शनिवार, 28 मार्च 2009

सौ साल बाद हिंद स्वराज

प्रसिद्ध गांधीवादी चिन्तक देवदत्त से साक्षात्कार के आधार पर

महात्मा गांधी की पुस्तक ‘हिंद स्वराजज् के बारे में कुछ भी कहने से पहले यह बताना जरूरी है कि यह आधुनिक समाज की विकृतियों से पार पाने का विकल्प प्रस्तुत करती है। इसमें कोई नुस्खा नहीं है, बल्कि दृष्टिकोण है, जिसके सहारे आधुनिक सभ्यता की समस्या का निदान ढूंढ़ा जा सकता है। अफ्रीका, इंगलैंड और भारत में कुछ साल बिताए वक्त से उन्हें जो अनुभव हुआ, उसे ही उन्होंने ‘हिंद स्वराजज् के रूप में पन्नों पर उकेरा।

यह पुस्तक उन्होंने 1909 में लंदन से केपटाउन जाते वक्त जहाज में 21 दिन में गुजराती भाषा में लिखी थी। इसके लिए उन्होंने जहाज में इस्तेमाल हो चुके पन्नों के पिछले हिस्से का उपयोग किया था। इससे जाहिर होता है कि उनके मन में अपनी बात कहने और उन समस्याओं से समाज को अवगत कराने की कितनी उत्कंठा थी, जिसे उन्होंने महसूस किया था। वास्तव में यह किताब एक साधारण व्यक्ति के अनुभव की दास्तां हैं, क्योंकि तब पुस्तक का लिखने वाला महात्मा नहीं सिर्फ मोहनदास करमचंद गांधी था।

आज हम पुस्तक की सौवीं वर्षगांठ मना रहे हैं। लेकिन मुङो खेद के साथ कहना पड़ रहा है कि सौ साल बाद भी हमें पुस्तक के बारे में वास्तविक समझ नहीं है। इसे लेकर बस गांधीगिरी की जा रही है। तथाकथित गांधीवादी या गैर-सरकारी संगठन महज कुछ औपचारिकता पूरी कर रहे हैं। पुस्तक के मूल तत्व पर कहीं बहस नहीं हो रही। नोबल विजेता वीएस नायपॉल की टिप्पणी इसके बारे में बिल्कुल सटीक मालूम पड़ती है, ‘हिंदुस्तान के लोगों ने न हिंद स्वराज पढ़ा है और न पढ़ते हैं।ज्

जहां तक पुस्तक की प्रासंगिकता का सवाल है तो 21वीं सदी में भी इससे इनकार नहीं किया जा सकता। खासतौर पर, आज की बुनियादी समस्याओं से उबरने में इसका दृष्टिकोण कारगर साबित हो सकता है। स्वयं गांधी ने खासतौर पर भारतीय परिप्रेक्ष्य में इसकी प्रासंगिकता की बात कही थी। उनका साफ मानना था, ‘हिंदुस्तान को कभी आधुनिक सभ्यता रास नहीं आएगी, इसलिए हमें देहाती सभ्यता की ओर जाना चाहिए।ज् यहां यह उल्लेखनीय है कि नैतिक आधार वाली सभ्यता को वह देहाती और भौतिक आधार वाली सभ्यता को आधुनिक मानते थे।

चूंकि गांधी स्वयं इस पुस्तक को भारत के संदर्भ में प्रासंगिक मानते थे, इसलिए उन्होंने इस पर बहस को आगे बढ़ाने की कोशिश की। इसे उन्होंने गुजराती में लिखा था, लेकिन अधिक से अधिक लोगों तक इसे पहुंचाने के लिए उन्होंने स्वयं ही इसका अंग्रेजी अनुवाद किया। लेकिन हमारे देश के राजनेताओं ने इसे कभी स्वीकार नहीं किया। उन्होंने इसे 1945 में ही ठुकरा दिया था। तब पुस्तक पर बहस आगे बढ़ाने की गरज से गांधी ने जवाहर लाल नेहरू को यह कहते हुए पत्र लिखा था, ‘हिंदुस्तान को बदलने के लिए और आजाद भारत के नवनिर्माण के लिए हिंद स्वराज प्रासंगिक है। लेकिन मैं इसमें एक परिवर्तन करना चाहूंगा। यह कि किताब में मैंने प्रजातंत्र को वेश्या कहा है, जबकि अब मैं इसे बांझ करना चाहता हूं।ज् तब जवाहर ने इसे ‘अयथार्थवादीज् कहकर टाल दिया था। बहस को और आगे ले जाने के लिए गांधी ने नेहरू को दूसरा पत्र लिखा, जिसका उन्होंने कोई जवाब नहीं दिया। साफ है कि हमारा राजनीतिक नेतृत्व कभी इस बहस को आगे बढ़ाने के पक्ष में नहीं रहा।

आजाद भारत में संविधान निर्माण के दौरान इस पर बहस हुई। संविधान सभा में तीन दिन तक इस पर बहस हुई, जिसमें गांधी के पंचायती राज-व्यवस्था पर बहुसम्मति बनी। लेकिन तब भी डॉ. भीम राव अंबेडकर और बीएन राय ने इसे यह कहकर टाल दिया कि बात सही है, लेकिन संविधान का निर्माण लगभग हो चुका है। इसलिए इसे राज्य के नीति-निर्देशक तत्वों में शामिल कर दिया जाएगा। इस तरह संविधान सभा ने भी पंचायती राज-व्यवस्था को लेकर जिम्मेदारी आने वाली सरकारों पर छोड़कर अपना पल्ला झाड़ लिया और पुस्तक के तत्वों पर बहस यहीं खत्म हो गई।

लेकिन भारतीय राजनेताओं ने भले ही इस पर बहस को आगे बढ़ाने में रुचि नहीं ली, विदेशी विद्वानों और चिंतकों ने इसे हमेशा सराहा। रूसी चिंतक और उपन्यासकार लियो टॉलस्टॉय ने ‘¨हद स्वराजज् को ऐतिहासिक करार देते हुए ‘न केवल भारत, बल्कि पूरी मानवता के लिए महत्वपूर्णज् बताया था। पश्चिम के विद्वान आज भी ‘हिंद स्वराजज् को अपने सिद्धांतों में फिट करने की कोशिश कर रहे हैं। पिछले माह दिल्ली में ‘हिंद स्वराज की प्रासंगिकताज् पर हुए एक सेमिनार में 37 देशों के 226 प्रतिनिधियों ने भाग लिया था। दो दिन तक चले इस सेमिनार में 67 पेपर प्रस्तुत किए गए थे, लेकिन आश्चर्य की बात है कि सभी पेपर विदेशी विद्वानों के थे, किसी भारतीय की इस पर कोई प्रस्तुति नहीं थी। इससे भी ज्यादा खेदजनक यह है कि सेमिनार में भारतीय प्रतिनिधियों की ओर से कोई सारगर्भित प्रश्न नहीं उठाए गए। हां, आईआईटी और मैनेजमेंट के कुछ छात्रों ने अपेक्षाकृत अधिक प्रासंगिक प्रश्न उठाए, जिससे कुछ युवाओं में इसके प्रति रुझान के संकेत मिलते हैं, जो सकारात्मक है। कुल मिलाकर, हमें हमारी ही कृति के बारे में आज विदेशी विद्वानों और चिंतकों से पता चल रहा है, ठीक वैसे ही जसे ग्रीक सभ्यता अरब के माध्यम से वापस यूरोप गई थी।

‘हिंद स्वराजज् की सौवीं वर्षगांठ के मौके पर पूरे साल निश्चय ही जगह-जगह कई कार्यक्रम आयोजित किए जाएंगे। लेकिन मुङो बहुत खेद के साथ कहना पड़ रहा है कि यह भी महज औपचारिकता बनकर रह जाएगी। इसके साथ आज कुछ वैसा ही हो रहा है, जसा गुरुनानक देव के शव पर पड़े चादर के साथ हुआ था। तब उनसे स्वयं को जोड़ने के लिए लोग उनके मृत शरीर पर पड़े चादर के कई टुकड़े कर उसे अपने साथ ले गए थे। आज वही ‘हिंद स्वराजज् के साथ हो रहा है। विभिन्न वर्ग, खासकर राजनेता अपनी वैधता के लिए इसका इस्तेमाल कर रहे हैं।

1 टिप्पणियाँ:

Abhishek Mishra ने कहा…

अच्छी पोस्ट. स्वागत गाँधी विचार को समर्पित मेरे ब्लॉग पर भी.
(gandhivichar.blogspot.com)