने कहा कि सोरेन ‘अल्जाईमर्सज् से पीड़ित हैं और इसलिए कई बार उन्हें पता नहीं होता कि वे क्या कर रहे हैं। कटौती प्रस्ताव पर यूपीए सरकार के पक्ष में भी उन्होंने मतदान इसी बीमारी के प्रभाव में किया।

लेकिन सोरेन के अब तक के राजनीतिक कॅरियर को देखते हुए यह बात इतनी छोटी और आसान नहीं जान पड़ती। यह तर्क गले नहीं उतरता कि उन्होंने गलती से सरकार के पक्ष में मतदान कर दिया। दरसअल, सोरेन राजनीति के ऐसे चतुर खिलाड़ी हैं, जो सत्ता में रहने के लिए हर किसी को तौलते हैं। जानकारों के मुताबिक कटौती प्रस्ताव पर मतदान के दौरान उन्होंने न केवल लाल बटन दबाया, बल्कि पर्ची पर भी यूपीए सरकार के पक्ष में ही मतदान किया। ऐसे में यह गलती से उठाया गया कदम नहीं हो सकता। संभव है कि अंदर ही अंदर कांग्रेस से उनकी कोई डील हो गई हो, कें्र में किसी मंत्री पद के लिए उन्होंने ऐसा किया हो, क्योंकि झारखंड राज्य की राजनीति में उनका कॅरियर ढलान पर है। लेकिन कांग्रेस से नकार पाकर उन्होंने एक ऐसा प्रस्ताव भाजपा से कर लिया कि वह बगलें झांकने लगी। समर्थन वापसी के फैसले को जाम कर दिया। सोरेन ने कहा कि वे भाजपा के मुख्यमंत्री के साथ काम करने को तैयार हैं। अब भाजपा में उल्टा बवाल है कि मुख्यमंत्री कौन हो?

पिछले साल तमार विधानसभा सीट से चुनाव हारने के बाद सोरेन को मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देना पड़ा था, जिसके बाद राज्य में राष्ट्रपति शासन लगा। इस बीच लोकसभा चुनाव में उन्हें जीत मिली। राज्य में हुए विधानसभा चुनाव में भी उनकी पार्टी 18 सीट जीतकर आई। भाजपा व कुछ अन्य सहयोगियों के समर्थन से सोरेन फिर मुख्यमंत्री बने। लेकिन मुख्यमंत्री बने रहने के लिए छह माह के अंदर उनका विधानसभा सदस्य चुना जाना आवश्यक है। पर कोई भी उनके लिए सीट खाली करने को तैयार नहीं है। न तो उनके बेटे हेमंत सोरेन दुमका विधानसभा सीट और न ही बहू सीता सोरेन जामा विधानसभा सीट छोड़ने को तैयार हैं।

अब भाजपा भले ही सोरेन के इस कदम को ‘विश्वासघातज् करार दे, लेकिन पिछले करीब तीन दशक के सोरेन के राजनीतिक जीवन को देखते हुए यह उनका कोई चौंकानेवाला कदम मालूम नहीं होता। अपने अब तक के राजनीतिक कॅरियर में सोरेन हमेशा सत्ता के करीब रहे और इसके लिए बार-बार पाला बदलते रहे। 1980 में जब वे पहली बार लोकसभा के लिए चुने गए तो कांग्रेस (आई) के साथ थे। लेकिन तीन साल बाद ही उन्होंने जनता पार्टी का दामन थाम लिया। पर 1985 में विधानसभा चुनाव के दौरान वे फिर कांग्रेसी खेमे में आ गए। 1990 में वे फिर कांग्रेस के खिलाफ चले गए और 1991 का लोकसभा चुनाव उन्होंने जनता पार्टी के सहयोगी के रूप में झारखंड मुक्ति मोर्चा से लड़ा। सोरेन सहित पार्टी के छह सांसद चुने गए। लेकिन जब कें्र की कांग्रेस नीत नरसिम्हा राव सरकार संसद में विश्वास प्रस्ताव लेकर आई तो सोरेन सहित उनके सभी सांसदों ने सरकार के पक्ष में मतदान किया। आरोप लगा कि झामुमो के सांसदों ने नरसिम्हा राव सरकार को बचाने के लिए साढ़े तीन-तीन करोड़ रुपए लिए। भारतीय संसदीय प्रणाली के अब के सबसे बड़े सांसद रिश्वत कांड में उन्हें जेल भी हुई।

वर्ष 2000 में जब झारखंड बिहार से अलग हुआ तो सोरेन कें्र की तत्कालीन राजग सरकार के साथ हो गए, इस उम्मीद में कि संभवत: भाजपा मुख्यमंत्री बनने में उनका साथ देगी। लेकिन जब पार्टी ने बाबू लाल मरांडी को अपने मुख्यमंत्री रूप में पेश किया तो सोरेन उससे अलग हो गए और एक बार फिर कांग्रेस के साथ चले गए। बाद में वे कें्र में यूपीए सरकार के कार्यकाल के दौरान कोयला मंत्री भी बने। लेकिन चिरुडीह नरसंहार में वारंट जारी होने के बाद उन्हें अपने पद से इस्तीफा देना पड़ा। इस बीच 2005 में वे पहली बार कांग्रेस और राष्ट्रीय जनता दल के समर्थन से मुख्यमंत्री बने, लेकिन उनकी सरकार नौ दिन ही चल पाई। विश्वास मत हासिल नहीं कर पाने के कारण उनकी सरकार गिर गई। 2007 में निर्दलीय विधायक मधु कोड़ा को मुख्यमंत्री बनाने की कांग्रेस और आरजेडी की मुहिम को भी उन्होंने समर्थन दिया, लेकिन सालभर बाद ही उन्होंने सरकार से समर्थन वापस ले लिया। वे स्वयं मुख्यमंत्री बने, लेकिन तमार विधानसभा का उपचुनाव हार जाने के कारण उन्हें इस्तीफा देना पड़ा। राज्य में फिर चुनाव हुए। हालांकि किसी भी दल को बहुमत नहीं मिला, लेकिन नतीजे का अंकगणित सोरेन के साथ था। उनके बिना किसी की सरकार नहीं बन सकती थी। राज्य में एक बार फिर अपनी सरकार बनाने के लिए अब तक यूपीए के घटक रहे गुरुजी को सरकार बनाने के लिए एनडीए का सहयोग लेने में कोई हर्ज नहीं दिखा।

एक बार फिर ‘अल्जाईमर्सज् के नाम पर उन्होंने पलटी मारते हुए लोकसभा में कटौती प्रस्ताव पर यूपीए के पक्ष में मतदान कर दिया। सोरेन के पिछले तीन दशक के राजनीतिक उलट-पुलट को देखते हुए कहा जा सकता है कि वे राजनीति के ऐसे चतुर सुजान हैं, जो जानते हैं कि कब किस करवट होना फायदेमंद होगा।

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